शनिवार, 2 जनवरी 2010

इनाम और सम्मान बिना मांगे मिले तभी उनकी अहमियत होती है.

इनाम और सम्मान बिना मांगे मिलें तभी उनकी अहमियत होती है। पर कुछ लोग इन्हें किसी भी तरह पाने के लिये कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। चाहे उनकी ऐसी हरकतों से वे उपहास का पात्र ही क्यों ना बन जायें। ऐसी ही घटना कुछ दिनों पहले घटी।

मेरे एक मित्र एक यात्रा से एक अनूठी जानकारी ले लौटे, जिसे उन्होंने एक पत्रिका में भेजने के लिये उसके ब्यौरे का प्रिंट आउट निकाल कर अपनी मेज पर रखा हुआ था। तभी उनके एक सहयोगी उस कमरे में आये, उस समय वहां कोई नहीं था, उन्होंने उस कागज को पढा और चुपचाप उसकी फोटोकापी कर अपने कक्ष में चले गये। पर उनकी बदकिस्मती से उनको ऐसा करते एक चपरासी ने देख लिया था पर उस समय वह कुछ समझ नहीं पाया था। लंच के समय जब सब इकट्ठा हुए तो उस यात्रा की बात चली, उसके अनूठेपन के कारण सभी को ज्यादा जानने की उत्सुकता थी। अभी मेरे मित्र ने विस्तार से अपनी बात कहनी शुरु की ही थी कि वही सज्जन वहां आ पहुंचे और बीच बीच में ऐसे बोलने लगे जैसे उन्हें उस जगह की सारी जानकारी हो। पर जब किसी ने पलट कर उस बारे में और कोई सवाल पूछ लिया तो उनकी नीम हकीमी काम ना आयी और वह फिर अपने कमरे की ओर लौट गये पर जल्दि ही अपना पेपर वर्क पूरा कर फिर वापस आ गये और फिर अपना ज्ञान बघारने लगे। पर अब तक उस चपरासी ने सब देख सुन समझ उनकी फोटो कापी की बात सब को बता दी थी। वैसे भी उनकी DEPTH भी सभी को पता थी तो सब मन ही मन मुस्कुराते हुए उन्हें तरह-तरह से कुरेदते रहे जिस पर उनकी नीम हकीमी भी उन्हें धोखा दे उपहास का पात्र बनाती रही।

लोग ऐसा क्यों करते हैं? शायद मन ही मन ऐसे लोग हीन ग्रंथियों से पीड़ित होते हैं और उन्हें लगता रहता है कि लोग उन्हें तरजीह नहीं देते। फिर यदि ये ऊपर वाले की मेहरबानी से किसी ठीक-ठाक सी कुर्सी को हथियाने में कामयाब हो जाते हैं तो रोज अपने लिये ही मुश्किलें पैदा करते रहते हैं। कभी कोई इन्हें देखे बगैर निकल जाये तो इनका मुंह फूल जाता है, कभी कोई इन्हें "विश" ना करे तो इनका रक्त चाप बढ जाता है। पर ऐसे लोग कभी आगे बढ कर दूसरों की इज्जत करने में अपनी हेठी समझते हैं भले ही मालिक इनकी रोज सब के सामने ऐसी की तैसी करते रहें। इनको शायद पता ही नहीं होता कि इज्जत-मान बाजार से खरीदने की वस्तुएं नहीं हैं, उन्हें अपने व्यवहार, अपने कर्म और अपनी लियाकत से अर्जित किया जाता है।

आपके आस-पास भी तो ऐसे लोग होंगे ही?

भगवान ऐसे लोगों को सदबुद्धि दे या अन्य लोगों को इनसे बचाये।

10 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

Apke vicharo se shamat hun .

नेहा पाठक ने कहा…

mujhe pehle apni mummy ke saamne(sirf) apni tareef karni ki aadat thi, jisase vo jhalla jaati thi. Dheere dheere apni is aadat ki kharaabi tab pata chali jab apne hi jaise kuchh aur logo ne mera sir chaata

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप की बात से सहमत हुं , ऎसे लोग हमारे आस पास बहुत होते है, लेकिन जब इन का पता लग जाये तो इन्हे नजर आंदाज करना ही बेहतर है, लेकिन इन की हरकतो से हमे सवक भी लेना चाहिये कि ऎसे लोगो के बारे लोग कैसा सोचते है अगर हम मै भी ऎसे कीटाणू हो तो जल्द ही इस का उपचार करना चाहिये, ताकि हम भी जग हंसाई से बचे रहे, बहुत सुंदर लगा आप का यह लेख

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सत्य-वचन महाराज!

गिरिजेश राव ने कहा…

सहमत महराज आप से भी और राज भाटिया जी से भी।

वैसे इज्जत और सम्मान एक ही हैं। किसी एक को ही रखिए न !

AlbelaKhatri.com ने कहा…

sahi kahi

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने.

रामराम.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

:)

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

गिरिजेश जी,
सम्मान के और भी तो अर्थ हैं।

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

ओढ़ा हुआ रूप कब तक काम आयेगा ! जो प्रदत्त उसी का स्वागत करें, उसे ही निखारें - दिखाने का कैसा लोभ !
प्रविष्टि सुन्दर है ।