अंग्रेजों ने अपने शासन काल में मनमानी लूट-खसोट की। हमारी बहुमूल्य धरोहरों को अपने देश भेज दिया। हजारों छोटे-मोटे गोरों ने अपने घरों को सजा, सवांर, समृद्ध बना लिया, हमारे बल-बूते पर। पर उनमें कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने अपनी कर्तव्य परायणता के आड़े किसी भी चीज को नहीं आने दिया। ऐसा ही एक नाम है लार्ड कर्जन का। अगर वे नहीं होते तो शायद हमारे गौरवशाली अतीत का बखान करने वाले कयी स्मारक भी शायद न होते। बात कुछ अजीब सी है पर सही है।
समय था 1831 का, दिल्ली और आगरा पर ब्रिटिश फौज ने कब्जा जमा लिया था और शासन था, लार्ड विलियम बैंटिक का। इन शहरों की खूबसूरत इमारतें बैंटिक की आंख की किरकिरी बनी हुई थीं। खासकर ताजमहल। एक योजना के अंतर्गत यह तय किया गया कि दिल्ली के लाल किले और आगरे के ताजमहल को या तो गिरा दिया जाए या बेच दिया जाए। इस आशय की एक खबर बंगाल के एक अखबार 'जान बुल' में 26 जुलाई 1831 के अंक में छपी भी थी। इसमें बताया गया था कि ताज को सरकार की बेचने की मंशा है पर यदि सही कीमत नहीं मिलती तो इसे गिराया भी जा सकता है। इसके पहले आगरा के लाल किले में स्थित संगमरमर के बने नहाने के हौदों को बैंटिक ने निलाम करवाया था, पर उनको तोड़ने में जो खर्च आया था वह उसके मलबे से प्राप्त रकम से काफी ज्यादा था। यह भी एक कारण था ताज के टूटने में होने वाले विलंब का और शासन की झिझक का। इधर अवाम को भी इस सब की खबर लग चुकी थी जिसमें अंग्रेजों की इस तोड़-फोड़ की नीतियों से आक्रोश उभर रहा था। बैंटिक के अधिकारों पर भी सवाल उठने लग गये थे। ब्रिटिश हुकुमत भी सिर्फ ताज के संगमरमर के कारण उसे गिराने के कारण फैलने वाले असंतोष को लेकर सशंकित थी। इसलिए इस घाटे के सौदे से उसने अपना ध्यान धीरे-धीरे हटा लिया। और फिर लार्ड कर्जन के आने के बाद तो सारा परिदृश्य ही बदल गया। कर्जन एक कर्तव्यनिष्ठ शासक था। जनता के मनोभावों को समझते हुए उसने यहां की सभी गौरवशाली इमारतों के संरक्षण तथा रखरखाव का वादा किया और निभाया। उसके शासन काल में इन प्राचीन इमारतों तथा स्मारकों को संरक्षण तो मिला ही उनका उचित रख-रखाव और देख-रेख भी की जाती रही।
इन सब बातों का खुलासा 7 फरवरी 1900 को एशियाटिक सोसायटी आफ बेंगाल की सभा में खुद लार्ड कर्जन ने किया था।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 26 अप्रैल 2009
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी।
फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने की नाकाम कोशिश करते नज़र आने लगे हैं। अब यह जनता की दबी भड़ास का नतीजा हैं या प्रायोजित कार्यक्रम, यह खोज का विषय है। पर वर्षों पहले भी एक चप्पल चली थी, वह भी एक ऐसे इंसान के हाथों जो अपने समय के प्रबुद्ध और विद्वान पुरुष थे।
बात ब्रिटिश हुकुमत की है। बंगाल में नील की खेती करनेवाले अंग्रेजों जिन्हें, नील साहब या निलहे साहब भी कहा जाता था, के अत्याचार , जोर-जुल्म की हद पार कर गये थे। लोगों का जीवन नर्क बन गया था। इसी जुल्म के खिलाफ कहीं-कहीं आवाजें भी उठने लगी थीं। ऐसी ही एक आवाज को बुलंदी की ओर ले जाने की कोशीश में थे कलकत्ते के रंगमंच से जुड़े कुछ युवा। ये अपने नाटकों के द्वारा इन अंग्रेजों की बर्बरता का मंचन लोगों के बीच कर विरोध प्रदर्शित करते रहते थे । ऐसे ही एक मंचन के दौरान इन युवकों ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी को भी आमंत्रित किया। उनकी उपस्थिति में युवकों ने इतना सजीव अभिनय किया कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गये। खासकर निलहे साहब की भूमिका निभाने वाले युवक ने तो अपने चरित्र में प्राण डाल दिये थे। अभिनय इतना सजीव था कि विद्यासागर जी भी अपने पर काबू नहीं रख सके और उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाल कर उस अभिनेता पर दे मारी। सारा सदन भौचक्का रह गया। उस अभिनेता ने विद्यासागर जी के पांव पकड़ लिए और कहा कि मेरा जीवन धन्य हो गया। इस पुरस्कार ने मेरे अभिनय को सार्थक कर दिया। आपके इस प्रहार ने निलहों के साथ-साथ हमारी गुलामी पर भी प्रहार किया है। विद्यासागर जी ने उठ कर युवक को गले से लगा लिया। सारे सदन की आंखें अश्रुपूरित थीं।
बात ब्रिटिश हुकुमत की है। बंगाल में नील की खेती करनेवाले अंग्रेजों जिन्हें, नील साहब या निलहे साहब भी कहा जाता था, के अत्याचार , जोर-जुल्म की हद पार कर गये थे। लोगों का जीवन नर्क बन गया था। इसी जुल्म के खिलाफ कहीं-कहीं आवाजें भी उठने लगी थीं। ऐसी ही एक आवाज को बुलंदी की ओर ले जाने की कोशीश में थे कलकत्ते के रंगमंच से जुड़े कुछ युवा। ये अपने नाटकों के द्वारा इन अंग्रेजों की बर्बरता का मंचन लोगों के बीच कर विरोध प्रदर्शित करते रहते थे । ऐसे ही एक मंचन के दौरान इन युवकों ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी को भी आमंत्रित किया। उनकी उपस्थिति में युवकों ने इतना सजीव अभिनय किया कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गये। खासकर निलहे साहब की भूमिका निभाने वाले युवक ने तो अपने चरित्र में प्राण डाल दिये थे। अभिनय इतना सजीव था कि विद्यासागर जी भी अपने पर काबू नहीं रख सके और उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाल कर उस अभिनेता पर दे मारी। सारा सदन भौचक्का रह गया। उस अभिनेता ने विद्यासागर जी के पांव पकड़ लिए और कहा कि मेरा जीवन धन्य हो गया। इस पुरस्कार ने मेरे अभिनय को सार्थक कर दिया। आपके इस प्रहार ने निलहों के साथ-साथ हमारी गुलामी पर भी प्रहार किया है। विद्यासागर जी ने उठ कर युवक को गले से लगा लिया। सारे सदन की आंखें अश्रुपूरित थीं।
रविवार, 19 अप्रैल 2009
क्या पांडव स्त्री दुर्बलता के शिकार थे ?
यदि निष्पक्षता से देखा जाय, पुस्तकों में वर्णित सिर्फ उनकी अच्छाईयों को ही ना देखा जाए तो उत्तर 'हां' में आता है। शुरु करते हैं द्रोपदी स्वयंवर से। अर्जुन ने अपने कौशल से द्रोपदी को वरा था। पर जब पांडव उसे लेकर कुंती के पास आए तो युधिष्ठिर, जिन्हें धर्म का अवतार कहा जाता है, जिनके बारे में प्रचलित है कि वह कभी झूठ नहीं बोलते थे, तो उन्होंने भले ही मां को चकित करने के लिए ही कहा हो, पर यह क्यों कहा कि हम भिक्षा लाए हैं। जिसे सुन कुंती ने बिना देखे ही अंदर से कह दिया कि आपस में बांट लो। पर जब कुंती को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसने कहा कि यह तो राजकन्या है और राजकन्याएं बंटा नहीं करतीं। यह सुन कर युधिष्ठिर ने मां की बात काटी कि हे माते तुम्हारे कहे वचन झूठ नहीं हो सकते तुम्हारी आज्ञा हमारा धर्म है। कोई ना कोई रास्ता निकालना पड़ेगा। बाकि भाई भी चुप रहे। क्या द्रोपदी के अप्रतिम सौंदर्य से सारे भाईयों के मन विचलित हो दुर्बल नहीं हो गये थे? क्या सभी भाई उसे पाना नहीं चाहते थे? जो अवसर अर्जुन ने उन्हें अनायास उपलब्ध करवा दिया था, उसे खोना क्या उनके लिए संभव था? जबकि मां की दूसरी बात भी उनके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए थी। उस समय किसी ने द्रोपदी के मन की हालत क्यूं नहीं जाननी चाही, जब कि स्वयंवर कन्या कि इच्छा पर आधारित होता था। उससे किसी ने पूछा, कि अपने से छोटे देवरों को वह कैसे पति मानेगी? परिवार की रक्षा करने वाले भीम को अपना भक्षक कैसे बनने देगी? उसकी देह को तो यंत्र बना दिया गया पर उसका मन ?
ठीक है सबने माँ की आज्ञा शिरोधार्य की पर इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिये थी कि उसे सिर्फ कहने भर को पत्नि मानते। मां ने यह तो नहीं कहा था कि उससे संतान प्राप्त करो। पर द्रोपदी से हरेक भाई ने पुत्र प्राप्त किया। जबकि ग्रन्थों में छोटे भाई की पत्नि को बेटी तथा बड़े भाई की पत्नि को मां का स्थान प्राप्त है। जाहिर है कि द्रोपदी के अप्सरा जैसे सौंदर्य ने पांडवों की नैतिकता को भुला दिया था। अब इस बंटवारे की गुत्थी को सुलझाने के लिए नारद मुनि की सहायता ली गयी। उनके कथनानुसार द्रोपदी का एक-एक भाई के पास एक साल तक रहना निश्चित किया गया जैसे वह इंसान ना हो कोई जींस हो। उस दौरान यदि कोई और भाई उसके कक्ष में आ जाता है तो उसे बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वनगमन करना होगा। इस नियम का परिस्थितिवश शिकार बना अर्जुन। पर अपने वनवास के दौरान इस नियम का पालन नहीं कर सका।
तीर्थाटन के दौरान हरिद्वार में नाग कन्या ऊलूपी उस पर आसक्त हो गयी, अर्जुन ने अपने नियम की मजबूरी बताई पर ऊलूपी के तर्कों से पराजित हो उसने उससे विवाह कर लिया। दो वर्षों तक नागलोक में रह कर पतित्व का निर्वाह करते हुए उसने ऊलूपी को मातृत्व का सुख प्रदान किया। उसके पश्चात घूमते-घूमते वह मणीपुर पहुंचा। वहां के राजा चित्रवाहन की कन्या, चित्रांगदा, गुणी और अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी थी। उसे देख अर्जुन का मन बेकाबू हो गया। उसने अपना परिचय दे चित्रवाहन से उसकी कन्या का हाथ मांगा। राजा ने उसकी बात मान ली पर एक शर्त रखी कि उनसे होने वाले पुत्र को उसे गोद दे दिया जाएगा। अर्जुन को इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी। उसने शर्त स्वीकार कर चित्रांगदा से विवाह कर लिया। यहां वह तीन साल तक रहा। फिर उसे नियम की याद आई और उसने मणीपुर छोड़ आगे की यात्रा शुरु की। चलते-चलते वह अपने सखा के यहां द्वारका जा पहुंचा। और इस बार उसकी दृष्टि का शिकार बनी अपने ही सखा की बहन सुभद्रा। पर यहां एक समस्या भी थी। श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम, सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे, जो राजनीतिक रूप से भी पांडवों के अनुकूल नहीं था। कृष्ण पांडवों के हितैषी थे उन्हीं की सलाह पर अर्जुन ने सुभद्रा का अपहरण कर लिया।
इस तरह क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अर्जुन ने वनगमन जरूर किया था, पर शर्तों के अनुसार ना वह ब्रह्मचर्य का पालन कर सका ना एक पत्निनिष्ठ रह सका। स्त्री-दुर्बलता के कारण उसन विवाहेतर संबंध बनाए। उसकी कमजोरी को ढकने के लिये कहा जा सकता है कि समय के साथ वह संबंध राजनीतिक शक्ति ही साबित हुए पर जिसको भगवान का वरदहस्त प्राप्त था, साक्षात प्रभू जिसके हितैषी थे, उसको ऐसे संबंधों की क्या जरूरत थी ?
ठीक है सबने माँ की आज्ञा शिरोधार्य की पर इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिये थी कि उसे सिर्फ कहने भर को पत्नि मानते। मां ने यह तो नहीं कहा था कि उससे संतान प्राप्त करो। पर द्रोपदी से हरेक भाई ने पुत्र प्राप्त किया। जबकि ग्रन्थों में छोटे भाई की पत्नि को बेटी तथा बड़े भाई की पत्नि को मां का स्थान प्राप्त है। जाहिर है कि द्रोपदी के अप्सरा जैसे सौंदर्य ने पांडवों की नैतिकता को भुला दिया था। अब इस बंटवारे की गुत्थी को सुलझाने के लिए नारद मुनि की सहायता ली गयी। उनके कथनानुसार द्रोपदी का एक-एक भाई के पास एक साल तक रहना निश्चित किया गया जैसे वह इंसान ना हो कोई जींस हो। उस दौरान यदि कोई और भाई उसके कक्ष में आ जाता है तो उसे बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वनगमन करना होगा। इस नियम का परिस्थितिवश शिकार बना अर्जुन। पर अपने वनवास के दौरान इस नियम का पालन नहीं कर सका।
तीर्थाटन के दौरान हरिद्वार में नाग कन्या ऊलूपी उस पर आसक्त हो गयी, अर्जुन ने अपने नियम की मजबूरी बताई पर ऊलूपी के तर्कों से पराजित हो उसने उससे विवाह कर लिया। दो वर्षों तक नागलोक में रह कर पतित्व का निर्वाह करते हुए उसने ऊलूपी को मातृत्व का सुख प्रदान किया। उसके पश्चात घूमते-घूमते वह मणीपुर पहुंचा। वहां के राजा चित्रवाहन की कन्या, चित्रांगदा, गुणी और अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी थी। उसे देख अर्जुन का मन बेकाबू हो गया। उसने अपना परिचय दे चित्रवाहन से उसकी कन्या का हाथ मांगा। राजा ने उसकी बात मान ली पर एक शर्त रखी कि उनसे होने वाले पुत्र को उसे गोद दे दिया जाएगा। अर्जुन को इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी। उसने शर्त स्वीकार कर चित्रांगदा से विवाह कर लिया। यहां वह तीन साल तक रहा। फिर उसे नियम की याद आई और उसने मणीपुर छोड़ आगे की यात्रा शुरु की। चलते-चलते वह अपने सखा के यहां द्वारका जा पहुंचा। और इस बार उसकी दृष्टि का शिकार बनी अपने ही सखा की बहन सुभद्रा। पर यहां एक समस्या भी थी। श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम, सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे, जो राजनीतिक रूप से भी पांडवों के अनुकूल नहीं था। कृष्ण पांडवों के हितैषी थे उन्हीं की सलाह पर अर्जुन ने सुभद्रा का अपहरण कर लिया।
इस तरह क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अर्जुन ने वनगमन जरूर किया था, पर शर्तों के अनुसार ना वह ब्रह्मचर्य का पालन कर सका ना एक पत्निनिष्ठ रह सका। स्त्री-दुर्बलता के कारण उसन विवाहेतर संबंध बनाए। उसकी कमजोरी को ढकने के लिये कहा जा सकता है कि समय के साथ वह संबंध राजनीतिक शक्ति ही साबित हुए पर जिसको भगवान का वरदहस्त प्राप्त था, साक्षात प्रभू जिसके हितैषी थे, उसको ऐसे संबंधों की क्या जरूरत थी ?
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
कैसी रही
पाकिस्तान में अनाज की भारी कमी हो जाने से सरकार ने फरमान निकाला कि अनाज की बर्बादी रोकी जाए। जिनके पास जानवर हैं वे भी उन्हें खिलाने में एहतियात बरतें। नियम का पालन करवाने के लिए सैनिकों की टुकड़ियां घूम-घूम कर जायजा लेने लग गयीं। ऐसे में सैनिकों का दस्ता एक गांव से गुजरा, उन्होंने देखा कि एक आदमी अपने घोड़े को चने खिला रहा है। सैनिक अदालत ने उस पर भारी जुर्माना कर दिया। कुछ दिनों बाद फिर सैनिक उधर से गुजरे उन्होंने फिर गांव वाले को अपने घोड़े को कुछ खिलाते देख पूछा, अब क्या खिला रहे हो? घोड़े वाले ने कहा घास। उस पर फिर जुर्माना ठोक दिया गया। कुछ दिनों बाद फिर सैनिकों ने उसी गांव का मुआयना किया और उस गांव वाले से पूछा आजकल घोड़े को क्या खिलाते हो? गांव वाला बोला हुजूर अब तो घोड़े को मैं पैसे दे देता हूं। उसकी जो इच्छा होती है बाजार जा खुद ही खा आता है।
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
लिंकन ने गीता तो नहीं पढी होगी, पर
अब्राहम लिंकन ने गीता तो नहीं पढी होगी पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा, अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।
अब्राहम लिंकन 28-30 सालों तक लगातार असफल होते रहे, जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला, दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में। उनकी असफलताओं पर नज़र डालें तो हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा। 20-22 साल की आयु में घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता हाथ आयी। 26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया, पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा। 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा। 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी। 46 वर्षीय लिंकन ने हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी। अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा। अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर खड़ी मुस्काती रही। पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती। दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते थे। वहां भी उनकी आलोचना होती थी। पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है। तो यह तो लिंकन थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके, पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है? शायद हां। इसी 'हां' को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस 'हां' से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।
गुरुवार, 16 अप्रैल 2009
कोहनूर, भारत के बाहर कैसे गया
कोहेनूर
जिसका नाम सुनते ही कलेजे में एक टीस उभर आती है। अपनी विरासत को सात समुद्र पार पड़ा देख, उसे वापस न पा सकने की कसक कचोटती रहती है दिलो-दिमाग को। अंग्रेजों ने हमारी सभ्यता, संस्कृति और बौद्धिक सम्पदा को तो हानि पहुंचाई ही साथ ही साथ हमें वर्षों लूट-लूट कर गरीबी के अंधियारे में धक्के खाने के लिए छोड़ दिया। सालों साल हमारा हर रूप से दोहन होता रहा। उसी का एक रूप था कोहनूर का ब्रिटेन पहुंचना। इसकी कीमत का कोई अंदाजा नहीं था। कहते हैं कि एक बार कोशिश की गयी थी इसका मोल आंकने की तो जवाब पाया गया था कि यदि एक ताकतवर इंसान चारों दिशाओं में पत्थर फेंके, फिर उन फेंके गये पत्थरों के बीच की भूमि को सोने से भर दिया जाय तो भी इसके मुल्य की कीमत नहीं मिल पाएगी। हो सकता है कि यह अतिश्योक्ति हो पर इसमें दो राय नहीं है कि यह दुनिया के बेशकिमती हीरों में से एक रहा है।
जिसका नाम सुनते ही कलेजे में एक टीस उभर आती है। अपनी विरासत को सात समुद्र पार पड़ा देख, उसे वापस न पा सकने की कसक कचोटती रहती है दिलो-दिमाग को। अंग्रेजों ने हमारी सभ्यता, संस्कृति और बौद्धिक सम्पदा को तो हानि पहुंचाई ही साथ ही साथ हमें वर्षों लूट-लूट कर गरीबी के अंधियारे में धक्के खाने के लिए छोड़ दिया। सालों साल हमारा हर रूप से दोहन होता रहा। उसी का एक रूप था कोहनूर का ब्रिटेन पहुंचना। इसकी कीमत का कोई अंदाजा नहीं था। कहते हैं कि एक बार कोशिश की गयी थी इसका मोल आंकने की तो जवाब पाया गया था कि यदि एक ताकतवर इंसान चारों दिशाओं में पत्थर फेंके, फिर उन फेंके गये पत्थरों के बीच की भूमि को सोने से भर दिया जाय तो भी इसके मुल्य की कीमत नहीं मिल पाएगी। हो सकता है कि यह अतिश्योक्ति हो पर इसमें दो राय नहीं है कि यह दुनिया के बेशकिमती हीरों में से एक रहा है।
कोहनूर मुगल शासकों की सम्पत्ति का हिस्सा था। जिसे नादिरशाह ने लूट कर काबुल भिजवा दिया था। जहां से पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह जी ने वहां के शासक शाहशुजा को हरा फिर इसे अपने खजाने में स्थान दिया। पर समय की मार, द्वितीय अंग्रेज-सिक्ख युद्ध में जब पंजाब के राजा दिलीप सिंह को पराजय का सामना करना पड़ा तो राज्य के साथ-साथ यह अनमोल हीरा भी तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी को प्राप्त हो गया। उसे अपने आकाओं को खुश करने और उनकी नज़रें इनायत पाने का एक बेहतरीन मौका हाथ लग गया था। उसने इसे ब्रिटेन की महारानी को सौंपने का निश्चय कर लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसका विरोध किया, क्योंकि वह हीरे पर अपना हक समझती थी। पर साम्राज्यवादी डलहौजी को गवारा नहीं था कि ऐसी बेहतरीन वस्तु से इंग्लैंड वंचित रह जाए। उसने चुप-चाप इसे ब्रिटेन भेजने का निश्चय किया और इस षड़यंत्र में उसका साथ दिया लार्ड हाबहाऊस ने। सारा काम गुप्त रूप से किया गया। लाहौर से डलहौजी खुद हीरे को ले बंबई आया। वहां से एक युद्धपोत जिसका नाम 'मिदे' था, के द्वारा कोहनूर को भेजने का प्रबंध किया गया। योजना इतनी गुप्त रखी गयी थी कि जहाज के कप्तान को भी इस बात की जानकारी नहीं दी गयी उसे सिर्फ इतना पता था कि दो आदमियों को इंग्लैंड ले जाना है। पर किसी तरह इस षड़यंत्र की भनक लाहौरवासियों को लग गयी। पर विरोध के स्वर तेज होने के पहले ही जहाज बंदरगाह छोड़ चुका था।
इसे विचित्र संयोग ही कहेंगे कि कोहनूर जहां-जहां भी रहा वहां खून-खराबा या दुख: का भी पदार्पण हुआ। युद्धपोत 'मिदे' जब ब्रिटेन पहुंचा तो महारानी पारिवार में मौत के कारण शोकाग्रस्त थीं। पर इसके बावजूद कोहनूर को पाने का लोभ संवरण नहीं कर पायीं। तीन जुलाई 1850 के दिन सायं ठीक साढे चार बजे यह नायाब और दुर्लभ तोहफा विशिष्ट मेहमानों की उपस्थिति में महारानी को भेंट कर दिया गया। आज भी यह ब्रिटिश राज परिवार की शोभा बढा रहा है।
मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
रूमाल, जो कभी संपन्नता और प्रतिष्ठा के प्रतीक थे.
यह सोच कर भी आश्चर्य होता है कि आज हर खासो-आम को उपलब्ध यह चौकोर कपडे का टुकडा किसी जमाने में सिर्फ रसूखवाले और संपन्न लोग ही रख सकते थे। इसका जिक्र ईसा से भी दो सौ साल पहले मिलता है। तब लिनेन के इस सफेद टुकडे को, जो बेशकीमती होता था, सुडेरियम के नाम से जाता था और यह केवल संपन्न लोगों की सम्पत्ति हुआ करता था। धीरे-धीरे आयात बढने से यह जनता के लिए भी सुलभ हो गया। इसके जन्म की भी कयी रोचक कथाएं हैं। मध्य युग में चर्च के अधिकारियों ने नाक बहने पर उसे चर्च की चादरों से या अपने कपड़ों से पोंछने की मनाही कर दी थी। तब चादरों के छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में इसका जन्म हुआ। पर अंग्रेजों के अनुसार इसका आविष्कार रिचर्ड़ द्वितीय (1367-1400) ने किया था। कहते हैं कि रिचर्ड़ सफाई के लिए प्रयुक्त होने वाले भारी-भरकम तौलियों से परेशान था। खासकर जुकाम वगैरह होने पर इतने भारी तौलियों का उपयोग करना दुष्कर हो जाता था। सो उसके दिमाग में एक तरकीब आयी और उसने सुंदर-सुंदर कपड़ों के छोटे-छोटे टुकड़े करवा दिये जो हाथ और नाक साफ करने के काम आने लगे। यही आधुनिक रूमालों के पूर्वज थे। वैसे देखा जाए तो रूमाल को प्रिय बनाने का काम नसवार लेने वालों ने किया होगा जो अपने कपड़ों को दाग-धब्बों से बचाने के लिए किसी छोटे कपड़े का उपयोग करते होंगे।
एक बार अस्तित्व मे आ जाने के बाद इसका उपयोग विभिन्न रूपों में होने लगा। जैसे ईत्र की सुगंध को समोये रखने में, किसी को उपहार स्वरूप देने में, हाथ से कढे रूमाल प्यार के तोहफे के रूप में देने में इत्यादि-इत्यादि। फिर तो कभी यह कोट की शान बना और कभी कुछ उपलब्ध ना होने पर बाज़ार से सौदा-सुलफ बांध लाने का जरिया। जहां मुगलों के जमाने में सौगातें सुंदर नफीस रूमालों से ढक कर भेजी जाती थीं, वहीं एक समय यह कुख्यात डाकूओं का हत्या करने का हथियार भी बना। जब इसके एक सिरे में सिक्का बांध कर राहगीर की हत्या कर दी जाती थी।
तो यह एतिहासिक उठा-पटक वाला, उत्थान-पतन देखने वाला कपड़े का चौकोर टुकड़ा आज हम सब की एक जरूरत बन चुका है। भूल जाएं तो अलग बात है पर इसके बिना बाहर निकलने की सोची भी नहीं जा सकती।
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वकील ने अपने नेता मुवक्किल को ई-मेल भेजा कि सत्य की विजय हो गयी है। तुरंत जवाब आया - हाई कोर्ट में अपील कर दो।
एक बार अस्तित्व मे आ जाने के बाद इसका उपयोग विभिन्न रूपों में होने लगा। जैसे ईत्र की सुगंध को समोये रखने में, किसी को उपहार स्वरूप देने में, हाथ से कढे रूमाल प्यार के तोहफे के रूप में देने में इत्यादि-इत्यादि। फिर तो कभी यह कोट की शान बना और कभी कुछ उपलब्ध ना होने पर बाज़ार से सौदा-सुलफ बांध लाने का जरिया। जहां मुगलों के जमाने में सौगातें सुंदर नफीस रूमालों से ढक कर भेजी जाती थीं, वहीं एक समय यह कुख्यात डाकूओं का हत्या करने का हथियार भी बना। जब इसके एक सिरे में सिक्का बांध कर राहगीर की हत्या कर दी जाती थी।
तो यह एतिहासिक उठा-पटक वाला, उत्थान-पतन देखने वाला कपड़े का चौकोर टुकड़ा आज हम सब की एक जरूरत बन चुका है। भूल जाएं तो अलग बात है पर इसके बिना बाहर निकलने की सोची भी नहीं जा सकती।
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वकील ने अपने नेता मुवक्किल को ई-मेल भेजा कि सत्य की विजय हो गयी है। तुरंत जवाब आया - हाई कोर्ट में अपील कर दो।
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...