जी हां, यदि आप पूरा भारत देखने निकले हैं तो कम से कम सात जगहों के लिये आप को सरकारी इजाजत लेने की जरूरत पड़ेगी।
1, लक्षद्वीप :- करीब 32 कि.मी. के इस केंद्र शासित प्रदेश में 36 द्वीपों का समूह समाया हुआ है। जिनमें सिर्फ 10 पर लोग रहते हैं। बाकी जगह पीने के पानी का अभाव है। इसकी राजधानी कावारति है। यहां के सूर्य तथा चंद्रोदय के दृश्य बहुत मनोहारी होते हैं। यहं जाने के लिये परमिट कोच्ची में लक्षद्वीप के प्रशासक के दफ्तर से लिया जा सकता है।
2, अरुणाचल प्रदेश :- भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित यह एक स्वर्गिक स्थान है। भारत की मुख्य भूमी पर सूर्य की किरणें सर्वप्रथम यहीं की धरती को चूमती हैं। इसकी राजधानी ईटानगर है। यह रेलमार्ग से तो नहीं पर वायू तथा सड़क मार्ग से शेष भारत से जुड़ा हुआ है। यहां जाने के लिये इनर लाईन परमिट लेना पड़ता है।
3, सिक्किम :- यहां की राजधानी गैगंटाक है। यहीं से घूमने के लिये पुलिस की अनुमति लेनी पड़ती है। यहां कैमरा ले जाना भी मना है।
4, मिजोरम :- इस जनजातीय प्रदेश में लुसाई भाषा बोली जाती है। जिसमें मिजोरम का अर्थ होता है ऊंची भूमी या देश में रहने वाले मनुष्य। इसकी राजधानी आईजोल है। यहां भी बस या विमान द्वारा ही जाया जा सकता है।
5, नागालैंड :- इसकी राजधानी कोहिमा है। यहां जाने के लिये इनर लाईन परमिट लेना पड़ता है। यह महाभारत में वर्णित अर्जुन की पत्नी उलूपी का देश है।
6, खुर्दग ला :- अठारह हजार सात सौ फुट की उंचाई पर स्थित यह जगह चीन की सीमा से लगी हुई है। यह लेह से करीब 46 कि.मी. दूर है। यहीं से यहां का परमिट मिलता है। पर विदेशियों का प्रवेश प्रतिबंधित है। यह अत्यंत दुर्गम स्थान है। यहां संसार की सबसे ऊंची सड़क तथा सबसे ऊंचा पुल है।
7, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह :- बंगाल की खाड़ी में स्थित यह जगह अंग्रेजों के जमाने में काला पानी के नाम से जानी जाती थी। अंडमान जाने के लिये भारतियों को इजाजत नहीं लेनी पड़ती पर निकोबार के लिये वहां किसी रिश्तेदार या नौकरी का प्रमाण पत्र देना पड़ता है। ऐसा वहां की जनजातियों और सैनिक सुरक्षा के कारण किया जाता है। भारत में सबसे पहले सूर्योदय मुख्य भूमी के अरुणाचल से भी पहले यहां के काचाल द्वीप में होता है।
इन जगहों पर प्रतिबंध इस लिये है क्यों कि यह सारे क्षेत्र सीमावर्ती हैं और फिर जनजातियों के निवास स्थान हैं, जिनकी पहचान को बचाये रखना भी बहुत जरूरी है। इसके अलावा ज्यादा आवाजाही से प्रकृति से छेड़खानी का खतरा भी बढ जाता है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009
सोमवार, 9 फ़रवरी 2009
क्या आपने ऐसे विज्ञापन देखे हैं?
कभी-कभी कुछ ऐसा देखने को मिल जाता है टी.वी. पर दिखाये जाने वाले विज्ञापनों में कि समझ नहीं आता कि हम बावले हैं या सामने वाला। दो-तीन नमूने पेश हैं -
1, एक जाने-माने शैंपू का विज्ञापन :- एक मां अपनी बच्ची को क्रिकेट सिखाने के लिये कोच के पास लेकर जाती है। बजाय इसके कि कोच साहब उसके खेल के बारे में पूछ-ताछ करें, उन्हें बालिका के बालों की चिंता होती है। कहते हैं इसके बाल खराब हो जायेंगे। मां जवाब देती है, आप तो इसके खेल पर ध्यान दें बालों की फिक्र मैं कर लूंगी।
2, एक कपड़े धोने के साबुन का विज्ञापन :- क्रिकेट खेलते बच्चों की बाल से एक महोदय की खिड़की का शीशा टूट जाता है। गुस्से में महोदय दंड़ देने लगते हैं तो बाल लेने आया लड़का गलती की माफी मांगने के बदले ढिठता से कहता है कि दूसरी बाल भी इधर ही आयेगी। जिनका शीशा टूटा था इस पर खुश हो उसकी उजली कमीज का कालर ठीक कर उसे शाबाशी दे विदा करते हैं और लड़का अकड़ता हुआ चल देता है।
3, एक कंस्ट्रक्श्न कंपनी का विज्ञापन :- एक बच्चा एक बच्ची को एक डैम के पास लाता है और बच्ची से कहता है इसे मैने बनाया। बच्ची आश्चर्य से पूछती है, इतना बड़ा !!
बच्चा डैम से पानी छोड़ने के समय को जानते हुए बच्ची को धोखे में रख कहता है कि यह मेरी बात सुनता है। उसी समय डैम से पानी आना शुरु हो जाता है। बच्ची अवाक रह जाती है और पीछे से आवाज आती है कि ऐसी बड़ी-बड़ी बातें हम आसानी से कर जाते हैं (या इन्हीं शब्दों के मिलते-जुलते अर्थ का वाक्य)
इसका अर्थ यह भी निकलता है कि हम ऐसे ही लोगों को बेवकूफ बनाते रहते हैं।
ऐसे विज्ञापनों को देख समझ नहीं आता कि हसें या रोयें।
शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
संता का दृष्टिकोण
बात कुछ पुरानी है पर इतनी भी नहीं कि हम सब भूल चुके हों। कहानी एक गांव की है। उस गांव में एक अनाथ लड़का रहता था। वह बड़ा ही हुड़दंगी था। दिन भर अवारागर्दी करना लोगों को तंग करना ही उसका शगल था। उसके कारण सारे गांव के नाक में दम रहता था। एक बार बड़े-बुढों ने उसे समझा बुझा कर गांव के दुधारु पशुओं को चराने का काम सौंप दिया। अब वह दिन भर ढोरों के साथ जंगल में घुमता रहता। इससे गांव वालों को भी राहत मिली और उसे भी खाने पीने का आराम हो गया। पर कहते हैं ना कि बंदर कैसा भी हो गुलाटी मारना नहीं भूलता, सो एक दिन ऐसे ही उस लड़के के दिमाग में फिर गांव वालों को तंग करने की सूझी। बस फिर क्या था, वह एक पेड़ पर चढ गया और लगा जोर-जोर से चिल्लाने कि शेर आया, शेर आया। उसकी आवाज सुन पास के खेतों में काम करते लोग लाठी बल्लम ले दौड़े आए। उन्हें देख लड़का ढीठाई से हंसने लगा। गांव वाले उसे गरियाते हुए वापस चले गये। लड़के को एक नया खेल मिल गया। तीन चार दिन बाद उसने फिर वैसी ही गुहार फिर लगाई। भोले-भाले गांव वाले कुछ अनिष्ट ना हो जाए यह सोच फिर उसकी सहायता को चले आए पर फिर उन्हें बेवकूफ बनना पड़ा। एक दो बार फिर ऐसा ही हुआ और गांव वासियों को बेवकूफ बना वह लड़का मजा लेता रहा। एक दिन सचमुच राह भटक कर एक शेर उधर आ निकला। शेर को सामने देख लड़के के देवता कूच कर गये। किसी तरह दौड़ कर पेड़ पर चढ कर उसने अपनी जान बचा ली। वहां से उसने पचासों आवाजें लगाईं पर गांव वाले इसे उसकी शरारत समझ उस ओर नहीं आए और शेर एक बछड़े को उठा जंगल में गुम हो गया।
यह कहानी मैने संता को सुनाई और पूछा कि संते इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है। संता ने झट से जवाब दिया,सर जी, झूठे का सब विश्वास करते हैं सच को कोई घास नहीं ड़ालता।
यह कहानी मैने संता को सुनाई और पूछा कि संते इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है। संता ने झट से जवाब दिया,सर जी, झूठे का सब विश्वास करते हैं सच को कोई घास नहीं ड़ालता।
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
मंगलनाथ, जहाँ मंगल ग्रह का जन्म हुआ था.
स्कन्द पुराण के अनुसार किसी जमाने में अवंतिका पुरी ( उज्जैन ) पर अंधक नामक दैत्य राज किया करता था। उसने घोर तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया था कि अगर मेरे रक्त की बूदें जमीन पर गिरें तो उससे अनेकों दैत्य उत्पन् हो जायें। इस वरदान के मिलने पर अधंकासुर ने चारों ओर आतंक मचाना शुरु कर दिया। सब तरफ त्राही-त्राही मच गयी। तब सभी लोग त्रस्त हो कर भगवान शिव की शरण में गये और उनसे इस विपत्ती से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना करने लगे। प्रभू ने सबको सांत्वना देते हुए अधंकासुर को ललकारा। घमासान युद्ध के पश्चात अधंकासुर का नाश हुआ। युद्ध के दौरान भगवान शिव के मस्तक से पसीने की बुंद धरती पर गिरी जिसके संयोग से पृथ्वी के गर्भ से मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई उसी समय उसी स्थान पर ब्रह्मा जी द्वारा उन्हें शिव पिण्ड़ के रूप में स्थापित कर दिया गया। देवताओं और ब्राह्मणों द्वारा पूजित यह स्थान वर्तमान में मंगलनाथ के नाम से सारे भारत में प्रसिद्ध है। उज्जैन शहर से चार-पांच की.मी. की दूरी पर क्षिप्रा नदी के किनारे हरे-भरे स्थान पर स्थित यह मंदिर अद्भुत शांति और सकून प्रदान करता है।
भानू परिवार का यहां हर मंगलवार को जाना होता है। सो उसी के सौजन्य से हमें भी इस अनोखी जगह के दर्शनों का लाभ प्राप्त हो गया। जब क्षिप्रा अपने पूरे सौंदर्य के साथ मंदिर के पिछवाड़े से कल-कल ध्वनी कर गुजरती होगी तो आने वाले भक्तों, पर्यटकों को स्वर्गिक आनंद की प्राप्ति होती होगी। आज इस पवीत्र नदी के ठहरे गंदे काले रंग के पानी जिसमें जहां-तहां जलकुम्भीयां उगी हुए हैं, को देख मन ग्लानी से भर उठता है, क्योंकि उसको इस रूप में पहुंचाने के हम सभी जिम्मेवार हैं। फिर भी कभी उज्जैन यात्रा पर आयें तो मगलनाथ के भी दर्शन जरूर करें।
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009
उज्जैन में पानी के लिए हाहाकार
पिछले दिनों करीब 20-22 सालों के बाद महाकाल की नगरी उज्जैन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हालांकि जाने का कार्यक्रम निहायत व्यक्तिगत था पर संयोगवश दिन मौनी अमावस्या तथा सूर्य ग्रहण के पड़ रहे थे। इस बार प्रवास का सारा भार मेरे प्रिय भाई स्वरुप मित्र, अशोक जी के सुपुत्र भानू ने संभाल रखा था। उन्हीं के सुझाव से महाकाल के दर्शन सोमवार 26 जनवरी को ना कर एक दिन पहले रविवार को ही कर लिये थे। सोमवार के दिन तो ठट्ठ के ठट्ठ लोगों का जन समुद्र उमड़ा पड़ा था। मुण्ड़ ही मुण्ड़, ऐसा लग रहा था कि सारे भारत से लोग उज्जैन की ओर ही चले आ रहे हों। समयाभाव के कारण ज्यादा घूमना नहीं हो पाया था, फिर भी महाकाल के दर्शनों के बाद पांतजली आश्रम और मंगल ग्रह की जन्म स्थली मंगलनाथ के दर्शन जरूर कर लिये। उस बारे में फिर लिखुंगा, आज कुछ और ही बताना चाहता हूं।
पहले जब उज्जैन गया था और अब के वाले शहर में जमीन आसमान का फर्क होना ही था। इतना लंबा समय जो पसर गया है बीच में। पहले प्रभू के दर्शन आप उनके गले मिल कर भी कर सकते थे, अब करीब पचास फुट दूर से ही नमस्कार करना पड़ता है। आबादी बेहिसाब बढ गयी है। क्षिप्रा जैसी पवित्र नदी नाले के रूप को प्राप्त हो गयी है। पानी की किल्लत इतनी ज्यादा है कि नगर निगम हर चौथे दिन ही घरों में पानी पहुंचा पाता है। पहले यह अवधी दो दिनों की थी फिर इसे तीन दिन किया गया जो अब चार दिनों की हो गयी है। भविष्य में भी राहत नज़र नहीं आती गर्मियों में यह मियाद और बढने की आशंका से नागरिक चिंतित हैं। ऊपर से चार-चार घंटों का पावर-कट। जरा सोच कर देखिये यही दशा सारे देश की हो सकती है। इसीलिये समय रहते सरकारों का मुह जोहने से पहले हमें खुद भी प्रकृति प्रदत्त इस अनमोल अमृत को सहेजने के उपाय करने होंगे। जैसा कि मैनें वहां के लोगों से बात-चीत करने पर पाया, बहुत सारे परिवार शहर छोड़ कहीं और बसने का मन बना रहे हैं। पर इस बात की क्या गारंटी है कि और जगहों का ऐसा हाल नहीं होगा ? पांच-सात माह पहले इंटर-नेट पर ही देखा था किसी अफ्रिकी देश का हाल, जहां एक बोर्ड़ लगा हुआ था potable water on tuesday only तब यह अंदाज नहीं था कि यह विनाशकारी दशा हमें भी इतनी जल्दी अपने पाश में जकड़ लेगी।
हालांकि इंड़ियन वाटर पोर्टल पर अनुपम जी की पोस्ट देखता रहता हूं। पर उनकी जटिल प्रक्रिया के कारण उन्हें कभी कुछ कह नहीं पाया। उनके लेखों से काफी जानकारी मिलती रहती है। पर पढने और अनुभव करने में बहुत फर्क होता है। यह तो महाकाल की नगरी जा कर ही जान पाया।
पहले जब उज्जैन गया था और अब के वाले शहर में जमीन आसमान का फर्क होना ही था। इतना लंबा समय जो पसर गया है बीच में। पहले प्रभू के दर्शन आप उनके गले मिल कर भी कर सकते थे, अब करीब पचास फुट दूर से ही नमस्कार करना पड़ता है। आबादी बेहिसाब बढ गयी है। क्षिप्रा जैसी पवित्र नदी नाले के रूप को प्राप्त हो गयी है। पानी की किल्लत इतनी ज्यादा है कि नगर निगम हर चौथे दिन ही घरों में पानी पहुंचा पाता है। पहले यह अवधी दो दिनों की थी फिर इसे तीन दिन किया गया जो अब चार दिनों की हो गयी है। भविष्य में भी राहत नज़र नहीं आती गर्मियों में यह मियाद और बढने की आशंका से नागरिक चिंतित हैं। ऊपर से चार-चार घंटों का पावर-कट। जरा सोच कर देखिये यही दशा सारे देश की हो सकती है। इसीलिये समय रहते सरकारों का मुह जोहने से पहले हमें खुद भी प्रकृति प्रदत्त इस अनमोल अमृत को सहेजने के उपाय करने होंगे। जैसा कि मैनें वहां के लोगों से बात-चीत करने पर पाया, बहुत सारे परिवार शहर छोड़ कहीं और बसने का मन बना रहे हैं। पर इस बात की क्या गारंटी है कि और जगहों का ऐसा हाल नहीं होगा ? पांच-सात माह पहले इंटर-नेट पर ही देखा था किसी अफ्रिकी देश का हाल, जहां एक बोर्ड़ लगा हुआ था potable water on tuesday only तब यह अंदाज नहीं था कि यह विनाशकारी दशा हमें भी इतनी जल्दी अपने पाश में जकड़ लेगी।
हालांकि इंड़ियन वाटर पोर्टल पर अनुपम जी की पोस्ट देखता रहता हूं। पर उनकी जटिल प्रक्रिया के कारण उन्हें कभी कुछ कह नहीं पाया। उनके लेखों से काफी जानकारी मिलती रहती है। पर पढने और अनुभव करने में बहुत फर्क होता है। यह तो महाकाल की नगरी जा कर ही जान पाया।
बुधवार, 21 जनवरी 2009
सफेद घर में काले आदमी का प्रवेश, परेशान हम क्यूँ
सफेद घर में काले आदमी के प्रवेश करते (व्हाइट हाउस में ओबामा ) ही हमारे रंग-बिरंगे देश में बिना बात के लोग लाल-पीले होने लग गये हैं।कहीं मुस्लिम प्रधान मंत्री के लिये बहस हो रही है तो कहीं सोनिया जी को लेकर। जबकि बहस या प्रयास होना चाहिये था, सक्षमता को लेकर। आज ऐसे नेतृत्व की जरुरत है जो हर बाहरी- भीतरी दवाब का सीना तान कर सामना करने का माद्दा रखता हो। कुर्सी की बजाए देश को प्रमुखता देता हो। वंशवाद की जगह लायक युवाओं को देश की कमान सौंपने का हौसला रखता हो।
रही सोनिया जी की बात तो मेरा यह साफ मत है कि यदि उनकी पार्टी बहुमत में होती तो वह कभी भी इस पद को स्वीकारने से इंकार नहीं करतीं। वे और उनके सिपहसलारों को पूरी तरह मालुम था कि इस सतरंगी दाल की खिचड़ी ने नाकों चने चबवा देने हैं। सो एक तीर से दो शिकार की तर्ज पर मनमोहन जी को सूली पर चढाया गया और त्याग की वाहवाही भी लूट ली गयी।
रही सोनिया जी की बात तो मेरा यह साफ मत है कि यदि उनकी पार्टी बहुमत में होती तो वह कभी भी इस पद को स्वीकारने से इंकार नहीं करतीं। वे और उनके सिपहसलारों को पूरी तरह मालुम था कि इस सतरंगी दाल की खिचड़ी ने नाकों चने चबवा देने हैं। सो एक तीर से दो शिकार की तर्ज पर मनमोहन जी को सूली पर चढाया गया और त्याग की वाहवाही भी लूट ली गयी।
रविवार, 18 जनवरी 2009
अपनी औकात नही भूलनी चाहिए
अमेरिका की शह पर पाकिस्तान की धृष्टता को देख एक कहानी याद आ गयी।
एक जंगल में एक गीदड़ रहता था। दूसरों के शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गये, वह थर-थर कांपने लगा। फिर उसे क्या सूझा कि वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। उसने पूछा, क्या हुआ? क्या बात है? गीदड़ बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं , मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।
उस दिन से गीदड़ के दिन फिर गये। पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। शेर के साथ रहता देख जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लग गये थे, जिससे वह अपने-आप को ताकतवर समझने लग गया था। अब वह शेर को शिकार करते ध्यान से देखने लगा था। उसने पाया कि शिकार के पहले शेर की आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वह जोर की दहाड़ मार बिजली की गति से शिकार की गर्दन पर झपट कर उसका काम तमाम कर देता है। गीदड़ को लगा कि यह तो बहुत आसान है, यह तो वह भी कर सकता है। सो एक दिन उसने शेर से कहा कि आप इतने दिनों से मेरे लिये भोजन का प्रबंध करते आये हैं ,आज मैं आप के लिये शिकार कर लाउंगा। शेर ने उसे बहुत समझाया, खतरे बताये पर गीदड़ ने उसकी एक ना मानी। हार कर शेर ने उसे इजाजत दे दी। गीदड़ मांद से निकला। कुछ ही दूरी पर उसे एक हाथी नजर आया। आज तक गीदड़ ने हाथी का मांस नहीं खाया था, क्योंकि शेर भी हाथी से कतराता था। गीदड़ ने सोचा आज इसे मार कर ले जाउंगा तो शेर खुश हो जायेगा। यह सोच वह हाथी के करीब गया, अपनी आंखें लाल करने की कोशिश की, शरीर को ताना और जोर से चिल्ला कर हाथी पर कूद गया। पर उससे टकरा कर जमीन पर गिर पड़ा। हाथी ने झुंझला कर उसकी खोपड़ी पर अपना पैर रख दिया। गीदड़ के सिर की हड़्ड़ियां चूर-चूर हो गयीं। हाथी ने जोर की चिंघाड़ भरी और जंगल में गुम हो गया।
एक जंगल में एक गीदड़ रहता था। दूसरों के शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गये, वह थर-थर कांपने लगा। फिर उसे क्या सूझा कि वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। उसने पूछा, क्या हुआ? क्या बात है? गीदड़ बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं , मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।
उस दिन से गीदड़ के दिन फिर गये। पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। शेर के साथ रहता देख जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लग गये थे, जिससे वह अपने-आप को ताकतवर समझने लग गया था। अब वह शेर को शिकार करते ध्यान से देखने लगा था। उसने पाया कि शिकार के पहले शेर की आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वह जोर की दहाड़ मार बिजली की गति से शिकार की गर्दन पर झपट कर उसका काम तमाम कर देता है। गीदड़ को लगा कि यह तो बहुत आसान है, यह तो वह भी कर सकता है। सो एक दिन उसने शेर से कहा कि आप इतने दिनों से मेरे लिये भोजन का प्रबंध करते आये हैं ,आज मैं आप के लिये शिकार कर लाउंगा। शेर ने उसे बहुत समझाया, खतरे बताये पर गीदड़ ने उसकी एक ना मानी। हार कर शेर ने उसे इजाजत दे दी। गीदड़ मांद से निकला। कुछ ही दूरी पर उसे एक हाथी नजर आया। आज तक गीदड़ ने हाथी का मांस नहीं खाया था, क्योंकि शेर भी हाथी से कतराता था। गीदड़ ने सोचा आज इसे मार कर ले जाउंगा तो शेर खुश हो जायेगा। यह सोच वह हाथी के करीब गया, अपनी आंखें लाल करने की कोशिश की, शरीर को ताना और जोर से चिल्ला कर हाथी पर कूद गया। पर उससे टकरा कर जमीन पर गिर पड़ा। हाथी ने झुंझला कर उसकी खोपड़ी पर अपना पैर रख दिया। गीदड़ के सिर की हड़्ड़ियां चूर-चूर हो गयीं। हाथी ने जोर की चिंघाड़ भरी और जंगल में गुम हो गया।
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