बुधवार, 15 मई 2019

व्यथा एक सरोवर की !

वर्षों से काठ की हांडी में खिचड़ी के सपने दिखाने वालों को किनारे कर दिया गया। सबकी समझ में आ गया था कि इंसान रहेगा तभी धर्म-जाति भी रह पाएगी ! मुफ्तखोरों को भी इशारों से समझा दिया गया कि मेहनत सभी को करनी पड़ेगी, यह नहीं कि सरोवर की काया पलट हम करें और तुम बर्तन ले कर पानी भरने आ जाओ ! अब अवाम ''देखिएगा, हम करेंगें, हमें करना है'' की बजाए ''देखें, हमने कर दिया है'' कहने वाले को तरजीह देने लगी ! चौधरी भी समझ गए थे कि हवाबाजी के दिन हवा हुए ! अब कुछ ना किया तो चौधराहट तो क्या बिस्तर भी गोल करना पड़ जाएगा .......!           

#हिन्दी_ब्लागिंग   
प्रकृति की सुरम्य घाटियों में एक अति विशाल, सुंदर, क़ुदरत की नेमतों से घिरा हुआ झीलनुमा सरोवर था। दूर-दूर के लोग, पशु-पक्षी सब उस पर आश्रित थे। बिना भेद-भाव के मिल-जुल कर सब अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप उसका उपयोग किया करते थे। धीरे-धीरे उसके शुद्ध-निर्मल जल, फलदार वृक्ष, उपजाऊ जमीन, स्वच्छ पर्यावरण के कारण उसकी ख्याति इतनी फ़ैल गयी कि देश तो देश, विदेशों से भी लोगों ने आ-आ कर उसके पास डेरा जमा लिया ! अब जैसा कि होता आया है, भीड़ बढ़ने के साथ-साथ वहां कई चौधरी भी पैदा हो गए ! सरोवर उनकी पीढ़ियों को तारने का जरिया बन गया ! वे अपने मतलब के लिए लोगों को भरमा, तरह-तरह के हथकंडे अपना कर सरोवर के विभिन्न हिस्सों पर अपना बर्चस्व कायम करने की जुगत भिड़ाने लगे। कइयों ने अपनी चौधराहट कायम रखने के लिए अपने पूर्वजों की गाथाएं बयान करनी शुरू कर दीं ! कइयों ने ग्रामीणों को ही बेवकूफ बना, सरोवर के सौंदर्यीकरण के नाम पर उन्हीं के पैसे से सरोवर के चारों ओर अपना प्रशस्ति गान करते निर्माण करवा दिए ! तो कोई अति चतुर अपने को सर्वहारा का सच्चा हितैषी बता, सरोवर से ही धंधे का जुगाड़ कर, अपने परिवार का भविष्य संवारने लगा। कुछ ने आस-पास के जीवन देने वाले, वातावरण को स्वच्छ रखने वाले, बरसात का पानी संजोने वाले पेड़-पौधों को काट अपने विशाल महलों का निर्माण कर डाला। वहां एक डाली तक नहीं छोड़ी ! तो किसी ने नहा-धो कर वहीं पूजा-अर्चना की व्यवस्था करने की गोटी चल दी। पर सरोवर की ओर ध्यान देने, उसके रखरखाव, उसकी सुरक्षा की किसी को कोई परवाह नहीं थी ! परिणामस्वरूप अवाम के जीवन का सहारा, जीव-जंतुओं का पालनहार वह सरोवर सिमटता गया, पर्यावरण दूषित होता गया ! कभी गर्मी की भरी दोपहरी में भी शीतल छाया देने वाले वृक्षों के कट जाने से सरोवर की गहराई पर भी बुरा असर पड़ने लगा ! जल कम और दूषित हो गया ! पशु-पक्षी दूर चले गए ! जमीन ऊसर होने लगी ¡ लोगों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को  पूरा करने में भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ने लगा ! पर स्वार्थी चौधरीगण इसकी ओर ध्यान देने, इसकी बेहतरी के लिए कुछ करने की बजाय एक-दूसरे पर आरोप, नीचा दिखाने में ही जुटे रहे ! उन्हें इतना भी इल्म नहीं रहा कि इस सरोवर के ना रहने पर वे भी मिटटी में मिल जाएंगे ! 

इधर अवाम किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी खड़ी यह सारा तमाशा देखती तो थी, उसे कुछ-कुछ एहसास भी हो रहा था कि उसे धीरे-धीरे उसी के सरोवर से दूर कर दिया गया है पर वह बहकावों से, परंपराओं से, जाति से, धर्म से इतर अपनी भलाई का रास्ता अभी भी नहीं खोज पा रही थी ! यदि कुछ लोग सरोवर की दुर्दशा की गुहार ले कर किसी के पास चले भी जाते तो उनकी बात अनसुनी कर उन्हें यह समझाया जाता कि हम तो तुम्हारे साथ हैं, सदा तुम्हारा भला चाहते हैं ! पर तुम्हारी इस हालत का जिम्मेदार फलाना चौधरी है ! वही यहां का पानी निकाल अपने घर ले जाता है ! कोई कहता देखो वह अपनी गंदगी यहीं धो कर इसके पानी को दूषित कर रहा है ! कोई कहता कि फलाने ने वर्षों से इस पर कब्जा कर तुम्हारी यह हालत बनाई है ! कोई किसी के कर्मकांड को जल दूषित होने का कारण बता देता ! सरोवर को बचाने की जगह सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने, उस पर दोषारोपण कर खुद को पाक-साफ़ बताने में जुटे हुए थे ! दुर्भावना, पूर्वाग्रहों, कुंठाओं, विद्वेष ने हालात इतने जहरीले बना दिए थे कि यदि कोई सरोवर की ढलती कगार को बचाने के लिए घाट बनाने की कोशिश करता भी तो उसके विरुद्ध मिटटी चोरी का इल्जाम लगाते हुए सारे चौधरी अपने मतभेद भुला, अपने स्वार्थ किनारे कर एकजुट हो जाते, उसे बदनाम करने में !

पर यह सब कितने दिन चलता ! कितने दिन जनता अपने भाग्य के सहारे बैठी रहती ! कब तक सामने वालों की नौटंकी देखती रहती ! समय बदला ! नई पीढ़ी साक्षर हुई ! लोगों में, समाज में जागरूकता आई ! वर्षों से काठ की हांडी में खिचड़ी के सपने दिखाने वालों को किनारे कर दिया गया। सबकी समझ में आ गया था कि इंसान रहेगा तभी धर्म-जाति भी रह पाएगी ! मुफ्तखोरों को भी इशारों से समझा दिया गया कि मेहनत सभी को करनी पड़ेगी, यह नहीं कि सरोवर की काया पलट हम करें और तुम बर्तन ले कर पानी भरने आ जाओ ! अब अवाम ''देखिएगा, हम करेंगें, हमें करना है'' की बजाए ''देखें, हमने कर दिया है'' कहने वाले को तरजीह देने लगी ! सरोवर को हरा-भरा बनाने में एकजुट हुए लोगों का साथ, जाति, धर्म, भाषा को पैमाना बनाए बिना दिया जाने लगा। वृक्ष लगाए जाने लगे, लोगों को काम मिला, रोजगार बढ़ा। जेब में पैसा आया तो खुशहाली बढ़नी ही थी ! चौधरी भी समझ गए थे कि हवाबाजी के दिन हवा हुए ! अब कुछ ना किया तो चौधराहट तो क्या बिस्तर भी गोल करना पड़ जाएगा !             

12 टिप्‍पणियां:

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरूवार 16 मई 2019 को साझा की गई है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 112वीं जयंती - सुखदेव जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

roopchandrashastri ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (16-05-2019) को "डूब रही है नाव" (चर्चा अंक- 3337) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

रविंद्र जी, अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी आप का और ब्लॉग बुलेटिन का हार्दिक आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, हार्दिक धन्यवाद

Anita saini ने कहा…

नी:शब्द
सादर

Meena Bhardwaj ने कहा…

कथा के माध्यम से चेतना का संदेश । अत्यन्त सुन्दर ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनिता जी, ''कुछ अलग सा'' पर सदा स्वागत है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी, हार्दिक आभार, ब्लॉग पर सदा स्वागत है

Kamini Sinha ने कहा…

अब अवाम ''देखिएगा, हम करेंगें, हमें करना है'' की बजाए ''देखें, हमने कर दिया है'' कहने वाले को तरजीह देने लगी ! बहुत खूब ,बिलकुल सटीक ,अब बदलाव जरूर आयेगा ,हर अति का अंत होता हैं और अब सब अति हो चूका हैं ,सादर

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी, आशा तो है सुधार होना भी जरूरी है

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