शनिवार, 11 मार्च 2023

"शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों किया जाता है :

शांति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ! यह सब जगह सदा विद्यमान रहती है, जब तक इसे हमारे या हमारे क्रिया-कलापों द्वारा भंग ना किया जाए ! इसका यह भी अर्थ है कि हमारी गति-विधियों से ही शांति का क्षय होता है ! पर जैसे ही यह खत्म होता है, शांति पुन: बहाल हो जाती है ! यह जहां भी होती है, वहाँ सदा खुशियों  का डेरा रहता है ! इसीलिए शांति की प्राप्ति के लिए हम प्रार्थना करते हैं, जिससे हमारी मुसीबतों, दुखों, तकलीफों का अंत होता है और मन को सुख की अनुभूति होती है ...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज शाम टहलने निकला तो रास्ते में पंडित राम शरण त्रिपाठी मिल गए ! स्नेहवश हम सब उन्हें रामजी कह कर बुलाते हैं ! विद्वान पुरुष हैं ! ग्रंथों का गहन अध्ययन किया हुआ है ! किसी भी बात को प्रमाण के साथ ही प्रस्तुत करते हैं ! उनके साथ बतियाते हुए भोलेनाथ के मंदिर प्रांगण में पहुँच गया।  वहां कुछ लोग शिवलिंग की प्रदक्षिणा कर रहे थे, तो वैसे ही राम जी से पूछ लिया कि हम प्रदक्षिणा क्यों करते हैं ?

रामजी ने बताया कि जिस तरह सूर्य को केंद्र में रख सारे ग्रह उसका चक्कर लगाते हैं जिससे सूर्य की ऊर्जा उन्हें मिलती रहे, उसी तरह प्रभू यानी सर्वोच्च सत्ता, जो सारे विश्व का केंद्र है, उसकी परिक्रमा कर उनकी कृपा प्राप्त करने का विधान है ! वही कर्ता है, वही सारी गतिविधियों का संचालक है, उसी की कृपा से हम अपने नित्य प्रति के कार्य पूर्ण कर पाते हैं, उसी से हमारा जीवन है ! फिर प्रभू समदर्शी हैं, अपने सारे जीवों पर एक समान दया भाव रखते हैं ! इसका अर्थ है कि हम सभी उनसे समान दूरी पर स्थित हैं और उनकी कृपा, बिना भेद-भाव के सब पर बराबर बरसती है। परिक्रमा करना भी उनकी पूजा अर्चना का एक हिस्सा है, जो उनके प्रति अपनी कृतज्ञतायापन का एक भाव है ! उन्हें अपने प्रेम-पाश में बांधने की एक अबोध कामना है ! केवल प्रभू  ही नहीं, जिनका भी हम आदर करते हैं, जो बिना किसी कामना के हमें लाभान्वित करते हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए हम उनकी परिक्रमा करते हैं ! चाहे वे हमारे माता-पिता हों, गुरुजन हों, अग्नि हो या वृक्ष हों ! वैसे ही एक परिक्रमा खुद की भी होती है, जो घर इत्यादि में पूजा की समाप्ति पर एक जगह खड़े होकर घूमते हुए की जाती है, जो याद दिलाती है कि हमारे भीतर भी वही प्रभू, वही शक्ति, वही परम सत्य विराजमान हैं, जिनकी प्रतिमा की हम अभी-अभी पूजा-अर्चना किए हैं !

मैंने फिर पूछा कि परिक्रमा प्रतिमा को दाहिने रख कर यानी घड़ी की सूई की चाल के अनुसार ही क्यों की जाती है ?  यह सुन कर वहाँ बैठे एक सज्जन बोले कि इससे आपस में लोग भिड़ने से बचे रहते हैं नहीं तो कोई दाएं से चलेगा और कोई बांए से आएगा तो मार्ग अवरुद्ध होने लगेगा !रामजी मुस्कुरा कर बोले, आपकी बात आंशिक रूप से अपनी जगह ठीक है, पर आराध्य को दाहिने तरफ रख परिक्रमा करने का मुख्य कारण यह है कि हमारे यहाँ दाएं भाग को ज्यादा पवित्र और सकारात्मक माना जाता है ! इसीलिए जो हमारी सदा रक्षा करते हैं, हर ऊँच-नीच से बचाते हैं, सदा हमारा ध्यान रखते हैं, उन प्रभू को हम अपनी दाईं और रख अपने आप को सदा सकारात्मक रहने की याद दिलाते हुए, उनकी परिक्रमा करते हैं।


आज मन में पता नहीं क्यूँ एक के बाद एक प्रश्न अपना सर उठा रहे थे ! ऐसे ही एक सवाल के बारे में मैंने पंडितजी से फिर पूछ लिया कि पूजा समाप्ति पर हम "शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों करते हैं ?
रामजी ने बताया कि शांति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह सब जगह सदा विद्यमान रहती है। जब तक इसे हमारे या हमारे क्रिया-कलापों द्वारा भंग ना किया जाए। इसका यह भी अर्थ है कि हमारी गति-विधियों से ही शांति का क्षय होता है पर जैसे ही यह सब खत्म होता है, शांति पुन: बहाल हो जाती है। यह जहां भी होती है वहां सदा खुशियों का डेरा रहता है। इसीलिए शांति की प्राप्ति के लिए हम प्रार्थना करते हैं. जिससे हमारी मुसीबतों, दुखों, तकलीफों का अंत होता है और मन को सुख की अनुभूति होती है ! जीवन में कुछ ऐसी  प्राकृतिक आपदाएं होती हैं जिन पर किसी का वश नहीं चलता, जैसे भूकंप, बाढ़ इत्यादि। कुछ ऐसी विपदाएं होती हैं जो हमारे द्वारा या हमारी गलतियों से घटती हैं जैसे प्रदूषण, दुर्घटना, जुर्म इत्यादि ! कुछ शारीरिक और मानसिक परेशानियां होती हैं ! सारे दुखों, तकलीफों, अड़चनों, परेशानियों या रुकावटों का कारण तीन स्रोत, आदि-दैविक, आदि-भौतिक और आध्यात्मिक या मानसिक हैं ! इसलिए हम प्रभू से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे दुखों, तकलीफों तथा जीवन में आने वाली अड़चनों का शमन करें ! चूँकि ये मुसीबतें तीन ओर से आती हैं, इसीलिए शांति का उच्चारण भी तीन बार किया जाता है। वैसे भी प्राचीन काल से यह मान्यता चली आ रही है कि ''त्रिवरम सत्यमं'' यानी किसी भी बात को तीन बार कहने से वह सत्य हो जाती है, इसलिए अपनी बात को बल देने  के लिए ऐसा किया जाता है !  


 
शाम गहरा गई थी ! पंडितजी को भी मंदिर का अपना कार्य पूरा करना था ! इधर घर पर मेरा इंतजार भी शुरू हो चुका था ! इसलिए उनसे आज्ञा और नई जानकारियां ले मैं भी घर की ओर रवाना हो लिया !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

15 टिप्‍पणियां:

Nitish Tiwary ने कहा…

बहुत सुंदर जानकारी।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुलदीप जी
सम्मिलित करने हेतु हार्दिक आभार 🙏

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

नितीश जी
हार्दिक आभार आपका 🙏

Sudha Devrani ने कहा…

महत्वपूर्ण जानकारी शेयर करन हेतु अत्यंत आभार ।

मन की वीणा ने कहा…

वाह! वार्तालाप के जरिए सार्थक जानकारी दी आपने सुंदर प्रेरक।

Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर जानकारी

Onkar Singh 'Vivek' ने कहा…

महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुधा जी
सदा स्वागत है आपका 🙏

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुसुम जी
अनेकानेक धन्यवाद 🙏

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ओंकार जी
हार्दिक आभार आपका 🙏

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

विवेक जी
सदा स्वागत है आपका 🙏

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत रोचक जानकारी।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी
सदा स्वागत है आपका🙏🏻

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

रोचक एंव सुंदर जानकारी। ऐसा ही वार्तालाप काफी कुछ सिखा जाता है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हार्दिक आभार आपका, विकास जी🙏🏻

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