मंगलवार, 31 अगस्त 2010

"पीपली को लाइव" कर अनुष्का ने नाम और दाम दोनों का जुगाड़ बैठा लिया

पीपली लाइव देख ड़ाली। ना ही देखी जाती तो ठीक था। पर गल्तियां तो सभी से होती हैं। हो गयी हमसे भी। पर दाद देनी पड़ेगी अनुष्का की हिम्मत की । पहले तो आमिर को वश में किया फिर जैसे-तैसे जुगाड़ लगा बहुत सारे मंत्रियों व संत्रियों को भी फिल्म का डोज पिलवा कर नाम और दाम दोनों पा लिए। इसे कहते हैं "मार्केटिंग"।
आगे चलने से पहले दो बातें।

वर्षों पहले श्री सत्यजीत रे ने एक फिल्म बनाई थी "गुपी गाईन बाघा बाईन"। जब पिक्चर रिलीज हुई तो उसके बारे में बड़े-बड़े दिग्गज समिक्षकों ने एक से बढ कर एक समीक्षा लिख मारी। सत्यजीत साहब की फिल्म एवंई तो हो नहीं सकती इसीलिए किसी को उसमें गहरी राजनीति नजर आई तो किसी को भ्रष्ट नेतागिरी किसी ने उसमें दार्शनिकता खोज डाली तो किसी ने अपने देश की उसमे दिखाए राज्य से तुलना कर डाली। हफ्ते भर बाद जब सत्यजीतजी से फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि "मैंने कोई गूढ बात इस फिल्म द्वारा नहीं कही है। यह विशुद्ध बच्चों की फिल्म है जिसकी कहानी वर्षों पहले मेरे नानाजी ने लिखी थी।"

एक थे ख्वाजा अहमद अब्बास। धुरंधर कहानीकार। उनकी कहानियों पर जब-जब राजकपूर ने फिल्में बनाईं वे सुपर हिट हुईं। पर जब-जब अब्बास साहब ने खुद अपने हाथ आजमाए तब-तब फिल्म कब आई कब उतरी किसी को पता भी नहीं चला।

आमिर का लगता है कि महिला पत्रकारों के लिए उनके दिल में कोई कोना सदा सुरक्षित रहता है। जहां जा कभी बरखा अपना हित साध लेती है तो कभी अनुष्का।
आमिर का नाम अपनी फिल्म से जोड़ कर इस चतुर महिला ने अपनी पहचान बनवा ली। पर देखा जाए तो एक अच्छे भले विषय की ऐसी की तैसी हो गयी है। कहानी कहना, सुनाना अलग बात है पर उसको फिल्माने के लिए दक्षता का होना बहुत जरूरी होता है। कैमरे की कलम से जब झरने की कलकल सी कहानी गढी जाती है तो उसका जादुई असर पड़ता है देखने वाले पर। इसी कहानी को यदि किसी निष्णात हस्ति ने या खुद आमिर ने फिल्माया होता तो इस व्यंग्य की धार इतनी पैनी होती कि देश में ऐसा माहौल बनाने वालों की बखिया उधड़ जाती। पर इसमें तो अभद्र और वाहियात संवादों और बेमतलब की गंदी गालियां ड़ाल अपने को बिंदास दिखा तुरंत मशहूर होने की फूहड़ कोशिश की गयी है वह भी एक महिला निर्देशक द्वारा।

इसके अलावा पता नहीं परफेक्टनिष्ट कहलाने वाले आमिर की नजर नत्थे की पत्नी के किरदार पर कैसे नहीं पड़ी। एक गरीब, फटेहाल, दाने-दाने को मोहताज किसान परिवार, जिसके पुरुषों के गंदे कपड़े, धूल भरे चेहरों पर बेतरतीब बढे बिना कंघियाए बाल और झाड़-झंखाड़ की तरह उगी दाढियां अपनी बदहाली का बखान करती नजर आती हैं वहीं नत्थे की बीवी की "भवें" अभी अभी तराशी गयीं लगती हैं। इतना ही नहीं उसके चेहरे का मेक-अप और सलवट रहित साड़ियां निर्देशक की कमजोरी की चुगली खाती नजर आती हैं। एक मरभुक्खे परिवार की महिला को क्या अपनी भवें तराशने या चेहरा पोतने की मोहलत मिल भी पाती है कभी?

सही बात है यदि कैमरे से कहानी में रंग भरना इतना ही आसान होता तो आज हर ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे का नाम आसिफ, राज कपूर, गुरुदत्त, बिमलराय या ऋषिकेश मुखर्जी के साथ लिखा नजर आता।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

तब फिल्मों में स्त्री पात्र का होना एक अजूबा था.

फिल्मी पर्दे को छोड़ दें, वह तो बहुत बड़ी बात है, टीवी के छोटे पर्दे पर भी अपना चेहरा दिखाने और खुद अवतरित होने के लिए आज की कन्याएं कुछ भी करने को आतुर और लालायित रहती हैं। पर क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है कि जब भारत में फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के को अपनी पहली फिल्म, वह भी धार्मिक, के लिए महिला कलाकार की जरूरत पड़ी तो उन्हें दांतों तले पसीना आ गया था। कोई भी महिला या उसका परिवार अपने घर की युवती को इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। थक-हार कर उन्होंने अपनी बेटी से ही वह भूमिका करवाने की सोची पर वह उस भूमिका के लिए काफी छोटी थी। आखिर मजबूर हो उन्हें इस भूमिका के लिए एक होटल में रसोइये का काम करने वाले सालुंके नामक युवक को राजी करना पड़ा था। वैसे उस समय रंगमंच पर स्त्री पात्रों का काम भी पुरुष पात्र निभाया करते थे। क्योंकि उस समय भले और सभ्रांत घर की बहू-बेटियों के लिए ऐसे काम करना अलिखित रूप से वर्जित माना जाता था।
इसी कारण जब दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म "लंका दहन" बनाई तो उसमें भी पुरुष और महिला किरदारों को सालुंके ने ही निभाया था।

पता नहीं यह स्थिति कब तक बनी रहती यदि उस समय बंबई में दफ्तरों इत्यादि में कार्यरत एंग्लो-इंड़ियन युवतियां फिल्मों में दिलचस्पी लेना शुरु ना कर देतीं।

आज तो यह सुन-पढ कर भी आश्चर्य होगा वर्तमान पीढी को।

शनिवार, 28 अगस्त 2010

बिना शीर्षक के

कल एक खबरिया चैनल बता रहा था कि तिरुपति में बालाजी के मंदिर में चढावे के सोने के गहनों को नकली जेवरों से बदल दिया गया। सोने के लाखों रुपये के सिक्कों में हेराफेरी हुई है।

वर्षों पहले कलकत्ते में, शक्ति के रूपों में भी सबसे भयंकर, मां काली की सोने की जीभ चुरा ली गयी थी।

मंदिरों, पूजास्थलों या म्यूजिमों से देवी-देवताओं की मूर्तियां अक्सर चोरी हो ऊंचे दामोँ में बिकती रहती हैं।

पूजास्थलों में एक ही चढावा घूम-फिर कर बार-बार चढता रहता है।

क्या आस्था, ड़र, विश्वास सब तिरोहित होता जा रहा है? स्वर्ग, नर्क, अगला जन्म, यह सब छोड़ आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

रानी लक्ष्मी बाई की सखी झलकारी, इतिहास मौन है जिसके बारे में

"झलकारी", महारानी लक्ष्मीबाई का दाहिना हाथ, समर्पण और वफादारी का दूसरा नाम। अपने देश और सहेली के लिए जिसने अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। पर इतिहास ने उसे उतनी तवज्जो नहीं दी जितने की वह हकदार थी............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
झांसी की रानी की सेना के एक सिपहसालार पूरन कोली की पत्नी थी झलकारी। शादी के बाद जब दोनों अपनी रानी का आशिर्वाद लेने महल में गये तभी उसे देख वहां उपस्थित सारे लोग दंग रह गये थे। एकदम लक्ष्मी बाई का प्रतिरूप थी वह। वैसे ही नैन-नक्श, वैसा ही कद , वैसी ही रंगत, वैसी ही कद-काठी। रानी भी उसे देख हैरान हो गयी थी। उसी दिन से उसे रानी ने अपनी सहेली बना लिया था। तब ही से शुरु हो गया था झलकारी का प्रशिक्षण। उसे घुड़सवारी, सैन्य संचालन, अस्त्र-शस्त्र चलाने की विधिवत शिक्षा रानी ने अपनी देख-रेख में दिलवानी आरम्भ करवा दी थी। दोनों जब साथ-साथ निकलती थीं तो पहचानना मुश्किल हो जाता था कि कौन, कौन है?

वैसे भी झलकारी बचपन से ही निड़र और बहादुर थी। एक बार किशोरावस्था में ही उसने अपनी सहेलियों की रक्षा एक दुर्दांत बाघ को सिर्फ कुल्हाड़ी से मार कर की थी। पूरन कोली ने भी उसकी ख्याति सुन और उसकी बहादुरी से प्रभावित हो कर उससे शादी की थी।

सन सत्तावन का युद्ध शुरु हो चुका था। झलकारी रानी के कंधे से कंधा मिला कर युद्ध में भाग ले रही थी। एक दिन रणभूमि में रानी अंग्रेजों से बुरी तरह घिर गयीं। वह अपने दोनों हाथों में तलवार लिए अंग्रेज सैनिकों को गाजर मूली की तरह काटे जा रही थीं। पीठ पर दतक पुत्र दामोदर बंधा हुआ था। उनकी तलवार जिधर घूम जाती उधर ही नर मुंड़ भूलुंठित हो जाते थे। पर अंग्रेजों का घेरा धीरे-धीरे कसता जा रहा था। इतने में झलकारी की नजर मुसीबत में घिरी अपनी सखी पर पड़ी। तुरंत उसने उधर का रूख कर घेरा तोड़ा और रानी के पास जा पहुंची। भयंकर मार-काट मच गयी पर धीरे-धीरे संकट गहराने लगा था। मौके की नजाकत को देख झलकारी ने रानी को निकल जाने के लिए कहा। पर रानी कहां मानने वाली थीं। पर सारे ऊंच-नीच समझा कर, दामोदर की दुहाई दे कर किसी तरह उन्हें मना लिया गया। रानी ने अपना चेहरा कपड़े से ढक लिया और झलकारी ने अपना चेहरा उघाड़ लिया। अंग्रेजों को धोखा दे रानी अपने कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ रणभूमि से निकल गयीं, फिर तैयारी कर अंग्रजों से लोहा लेने के लिए। इधर झलकारी ने साक्षात रणचंडी का रूप धारण कर लिया। पर अंग्रेज भी ऐसा मौका चूकना नहीं चाहते थे, रानी को जीवित गिरफ्तार करने का। आखिरकार झलकारी बंदी बना ली गयी। अंग्रेज अपनी इस सफलता पर फूले नहीं समा रहे थे। उसे सेनाध्यक्ष रोज के सामने ले जाया गया। पर कुछ हिंदोस्तानी सैनिकों ने झलकारी को पहचान कर असलियत बता दी। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पहले तो झलकारी को मृत्यु दंड़ दिया गया पर बाद में उसे आजीवन कैद की सजा सुनाई गयी। जहां जेल में अमानुषिक यातनाओं से उसकी इहलीला समाप्त हो गयी।

हालांकि झलकारी अंग्रेजों की दुश्मन थी, फिर भी अंग्रेज अधिकारी उसकी वीरता, साहस, रणकुशलता और शौर्य की प्रशंसा किए बगैर नहीं रह सके। अपने उच्चाधिकारियों को भेजी गयी सूचना में उसकी खुल कर प्रशंसा की गयी थी।

पर अपना इतिहास पता नहीं क्यों मौन साधे है उस विरांगना के प्रति ?

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

यह सलाह नहीं चेतावनी है

जैसा देश वैसा भेष यह कहावत तो आपने जरुर सुनी होगी पर एक बात की और गाठं बांध लें, जहां भी रहते हैं वहां की भाषा जरूर सीख लें और कोशिश करें कि स्थानीय लोगों से उनकी ही भाषा में बात कर सकें। पता नहीं आप की किस बात का क्या अर्थ निकाल कर क्या अनर्थ कर दिया जाए। मजाक नहीं है खुद ही देख लें :-

अमेरिका में रह रहे एक हिंदुस्तानी भाई को सड़क पर ही दिल का दौरा पड़ गया। उन्हें तुरंत अम्बुलेंस सेवा मुहैय्या करवाई गयी। अपने यह सज्जन धार्मिक प्रवृति के थे सो वह लगातार "हरि ओम, हरि ओम" का जाप कर रहे थे। अम्बुलेंस वाले उन्हें ले उनके घर पहुंच गये। स्वाभाविक ही था कि उनकी पत्नि उन्हें इस हालात में देख चीख पड़ीं कि आप लोग इन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय यहां घर क्यों ले आए ?

"मैडम, इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। सर लगातार "हरी होम, हरी होम" बोले जा रहे थे। हमें लगा कि यह पहले घर जाना चाहते हैं। सो................

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

"पांगी घाटी" जहां आज भी लड़की को भगा कर शादी करने का चलन है।

हमारा हिमालय दुर्गम घाटियों और ऊचाईयों का अद्भुत संगम है। आश्चर्य होता है ऐसी-ऐसी जगहों को देख कर कि वहां मनुष्य रह कैसे लेता है। क्या है ऐसा उस जगह में जो आठ-आठ महीने मुख्य धरा से कट कर भी इंसान खुश है अपने उस निवास मे।

एक ऐसी ही घाटी में बसी आबादी का जिक्र है, नाम है जिसका “पांगी”। हिमाचल के खूबसूरत चंबा जिले मे आने वाली यह घाटी सैलानियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। राजधानी शिमला से इसकी दूरी करीब 560 किमी है। यहां जाने के लिए चंबा से “तरेला” नमक स्थान तक बस की सुविधा है। उसके बाद पैदल यात्रा करना अपने आप मे एक सुखद और रोमांचक अनुभव है। वैसे गाड़ियों द्वारा जाने के लिए एक रास्ता रोहतांग दर्रे को पार कर भी जाता है। पांगी घाटी तकरीबन 1200 किमी क्षेत्र में फैली हुए है। यह अक्तूबर से मई तक बर्फ से ढकी रहती है। उस समय यहां का तापमान -35 से -40 डिग्री तक हो जाता है। सारे काम-काज ठप्प पड़ जाते हैं। फिर भी यहां के रहने वाले अपना सामान्य जीवन बसर करते रहते हैं। इन कठिन परिस्थितियों को झेलने के लिए इनके घर भी खास तरीके से बने होते हैं। यह मिट्ती और लकड़ी के बने घर तीन मंजिला होते हैं। मुख्य द्वार निचली मंजिल में होता है जो चारों ओर से दिवारों से घिरा होता है जिससे ठंड़ी हवाएं सीधे अंदर ना आ सकें। यहीं पर इनके पालतु जानवर रहते हैं। दूसरी मंजिल में रहने तथा खाना बनाने की व्यवस्था होती है। रसोईघर काफी बड़ा बनाया जाता है जिससे सर्दियों में सारा परिवार वहां की गर्माहट में सो सके। यहां धुएं रहित चुल्हों की व्यवस्था होती है। रसोई के सामने ही एक बड़ा सा चुल्हा भी बनाया जाता है जिसमें बर्फ को पिघला कर पीने के पानी की आपूर्ति होती रह सके। कड़ाके की ठंड़ में बाहर ना जाना पड़े इसलिए शौचालय का इंतजाम भी इसी मंजिल पर होता है। यहां हर घर में जौ की शराब बनती है जो इन्हें ठंड़ से तो बचाती ही है साथ ही साथ स्वास्थ्यवर्द्धक पेय का भी काम करती है।

यहां के लोग देवी के भक्त हैं। इनकी आराध्य देवी "मिंगल माता" है, जिस पर इन्हें अटूट विश्वास है। इसी देवी के ड़र से यहां चोरी-चमारी की घटनाएं नहीं होती हैं। यहां शादी ब्याह का भी अजीबोगरीब रिवाज है। यहां लड़की को भगा कर ले जाने का चलन है। लड़का लड़की को भगा कर अपने घर ले जाता है। लड़के के घर जा कर यदि लड़की वहां का भोजन ग्रहण कर लेती है तो शादी को रजामंदी मिल जाती है पर यदि वह ऐसा नहीं करती तो बात नहीं बनती और लड़के वालों को पंचायत की तरफ से दंड़ मिलता है साथ ही साथ हर्जाना भी देना पड़ता है।

जाड़े के चरम में यहां करीब 15 से 20 फुट तक बर्फ गिर जाती है तब बाहरी दुनिया से जुड़ने का एकमात्र साधन हेलिकाप्टर ही रह जाता है। यहां का मुख्यालय “किलाड़” है। जहां सरकार ने हर सुविधा मुहैय्या करवाई हुई है। यहां का वन व लोक निर्माण विश्राम गृह बड़े-बड़े होटलों को मात करता है। जून से सितंबर तक का समय यहां रौनक मेला लगा रहता है। दूर-दूर से सैंकड़ों चरवाहे अपने-अपने रेवड़ों को यहां ला कर ड़ेरा ड़ाल देते हैं । यहां की घास इतनी पौष्टिक है कि हर चरवाहा उसे अपने पशुओं को खिलवाने के लिए लालायित रहता है। एक और आश्चर्य की बात यहां रबी और खरीफ की फसलें एक साथ उगाई जाती है। यहां की आलू की पैदावर भी बहुत मशहूर है। यहां के रहने वालों को सरकारी सुविधा प्राप्य होने का कारण यहां के बहुत सारे युवा सरकारी कार्यालयों में भी कार्य करते हैं।

पांगी घाटी में पहुंचना चाहे कितना भी मुश्किल हो यहाँ पहुंच कर पर्यटक अपनी सारी तकलीफें भूल जाता है। इस हरी-भरी स्वर्ग नुमा घाटी में प्रकृति ने अपना सौंदर्य मुक्त हाथों से लुटाया है।

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कीरो ने देखा मन्त्रों का प्रभाव

कीरो, विश्व प्रसिद्ध भविष्यवक्ता तथा हस्तरेखाविद्। जिसके मानने वालों में रानी विक्टोरिया, एडवर्ड़ सप्तम, लार्ड किचनर जैसे बड़े-बड़े नाम शामिल थे, ने अपनी पुस्तक में अपनी भारत यात्रा के दौरान की एक हैरतगेंज घटना का जिक्र किया है। उसी के अनुसार :-

भारत में मुझे अनेकों बार अलौकिक चमत्कारों को देखने का अवसर प्राप्त हुआ था। यहां का आध्यात्म, योग, भगवान के प्रति आस्था, तंत्र-मंत्र सदा मुझे आकर्षित करते रहे। ऐसे ही एक मंत्र के प्रयोग को देखने का मुझे अवसर मिला, जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए थे।

एक बार किसी गांव में एक चीते का आतंक फैल गया था। उसने सैंकड़ों मवेशी तथा मनुष्य उदरस्त कर ड़ाले थे। गांव वाले उसके ड़र से अपने घर छोड़ अनयत्र जा कर रहने लगे थे। किसी भी तरह काबू ना आने वाले इस भयंकर पशू को मंत्रों से वश में किया गया था। उसके लिए घने जंगल में एक पुराने मंदिर में बारह ब्राह्मणों ने मिल कर एक अनुष्ठान का आयोजन किया। वे सब एक गोले में बैठ कर एक दुसरे की उंगलियों को आपस में छुआए धीमे स्वर में एक सुर व ताल में मंत्र जाप कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके मंत्रजाप की ध्वनी तीव्र होती जा रही थी। मैं सोच रहा था कि इससे ना जाने क्या होने वाला है? पर थोड़ी ही देर में मुझे इसका जवाब मिल गया जब कुछ दूर किसी जगली पशू के रोने की सी आवाज सुनाई दी। ब्राह्मणों का मंत्रोचार अपने चरम पर पहुंच चुका था। तभी अचानक मंदिर के दरवाजे पर एक विशाल पशू की छाया नजर आई। धीरे-धीरे आकृति साफ नज़र आने लगी वह एक विशालकाय, भयंकर, क्रूर चीता था जो चांद की रोशनी में मंदिर के आहाते में प्रवेश कर चुका था। अब वह बिना हिले-ड़ुले वहां खड़ा था सिर्फ उसकी पूंछ गुस्से में धीरे-धीरे हिल रही थी। वहां जमा ग्रामिण भय के मारे एक दूसरे से चिपक गये थे। मंत्रोच्चार अपने चरम पर था। तभी चमत्कार हो गया। चीते की क्रोध से चमकती आंखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। उसका सिर निढाल सा हो एक तरफ झुकने लगा और कुछ ही देर में वह विशालकाय पशू जमीन पर एक तरफ लुढक गया।

विशिष्ट पोस्ट

यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...