देवगुरु बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र और देवताओं के पुरोहित हैं। इन्होंने प्रभास तीर्थ में भगवान शंकरजी की कठोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर प्रभू ने उन्हें देवगुरु का पद प्राप्त करने का वर दिया था। इनका वर्ण पीला है तथा ये पीले वस्त्र धारण करते हैं। ये कमल के आसन पर विराजमान हैं तथा इनके चार हाथों में क्रमश:- दंड, रुद्राक्ष की माला, पात्र और वरमुद्रा सुशोभित हैं। इनका वाहन रथ है जो सोने का बना हुआ है और सूर्य के समान प्रकाशमान है। उसमें वायुगति वाले पीले रंग के आठ घोड़े जुते हुए हैं। इनका आवास स्वर्ण निर्मित है। ये अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें सम्पत्ति तथा बुद्धि प्रदान कर उन्हें सन्मार्ग पर चलाते हैं और विपत्तियों में उनकी रक्षा करते हैं। शरणागतवत्सलता इनमें कूट-कूट कर भरी है। इनकी तीन पत्नियां हैं। पहली पत्नी शुभा से सात कन्याएं उत्पन्न हुई हैं। दूसरी पत्नी तारा से सात पुत्र तथा एक कन्या है तथा तीसरी पत्नी ममता से दो पुत्र, भरद्वाज और कच हुए हैं। कच ने ही दैत्य गुरु शुक्राचार्य से मृतसंजीवनी विद्या सीख कर देवताओं की मदद की थी। बृहस्पति प्रत्येक राशि में एक-एक साल तक रहते हैं। वक्रगति होने पर अंतर आ जाता है। इनकी महादशा सोलह साल की होती है। ये मीन और धनु राशि के स्वामी हैं।
इनका सामान्य मंत्र है :- “ ऊँ बृं बृहस्पतये नम:”। एक निश्चित समय और संख्या में श्रद्धानुसार इसका जप करना चाहिये। जाप का समय संध्या काल है।
* पिछला ग्रह : बुध, अगला ग्रह : शुक्र
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 30 नवंबर 2008
शनिवार, 29 नवंबर 2008
हमें नाज़ है अपने वीर जवानों पर
हमारे वीर जवानों ने फिर एक बार संकट से देश को उबारा। ये देश के सच्चे सपूत, जिस निड़रता, जिंदादिली और जज्बे से काम करते हैं, भूखे, प्यासे, उनींदे, खुद को मौत के मुंह में डाल दूसरों की जिंदगी की रक्षा करते हैं, जो खुद के परिवारों से दूर देशवासियों को चैन की नींद सुलाने की कठिन जिम्मेदारी निभाते हैं उनकी जितनी भी स्तुति की जाये कम है। पर विडंबना देखिये उन्हीं को जब आर्थिक सहूलियत देने की बात होती है तो हाय-तौबा मच जाती है।
सदन में एक दूसरे को फूटी आंखों ना सुहाने वाले नेतागण अपनी आर्थिक बढ़ोतरी पर तो बेशर्मों की तरह एक हो जाते हैं पर जब जवानों की भलाई की बात का मौका आता है तब अड़चने क्यों पेश आने लगती हैं। क्यों सेना के अधिकारियों को अपना विरोध प्रकट करना पड़ता है? क्यूं? क्यूं?
सदन में एक दूसरे को फूटी आंखों ना सुहाने वाले नेतागण अपनी आर्थिक बढ़ोतरी पर तो बेशर्मों की तरह एक हो जाते हैं पर जब जवानों की भलाई की बात का मौका आता है तब अड़चने क्यों पेश आने लगती हैं। क्यों सेना के अधिकारियों को अपना विरोध प्रकट करना पड़ता है? क्यूं? क्यूं?
गुरुवार, 27 नवंबर 2008
कहाँ मुंह छिपाए बैठे हैं
कहां हैं देवताओं के नाम वाली सेनाओं के सेनापति? लोग भी समझ लें कि सिर्फ नाम रख लेने से ही देवत्व नहीं आ जाता। क्यूं नहीं जागती इनकी गैरत? कहां मुंह छिपाये छिपे बैठे हैं निर्दोषों पर कहर बरपाने वाले? अपने ही देश के गरीब, निहत्थे, बेसहारा लोगों पर अपनी मर्दानगी दिखाने वालों को क्यूं सांप सूंघ गया है। बात तो तब होती कि आज सामने आकर ललकारते देश के दुश्मनों को। जतला देते कि हम सचमुच अपने राज्य के लोगों की चिंता करते हैं। पर नहीं उस खेल में और इस हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है। वहां जान लेने पर भी खुद पर आंच ना आने की गारंटी थी। यहां सीधे ऊपर जाने का रास्ता नजर आता है।
बुधवार, 26 नवंबर 2008
ग्रहों की कहानी--------५ :- बुध
बुध के पिता चन्द्रमा और मां तारा हैं। इनकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी इसलिए ब्रह्माजी ने इनका नाम बुध रखा। ये सभी शास्त्रों में पारंगत तथा अपने पिता चन्द्रमा की तरह कांतिमान हैं। इन्हें सब तरह से योग्य पा ब्रह्माजी ने इन्हें भूतल का स्वामी तथा ग्रह बना दिया था। इनका वर्ण कनेर के फूल की तरह पीला है तथा ये पीले रंग के ही वस्त्र धारण करते हैं। इन्होंने अपने चारों हाथों में तलवार, ढाल, गदा तथा वरमुद्रा धारण की हुई है। इनका रथ श्वेत और प्रकाश से दीप्त है, जिसमें वायु के समान गति वाले दस घोड़े जुते हुए हैं। इनका एक वाहन सिंह भी है। इनकी विद्या-बुद्धि से प्रभावित होकर महाराज मनु ने अपनी गुणवती कन्या इला का विवाह इनके साथ कर दिया। इनके संयोग से महाराज पुरूरवा की उत्पत्ति हुई। जिन्होंने चन्दवंश का विस्तार किया। बुध ग्रह के अधिदेवता भगवान विष्णु हैं। बुध, मिथुन और कन्या राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा 17 वर्ष की होती है। इनकी शांति के लिए प्रत्येक अमावस्या को व्रत रखना शुभ होता है। वैसे ये प्राय: मंगल ही करते हैं। इनका सामान्य मंत्र :- “ऊँ बुं बुधाय नम:” है। जिसका जाप एक निश्चत संख्या में रोज करने से शुभ फल प्राप्त होता है। किन्हीं विशेष परिस्थितियों में विद्वानों का मार्ग दर्शन लेना उपयोगी रहता है।
* पिछला ग्रह : मंगल, अगला ग्रह : बृहस्पति।
* पिछला ग्रह : मंगल, अगला ग्रह : बृहस्पति।
मंगलवार, 25 नवंबर 2008
ग्रहों की कहानी---------------४ :- मंगल
विभिन्न कल्पों में मंगल की उत्पत्ति की विभिन्न कथाएँ हैं। इनमें ज्यादा प्रचलित कथा इस प्रकार है। जब हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई हिरण्याक्ष पृथ्वी को चुरा कर ले गया था तब भगवान ने वाराहावतार लिया और हिरण्याक्ष को मार कर पृथ्वी का उद्धार किया था। इस पर पृथ्वी ने प्रभू को पति रूप में पाने की इच्छा की। प्रभू ने उनकी मनोकामना पूरी की। इनके विवाह के फलस्वरूप मंगल की उत्पत्ति हुई। इनकी चार भुजाएँ हैं तथा शरीर के रोयें लाल रंग के हैं। इनके वस्त्रों का रंग भी लाल है। यह भेड़ के वाहन पर सवार हैं और इनके हाथों ने त्रिशूल, गदा, अभयमुद्रा तथा वरमुद्रा धारण की हुई है। पुराणों में इनकी बड़ी महिमा बताई गयी है। ये प्रसन्न हो जायें तो मनुष्य की हर इच्छा पूरी हो जाती है। इनके नाम का पाठ करने से ऋण से मुक्ति मिल जाती है। यदि इनकी गति वक्री ना हो तो यह हर राशि में एक-एक पक्ष बिताते हुए बारह राशियों को ड़ेढ़ वर्ष में पार करते हैं। इनको अशुभ ग्रह माना जाता है। इनकी महा दशा सात वर्षों तक रहती है। इनकी शान्ति के लिए शिव उपासना, मगलवार को व्रत और हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। ये मेष तथा वृश्चिक राशि के स्वामी हैं। इनका सामान्य मंत्र :- “ऊँ अं अंगारकाय नम:” है। इसके जाप का समय प्रात: काल का है। इसका एक निश्चित संख्या में, निश्चित समय में पाठ करना चाहिये। इस विषय में किसी विद्वान का सहयोग और परामर्श ले लेना चाहिये।
* अगला ग्रह :- बुध
* अगला ग्रह :- बुध
सोमवार, 24 नवंबर 2008
ग्रहों की कहानी------------- ३ :- चंद्रदेव
श्रीमद्भागवत के अनुसार चन्द्रदेव महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र हैं। इनका वर्ण गौर है। इनके वस्त्र, अश्व और रथ श्वेत रंग के हैं। शंख के समान उज्जवल दस घोड़ों वाले अपने रथ पर ये कमल के आसन पर विराजमान हैं। इनके एक हाथ में गदा और दूसरा हाथ वरमुद्रा में है। इन्हें सर्वमय कहा गया है। ये सोलह कलाओं से युक्त हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इनके वंश में अवतार लिया था, इसीलिये वे भी सोलह कलाओं से युक्त थे।
ब्रह्माजी ने इन्हें बीज, औषधि, जल तथा ब्राह्मणों का राजा मनोनीत किया है। इनका विवाह दक्ष की सत्ताईस कन्याओं से हुआ है, जो सत्ताईस नक्षत्रों के रूप में जानी जाती हैं। इस तरह नक्षत्रों के साथ चन्द्रदेव परिक्रमा करते हुए सभी प्राणियों के पोषण के साथ-साथ पर्व, संधियों व मासों का विभाजन करते हैं। इनके पुत्र का नाम बुध है जो तारा से उत्पन्न हुआ है। इनकी महादशा दस वर्ष की होती है तथा ये कर्क राशि के स्वामी हैं। इन्हें नवग्रहों में दूसरा स्थान प्राप्त है। इनकी प्रतिकूलता से मनुष्य को मानसिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। कहते हैं कि पूर्णिमा को तांबे के पात्र में मधुमिश्रित पकवान अर्पित करने पर ये तृप्त होते हैं। जिसके फलस्वरूप मानव सभी कष्टों से मुक्ति पा जाता है।
इनका सामान्य मंत्र :- "ऊँ सों सोमाय नम:" है। इसका एक निश्चित संख्या में संध्या समय जाप करना चाहिये।
* अगला ग्रह :- मंगल।
ब्रह्माजी ने इन्हें बीज, औषधि, जल तथा ब्राह्मणों का राजा मनोनीत किया है। इनका विवाह दक्ष की सत्ताईस कन्याओं से हुआ है, जो सत्ताईस नक्षत्रों के रूप में जानी जाती हैं। इस तरह नक्षत्रों के साथ चन्द्रदेव परिक्रमा करते हुए सभी प्राणियों के पोषण के साथ-साथ पर्व, संधियों व मासों का विभाजन करते हैं। इनके पुत्र का नाम बुध है जो तारा से उत्पन्न हुआ है। इनकी महादशा दस वर्ष की होती है तथा ये कर्क राशि के स्वामी हैं। इन्हें नवग्रहों में दूसरा स्थान प्राप्त है। इनकी प्रतिकूलता से मनुष्य को मानसिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। कहते हैं कि पूर्णिमा को तांबे के पात्र में मधुमिश्रित पकवान अर्पित करने पर ये तृप्त होते हैं। जिसके फलस्वरूप मानव सभी कष्टों से मुक्ति पा जाता है।
इनका सामान्य मंत्र :- "ऊँ सों सोमाय नम:" है। इसका एक निश्चित संख्या में संध्या समय जाप करना चाहिये।
* अगला ग्रह :- मंगल।
रविवार, 23 नवंबर 2008
ग्रहों की कहानी------------------- २ :- सूर्यदेव
जब ब्रह्माजी अण्ड का भेदन कर उत्पन्न हुए, तब उनके मुंह से ‘ऊँ’ महाशब्द उच्चरित हुआ। यह ओंकार परब्रह्म है और यही भगवान सूर्यदेव का शरीर है। ब्रह्माजी के चारों मुखों से चार वेद आविर्भूत हुए और ओंकार के तेज से मिल कर जो स्वरूप उत्पन्न हुआ वही सूर्यदेव हैं। यह सूर्यस्वरूप सृष्टि में सबसे पहले प्रकट हुआ इसलिए इसका नाम आदित्य पड़ा। सूर्यदेव का एक नाम सविता भी है। जिसका अर्थ होता है सृष्टि करने वाला। इन्हीं से जगत उत्पन्न हुआ है। यही सनातन परमात्मा हैं। नवग्रहों में सूर्य सर्वप्रमुख देवता हैं। इनकी दो भुजाएं हैं। वे कमल के आसन पर विराजमान हैं; उनके दोनों हाथों में कमल सुशोभित हैं। इनका वर्ण लाल है। सात घोड़ों वाले इनके रथ में एक ही चक्र है, जो ंवत्सर कहलाता है। इस रथ में बारह अरे हैं जो बारह महीनों के प्रतीक हैं, ऋतुरूप छ: नेमियां और चौमासे को इंगित करती तीन नाभियां हैं। चक्र, शक्ति, पाश और अंकुश इनके मुख्य अस्त्र हैं।
एक बार दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर उनके सारे अधिकार छीन लिए। तब देवमाता अदिति ने इस विपत्ति से मुक्ति पने के लिये भगवान सूर्य की उपासना की, जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने अदिति के गर्भ से अवतार लिया और दैत्यों को पराजित कर सनातन वेदमार्ग की स्थापना की। इसलिये भी इन्हें आदित्य कहा जाता है।
भगवान सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा छ: वर्ष की होती है। इनकी प्रसन्नता के लिए इन्हें नित्य सूर्यार्ध्य देना चाहिये। इनका सामान्य मंत्र है –“ ऊँ घृणि सूर्याय नम:” इसका एक निश्चित संख्या में रोज जप करना चाहिये।
अगला नवग्रह 'चन्द्रदेव'
एक बार दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर उनके सारे अधिकार छीन लिए। तब देवमाता अदिति ने इस विपत्ति से मुक्ति पने के लिये भगवान सूर्य की उपासना की, जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने अदिति के गर्भ से अवतार लिया और दैत्यों को पराजित कर सनातन वेदमार्ग की स्थापना की। इसलिये भी इन्हें आदित्य कहा जाता है।
भगवान सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा छ: वर्ष की होती है। इनकी प्रसन्नता के लिए इन्हें नित्य सूर्यार्ध्य देना चाहिये। इनका सामान्य मंत्र है –“ ऊँ घृणि सूर्याय नम:” इसका एक निश्चित संख्या में रोज जप करना चाहिये।
अगला नवग्रह 'चन्द्रदेव'
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