गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

मणिकर्ण, शिव-रात्री पर विशेष

अपने विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा माता पार्वती  घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे।   उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी  कि  वे यहां  ग्यारह हजार वर्ष  तक निवास करते रहे। 

मणिकर्ण का विहंगम दृश्य 
मणिकर्ण, हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र तीर्थ-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ, जो कुल्लू से 35 कीमी  दूर समुंद्र तट से 1650 मीटर  की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है। पौराणिक कथा है कि अपने विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा माता पार्वती  घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे।  उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी  कि  वे यहां  ग्यारह हजार वर्ष  तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही जब शिवजी ने काशी नगरी  की स्थापना की, तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट ही  रक्खा। 
खौलते पानी का कुंड 

इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं  यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है, ऐसी मान्यता है यहां के लोगों मे। कहते हैं कि यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव् धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। उसके मणि ना लौटाने के दुस्साहस से शिवजी क्रोधित हो गये. तब उनके क्रोध से भयभीत हो शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग-अलग  तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।  


 यहाँ एक प्राचीन भव्य राम मंदिर भी है. जहां यात्रीयों और भक्तों के लिए नि:शुल्क रहने और खाने की समुचित व्यवस्था उपलब्ध है।   

   


सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

अजीबोगरीब स्थिति

करीब दो महीने के बाद मुझे एक ई-मेल मिला जिसमे एक भले आदमी ने उसी धर्मशाला से अपने चोरी हुए सामान के लिए धर्मशाला के प्रबंधकों के साथ मुझे भी पत्र भेज मारा। मैं असमंजस में पड गया कि अगला चाहता क्या है?    

कई बार ऎसी बातें या घटनाएं घट जाती हैं जो विचार करने पर बड़ी अजीब सी लगती हैं। ऐसा ही पिछले दिनों कुछ हुआ.  इस बार शरद पूर्णिमा के अवसर पर  राजस्थान के चूरू जिले के एक कस्बे सुजानगढ़ में स्थित हनुमान जी के सुप्रसिद्ध बालाजी मंदिर दर्शन करने फिर सुयोग मिला। वैसे तो यहाँ साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है. पर चैत्र और आश्विन पूर्णिमा के समय यहाँ मेला भरता है जब लाखों लोग अपनी आस्था और भक्ति के साथ यहाँ आकर हनुमान जी के दर्शन का पुण्य लाभ उठाते हैं. 

पहले भी दो बार सालासर जाना हुआ था, पर इस देव-स्थान का कुछ ऐसा आकर्षण है कि मन नहीं भरता और बार-बार जाने की इच्छा होती है। इस बार भी मौका मिलते ही आठ-नौ जनों का समूह 17. 10. 13 को हनुमान जी के दर्शन के लिए सालासर रवाना हो गया। यह याद नहीं रहा कि यह अवसर शरद पूर्णिमा का है, नहीं तो ठहरने की व्य्वस्था पहले करवा लेते। रास्ते में इसकी जानकारी मिली पर फिर सब प्रभू पर छोड़ आगे बढ़ाते रहे. करीब साढ़े दस बजे हम सालासर धाम पहुंचे। पर वहाँ तो जैसे लोगों का सैलाब उमड़ा पड़ा था। पैदल चलने तक की जगह नहीं थी।  दिन रात का जैसे कोइ फर्क ही नहीं था.  लोग खुले मे, तंबुओं में, शामियाने में, जहां जगह मिली पड़े थे. उस समय भी कोई नहा रहा था, कोई मस्ती में नाच-गा रहा था तो कोइ भूख मिटाने की फिराक में भोजन का प्रबंध करने में जुटा था. गाड़ी बेहद धीरे-धीरे रेंग रही थी. हमें तो सोच कर ही सिहरन हो रही थी की यदि जगह न मिली तो कैसे क्या होगा ? जगह की सचमुच किल्लत लग रही थी. पर कहते हैं ना की प्रभू कभी अपने बच्चों को मायूस नहीं करता. सो उसी दैवयोग से हमारी रेंगती और कोई आश्रय ढूँढ़ती गाड़ी एक जगमगाती सुन्दर सी इमारत के सामने जा रुकी.  नज़र उठा के देखा तो ऊपर नाम लिखा हुआ था "चमेली देवी अग्रवाल सेवा सदन". भीड़ वहाँ भी थी फिर भी अन्दर जा पता करने की सोची। स्वागत कक्ष में बैठे सज्जन ने पहले तो साफ मना ही कर दिया पर फिर पता नहीं बच्चों या हमारे हताश चेहरों को देख तीसरे तल्ले पर स्थित एक "वी आई पी सूइट" जिसमें दो आपस में जुड़े हुए कमरे अपने-अपने प्रसाधन कक्ष के साथ थे, का आवंटन दूसरे दिन ग्यारह बजे तक के लिए कर दिया. हमें तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गयी हो. वहीं खाने की भी व्यवस्था थी, खाना सचमुच स्वादिष्ट था सो निश्चिंत और शांत मन से उदर पूर्ती की गयी.  दूसरे दिन दर्शन लाभ कर वापस हो लिए।  

वहाँ से लौटने के बाद मैंने धर्मशाला के प्रबंधकों को एक आभार जताते हुए पत्र लिखा था जिसमे उस रात कठिन समय में हमारी सहायता की गयी थी। अब होती है शुरू असली बात, जिसके लिए इतनी भूमिका बांधी। करीब दो महीने के बाद मुझे एक ई-मेल मिला जिसमे एक भले आदमी ने उसी धर्मशाला से अपने चोरी हुए सामान के लिए धर्मशाला के प्रबंधकों के साथ मुझे भी पत्र भेज मारा। मैं असमंजस में पड गया कि अगला चाहता क्या है? क्या मेरे पत्र में धर्मशाला की प्रशंसा अगले को रास नहीं आई? या आगे कभी वहाँ न ठहरूँ  या कोई और बात है? खैर मैंने उसे एक पत्र द्वारा अपनी उस यात्रा की असलियत तो बता दी थी. 
नुक्सान किसी का भी हो दुःख तो होता ही है वह भी ऐसी जगह जहां आदमी आस्था ले कर जाता है पर उसके लिए सभी को  वहाँ से शिकायत हो ऐसा तो संभव नहीं हो सकता न। उनका नुक्सान हुआ तो वहीं उसका निराकरण कर लेना चाहिए था बनिस्पत घर लौट कर अपना गुस्सा जग-जाहिर करने के।                      

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है पर..........

प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है।

संत वेलेंटाइन

फिर एक बार संत वेलेंटाइन का संदेश ले फरवरी का माह आ खड़ा हुआ। बाजारों में, अखबारों में युवाओं में काफी उत्साह उछाल मार रहा है। जो उत्सव कुछ समय पहले एक दिन का होता था उसे बाजार ने अपनी सहूलियत को मद्दे-नजर रख हफ्ते भर का कर दिया। देखा जाए तो हमारे सदियों से चले आ रहे पर्व "वसंतोत्सव" का भी तो यही संदेश है। हमारी तो प्रथा रही है प्रेम बरसाने की। इंसान की तो छोड़ें हमारे यहाँ तो पशु-पक्षियों से भी नाता जोड़ लिया जाता है। उन्हें भी परिवार का सदस्य मान अपना स्नेह उड़ेल दिया जाता है। जीवंत की बात तो क्या यहां तो पत्थरों और पेड़ों में भी प्राण होना मान उनकी पूजा होती रही है। सारे संसार को प्रेम का संदेश देने वाले को आज प्रेम सीखना पड़ रहा है पश्चिम से। सनातन काल से हमारे देश में रिवाज रहा है, प्रेम का, भाईचारे का, सौहार्द का। पर इसे कभी भुनाया नहीं गया। पर  जब आर्थिक उदारीकरण के  "बाजार" ने इसे वेलेंटाइन के नाम से जोड़ 'वाया' पश्चिम से प्रेम दिवस के रूप में प्रचारित कर आयात किया तो हमारी आंखें चौंधिया गयीं हमें चारों ओर प्यार ही प्यार नज़र आने लगा। गोया कि  "कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, आज वे हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।"

वसंतोत्सव 
इस उत्सव ने भारतीय युवाओं को खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने-अपने तरीके से मनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस संवेदनहीन और भावनाहीनता के समय में  कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है? सच तो यह है कि अधिकाँश इसे सिर्फ मौज-मस्ती का जरिया मान आनंद पाने की दौड़ में शामिल होते हैं उन्हें सामाजिक या अपने दायित्व का कोई एहसास नहीं होता।  प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है। जिस तरह के हालात हैं, मानसिक विकृतियां हैं, दिमागी फितूर है उसके चलते युवाओं को काफी सोच समझ कर अपने कदम उठाने चाहिए। खास कर युवतियों को। 

प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है। पर ये जो व्यवसायिकता है। अंधी दौड़ है या इसी बहाने शक्ति प्रदर्शन है उसे किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता।

किसी की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

सोलह श्रृंगार

 इसी कारण नारी और पुरुष दोनों में अपने को ज्यादा आकर्षक दिखाने या लगने की होड़ शुरू हो गयी होगी और इस तरह ईजाद हुई होगी तरह-तरह की श्रृंगारिक विधियों की जिसमें अंतत: बाजी मारी होगी नारी ने सोलह श्रृंगार कर के जिनका  उल्लेख शास्त्रों में उपलब्ध है। शायद ही किसी और देश में नारी के श्रृंगार का इतना वृहद विवरण और कला का विवरण मिलता हो। 

श्रृंगारिक ऋतु  ने दस्तक दे दी है।  हालांकि देश के उपरी भागों में अभी भी शीत पालथी जमाए बैठा है पर वह भी जानता है कि चला-चली की बेला आ गयी है। क्योंकि वासंती बयार ने धीरे-धीरे बहना शुरू कर दिया है।  साल का यह समय सबसे सुहाना होता है जब शीत की सुषुप्तावस्था से प्रकृति अंगड़ाई ले आलस्य त्याग अपना मोहक रूप धारण करने लगती है।  यही वह समय है जब  शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट के बीच आगमन होता है बसंत का। इसे ऋतुओं का राजा माना गया है अर्थात ऋतुराज। आदिकाल से कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब कर अपनी रचनाओं में इसका वर्णन करते आए हैं। क्योंकि  इस ऋतु में वह सब कुछ है जिसकी चाहत इंसान को रहती है। इसमें फूल सिर्फ खिलते हैं, झडते नहीं। बयार बासंती हो जाती है। धरा धानी चुनरी ओढ़ अपने सर्वोत्तम निखार से जीवन का बोध कराती है। जीव-जगत  में उल्लास छा जाता है। जिंदगी से मोह उत्पन्न होने लगता है, जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। इसीलिए इस समय को मधुमास का नाम दिया गया है। जब सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। "हल्की सी शोखी, हल्का सा नशा है, मिल गयी हो भंग जैसे पूरी बयार में" बसंत के आते ही टहनियों में कोंपलें फूटने लगती हैं। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। वायु के नर्म-नर्म झोंकों से फल-फूल, लताएं-गुल्म, पेड-पौधे सभी जैसे मस्ती में झूमने लगते हैं। इसी समय आम की मंजरियों में भी बौर आने लगते हैं जैसे ऋतुओं के राजा ने फलों के राजा को दावत दी हो। लगता है जैसे सारी प्रकृति अपने श्रृंगार पर उतारू हो गयी हो।

पूरी कायनात को सजा-धजा देख कर ही शायद मनुष्य को भी अपने श्रृंगार की सुध आई होगी। क्योंकि आकर्षक जीवन ही सार्थक है और आकर्षण सौंदर्य में है और सौंदर्य को बढ़ाने में श्रृंगार की महती भूमिका होती है। इसी कारण नारी और पुरुष दोनों में अपने को ज्यादा आकर्षक दिखाने या लगने की होड़ शुरू हो गयी होगी और इस तरह ईजाद हुई होगी तरह-तरह की श्रृंगारिक विधियों की जिसमें अंतत: बाजी मारी होगी नारी ने सोलह श्रृंगार कर के जिनका  उल्लेख शास्त्रों में उपलब्ध है। शायद ही किसी और देश में नारी के श्रृंगार की कला का इतना वृहद विवरण मिलता हो। इन सोलह विधियों की कई सूचियां हैं पर सबसे लोकप्रिय बल्लभ देव की सुभाषितवली मानी जाती है। जिसके अनुसार सोलह श्रृंगार इस प्रकार हैं :-

1 :- स्नान।   2 :- वस्त्र।    3 :-  हार।    4 :- तिलक।    5 :-  काजल।    6 :-  कुंडल.    7 :-  नाक का लौंग.
8 :- केश सज्जा।   9 :-  कंचुक।   10 :-  नुपुर।   11 :-  सुगंध।   12 :-  कंकण।   13 :-  महावर।   14 :- मेखला। 15 :-  पान   और  16 :-  कर दर्पण।

मूलत:  यही सोलह श्रृंगार हैं पर कहीं-कहीं इनमे थोडा सा फेर बदल मिल जाता है।  जैसे स्नान के पूर्व उबटन या केश सज्जा में फूल इत्यादि का उपयोग आदि।

यह ध्रुव सत्य है कि आयु के साथ-साथ शरीर और सौंदर्य का क्षरण होता है पर मानव की प्रवृति है युवावस्था को बांध कर रखने की. जिसमे वह पूरी तरह से तो नहीं पर आंशिक रूप से इन विधियों को अपना कुछ सफलता तो पा ही लेता है। हालांकि सौंदर्य वह नहीं है जो बाहर से थोपा जाए. असली सौंदर्य तो मानव के भीतर ही रह कर अपना आभास देता रहता है।                 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

माँ के लिए उसने अमरत्व ठुकराया

प्राणी के जन्म लेते ही उसकी मृत्यु भी निश्चित हो जाती है पर उसके साथ ही उसके मन में अमर होने की कामना भी जन्म ले लेती है। पर इस असार संसार में ऐसा कोई नहीं हुआ जिसका अंत न हुआ हो। हमारे वेद-पुराणों के किस्से-कहानियों में जरूर ऐसे चरित्रों का उल्लेख मिल जाता है जिन्होंने अपने कर्मों से अमरत्व हासिल कर लिया हो। कोई बिरला ही होगा जो इस सुयोग से अपने को वंछित करना चाहता हो।  पर महाभारत में एक प्रसंग है जहां अपनी माँ की खातिर एक बेटे ने अमृत को भी ठुकरा दिया। 

कथानुसार कश्यप ऋषि की दो पत्नियों कद्रू जिनके हजार नाग पुत्र थे तथा विनता जिनका अति तेजस्वी पुत्र गरुड़ था। हालांकि कद्रू और विनता दोनों बहनें थीं पर उनकी आपस में बनती नहीं थी। कद्रू सदा विनता को नीचा दिखाने की ताक में रहती थी। ऐसे ही एक दिन दोनों में बहस हो गयी कि समुद्र मंथन से निकले घोड़े का रंग क्या है ?  विनता का कहना था कि वह पूर्ण रूप से शुभ्र है पर कद्रू उसे जान बूझ कर आंशिक रूप से काला बता रही थी. शर्त बद गयी और कद्रू के पुत्रों ने उस पूर्णरूपेण सफेद घोड़े उच्चैश्रवा की पूंछ पर लिपट उसे आंशिक काला बना दिया। शर्त के अनुसार विनता को कद्रू की दासी बना देख गरूड़ को अत्यंत कष्ट होता था। उन्होंने अपनी माँ की दासता से छुटकारे का हल अपने सौतेले भाईयों से पूछा तो उन्होंने कहा कि हमें स्वर्ग से अमृत ला दो तो तुम्हारी माँ को छुटकारा मिल जाएगा। अमृत कलश कड़ी सुरक्षा के बीच देव राज इंद्र के कब्जे में था। पर अपनी जान की चिंता किए बगैर गरुड़ ने भीषण युद्ध कर उसे प्राप्त किया और तीव्र गति से स्वर्ग से निकल आए। विष्णू जी ने जब देखा कि महापराक्रमी गरुड़ ने अमृत पाने के बाद भी उसे खुद पान नहीं किया तो उन्होंने गरुड़ को दर्शन दे इसका कारण जानना चाहा तो गरुड़ ने सारी बात बताई और यह भी कहा कि शर्त के अनुसार उन्हें इसे ले जाकर नागों को देना है पर वे इसे किसी को पीने नहीं देंगे। माँ के दासता मुक्त होते ही इसे वहाँ से इंद्र तुरंत वापस ला सकते हैं। 
विष्णू जी गरुड़ के पराक्रम, चातुर्य, निश्छलता, मातृ-प्रेम तथा न्याय शीलता से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अमरत्व का वर दे अपने वाहन का भार भी सौंप दिया। 

आज किसी से पूछा जाए कि किन-किन देवताओं ने अमृत पान किया तो शायद ही कोई उन सारों के नाम बता पाए पर जिसने अमृत उपलब्ध होने पर भी अपने आप को अमर होने के लोभ से परे रखा, आज उसे सारा संसार जानता है।   

बुधवार, 29 जनवरी 2014

क्या ऐसी ही होगी हमारी शिक्षित भावी पीढ़ी !!

देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। आज छात्रों को College और Collage या Principal और Principle में फर्क नहीं पता। अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में B. Ed. करने वाले भावी शिक्षक ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते।  

शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमारी सरकार काफी अव्यवस्थित रहती है।  सरकारी कारिंदे सर से एड़ी का जोर लगा देते हैं कागजों में आंकड़ों को सुधारने में। पर यदि इसकी आधी ताकत भी सही ढंग से शिक्षा पद्यति को सुधारने में लगा दी जाए तो देश कागजों में नहीं, सही में साक्षर होना शुरू हो जाए। अभी तो अनपढ़ लोगों को सिर्फ अपना नाम लिखना सिखा उन्हें साक्षर घोषित कर दिया जाता है. देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। पर इससे सरकारी व्यवस्था को  किसी से लेना-देना नहीं है वहाँ तो सिर्फ आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर अपनी पीठ थपथपाने का खेल होता है। बड़े शहरों और कुछ राज्यों को छोड़ दें तो बाक़ी जगह की एक भयानक तस्वीर सामने आती है। साक्षरता के आंकड़ों को बढ़ाने के लिए स्कूलों में आठवीं तक की पढ़ाई में से परीक्षा का प्रावधान ही नही होने से स्कूल-कालेजों में पढ़ाई का स्तर इतना गिर गया है कि स्नातक की पढ़ाई करने वाले छात्रों को College और Collage या Principal और Principle तक का फर्क नहीं पता।   अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में B. Ed.
क्या होगा ऐसी पढ़ाई का 
करने वाले भावी शिक्षक ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। यही लोग जब येन-केन-प्रकारेण स्कूलों-कालेजों में नौकरी जुगाड़ कर पैसे की खातिर पढ़ाना शुरू करेंगे तो अंदाजा लग सकता है कि स्तर कहाँ पहुंचेगा।
संलग्न फ़ोटो में एक B. Com के छात्र का प्रार्थना पत्र देख आश्चर्य होना स्वाभाविक है. यह तो एक बानगी है। सोचने की तथा मंथन की बात यह है कि दोष किसका है , छात्र का, अध्यापक का या शिक्षा-प्रणाली का ?
अभी  कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर छपी थी कि पांचवीं के छात्र दूसरी कक्षा की पुस्तक नहीं पढ़ पाते। तो स्कूलों में कैसी पढ़ाई होती है? क्या पढ़ाया जाता है ? कैसे पढ़ाया जाता है?  इस पर कभी नियम-कानून बनाने वाले क्या ध्यान नहीं देते?
कहावत है कि नींव मजबूत होने पर ही इमारत बुलंद हो सकती है. पर जहां नींव ही हवा में हो वहाँ क्या आशा की जा सकती है।  यही कारण है कि तरह-तरह के प्रलोभन दे बच्चों को हांक कर स्कूल तो ले आया जाता है पर जैसे-जैसे ऊंची कक्षाएं सामने आती हैं बच्चों की संख्या नीची होती जाती है। ऐसे में जरूरत है लोगों को जागरूक करने की. राजनीति से ऊपर उठ देश समाज की भलाई को प्राथमिकता देने की।  अपनी कुर्सी को बचाने के लिए ऊल-जलूल नीतियों को लागू करने की बजाए लायक बच्चों को "कुर्सी" दिलवाने में मदद करने वाली शिक्षा-प्रणाली को लागू करने की। इसमें बुद्धिजीवियो और शिक्षाविदों की सलाह ली जाए और उसको अमल में लाया जाए ना कि ऐसे लोगो को इसकी बागडोर सौंपी जाए जिनका इस विधा से कोई नाता ही न हो।                   

ऐसा नहीं है कि इन परिस्थितियों से लोग अनजान हैं, कोशिशें हो रही हैं उनका सकारात्मक परिणाम भी नजर आता है. पर वे बहुत धीमी और नगण्य हैं, उन पर भी सियासत की काली छाया पड़ती रहती है। इसलिए जो समितियां गठित की जाएं उनमें ऐसे शिक्षाविदों को रखा जाए जिन पर राजनीति का कोई दवाब न हो नाहीं सियासत से कोई लेना-देना। विद्या सर्वांगीण विकास में सहायक हो ना कि लकीर की फकीर। शिक्षा ग्रहण करने वाले में कहीं भी कैसी भी परीक्षा में उभर आने का माद्दा हो, उसे किसी भी संस्थान में ससम्मान दाखिला मिल सके इतनी क्षमता हो। जिससे नामी शिक्षा संस्थानों को अपने द्वार पर यह लिख कर लगाने कि जरूरत न हो कि फलांने राज्य या संस्थान वाले यहाँ अपना प्रार्थना पत्र न भेजें।          

बुधवार, 22 जनवरी 2014

ना वैसे सिंहासन रहे ना ही वैसे आरूढ़ होने वाले

पहले राजा-महाराजा, पंचपरमेश्वर या धर्माधिकारी इन गरिमामयी आसनों को अपनी लियाकत से हासिल कर उस पर बैठ अपने पराये को भूल न्याय करते थे। पर अब इन आसनों को अपनी योग्यता या काबिलियत से हासिल नहीं किया जाता। उसे पाने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद  हर तरह की नीति अपनाई जाती है। शायद इसी लिए उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है, जिससे आसनारूढ को सब अपना ही अपना दिखने लगता है।

किसी समय राजाओं के सिंहासन, न्यायाधीश की कुर्सी या पंचायतों के आसन की बहुत गरिमा होती थी। उस पर बैठने वाले का व्यवहार पानी में तेल की बूंद के समान रहा करता था। उसके लिए न्याय सर्वोपरी होता था। उस स्थान को पाने के लिए उसके योग्य बनना पड़ता था। समय बदला, उसके साथ ही हर चीज में बदलाव आया। पुराने किस्से-कहानियों में वर्णित घटनाएं कपोलकल्पित सी लगने लगीं। प्राचीन ग्रंथों को छोड़ दें तो 60-70 साल पहले की कथाओं को भी पढने से लोग आश्चर्यचकित होते हैं कि कहीं ऐसा भी हो सकता था।

राजा विक्रमादित्य का जितना बखान उनकी वीरता, न्याय प्रियता, उनके ज्ञान, चारित्रिक विशेषता, गुण ग्राहकता के लिए हुआ है वह शायद ही किसी सम्राट के लिए हुआ हो। कहते हैं उनके इन्हीं गुणों से प्रसन्न हो राजा इंद्र ने उनको एक विराट सिंहासन भेंट स्वरूप दिया था, जिस पर बैठ कर वे न्याय किया करते थे। उस आसन के उपर तक पहुंचने के लिए बत्तीस सीढियां चढनी पड़ती थीं। हर सीढी की रखवाली एक-एक पुतली करती थी जिससे कोई अयोग्य आसनारूढ ना हो जाए।
विक्रम ने राज-पाट छोड़ते वक्त उस सिंहासन को भूमि में गड़वा दिया था। कालांतर में जब राजा भोज ने शासन संभाला और उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे जमीन से निकलवा, उस पर बैठ कर राज करने का निश्चय किया। शुभ मुहुर्त में जब उन्होंने उस पर पहला कदम रखा तब उस पायदान की रक्षक पुतली ने उन्हें राजा विक्रम से जुड़ी एक कथा सुनाई और पूछा कि राजन क्या आप अपने को इस सिंहासन के योग्य पाते हैं? राजा भोज ने विचार कर कहा, नहीं। फिर उन्होंने उस लायक बनने के लिए साधना की, अपने को उस योग्य बनाया। इस तरह उन्होंने बत्तीस पुतलियों को संतुष्ट कर अपने आप को उस सिंहासन के लायक बना उस को ग्रहण किया।

यह तो पुरानी बात हो गयी। अभी भी प्रेमचंदजी की कहानियों के पंचपरमेश्वर या और भी धर्माधिकारियों के किस्से मशहूर हैं, जो इन गरिमामयी आसनों पर बैठ अपने पराये को भूल सिर्फ न्याय करते थे। पर अब इन आसनों को अपनी योग्यता या काबिलियत से हासिल नहीं किया जाता। उसे पाने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद  हर तरह की नीति अपनाई जाती है। शायद इसी लिए उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है, जिससे आसनारूढ को सब अपना ही अपना दिखने लगता है। वह अच्छे को छोड़ सिर्फ बुरा ही बुरा करने पर उतारू हो जाता है। अपनी गलत बातों का विरोध करने वाला उसे अपना कट्टर दुश्मन लगने लगता है। उस आसन पर बैठ सत्ता हासिल होते ही वह अपने आप को खुदा समझने लगता है।

हो सकता है कि तब गलत इंसान के गलत तरीके से सत्ता हथिया कर किए जाने वाले गलत कार्यों को उस आसन का श्राप मिलता हो कि जा निकट भविष्य में तेरा नाश अवश्यंभावी है? क्योंकि ऐसे अनगिनत उदाहरण इतिहास में मौजूद हैं।

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यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...