अंधेरी, सुनसान रात। आकाश मेघाच्छन। किसी भी समय बरसात शुरू हो सकती थी। बियाबान पड़ा हाई-वे। दूर-दूर तक रोशनी का नामो निशान नहीं। ऐसे में विशाल अपनी बाईक दौड़ाते हुए घर की तरफ चला जा रहा था। बाईक की रोशनी जितनी दूर जाती थी, बस वहीं तक दिखाई पड़ता था, बाकी सब अंधेरे की जादूई चादर में गुम था।
इतने में बूंदा-बांदी शुरु हो गयी। कुछ दूर आगे एक मोड़ पर एक टपरे जैसी दुकान पर गाड़ी रोक कर विशाल ने अपना रेन कोट निकाल कर पहना और दुकान से एक पैकट सिगरेट ले जैसे ही गाड़ी स्टार्ट कर चलने को हुआ, पता नहीं कहां से एक मानवाकृति निकल कर आई और विनम्र स्वर में लिफ़्ट देने की याचना करने लगी। विकास ने नजरें उठा कर देखा, सामने एक उंचे-पूरे कद का, काला रेन कोट पहने, जिसका आधा चेहरा हैट के नीचे छिपा हुआ था, एक आदमी खड़ा था। उसको हां कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पर बिना कारण और इंसानियत के नाते ना भी नहीं कह पा रहा था। मन मार कर उसने उस को पीछे बैठा लिया। पर अब गाड़ी से भी तेज विशाल का मन दौड़ रहा था। उसने लिफ़्ट तो दे दी थी पर चित्रपट की तरह अनेकों ख्याल उसके दिमाग में कौंध रहे थे। अखबारों की कतरने आंखों के सामने घूम रहीं थीं। अभी पिछले हफ्ते ही इसी सड़क पर एक कार को रोक नव दम्पत्ति की हत्या कर गाड़ी वगैरह लूट ली गयी थी। तीन दिन पहले की ही बात थी एक मोटर साईकिल सवार घायल अवस्था में सड़क पर पाया गया था। वह तो अच्छा हुआ एक बस वाले की नज़र उस पर पड़ गयी तो उसकी जान बच गयी। इसी तरह आये दिन लूट-पाट की खबरें आती रहती थीं। प्रशासन चौकसी बरतने का सिर्फ आश्वासन देता था, क्योंकी विशाल को अभी तक सिर्फ आठ-दस वाहन ही आते जाते दिखे थे। पुलिस गस्त नदारद थी।
शहर अभी भी पांच-सात किलो मीटर दूर था। अचानक विशाल को अपने पीछे कुछ हरकत महसूस हुई। इसके तो देवता कूच कर गये। तभी पीछे वाले ने गाड़ी रोकने को कहा। विशाल समझ गया कि अंत समय आ गया है। बीवी, बच्चों, रिश्तेदारों के रोते कल्पते उदास चेहरे उसकी आंखों के सामने घूम गये। पर मरता क्या ना करता। उसने एक किनारे गाड़ी खड़ी कर दी। बाईक के रुकते ही पीछे वाला विशाल के पास आया और अपने रेन कोट का बटन खोल अंदर हाथ डाल कुछ निकालने लगा। विशाल किसी चाकू या पिस्तौल को निकलते देखने की आशंका से कांपने लगा। तभी पीछेवाले आदमी ने एक सिगरेट का पैकट विशाल के आगे कर दिया और बोला, सर क्षमा किजिएगा, बहुत देर से तलब लगी हुई थी। बैठे-बैठे निकाल नहीं पा रहा था। सच कहूं तो मैंने लिफ़्ट तो ले ली थी पर इस सुनसान रास्ते में मैं बहुत डरा हुआ था कि पता नहीं चलाने वला कौन है, कैसा है, तरह तरह की बातें दिमाग में आ रहीं थीं। पर मेरा जाना भी बहुत जरूरी था। बड़ी देर बाद अपने को संयत कर पाया हूं। यह सब सुन विशाल की भी जान में जान आयी। दोनो ने सिगरेट सुलगायीं, अब दोनों काफी हल्कापन महसूस कर रहे थे।
बरसात भी थम चुकी थी। दूर शहर की बत्तियां भी नज़र आने लग गयीं थीं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008
गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008
न्याय, परम पिता का
परम पिता की नज़रों में तो सब बराबर हैं ! ना ऊँच-नीच, ना धर्म-अधर्म, ना जात-पात ! ना रंग-भेद ! फिर हमने क्यों कहीं दीवारें खड़ी कर दीं ! कहीं खाइयां खोद दीं ! कहाँ से ले आए हम इतना भेद-भाव, अहम्, द्वेष
#हिन्दी_ब्लागिंग
सावन-भादों की एक शाम। आकाश में घने बादल गहराते हुए रौशनी को विदा करने पर आमदा थे। दामिनी एक सिरे से दूसरे सिरे तक लपलपाती हुई माहौल को और भी डरावना बना रही थी। जैसे कभी भी कहीं भी गिर कर तहस-नहस मचा देगी। हवा तूफान का रूप ले चुकी थी।
ऐसे में उस सुनसान इलाके में, एक जर्जर अवस्था में पहुंच चुके खंडहर में, एक आदमी ने दौड़ते हुए आकर शरण ली। तभी दो सहमे हुए मुसाफिरों ने भी बचते बचाते वहां आ कर जरा चैन की सांस भरी। फिर एक व्यापारी अपने सामान को संभालता हुआ आ पहुंचा। धीरे-धीरे वहां सात-आठ लोग अपनी जान बचाने की खातिर इकट्ठा हो गये। बरसात शुरु हो गयी थी। लग रहा था जैसे प्रलय आ गयी हो। इतने में एक फटे हाल बच्चा अपने सूकर के साथ अंदर आ गया। उसके आते ही मौसम ने प्रचंड रूप धारण कर लिया। बादलों की कान फोड़ने वाली आवाज के साथ-साथ ऐसा लगने लगा जैसे बिजली जमीन को छू-छू कर जा रही हो। सबको लगने लगा कि अपने पालतू समेत उस बच्चे के आने से ही प्रकृति का कहर बढ़ा है। यदि यह इस जगह रहेगा तो ऊपर वाले के कोप से बिजली जरूर यहीं गिरेगी। इस पर सबने एक जुट हो, उस डरे, सहमे बच्चे को जबर्दस्ती धक्के दे कर बाहर निकाल दिया। डरते-रोते हुए बच्चे ने कुछ दूर एक घने पेड़ के नीचे शरण ली।
उसके वहां पहुंचते ही जैसे आसमान फट पड़ा हो, बादलों की गड़गड़ाहट से कान बहरे हो गये। बिजली इतनी जोर से कौंधी कि नजर आना बंद हो गया। एक पल बाद जब कुछ दिखाई पड़ने लगा, तब तक उस खंडहर का नामोनिशान मिट चुका था। प्रकृति भी धीरे-धीरे शांत होने लगी थी। बच्चा अपने पालतू के साथ अपने घर की ओर दौड़ा चला जा रहा था !
बुधवार, 29 अक्टूबर 2008
हसाईंयां, पूंछ वाली
उपदेश :- जिंदगी में खुश रहना है तो सदा खुदा और बीवी से डर कर रहना चाहिए।
सार :- खुदा को भी कभी किसीने देखा है?
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विज्ञापन :- कैंसर का इलाज़ हमसे करवाएं।
खुलासा :- इसका इलाज़ तो असली डाक्टरों के पास भी नहीं है। पर हम सस्ते में मारते हैं।
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तलाश :- बाबा, कोई ऐसा वशीकरण-मंत्र दो, जिससे मैं अपनी झगड़ालू बीवी को बस में कर सकुं। बच्चा, ऐसा कोई मंत्र मेरे पास होता तो मैं साधू ही क्यों बनता।
सच्चाई :- वैरागी बनने का कारण आस-पास भी हो सकता है।
सार :- खुदा को भी कभी किसीने देखा है?
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खुलासा :- इसका इलाज़ तो असली डाक्टरों के पास भी नहीं है। पर हम सस्ते में मारते हैं।
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तलाश :- बाबा, कोई ऐसा वशीकरण-मंत्र दो, जिससे मैं अपनी झगड़ालू बीवी को बस में कर सकुं। बच्चा, ऐसा कोई मंत्र मेरे पास होता तो मैं साधू ही क्यों बनता।
सच्चाई :- वैरागी बनने का कारण आस-पास भी हो सकता है।
सोमवार, 27 अक्टूबर 2008
अनदेखे 'अपनों' को दीप-पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
इस विधा यानि ब्लागिंग से आप सब से जो स्नेह, अपनापन, हौसला मिला है, उससे मन अभिभूत है। यह कैसी अजीब बात है कि जब तक एक बार रोज सबके नाम ना देख लिए जाएं तो कुछ खाली-खाली सा लगता है। तीन चार दिनों तक किसी की उपस्थिति न दिखे तो मन बरबस उसकी ओर लगा रहता है। ये जो "अनदेखे अपनों" से लगाव है उसे क्या नाम दिया जाए? इन रिश्तों को कैसे प्रभासित किया जाए? आज तक samajh में naheen aa paayaa है। in तीन सालों में apnii kuupamandukataa ke kaaran bahut kam logon से aamane-saamane milanaa ho paayaa है। sabhii se milane की ichchhaa मन me hone ke baawajuud किसी न किसी kaaran से waisaa sambhaw nahiin ho sakaa। khair yah aapasii स्नेह aise ही banaa rahe yahii kaamanaa है।
इस दीपोत्सव पर आप सभी को सपरिवार मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।
इस दीपोत्सव पर आप सभी को सपरिवार मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।
आने वाले दिन और बेहतर हों। सभी जने सदा सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें।
यही प्रभू से प्रार्थना है।
रविवार, 26 अक्टूबर 2008
कैसी रही
एक गडेरिया अपना रेवड़ चरा रहा था कि एक बड़ी सी गाड़ी उसके पास आ कर रुकी। उसमें से कीमती कपड़े पहने हुए एक युवक उतरा और गड़ेरिये के पास आ बोला, कि मैं यदि तुम्हारे रेवड़ में कितनी भेड़ें हैं , बतला दूं तो क्या तुम मुझे एक भेड़ दोगे? गड़ेरिए के मान जाने पर युवक ने अपना लैप टाप निकाला, सैटेलाईट से कनेक्शन जोड़ा, उस जगह को स्कैन किया, जटिल आंकड़ों को जोड़ा घटाया, फिर गड़ेरिये को बताया कि तुम्हारे पास 1352 भेड़ें हैं। गड़ेरिए के सही है, कहने पर युवक ने अपनी पसंद का जानवार उठा कर अपनी गाड़ी में रख लिया। तब चरवाहे ने कहा कि यदि मैं बता दूं कि तुम्हारा पेशा क्या है, तो क्या तुम मेरा जानवर वापस कर दोगे? युवक ने भी उसकी बात मान ली। इस पर चरवाहे ने कहा कि तुम प्रबंधन सलाहकार हो। युवक आश्चर्यचकित हो बोला, अरे! तुम्हें कैसे पता चला? चरवाहे ने जवाब दिया, यह तो बहुत आसान था। तुम बिना बुलाए मेरे पास आए। बिना मेरे मांगे अपनी सलाह दी, ऐसे सवाल का जवाब दिया जिसका उत्तर मुझे मालुम था, और इस सब की कीमत भी ली, जब की तुम मेरे काम के बारे में कुछ भी नहीं जानते।
"लाओ मेरा कुत्ता वापस करो"
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तीन पागलों को उनके चेक-अप के लिए एक खाली पड़े स्विमिंग पूल के पास ले जाकर डाक्टर ने कहा, कूदो। दो पागल तुरंत कूद गये और चोट खा बैठे। तीसरे की तरफ देख कर डाक्टर ने कहा, अरे वाह, तुम तो ठीक हो गये हो। अच्छा बताओ तुम क्यों नहीं कूदे?
उसने जवाब दिया "मुझे तैरना कहां आता है"
"लाओ मेरा कुत्ता वापस करो"
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तीन पागलों को उनके चेक-अप के लिए एक खाली पड़े स्विमिंग पूल के पास ले जाकर डाक्टर ने कहा, कूदो। दो पागल तुरंत कूद गये और चोट खा बैठे। तीसरे की तरफ देख कर डाक्टर ने कहा, अरे वाह, तुम तो ठीक हो गये हो। अच्छा बताओ तुम क्यों नहीं कूदे?
उसने जवाब दिया "मुझे तैरना कहां आता है"
शनिवार, 25 अक्टूबर 2008
''स्वयंप्रभा'', रामायण का एक उपेक्षित पात्र
थके-हारे, निश्चित समय में सीता माता को ना खोज पाने के भय से व्याकुल, वानर समूह को उचित मार्गदर्शन दे, लंका का पता बताने वाली सिद्ध तपस्विनी "स्वयंप्रभा" को वाल्मीकि रामायण के बाद कोई विशेष महत्व नहीं मिल पाया। हो सकता है, श्री राम से इस पात्र का सीधा संबंध ना होना इस बात का कारण हो।
#हिन्दी_ब्लागिंग
शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो कि स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठ कर वह सारी बात बताती हैं।
यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देव-कन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।
इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं। आगे की कथा तो जगजाहिर है।
यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है। पर पता नहीं, स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र उपेक्षित क्यूं रह गया।
हाय, कितने गरीब हैं हम
अखिल भारतीय जेम्स एंड ज्वैलरी ट्रेड फेडरेशन के सर्वे की मानें तो दीवाली से पहले अक्टूबर के दौरान सिर्फ बीस दिनों में पांच टन सोने की बिक्री हुई इस गरीब देश में। जो पिछले आंकड़ों से 66 फीसदी ज्यादा है। इस साल दुकानों में पहुंचने वाले ग्राहकों की संख्या में भी 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गयी। और यह सब तब है जबकि सोने की कीमतों में पिछले पांच सालों की तुलना में 160 प्रतिशत उछाल आ चुका है।
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