शनिवार, 16 मई 2009

कलयुगी श्रवण कुमार

आज हरिया अपने बेटे डा गोविन्द के साथ शहर जा रहा था। गाँव वाले अचंभित थे, गोविन्द के गाँव आने पर, उसके दो-दो नर्सिंग होम थे शहर में, इतना व्यस्त रहता था वह कि अपनी माँ के देहांत पर भी गाँव नहीं आ सका था। पर खुश भी थे, हरिया को चाहने वाले, यह सोच कर कि बीमार हरिया शहर में अपने बेटे के पास रह कर अपनी जिन्दगी के शेष दिन आराम से गुजार सकेगा।
उधर गोविन्द बाप को देख कर ही समझ गया था कि महीने दो महीने का खेल ही बचा है। उसे बाप की देह के किडनी इत्यादि अंग, बैंक बैलेंस में तब्दील होते नजर आ रहे थे।

मंगलवार, 12 मई 2009

हे भगवान, इतने जुड़वां

याद है ये फिल्में - कानून, राम और श्याम, सीता और गीता, अंगूर, शर्मीली वगैरह-वगैरह। ये वह फिल्में थीं जिनमें एक ही चेहरे के दो-दो इंसान या इंसाननीयां थीं और जिसके कारण पूरी फिल्म में अफरातफरी मची रहती है। और यह तब होता है जब कि कहानी में एक या दो जोड़े होते हैं। सोचिए यदि असली जिंदगी में ऐसे लोगों से पाला पड़ जाये वह भी एक दो नहीं 250 से भी ज्यादा जोड़ों से तो क्या हाल होगा। पर ऐसा है और अपने ही देश में ही है।
केरल के कोड़िन्ही नामक गांव ने दुनिया में शोहरत पायी है अपने यहां जन्मे जुड़वां बच्चों के कारण। यहां की सरकारी सूची में 250 जुड़वां बच्चों के जन्म का विवरण है, पर यहां के निवासियों के अनुसार इनकी संख्या इससे अधिक ही है। पिछले सात के करीब दशकों में यहां करीब 250 जुड़वों का जन्म हो चुका है। पिछले पांच सालों में ही करीब साठ जोड़ी बच्चे जन्म ले चुके हैं। हर साल यह दर बढती ही जा रही है। एक ही जगह इतनी बड़ी संख्या में जुड़वाओं ने अवतरित होकर वैज्ञानिकों को भी हैरानी में डाल रखा है।
हां, इसका कोई रेकार्ड नहीं है कि, कितने रामस्वरुपों ने शैतानी की, फलस्वरुप पकड़े गये।

रविवार, 10 मई 2009

प्रभू, तुम माँ के बराबर नही हो

कहते हैं कि ईश्वर हर जगह मौजूद नहीं रह सकता था इसीलिये उसने माँ की रचना की। पर यह उसकी एकमात्र रचना है, जो अपने रचयिता से भी महान हो गयी। क्योंकि :-
प्रभू सर्वव्यापक है। माँ भी है।
वह दया का सागर है। माँ भी है।
वह पालनकर्ता है। माँ भी है।
वह सुखदाता है। माँ भी है।
वह दुखहर्ता है। माँ भी है।
वह हमसाया है। माँ भी है।
वह सबके भोजन का प्रबंध करता है। माँ भी करती है।
परंतु :-माँ अपने शरीर का अंग काट कर रचना करती है।
माँ खुद भूखी रह कर बच्चों के खाने का प्रबंध करती है।
माँ खुद गीले में रह बच्चों को सुख की नींद देती है।
माँ खुद जाग-जाग कर तिमारदारी करती है।
माँ सपने में भी अपने बच्चों को कष्ट देने का नहीं सोच सकती।
मां कभी भी अपने किए का सिला नहीं चाहती।
मां तन-मन-धन से बच्चों के लिये न्योछावर रहती है।
माँ बच्चों पर विपत्ती आने पर अपनी जान की भी परवाह नहीं करती।
सबसे बड़ी बात प्रभू को भी माँ की जरूरत पड़ती है। वह भी समय-समय पर माँ के स्नेह, वात्सल्य, प्रेम, ममता को पाने के लिये अपने आप को रोक नहीं पाता।
और अंत में :- दुनिया में अनगिनत लोग हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं पर एक भी प्राणी ऐसा नहीं मिलेगा जो माँ के वजूद से इंकार कर सके।

गुरुवार, 7 मई 2009

टी. वी. पर यह किस जमाने की शकुन्तला है भाई

कल ऐसे ही रिमोट से टीवी के चैनलों का जायजा ले रहा था। अचानक एक जगह भव्य सेट देख कर थम गया। खोजा तो दिखा कि 'शकुन्तला' नाम का सीरीयल चल रहा है। आगे बढ़ने ही वाला था की परदे पर की कन्या ने साथ के युवक से कहा की आपके सर में दर्द हो रहा है, मैं "बाम" लगा देती हूँ। मुझे लगा की शायद मैंने ग़लत सुना हो, पर यकीन मानिए, वह सतयुगी बाला बार-बार कलयुगी शब्द "बाम" का उपयोग धड़ल्ले से करती रही। कम से कम तीन-चार बार तो उसने कहा ही होगा।
सोच-सोच कर ही डर लगता है कि इतना शक्तिशाली माध्यम कैसे-कैसे हाथों में चला गया है। यह तो एक बानगी है। पता नहीं कैसे-कैसे लोग कैसी-कैसी चीजें कैसे-कैसे रूपों में परोसे जा रहे हैं। लोगों का हाज़मा बिगडे उनकी बला से।

बुधवार, 6 मई 2009

अजीब है पर सच है

1) कागज की एक शीट को, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, चारों कोने मिला कर, आठ बार से ज्यादा फोल्ड नहीं किया जा सकता। कोशीश कर देखें।
2) FOUR एक ऐसी संख्या है, जिसमें अक्षर और संख्या का मान बराबर है।
3) कबूतर अकेला पक्षी है जो पानी को चूस कर पी सकता है। बाकी के पक्षियों को पानी निगलने के लिये अपनी गर्दन को पीछे झटकना पड़ता है।
4) आदमी अकेला प्राणी है जो पीठ के बल भी सो सकता है।
5) “37” एक ऐसी संख्या है जो खुद किसी और संख्या से विभाजित नहीं होती, पर नीचे वाली अजीबोगरीब संख्यायों को विभाजित कर देती है :- 111, 222, 333, 444, 555, 666, 777, 888, 999।
6) ज़ेबरे पर सफेद धारियां होती हैं ना कि काली।

रविवार, 3 मई 2009

"मंडी", जहाँ महाकाव्य महाभारत की रचना हुई थी.

इस बार अपने देश का अधिकतर भाग गर्मी की चपेट में है। इससे बचने के लिये पहाड़ों पर जाने का प्रोग्राम बना रहे हैं और प्रकृति की सुंदरता को करीब से देखना चाहते हैं तो अपेक्षाकृत कम जानीजाने वाली जगहों को अपनी छुट्टियों के लिये चुने। वहां मशहूर जगहों की अपेक्षा कम भीड़-भाड़ और ज्यादा सकून मिल पायेगा। ऐसी ही एक जगह है “मंडी”।
यह चण्ड़ीगढ कुल्लू मार्ग पर व्यास नदी के तट पर बसा बेहद खूबसूरत नगर है, जो प्राकृतिक सौंदर्य, एतिहासिक महत्ता और धार्मिक स्थलों के लिये खासा मशहूर है। ऐसा माना जाता है कि महर्षि मांड़व्य ने यहां घोर तपस्या की थी जिस कारण इसे मांडव्य के नाम से जाना जाने लगा। जो कालांतर में मंडी बन गया। यही वह स्थान है जहां महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की थी।
यहां वर्षों तक सैन वंश का शासन रहा जिन्होंने अपने शासन काल में सैंकड़ों मंदिरों, स्मारकों व किलों का निर्माण करवाया था। यहां अभी भी सौ से ज्यादा मंदिर हैं । जिनमें नीलकंठ महादेव, भूतनाथ, एकादश रुद्र, त्रिलोकी नाथ, अर्ध नारिश्वर, सिद्धकाली, सिद्धभद्रा, महामृत्युंजय आदि प्रमुख हैं।
यहां घूमने-देखने के लिये ढेरों स्थानों में रिवाल्सर,कमरूनाथ, पाराशर झील जैसी अनेकों जगहें हैं जिन्हें देख प्रकृति प्रेमियों का वापस जाने का दिल नहीं करता।
मंडी से 40 कि.मी. दूर पराशर झील के किनारे ऋषि पराशर का एक खूबसूरत पैगोड़ा शैली का बना हुआ मंदिर है। इस में लकडी पर उकेरी गयी आकृतियां इतनी लाजवाब हैं कि देखने वाला खड़ा का खड़ा रह जाता है। इस मंदिर में लक्ष्मी, विष्णू, दुर्गा तथा शिव जी की प्रतिमायें स्थापित हैं।
इसी तरह रिवाल्सर झील जो मंडी से 25कि.मी. की दूरी पर स्थित है, अपनी सुंदरता में अद्वितीय है। यह जगह महर्षि लोमष की तपोभूमी के रूप में जानी जाती है। जो शिव जी के अनन्य भक्त थे।
मंडी से ही 50 कि.मी. की दूरी पर एक और खूबसूरत झील कमरूनाग है। यहां का पहुंच मार्ग इतना सुंदर है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यहीं कमरुनाथ जी का प्रसिद्ध बेहद प्राचीन मंदिर भी है।
मंडी से ही शिमला जाने के रास्ते में ‘तत्ता पानी’ नाम की एक और दर्शनीय जगह आती है। जो एक अजूबे की तरह है। एक तरफ सतलुज नदि का बर्फ के समान ठंड़ा पानी है तो वहीं नदि के आगोश से निकलता हुआ गर्म जल किसी परी कथा की याद दिला देता है।
तो जब भी, कभी भी, पहाड़ों का रुख करें तो विख्यात जगहों को छोड़ कुछ अनजानी जगहों को तलाशें। यकीन मानिये कभी भी निराशा हाथ नहीं लगेगी।

शुक्रवार, 1 मई 2009

आओ कसाबो, हमारे जले पर नमक छिड़को

आओ हमारे देश में तुम्हारा स्वागत है। आप तो जानते ही हैं कि हम और हमारा देश मेहमानों को देवता स्वरूप समझते हैं। हम खायें ना खायें उन्हें भरपेट भोजन उपलब्ध करवाते हैं। खुद गीले-सुखे में जैसे-तैसे गुजारा कर अतिथी को शैया सुख प्रदान करते हैं। हमारी फितरत है कि आप हमें लतियाते, धकियाते, गलियाते रहें पर हम फिर भी आपको सिर पर बैठाये रखते हैं। हमें सिखाया गया है कि कोई एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर दो, कि ले भाई गुस्सा निकाल ले, यह दिल के लिये घातक होता है। पर यदि कहीं आप ज्यादा ही नाराज हो सौ-पचास लोगों का क्रिया करम भी कर देते हैं तो भी हमारे यहां डरने की जरूरत नहीं होती, यहां मानवाधिकारियों की फौज पुरजोर कोशीश करती है कि आप के सलीके से संवारे गये बालों में एक खम भी ना पड़े। जिनकी जान जाती है उनके आत्मियों को भी यह पता है कि यह आपकी करनी नहीं है आप तो सिर्फ माध्यम हो करने वाला तो भगवान है। आत्मा अमर होती है वह चोला बदलती रहती है, इत्यादि-इत्यादि और यह सब हमारी घुट्टी में है। इसलिये बेचारे कुछ दिन रो-गा कर चुप हो जाते हैं। वैसे आप लोग भी कफी समझदार हैं इसीलिए किसी संत्री-मंत्री पर हाथ नहीं डालते क्योंकि वैसे कुछ दिक्कत हो सकती है। आम आदमी की कीमत यहां किसी भुनगे-मकौडे से ज्यादा नहीं है। फिर भी खुदा न खास्ता यदि आप कभी हिरासत में ले भी लिये जाते हैं तो हम वहां भी आपकी खातिर-तवज्जो में कोई कमी नहीं आने देते। आपको बेहतरीन सुविधाओं के साथ-साथ लज़ीज भोजन का स्वाद दिलाया जाता है। आपकी दिनचर्या को खुशगवार बनाने में हम कोई कोर-कसर नहीं छोडते। यहां तक कि नहाने धोने के बाद आपकी पसंद का इत्र-फुलेल भी आपकी खिदमत में प्रस्तुत करने में हिचकिचाते नहीं हैं। आपकी हर फरमाईश को सिर माथे पर रखने के साथ-साथ ही हमारी कोशीश रहती है कि आप सादर और सुरक्षित हमसे विदा लें। फिर वापस आने की तैयारी कर के।
सो आईये, घूमिये-फिरिये, तफरीह करिये, शिकार का शौक फर्माईये और हमारी छती पर मूंग दलिये।
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दुनिया में शायद हमारा ही देश है, जहां खून-खराबा करने वाला भी रोज-रोज अपनी नयी-नयी मांगे मनवाने की जुर्रत कर सकता है। कसाब की हिम्मत देखिए कि जेल में अपनी मांगें ऐसे रख रहा है जैसे उसने हमारे लिए कोई बहादुरी का काम किया हो। बिना किसी शर्म, हया लज्जा के आज वह इत्र मांग रहा है, कल मुजरा देखने की भी फर्माइश कर सकता है। काश कोई तो ऐसा होता कि उसी समय उसके मुंह पर एक झापड़ रसीद करता। किस की शह पर उसमें इतनी हिम्मत आ गयी कि वह अपनी कारस्तानियों के कारण डरने की बजाय हमारे जख्मों पर ही नमक छिड़कने पर तुला हुआ है।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...