इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास चली आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की इस दौड़-धूप की खबर का तो पता लगना ही था ! वह भी तब जब उनके शिखर पर एक दूर-संचार का टावर भी लगा हुआ था। चुहिया को गिरता-पड़ता वहां तक पहुंचने की खबर मिलते ही पर्वतराज मायूस सा दिखते हुए चेहरे पर दर्द भरे भाव ले आए और इंतजार करने लगे नायिका के सामने आने का...................
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
एक सुबह एक तपस्वी ऋषि नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहे थे, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया उनकी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह घायल थी। वे उसे संभाल कर अपने आश्रम ले आए ! उसका इलाज तथा मरहम-पट्टी कर किसी अनजान खतरे को भांपते हुए अपने पास ही रख लिया। समय बीतता गया और उनकी तीमारदारी, पुत्रीवत स्नेह में बदल गई ! इसी मोहवश अपने तपोबल से उन्होंने उसे मानव रूप दे सर्वगुण सम्पन्न कर दिया।
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| परामर्श |
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| सूर्यदेव से याचना |
यह सुन मुषिका मेघराज के पास पहुंच गई और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके, तुमने गलत सुना है। अरे ! मुझसे तो कहीं शक्तिशाली पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। मैं उसके सामने कहीं नहीं टिकता ! इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि मैं जरूर तुम जैसी सुंदरी से विवाह कर लेता ! पर मैं तुम्हारे परिक्षण में उत्तीर्ण नहीं हो पा रहा हूँ, क्योंकि सदियों से मैं विशाल पर्वत से पार नहीं पा सका हूँ ! उनके आगे मेरा कोई बस नहीं चलता !
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| मेघदेव से विनय |
इ तना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास चली आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी ! वह भी तब जब उनके शिखर पर एक दूर-संचार का टावर लगा हुअ था। वे तो इंतजार कर ही रहे थे नायिका के आने का !
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| पवनदेव से विनती |
चु हिया को गिरता-पड़ता वहां तक आता देखते ही पर्वतराज मायूस सा दिखते हुए चेहरे पर दर्द भरे भाव ले आए और जब चुहिया ने अपने आने का कारण बताया तो उन्होंने उसे वही बता अपना पीछा छुड़वाया, जो सैकड़ों साल पहले भी एक बार बता चुके थे कि एक जीव मेरे से भी ताकतवर है, जो अपने मजबूत पंजों से मुझमें भी छिद्र कर खोखला बना देता है। देख ही रही हो मुझे अभी भी लगातार वेदना हो रही है !
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| पर्वतराज की शरण में |
इ तना सुन चुहिया ने वापस अपने पितृतुल्य ऋषि के पास जा चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। ऋषि ने उसी समय मूषकराज को खबर भेजी ! वे वहां आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर के लिए मौन साध लिया, फिर बोले देवी क्षमा करें। हमारा कभी भी मतैक्य नहीं हो सकता ! इसलिए मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता ! सच कटू होता है ! आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके ! मैं तो एक अदना सा चूहा हूं ! मेरे साथ आपका निर्वाह कभी भी ना हो सकेगा ! मुझे क्षमा करें ! इतना कह उन्होंने विदा ली ! अपने को सर्वोत्कृष्ट समझने वाली चुहिया को ऐसे परिणाम की आशा नहीं थी ! वह सन्न हो खड़ी रह गई !
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| सबक |
@सभी चित्र अंतर्जाल और AI के सौजन्य से 🙏






2 टिप्पणियां:
हा हा | इसीलिए "पुन: मूषक भव" की वास्तव में जरूरत है बहुत सी सभ्यताऐं पुनर्जीवित होना शुरू हो जाएंगी | :) :)
सुना है मूषिका रानी लेखिका हो गई है
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