क्या चीज हैं ये अंक भी। एक-एक अंक अपने 'अंक' में कैसी-कैसी विशेषताएं, कैसे-कैसे रहस्य लिये दुनिया को नचाते रहते हैं। आज अंक "सात" की बात करते हैं।
हमारी संस्कृति में, हमारे जीवन में, हमारे जगत में इस अंक विशेष का एक महत्वपूर्ण स्थान है।
सूर्य के रथ में सात घोड़ों का जिक्र आता है। प्रकाश में सात रंग होते हैं। सुर में सात स्वर, सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि, यानि, षड़ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद होते हैं। सात लोकों, भू, भुव:, स्व:, मह:, जन, तप और सत्य, का वर्णन मिलता है। पाताल भी सात ही गिनाये गये हैं जैसे, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। सात द्विपों के साथ-साथ सात समुद्रों का अस्तित्व है। सात ही पदार्थ, गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि, शुभ माने जाते हैं। सात क्रियायें, शौच, मुखशुद्धी, स्नान, ध्यान, भोजन, भजन तथा निद्रा आवश्यक होती हैं। इन सात जनों, ईश्वर, माता, पिता, गुरु, सूर्य, अग्नि तथा अतिथी का सम्मान करने के साथ-साथ इन सात विकारों का, ईर्ष्या, क्रोध, मोह, द्वेष, लोभ, घृणा तथा कुविचारों का त्याग करना चाहिये। हमारे वेदों में स्नान भी सात ही प्रकार के बताये गये हैं यथा, मंत्र स्नान, भौम स्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, करुण स्नान और मानसिक स्नान।
शायद इसीलिये हमारे ऋषि-मुनियों ने वैदिक रीति से होने वाले विवाहों में सात फेरों तथा सात वचनों का प्रावधान रखा था। वैदिक नियमों के अनुसार अपने परिजनों की साक्षी में वर-वधु पवित्र अग्नि के सात फेरे लेकर सात वचनों को निभाने का प्रण करते हैं। दोनों मिल कर यह कामना करते हैं कि हमें सदा मरीची, अंगिरा, अत्री, पुलह, केतु, पौलस्त्य,और वशिष्ठ इन सातों ऋषियों का आशिर्वाद मिलता रहे। हमारा प्रेम सात समुंदरों जैसा गहरा हो। निश दिन उसमें सातों सुरों का संगीत गुंजायमान हो। जीवन में सदा सातों रंगों का प्रकाश विद्यमान रहे। और हमारी ख्याति सातों लोकों में फैल जाये।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
मंगलवार, 26 मई 2009
रविवार, 24 मई 2009
एक मीठी भाषा 'बांग्ला'
वैसे तो हिंदी सारे भारत में बोली समझी जाती है, पर अलग-अलग राज्यों में स्थानीय भाषायें इसे प्रभावित भी करती रहती हैं। यह घालमेल कभी-कभी बड़ी मनोरंजक स्थितियां पैदा कर देता है। आज बांग्ला - हिंदी की बात करने से पहले भाषा के कारण उपजे हास्य को चख लें -
कलकत्ते में हर प्रांत के लोग मिल-जुल कर रहते हैं तथा एक-दूसरे के तीज-त्योहार में शामिल होना आम बात है। ऐसे ही मोहल्ले में मुशायरा हो रहा था कि गोपाल बाबू अड़ गये कि हाम भी गोजल पढेगा। लोगों ने समझाया कि दादा उर्दू आपके बस की बात नहीं है। पर वह गोपाल ही क्या जो मान जाये। अंत में उन्हें दो लाईने दी गयीं कि इसे रट लो। लिखा था "न गिला करुंगा, न शिकवा करुंगा। तू सलामत रहे यही दुआ करुंगा।" गोपाल बाबू खुश। जब उनका नाम पुकारा गया तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से पढना शुरु किया -" ना गीला कोरुंगा ना सूखा कोरुंगा तू साला मत रहे यही दूआ कोरुंगा"।अंदाज ही लगाया जा सकता है मुशायरे के हाल का।
बांग्ला में लड़के को खोका और लड़की को खोकी कहते हैं। खांसी को खोखी कहा जाता है। दफ्तर में बनर्जी बाबू को खांसी दम ना लेने दे रही थी सो उन्होंने अपने पंजाबी boss शर्माजी के पास जाकर कहा - सार, खोखी हुआ है, छुटी चाहिये।शर्माजी बोले - ओये बनर्जी चिंता ना कर अगले साल खोखा भी हो जायेगा।
बंगाली में कहीं-कहीं 'अ' का उच्चारण 'ओ' की तरह होता है, पर यह नियमबद्ध है हर बार ऐसा नहीं होता है। कलकत्ते में सियाल्दह स्टेशन के पास लक्ष्मी बाबू की एक सोने-चांदी की दुकान हुआ करती थी। उस समय आज की तरह ज्वेलर्स लिखने का चलन नहीं था। सभी की सहूलियत के लिये दुकान के दरवाजे के एक तरफ बांग्ला में लिखा हुआ था " लखी बाबुर सोना चांदीर दोकान"। इसी को दरवाजे की दूसरी तरफ हिंदी में लिख दिया गया था "लखी बाबू का सोना चांदी का दोकान" ले भाई एक कान सोने का दूसरा चांदी का, ऐश कर।
इस भाषा में मिठास बहुत है, पूरी तरह रसगुल्ले की चाशनी में पगी हुई होती है। विश्वास नहीं है तो देखिये - शाम के समय बनर्जी बाबू बाग मे बैठे हुए ठंड़ी हवा का आनंद लेने के बाद जब बाहर निकले तो उन्हें एहसास हुआ कि उनकी जेब काट ली गयी है। वे तुरंत फिर बाग के अंदर गये और वहां के माली से पूछा कि अभी जो यहां मेरे साथ एक भद्र लोक (पुरुष) बैठे थे उन्हें देखा ? माली ने जवाब दिया, नहीं। पर हुआ क्या ? बनर्जी बाबू बोले, अरे देखो न, वह भद्र लोक हमारी पोकेट मार कर भाग गया।गोयाकी पोकेटमार भी भद्र पुरुष होता है।
अब ऐसा है कि इस विषय पर लिखा जाय तो यह हनुमान जी की पूंछ की तरह बढता ही चला जायेगा। सोचा था कि बंगाल की हिंदी के बारे में लिखुंगा पर भटक गया। पर एक गुजारिश भी है कि इस भटकन को खेल भावना से ही लिया जाय। अगली बार रास्ते पर आ दोनों भाषाओं पर चर्चा करने की कोशिश करुंगा। तब तक के लिये नोमोश्कार।
कलकत्ते में हर प्रांत के लोग मिल-जुल कर रहते हैं तथा एक-दूसरे के तीज-त्योहार में शामिल होना आम बात है। ऐसे ही मोहल्ले में मुशायरा हो रहा था कि गोपाल बाबू अड़ गये कि हाम भी गोजल पढेगा। लोगों ने समझाया कि दादा उर्दू आपके बस की बात नहीं है। पर वह गोपाल ही क्या जो मान जाये। अंत में उन्हें दो लाईने दी गयीं कि इसे रट लो। लिखा था "न गिला करुंगा, न शिकवा करुंगा। तू सलामत रहे यही दुआ करुंगा।" गोपाल बाबू खुश। जब उनका नाम पुकारा गया तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से पढना शुरु किया -" ना गीला कोरुंगा ना सूखा कोरुंगा तू साला मत रहे यही दूआ कोरुंगा"।अंदाज ही लगाया जा सकता है मुशायरे के हाल का।
बांग्ला में लड़के को खोका और लड़की को खोकी कहते हैं। खांसी को खोखी कहा जाता है। दफ्तर में बनर्जी बाबू को खांसी दम ना लेने दे रही थी सो उन्होंने अपने पंजाबी boss शर्माजी के पास जाकर कहा - सार, खोखी हुआ है, छुटी चाहिये।शर्माजी बोले - ओये बनर्जी चिंता ना कर अगले साल खोखा भी हो जायेगा।
बंगाली में कहीं-कहीं 'अ' का उच्चारण 'ओ' की तरह होता है, पर यह नियमबद्ध है हर बार ऐसा नहीं होता है। कलकत्ते में सियाल्दह स्टेशन के पास लक्ष्मी बाबू की एक सोने-चांदी की दुकान हुआ करती थी। उस समय आज की तरह ज्वेलर्स लिखने का चलन नहीं था। सभी की सहूलियत के लिये दुकान के दरवाजे के एक तरफ बांग्ला में लिखा हुआ था " लखी बाबुर सोना चांदीर दोकान"। इसी को दरवाजे की दूसरी तरफ हिंदी में लिख दिया गया था "लखी बाबू का सोना चांदी का दोकान" ले भाई एक कान सोने का दूसरा चांदी का, ऐश कर।
इस भाषा में मिठास बहुत है, पूरी तरह रसगुल्ले की चाशनी में पगी हुई होती है। विश्वास नहीं है तो देखिये - शाम के समय बनर्जी बाबू बाग मे बैठे हुए ठंड़ी हवा का आनंद लेने के बाद जब बाहर निकले तो उन्हें एहसास हुआ कि उनकी जेब काट ली गयी है। वे तुरंत फिर बाग के अंदर गये और वहां के माली से पूछा कि अभी जो यहां मेरे साथ एक भद्र लोक (पुरुष) बैठे थे उन्हें देखा ? माली ने जवाब दिया, नहीं। पर हुआ क्या ? बनर्जी बाबू बोले, अरे देखो न, वह भद्र लोक हमारी पोकेट मार कर भाग गया।गोयाकी पोकेटमार भी भद्र पुरुष होता है।
अब ऐसा है कि इस विषय पर लिखा जाय तो यह हनुमान जी की पूंछ की तरह बढता ही चला जायेगा। सोचा था कि बंगाल की हिंदी के बारे में लिखुंगा पर भटक गया। पर एक गुजारिश भी है कि इस भटकन को खेल भावना से ही लिया जाय। अगली बार रास्ते पर आ दोनों भाषाओं पर चर्चा करने की कोशिश करुंगा। तब तक के लिये नोमोश्कार।
शनिवार, 23 मई 2009
शीर्षक देना जरूरी है, पर क्या शीर्षक दूँ ?
अपने राज भाटिया जी की माताजी की तबीयत बहुत नाजुक है। डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। आदमी चाहे कितना भी उम्रदराज हो जाये पर सदा अपने सर पर माँ के आंचल की छाया चाहता है। यही एक ऐसा रिश्ता है जिसमें किसी छल-फरेब-लालच का समावेश नहीं रहता। इतनी उम्र होने के बावजूद अभी भी जब बहुत हताश निराश हो जाता हूं तो माँ की गोद में सर रख देता हूं। भले ही वह मेरी परेशानी को दूर न कर पाती हों पर उनके हाथ का स्पर्श मिलते ही मुझमें एक हौसला जाग उठता है।भाटियाजी तो बहुत दूर हैं अपनी माताजी से उनकी मनोदशा को समझा जा सकता है। भगवान करे कि कोई चमत्कार हो और उनकी तबीयत सुधर जाये।
शुक्रवार, 22 मई 2009
क्या हनुमान जी के और भी पांच भाई थे ?
पिछले दिनों हिमाचल यात्रा के दौरान एक आश्चर्य जनक जानकारी मिली। एक जगह कथा के दौरान कथावाचक पंडितजी ने हनुमानजी के पांच छोटे भाईयों का जिक्र किया। जिनके नाम उन्होंने क्रमश: - मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान बताये। इसके साथ ही यह भी बताया कि वह सब विवाहित थे। पंडित जी की विद्वत्ता पर शक नहीं किया जा सकता था, कथा और भाषा पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। पर उनसे अपनी शंका का समाधान करने का अवसर और समय नहीं मिल पाया। हनुमानजी के इन अनुजों का मैंने आज तक कभी भी कहीं भी जिक्र न सुना है न पढा है। ऐसा क्यूं है कि कहीं भी इनके सहयोग का राम कथा में उल्लेख नहीं है। अब सारे ब्लागर भाईयों से ही यह उम्मीद है कि यदि किसी को इस बारे में कुछ जानकारी हो तो उसे हमारे बीच बांटे, जिससे इस शंका का समाधान हो सके। इंतजार रहेगा।
मंगलवार, 19 मई 2009
बंगाल के सुंदरवन में दहशत में इंसानी जिन्दगी
संसार में बंगाल का सुंदरवन ही शायद अकेली जगह है, जहाँ शेर लगातार आदमी का शिकार करते रहतें हैं। वहाँ के लोग किन परस्थितियों में जी रहे हैं इसका रत्ती भर अंदाज भी बाहर की दुनिया को नही है। वातानुकूलित कमरों में बैठ कर बंदरों-भालुओं को बचाने की बातें करने वाले तथाकथित पशु संरक्षकों से गुजारिश है कि कभी समय निकाल कर इंसान की जद्दोजहद की ओर भी ध्यान देने का कष्ट करें। वे पायेंगे कि कहीं-कहीं जानवर ही नहीं आदमी को भी बचाने की जरूरत है कुछ दिन पहले सुंदरवन के एक सुदूर गाँव का निवासी फटिक हालदार मछली पकड़ने अपने दो साथियों के साथ नदी पर गया था। फटिक तो पानी में उतर गया जबकि उसके दोनों साथी, बापी और दिलीप, नाव में उसकी सहायता के लिए रह गए। अभी फटिक ने जाल फेंका ही था कि पीछे से शेर ने उस पर धावा बोल दिया। फटिक तो शेर को देख भी ना पाया, परन्तु उसके दोनों साथी शेर की झलक पाते ही बेहोश हो नाव में गिर पड़े। शेर ने फटिक का कंधा अपने जबड़ों में ले झिन्झोड़ना शुरू कर दिया। पहले तो फटिक होशोहवाश खो बैठा, उसके पैर पानी में कीचड में धसे हुए थे , सर पर शेर सवार था, साथी बेहोश पड़े थे। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। उसे अपने पिता कि याद आयी जो इसी तरह शेर का शिकार हो गया था, उसे अपने बच्चों की याद आयी जो घर पर उसकी राह देख रहे थे। उसने अपने पैरों को मजबूती के साथ कीचड में गड़ाया और शेर के गले को अपनी बाँहों में कस कर पकड़ लिया। पानी में होने के कारण शेर भी फटिक पर काबू नहीं पा रहा था। फटिक के अनुसार उसके कन्धों में शेर के नुकीले दांत भाले की तरह घुसे हुए थे और वह पूरा मांस खींच लेना चाहता था। इसी बीच मैंने अपने घुटनों से उसके पेट पर वार किया और उसके मुहँ पर, चीखते हुए, एक जोरदार प्रहार किया। पता नहीं क्या हुआ भगवान् की दया से शेर मुझे छोड़ कर भाग गया और मैं पानी में गिर पडा पर मैं जानता था कि यदि मैं बेहोश हो गया तो मैं मर जाऊँगा सो मैंने किसी तरह नाव मे चढ़ कर अपने साथियों को होश दिलाया, फिर क्या हुआ मुझे नहीं पता। इसके बाद नाव में चार घंटों के सफर के बाद वे तीनो किसी तरह अपने गाँव पहुंचे । वहाँ से फटिक को एक घंटे की यात्रा के बाद जामत्तल्ला कस्बे की डिस्पेंन्सरी मे पहुंचाया गया जहाँ प्राथमिक चिकित्सा देने के बाद उसे कोलकत्ता भेजा गया। वहाँ डॉक्टरों के अथक प्रयास से फटिक की जान बच पाई । पर फटिक ने अपना पुस्तैनी धधा बंद करने का फैसला कर लिया है। वह नहीं चाहता कि ऐसे किसी हादसे मे उसकी जान चली जाने पर उसके परिवार को भूखा रहना पड़े।
सोमवार, 18 मई 2009
गिरने-गिरने का फर्क
संता :- ओये बन्तया, इक बात बता.
बंता :- पुच्छो जी,
संता :- पांचवी मंजिल और पहली मंजिल से गिरने में क्या फर्क है ?
बंता :- पांचवी मंजिल से गिरते आदमी की आवाज आती है ____ आआआअआआआआआआअ ## धप्प
और पहली मंजिल से गिरे आदमी से आवाज आती है --------- धप्प ## आआआआआआआअ
बंता :- पुच्छो जी,
संता :- पांचवी मंजिल और पहली मंजिल से गिरने में क्या फर्क है ?
बंता :- पांचवी मंजिल से गिरते आदमी की आवाज आती है ____ आआआअआआआआआआअ ## धप्प
और पहली मंजिल से गिरे आदमी से आवाज आती है --------- धप्प ## आआआआआआआअ
रविवार, 17 मई 2009
लंगडा आम, ऐसा नाम कैसे पडा
अपनी सुगंध, मिठास तथा स्वाद के कारण आम फ़लों का राजा कहलाता है। तरह-तरह के नाम हैं इसके - हापुस, चौसा, हिमसागर, सिंदुरी, सफ़ेदा, गुलाबखास, दशहरी इत्यादि-इत्यादि, पर बनारस का एक कलमी सब पर भारी पडता है। यह खुद जितना स्वादिष्ट होता है उतना ही अजीब नाम है उसका "लंगडा"। यह आमों का सरताज है। इसका राज फ़ैला हुआ है बनारस के रामनगर के इलाके में। इसका नाम ऐसा क्यों पडा इसकी भी एक कहानी है।
बनारस के राम नगर के शिव मंदिर में एक सरल चित्त पुजारी पूरी श्रद्धा-भक्ती से शिवजी की पूजा अर्चना किया करते थे। एक दिन कहीं से घूमते हुये एक साधू महाराज वहां पहुंचे और कुछ दिन मंदिर मे रुकने की इच्छा प्रगट की। पूजारी ने सहर्ष उनके रुकने की व्यवस्था कर दी। साधू महाराज के पास आम के दो पौधे थे जिन्हें उन्होंने मंदिर के प्रांगण में रोप दिया। उनकी देख-रेख में पौधे बड़े होने लगे और समयानुसार उनमें मंजरी लगी। जिसे साधू महाराज ने शिवजी को अर्पित कर दिया। रमता साधू शायद इसी दिन के इंतजार मे था, उन्होंने पुजारीजी से अपने प्रस्थान की मंशा जाहिर की और जाते-जाते उन्हें हिदायत दी कि इन पौधों की तुम पुत्रवत रक्षा करना। इनके फ़लों को पहले प्रभू को अर्पण कर फ़िर फ़ल के टुकडे कर प्रसाद के रूप में वितरण करना, पर ध्यान रहे किसी को भी साबुत फ़ल, इसकी कलम या टहनी अन्यत्र लगाने को नहीं देनी है। पुजारी से वचन ले साधू महाराज रवाना हो गये। समय के साथ पौधे वृक्ष बने उनमें फ़लों की भरमार होने लगी। जो कोई भी उस फ़ल को चखता वह और पाने के लिये लालायित हो उठता पर पुजारीजी किसी भी दवाब में न आ साधू महाराज के निर्देशानुसार कार्य करते रहे। समय के साथ-साथ फ़लों की शोहरत काशी दरबार तक भी जा पहुंची। एक दिन राजा ने भी प्रसाद चखा और उसके दैवी स्वाद से अभिभूत रह गये। उन्होंने उसी समय दरबार के माली को पुजारी के पास, आम की कलम लाने के आदेश के साथ भेज दिया। पुजारीजी धर्मसंकट मे पड गये। राजादेश को नकारा भी नहीं जा सकता था। सोचने के लिये समय चाहिये था सो उन्होंने दूसरे दिन खुद दरबार में हाजिर होने की आज्ञा मांगी। सारा दिन वह परेशान रहे। रात को उन्हें ऐसा आभास हुआ जैसे खुद शंकर भगवान उन्हें कह रहे हों कि काशी नरेश हमारे ही प्रतिनिधी हैं उनकी इच्छा का सम्मान करो। दूसरे दिन पुजारीजी ने टोकरा भर आम राजा को भेंट किये। वहां उपस्थित सभी लोगों ने उस दिव्य स्वाद का रसपान किया। फिर काशी नरेश की आज्ञानुसार माली ने उन फ़लों की अनेक कलमें लगायीं। जिससे धीरे-धीरे वहां आमों का बाग बन गया। आज वही बाग बनारस हिंदु विश्वविद्यालय को घेरे हुये है।
यह तो हुई आम की उत्पत्ती की कहानी। अब इसके अजीबोगरीब नाम की बात। शिव मंदिर के पुजारीजी के पैरों में तकलीफ़ रहा करती थी। जिससे वह लंगडा कर चला करते थे। इसलिये उन आमों को लंगडे बाबा के आमों के नाम से जाना जाता था। समय के साथ-साथ बाबा शब्द हटता चला गया और आम की यह जाति "लंगडा आम" के नाम से विश्व विख्यात होती चली गयी।
बनारस के राम नगर के शिव मंदिर में एक सरल चित्त पुजारी पूरी श्रद्धा-भक्ती से शिवजी की पूजा अर्चना किया करते थे। एक दिन कहीं से घूमते हुये एक साधू महाराज वहां पहुंचे और कुछ दिन मंदिर मे रुकने की इच्छा प्रगट की। पूजारी ने सहर्ष उनके रुकने की व्यवस्था कर दी। साधू महाराज के पास आम के दो पौधे थे जिन्हें उन्होंने मंदिर के प्रांगण में रोप दिया। उनकी देख-रेख में पौधे बड़े होने लगे और समयानुसार उनमें मंजरी लगी। जिसे साधू महाराज ने शिवजी को अर्पित कर दिया। रमता साधू शायद इसी दिन के इंतजार मे था, उन्होंने पुजारीजी से अपने प्रस्थान की मंशा जाहिर की और जाते-जाते उन्हें हिदायत दी कि इन पौधों की तुम पुत्रवत रक्षा करना। इनके फ़लों को पहले प्रभू को अर्पण कर फ़िर फ़ल के टुकडे कर प्रसाद के रूप में वितरण करना, पर ध्यान रहे किसी को भी साबुत फ़ल, इसकी कलम या टहनी अन्यत्र लगाने को नहीं देनी है। पुजारी से वचन ले साधू महाराज रवाना हो गये। समय के साथ पौधे वृक्ष बने उनमें फ़लों की भरमार होने लगी। जो कोई भी उस फ़ल को चखता वह और पाने के लिये लालायित हो उठता पर पुजारीजी किसी भी दवाब में न आ साधू महाराज के निर्देशानुसार कार्य करते रहे। समय के साथ-साथ फ़लों की शोहरत काशी दरबार तक भी जा पहुंची। एक दिन राजा ने भी प्रसाद चखा और उसके दैवी स्वाद से अभिभूत रह गये। उन्होंने उसी समय दरबार के माली को पुजारी के पास, आम की कलम लाने के आदेश के साथ भेज दिया। पुजारीजी धर्मसंकट मे पड गये। राजादेश को नकारा भी नहीं जा सकता था। सोचने के लिये समय चाहिये था सो उन्होंने दूसरे दिन खुद दरबार में हाजिर होने की आज्ञा मांगी। सारा दिन वह परेशान रहे। रात को उन्हें ऐसा आभास हुआ जैसे खुद शंकर भगवान उन्हें कह रहे हों कि काशी नरेश हमारे ही प्रतिनिधी हैं उनकी इच्छा का सम्मान करो। दूसरे दिन पुजारीजी ने टोकरा भर आम राजा को भेंट किये। वहां उपस्थित सभी लोगों ने उस दिव्य स्वाद का रसपान किया। फिर काशी नरेश की आज्ञानुसार माली ने उन फ़लों की अनेक कलमें लगायीं। जिससे धीरे-धीरे वहां आमों का बाग बन गया। आज वही बाग बनारस हिंदु विश्वविद्यालय को घेरे हुये है।
यह तो हुई आम की उत्पत्ती की कहानी। अब इसके अजीबोगरीब नाम की बात। शिव मंदिर के पुजारीजी के पैरों में तकलीफ़ रहा करती थी। जिससे वह लंगडा कर चला करते थे। इसलिये उन आमों को लंगडे बाबा के आमों के नाम से जाना जाता था। समय के साथ-साथ बाबा शब्द हटता चला गया और आम की यह जाति "लंगडा आम" के नाम से विश्व विख्यात होती चली गयी।
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