pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

''स्वयंप्रभा'', रामायण का एक उपेक्षित पात्र

थके-हारे, निश्चित समय में सीता माता को ना खोज पाने के भय से व्याकुल, वानर समूह को उचित मार्गदर्शन दे, लंका का पता बताने वाली सिद्ध तपस्विनी "स्वयंप्रभा" को वाल्मीकि रामायण के बाद कोई विशेष महत्व नहीं मिल पाया। हो सकता है, श्री राम से इस पात्र का सीधा संबंध ना होना इस बात का कारण हो।

#हिन्दी_ब्लागिंग 
शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो कि स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठ कर वह सारी बात बताती हैं।

यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देव-कन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।

इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं। आगे की कथा तो जगजाहिर है।

यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है। पर पता नहीं, स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र उपेक्षित क्यूं रह गया।

हाय, कितने गरीब हैं हम

अखिल भारतीय जेम्स एंड ज्वैलरी ट्रेड फेडरेशन के सर्वे की मानें तो दीवाली से पहले अक्टूबर के दौरान सिर्फ बीस दिनों में पांच टन सोने की बिक्री हुई इस गरीब देश में। जो पिछले आंकड़ों से 66 फीसदी ज्यादा है। इस साल दुकानों में पहुंचने वाले ग्राहकों की संख्या में भी 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गयी। और यह सब तब है जबकि सोने की कीमतों में पिछले पांच सालों की तुलना में 160 प्रतिशत उछाल आ चुका है।

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008

टिप्पणीयों को खुले दिल से स्वीकार करें

टिप्पणी देना और पाना किसे अच्छा नहीं लगता। हरेक को अपनी पोस्ट की प्रशंसा पा खुशी होती है। उत्साहित हो वह भी किसी और को भी प्रोत्साहित करना चाहता है। इसी उमंग में किसी अच्छे लेख की प्रशंसा में जब अपने विचार व्यक्त करता है तो वे, टिप्पणी माडरेशन सक्षम किया होने की वजह से, तुरंत प्रकाशित नहीं होते। ऐसा लगता है कि किसी के घर गये हों और चौकीदार अंदर जाने से यह कह कर रोक दे कि पूछ कर आता हूं कि अंदर आने दूं कि नहीं।
ऐसा क्यूं है। क्या लिखने वाला सिर्फ अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है, अपनी जरा सी आलोचना उसे पसंद नहीं। क्या यह डर है कि मैंने जो लिखा है उससे बहुत से लोग नाराज हो जायेंगे और उल्टी-सीधी बातें लिख मारेंगे, या और कुछ। यह तो सर्वविदित है कि सब को खुश नहीं किया जा सकता, मुंड़े-मुंड़े मत्रिभिन्ना, और जो लिखा गया है वह वैसा लिखने वाले को ठीक लगा इसलिये लिखा गया, यह पूर्णतया अपने विचार हैं। तो पढ़ने वाले को भी पूरी आजादी होनी चाहिए कि वह भी अपने विचारों से सबको अवगत करा सके, सबको यानी सबको। ऐसा मुझे लगता है।
अक्सर कहा जाता है कि ब्लागर परिवार में संदेशों का आदान-प्रदान होते रहना चाहिये। किसी को प्रोत्साहित करना बहुत अच्छी बात है। नवागत की झिझक मिटती है, हौसला बढ़ता है। पर सिर्फ टिप्पणी देनी है इसलिए टिप्पणी दे देने से लगता है कि सिर्फ औपचारिकता पूरी कर दी गयी हो। पर टिप्पणी निष्पक्ष होनी चाहिए। जरूरी तो नहीं कि कटु आलोचना कर द्वेष पैदा किया जाए। पर लेख के बारे में अपने विचार बिना ठेस पहुंचाए कहे जाएं तो सामने वाले को और अच्छा लिखने में मदद मिलेगी, ऐसा मेरा सोचना है। अपने बारे में सिर्फ अच्छे ही अच्छे कमेंट पा कर अपनी गल्तियों की तरफ ध्यान नहीं जाता। इसलिए दरवाजे हर्रक के लिए खुले होने चाहियें। सबका स्वागत होना चाहिए। ऐसा नहीं कि मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू।
मैंने अपने विचार रखे हैं, अन्यथा ना लिजियेगा।

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008

सनकी, कैसे कैसे

दुनिया का इतिहास तरह-तरह के सनकियों से भरा पड़ा है। आईये दो-एक का जायजा लें।

मुहम्मद बिन तुगलक को पता नहीं क्या सूझी, अच्छी भली अपनी राजधानी दिल्ली को छोड़ कर वहां से 600 मील दूर दौलताबाद में नयी राजधानी बसाने की सनक ने करीब तीस हज़ार परिवारों को बेसहारा भटकने के लिए मजबूर कर दिया था। वह जानता था कि उसके इस कदम से लोग खुश नहीं हैं, ऐसे लोग आने से इंकार ना कर दें, इसलिए उसने दिल्ली के घरों-दुकानों में आग लगवा कर नष्ट करवा दिया। सैकड़ों लोग मौत के मुंह में चले गये। जले पर नमक तब छिड़का गया, जब 15 वर्ष बाद फिर प्रजा सहित राजधानी को उठवा कर वापस दिल्ली ले आया गया।
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रूस का ईवान चतुर्थ तो तुगलक से भी एक कदम आगे निकला। उसने अपने परिवार, नौकरों-चाकरों, सैनिकों और खजाने के साथ अपनी राजधानी मास्को छोड़ दी, और एक बीहड़, सुनसान इलाके की ओर रवाना हो गया। कुछ दिनों बाद उसने वहां से संदेश भेजा कि राज्य की परिस्थितियों से दुखी होकर वह अपनी गद्दी का अधिकार छोड़ रहा है। सबको लगा कि वह गद्दी छोड़ रहा है। पर असल में वह देखना चाहता था कि उसके राज्य छोड़ने से कौन-कौन खुश होता है। पर उसकी यह चाल उसके मंत्री व अधिकारी समझ गये थे। वे सब मिल कर उसके पास गये और उससे प्रार्थना की कि वह राज-पाट ना छोड़े, क्योंकि वही एकमात्र इस लायक है, जो यह भार संभाल सके। इवान खुश हो गया और वापस आ गया। परन्तु आते ही उसने प्रार्थना करने वाले मंत्रियों के सर यह कह कर कटवा डाले कि वे राज्य भार कुछ समय तक संभालने में भी समर्थ नहीं हैं।
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हंगरी की कौन्टेस एलिजाबेथ बाथोरी अत्यंत रूपवती थी और चाहती थी कि उसका रूप सदा वैसा ही बना रहे। कुछ तांत्रिकों ने उसे विश्वास दिला दिया था कि यदि वह कुवांरी कन्याओं का रक्त पियेगी व उनके रक्त से स्नान करेगी तो उसका रूप-रंग कभी खत्म नहीं होगा। उसकी शादी एक अधिकारी से हुई थी। पर धीरे-धीरे उसने अपनी पहुंच शाही दरबार तक बना ली थी। वह एक तानाशाह किस्म की औरत थी। दरबार में प्राप्त अपनी शक्तियों का उसने खूब दुरुपयोग किया। कहा जाता है कि अपने पागलपन में उसने करीब 600 से अधिक कुंवारी लड़कियों का रक्त पिया और उनके रक्त से स्नान किया। लेकिन एक दिन उसके खून पीने का रहस्य खुल गया। उसको कठोर दंड दिया गया। जहां छिप कर वह खून पीती थी उसी जगह उसे कैद कर रखा गया। वहीं एक दिन उसकी मौत हो गयी।

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

कमजोर केन्द्र का नतीजा

वर्षों पहले, ताऊ ने भी अपना वर्चस्व बनाने के लिए ऐसी ही हरकत की थी। अपने भड़काउ भाषणों के द्वारा महाराष्ट्र की जनता को दो फाड़ कर वहां अपना एकाधिकार जमाने की। पर उस समय दिल्ली में एक मजबूत सरकार के हाथों में देश की बागडोर थी, एक निडर और दबंग महिला के नेतृत्व में। एक सिर्फ एक घुड़की मिली थी और तथाकथित शेर अपनी मांद में दुबक गया था। हिम्मत नहीं हुई थी कि कोई जवाब भी दे पाता। पर आज मामला बिल्कुल उल्टा है। कोई भी आता है आंख दिखा कर चला जाता है। सरकार को अपनी ही भसूड़ी पड़ी हुई है। अपने आप को बचाएं या देश को देखें। हिमाकत इतनी बढ़ गयी है, छुटभैइयों तक की, कि चोरी भी करते हैं फिर सीनाजोरी भी दिखाते हैं। महाराष्ट्र सरकार की तो छोड़ीए केन्द्र ही हिम्मत नहीं जुटा पा रहा कोई सख्त कदम उठाने का। एक कमजोर, हताश, हिचकोले खाते नेतृत्व से आशा करना भी बेवकूफी ही है।

यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे बिहार, यू.पी. के निवासियों के धैर्य और संयम की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। इनकी चुप्पी इनकी कमजोरी नहीं समझदारी है। प्रभू से यही प्रार्थना है कि इनकी बनाए रखे और उनकी लौटा दे।

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

बिना शीर्षक के

ठंड़ के दिन थे। एक गिद्ध पहाड़ की चोटी पर बैठा गुनगुनी धूप का आनंद ले रहा था। इतने में उधर से यमराज गुजरे। वहां गिद्ध को बैठा देख उनकी भृकुटी में बल पड़ गये। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस अपने रस्ते चले गये। पर इधर गिद्ध महाराज के तो देवता ही कूच कर गये। सही भी था जिसको साक्षात यमराज ही टेढ़ी नज़र से देख गये हों, उसका तो भगवान ही मालिक है। गिद्ध बेचारा डर के मारे कांपे जा रहा था, उसे आज अपना अंत साफ दिखाई पड़ रहा था। इतने में उधर से नारद मुनि निकले। गिद्ध की ऐसी बुरी दशा देख उन्होंने उससे पूछा, गिद्ध राज, क्या हुआ ऐसे क्यूं कांप रहे हो। गिद्ध की तो आवाज ही नहीं निकल रही थी। बड़ी मुश्किल से उसने सारी बात नारद जी को बताई। नारद जी बोले तुम डरो मत। यमराज तो धर्मराज हैं, बिना बात वे किसी को भी दंडित नहीं करते। फिर भी तुम सुरक्षा की दृष्टि से यहां से सौ योजन दूर मलय पर्वत पर चले जाओ, वहां एक गुफा है, उसके अंदर जा कर बैठ जाना। मैं यमराज जी से तुम्हारे बारे में बात करता हूं।
इस तरह गिद्ध को सुरक्षित जगह भेज नारद जी यमराज जी के पास गये और उनसे पूछा, महाराज, उस बेचारे गिद्ध से क्या भूल हो गयी, जो आप उस पर क्रुद्ध हो गये। यमराज जी बोले, नहीं तो, मैं क्रोधित नहीं इस बात को लेकर आश्चर्यचकित था, कि उस गिद्ध की मौत तो सौ योजन दूर मलय पर्वत की गुफा में होनी है। वह यहां कैसे बैठा हुआ है।

रविवार, 19 अक्टूबर 2008

उसे अपनी माँ से विवाह करना पड़ा था, दुनिया की दर्दनाक कहानियों में से एक

कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। इन्होंने भी प्रारब्ध को चुन्नौती दी थी, जिससे जन्म हुआ संसार की सबसे दर्दनाक कथा का।

यूनान में एक राज्य था थीबिज। इसके राजा लायस तथा रानी जोकास्टा के कोई संतान नहीं थी। कफी मिन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। पर खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिक सकीं। एक भविष्यवक्ता ने भविष्वाणी की कि उनका पुत्र, पित्रहंता होगा और अपनी ही मां से विवाह करेगा। यह जान दोनो आतंकित हो गये और अपने नवजात शिशु के हाथ पैर बंधवा कर उसे सिथेरन पर्वत पर फिंकवा दिया। पर बच्चे की मृत्यु नहीं लिखी हुई थी। जिस आदमी को यह काम सौंपा गया था, वह यह अमानवीय कार्य ना कर सका। उसने पहाड़ पर शिशु को पड़ोसी राज्य, कोरिंथ, के चरवाहे को दे बच्चे की जान बचा दी। उस चरवाहे ने अपने राजा 
पोलिबस, जिसकी कोई संतान नहीं थी, को खुश करने के लिए बच्चे को उसे सौंप दिया। रस्सी से बंधे होने के कारण शिशु के पांव सूज कर कुछ टेढे हो गये थे, जिनको देख कर पोलिबस के मुंह से निकला “ईडिपस” याने सूजे पैरोंवाला और यही नाम पड़ गया बच्चे का।     

समय बीतता गया। ईडिपस जवान हो गया। होनी ने अपना रंग दिखाया। एक समारोह में एक अतिथी ने उसका यह कह कर मजाक उड़ाया कि वह कोई राजकुमार नहीं है। वह तो कहीं पड़ा मिला था। ईडिपस के मन में शक घर कर गया। एक दिन बिना किसी को बताए वह अपोलो के विश्वप्रसिद्ध भविष्य वक्ता से मिलने निकल पड़ा। मंदिर की पुजारिन ने उसे स्पष्ट उत्तर तो दिया नहीं पर एक चेतावनी जरूर दी कि वह अपने पिता की खोज ना करे नहीं तो वह तुम्हारे हाथों मारा जाएगा और तुम अपनी ही मां से शादी करोगे।

ईडिपस यह सुन बहुत डर गया। उसने निर्णय लिया कि वह वापस कोरिंथ नहीं जाएगा। जब इसी उधेड़बुन में वह चला जा रहा था उसी समय सामने से लेयस अपने रथ पर सवार हो उधर से गुजर रहा था। लेयस का अंगरक्षक रास्ते से सबको हटाता जा रहा था। ईडिपस के मार्ग ना देने पर, अंगरक्षक से उसकी तकरार हो गयी, जिससे खुद को अपमानित महसूस कर ईडिपस ने उसकी हत्या कर दी। यह देख लेयस ने क्रोधित हो उस पर वार कर दिया, लड़ाई में लेयस मारा गया। अनजाने में ही सही ईडिपस के हाथों उसके पिता की हत्या हो ही गयी। इसके बाद भटकते-भटकते वह थीबिज जा पहुंचा। वहां जाने पर उसे मालुम पड़ा कि वहां के राजा की मौत हो चुकी है। जिसका फायदा उठा कर स्फिंक्स नामक एक दैत्य वहां के लोगों को परेशान करता रहता है। उसने एक शर्त रखी हुई थी कि जब तक कोई मेरी पहेली का जवाब नहीं देगा तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा। उसकी उपस्थिति का मतलब था मौत, अकाल और सूखा। राज्य की ओर से घोषणा की गयी थी कि इस मुसीबत से जो छुटकारा दिलवाएगा उसे ही यहां का राजा बना दिया जाएगा तथा उसीके साथ मृत राजा की रानी की शादी भी कर दी जाएगी। ईडिपस ने यह घोषणा सुनी, उसने वापस तो लौटना नहीं था, एक अलग राज्य पा जाने का अवसर मिलते देख उसने पहेली का उत्तर देने की इच्छा जाहिर कर दी। उसे स्फिंक्स के पास पहूंचा दिया गया। डरावना स्फिंक्स उसे घूर रहा था पर इसने बिना डरे उससे सवाल पूछने को कहा। स्फिंक्स ने पूछा कि वह कौन सा प्राणी है जो सुबह चार पैरों से चलता है, दोपहर में दो पैरों से और शाम को तीन पांवों पर चलता है और वह सबसे ज्यादा शक्तिशाली अपने कम पांवों के समय होता है। ईडिपस ने बिना हिचके जवाब दिया कि वह प्राणी इंसान है। जो अपने शैशव काल में चार पैरों पर, जवानी यानि दोपहर में दो पैरों पर और बुढ़ापे में लकड़ी की सहायता से यानी तीन पैरों से चलता है। इतना सुनना था कि स्फिंक्स वहां से गायब हो गया। थीबिज की जनता ने राहत की सांस ली। घोषणा के अनुसार ईडिपस को वहां का राजा बना दिया गया और रानी जोकास्टा से उसका विवाह कर दिया गया।

होनी का खेल चलता रहा। दिन बीतते गये। ईडिपस सफलता पूर्वक थीबिज पर राज्य करता रहा। प्रजा खुशहाल थी। पूरे राज्य में सुख-शांति व समृद्धि का वातावरण था। यद्यपि रानी जोकास्टा ईडिपस से उम्र में काफी बड़ी थी फिर भी दोनों में अगाध प्रेम था। इनकी चार संतानें हुयीं। बच्चे जब जवान हो गये तो समय ने विपरीत करवट ली। राज्य में महामारी फैल गयी। लोग कीड़े-मकोंड़ों की तरह मरने लगे। तभी देववाणी हुई कि इस सब का कारण राजा लेयस का हत्यारा है। दुखी व परेशान जनता अपने राजा के पास पहुंची। ईडिपस ने वादा किया कि वह शीघ्र ही लेयस के हत्यारे को खोज निकालेगा। उसने राज्य के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता टाइरसीज को आमंत्रित कर समस्या का निदान करने को कहा। टाइरसीज ने कहा, राजन कुछ चीजों का पता ना लगना ही अच्छा होता है। सच्चाई आप सह नहीं पायेंगें। पर ईडिपस ना माना उसने कहा प्रजा की भलाई के लिए मैं कुछ भी सहने को तैयार हूं । जब टाइरसीज फिर भी चुप रहा और ईडिपस के सारे निवेदन बेकार गये तो ईडिपस को गुस्सा आ गया और उसने टाइरसीज और उसकी विद्या को ही ठोंग करार दे दिया। इससे टाइरसीज भी आवेश में आ गया। उसने कहा कि आप सुनना ही चाहते हैं तो सुनें, आप ही राजा लेयस के हत्यारे हैं। वर्षों पहले आपने मार्ग ना छोड़ने के कारण जिसका वध किया था वही राजा लेयस आपके पिता थे। ईडैपस को सब याद आ गया। उसने चिंतित हो रानी से पूछ-ताछ की तो उसने विस्तार से अपनी बीती जिंदगी की सारी बातें बताईं कि राजा की मौत अपने ही बेटे के हाथों होनी थी। पर आप चिंता ना करें हमारा एक ही बेटा था जिसे राजा ने उसके पैदा होते ही मरवा दिया था। जोकास्टा ने ईडिपस को आश्वस्त करने के लिए उस आदमी को बुलवाया जिसे शिशु को मारने की जिम्मेदारी दी गयी थी। पर इस बार वह झूठ नहीं बोल पाया और उसने सारी बात सच-सच बता दी। रानी जोकास्टा सच जान पाप और शर्म से मर्माहत हो गयी। इतने कटु सत्य को वह सहन नहीं कर पायी। उसने उसी वक्त आत्महत्या कर ली। ईडिपस देर तक रानी जोकास्टा के शव पर यह कह कर रोता रहा कि तुमने तो अपने दुखों का अंत कर लिया, लेकिन मेरी सजा के लिए मौत भी कम है। उसी समय ईडिपस ने अपनी आंखें फोड़ लीं और महल से निकल गया। कुछ ही समय में उसका पूरा परिवार नष्ट हो गया क्योंकि वह भी उसी पाप की उत्पत्ति था, जो भाग्यवश अनजाने में हो गया था।

शायद यह दुनिया की सबसे दर्दनाक कहानी है।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...