बुधवार, 11 अप्रैल 2018

'ठ' से 'ठठेरा' ! कौन है यह ?

युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा सारा ध्यान उन पर ही अटक कर रह गया और मैं यथासंभव उनके साथ ही चलने लगा। कुछ ही देर में "ट वर्ग" की बारी आ गयी। युवक के 'ठ' से 'ठठेरा' बतलाने और बालक द्वारा उसका अर्थ पूछने पर युवक ने बताया, यूटेंसिल्स का काम करने वाले को हिंदी में ठठेरा कहते हैं.... !
#हिन्दी_ब्लागिंग 
कल पार्क में घूमते हुए एक बाप-बेटे की बातचीत के कुछ ऐसे अंश मेरे कानों में पड़े कि मैं सहसा चौंक गया ! युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा सारा ध्यान उन पर ही अटक कर रह गया और मैं यथासंभव उनके साथ ही चलने लगा। कुछ ही देर में "ट वर्ग" की बारी आ गयी। युवक के 'ठ' से 'ठठेरा' बतलाने और बालक द्वारा उसका अर्थ पूछने पर युवक ने बताया, यूटेंसिल्स का काम करने वाले को हिंदी में ठठेरा कहते हैं। यह अर्थ आज की पीढ़ी के अधिकांश लोगों को पता नहीं होगा ! बालक की ठठेरा-ठठेरा की रट सुनते हुए मैं उनसे आगे निकल गया। 
सच बताऊँ तो मुझे पता नहीं था कि पचासों साल पहले पुस्तक की तस्वीर में एक आदमी को बर्तन के साथ बैठा दिखा हमें पढ़ाया गया 'ठ' से 'ठठेरा' अभी तक वर्णमाला में कायम है ! ज़रा सा पीछे लौटते हैं ! पंजाब का फगवाड़ा शहर ! बालक रूपी मैं, अपने ददिहाल गया हुआ था। शाम को काम से लौटने पर दादाजी मुझे बाजार घुमाने ले जाते थे। उन दिनों वहाँ बाजार के अलग-अलग हिस्सों में एक जगह, एक ही तरह की वस्तुओं की दुकाने हुआ करती थीं। जैसे मनिहारी की कुछ दुकाने एक जगह, कपड़ों की एक जगह, आभूषणों की एक जगह वैसे ही बर्तनों का बाजार में अपना एक हिस्सा था, उसे ठठेरेयां दी गली या ठठेरा बाजार कहा जाता था। उसके 
शुरू होते ही पीतल, तांबे, कांसे के बर्तनों पर लकड़ी की हथौड़ियों से काम करते लोग और उनसे उत्पन्न तेज और कानों को बहरा  कर देने वाली ठक-ठन्न-ठननं-ठक-ठन्न की लय-बद्ध आवाजें एक अलग ही समां बांध देती थीं। यह ठठेरों के साथ मेरा पहला परिचय था। तब से सतलुज में काफी पानी बह गया है। तांबे-पीतल-कांसे के बर्तन चलन से बाहर हो चुके हैं ! कांच-प्लास्टिक-मेलामाइन-बॉन चाइना का जमाना आ गया है, ऐसे में तब ठठेरों का क्या हुआ ?


यही सोच कर जब हाथ-पैर मारे तो हैरत में डालने वाली जानकारी सामने आई। पता चला कि ठठेरा एक हिन्दू जाति है, जो परम्परागत रूप से चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी राजपूत हैं; जो अपने को सहस्त्रबाहु का वंशज मानते हैं। इनके अनुसार जब परशुराम जी ने पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने का प्रण लिया तो बहुतेरे लोगों ने अपनी पहचान छुपा बर्तनों का व्यवसाय शुरू कर दिया। जो आज तक चला आ रहा है। कुछ लोग अपने को मध्यकालीन हैहय वंशी भी कहते हैं। कुछ भी हो आज इस कारीगर, शिल्पकार, दस्तकार शिल्पियों की पहचान विश्व भर में हो गयी है, जब 2014 में यूनेस्को ने इनके कांसे और ताम्र शिल्प को भारत की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दे दी। करीब 47 उपजातियों में अपनी पहचान कायम रखे ये लोग वैसे तो देश-दुनिया में हर जगह के निवासी हैं पर मुख्यता इनका वास पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश व राजस्थान है। 




तो आज से जब भी "ठ" से "ठठेरा" पढ़ने या उसका अर्थ बतलाने का संयोग हो तो एक बार उनके समृद्ध इतिहास का स्मरण जरूर कर लें। 

रविवार, 8 अप्रैल 2018

फिल्म "हिंदी मीडियम" असली जीवन में मंचित हुई, दिल्ली में

पिछले साल एक फिल्म "हिंदी मीडियम" आई थी। जिसमें एक धनाढ्य व्यक्ति खुद को गरीब तबके का साबित कर अपने बच्चे को एक प्रतिष्ठित स्कूल में, आरक्षित कोटे के अंतर्गत दाखिल करवा देता है। पर दिल्ली के इन महाशय ने यह कारनामा फिल्म आने के चार साल पहले ही कर दिया था। अभी तक कई बार ऐसा सुनने में आया है कि अपराधी ने पकडे जाने पर अपने अपराध को किसी फिल्म से प्रेरित होना बताया है। पर यहां तो उल्टा हुआ है ! रियल लाइफ के नाटक को सालों बाद रील लाइफ में तब्दील किया पाया गया। कहीं  "हिंदी मीडियम" फिल्म बनाने वालों को इस हेरा-फेरी की भनक तो नहीं लग गयी थी........
#हिन्दी_ब्लागिंग 
भले ही हम कितना भी नकारें पर यह दुखद व कड़वा सच है कि हेरा-फेरी, धोखा-धड़ी, जुगाड़ जैसी विधाएं हमारे "गुणों" में शामिल हैं। हम सदा दूसरों को ईमानदार, सच्चा, नेक और आदर्श इंसान देखना चाहते हैं, किसी में जरा सी बुराई देखते ही उस पर राशन-पानी ले पिल पड़ते हैं, पर जब खुद के स्वार्थ या लाभ की बात होती है तो हमें कुछ भी गलत या अनैतिक नहीं लगता।  
वर्षों से पढ़ते-सुनते आए हैं कि बच्चों को संस्कार देना माता-पिता का फर्ज है जिससे वे एक जिम्मेदार नागरिक बन सकें। पर जो अभिभावक खुद ही कुकर्मों में लिप्त हों, जिनके लिए अपनी स्वार्थ-पूर्ती ही अभीष्ट हो, वे क्या आदर्श, शिक्षा या नैतिकता का पाठ पढ़ाएंगे अपने नौनिहालों को ? जो बच्चा बचपन से ही झूठ, धोखा-धड़ी, भ्रष्टाचार के माहौल में पलेगा-बढ़ेगा वह बड़ा होकर देश व समाज के हित को तो पैरों की ठोकर पर ही रखेगा ना !
    
आज एक विचित्र अनुभव हुआ जब अखबार में दिल्ली के एक व्यवसाई की करतूत पढ़, पिछले साल मई में आई "हिंदी मीडियम" फिल्म की याद आ गयी। जिसमें एक धनाढ्य व्यक्ति खुद को गरीब तबके का साबित कर अपने बच्चे को एक प्रतिष्ठित स्कूल में, आरक्षित कोटे के अंतर्गत दाखिल करवा देता है। पर इन महाशय ने यह कारनामा फिल्म आने के चार साल पहले ही कर दिया था। पकड़ाई में भी तब आए  जब अपने दूसरे बच्चे को भी उसी तरह वहां दाखिल करवाने का जुगाड़ भिड़ा रहे थे।  
दिल्ली के राजनयिक इलाके, चाणक्यपुरी में एक बहुत ही प्रतिष्ठित, नामी-गिरामी, विख्यात नर्सरी से लेकर बाहरवीं तक का CBSC से सम्बद्धित एक विद्यालय है, जिसका नाम संस्कृति स्कूल है। इसे ख़ास तौर पर सरकारी, सैन्य तथा विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के बच्चों के लिए बनाया गया है। इसकी गिनती देश के बेहतरीन स्कूलों में की जाती है। इसका संचालन एक NGO के द्वारा किया जाता है जिसका गठन वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की पत्नियों ने किया है। इसमें कुछ सीटें, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से आरक्षित रखी गयीं हैं। 
अब आज की खबर ! दिल्ली का एक धनाढ्य व्यवसाई, अब नाम क्या लेना, जिसका अपने MRI सेंटर के साथ-साथ अनाज इत्यादि का थोक का व्यवसाय है। जो बीसियों बार विदेश भ्रमण कर चुका है। उसने 2013 में अपने बड़े बेटे को, नकली कागजातों, गलत आय विवरण और खुद को अपने ही MRI सेंटर का कर्मचारी तथा घर के पते में, अपने बंगले की जगह चाणक्यपुरी के पास की बस्ती संजय कैम्प का उल्लेख कर संस्कृति स्कूल में दाखिल करवा दिया था। पांच साल निकल गए, किसी को हेरा-फेरी की भनक तक भी नहीं लगी।  शायद लगती भी नहीं ! पर अपनी पुरानी तिकड़म से कइयों को बेवकूफ बना विश्वास के अतिरेक में डूबा, अपनी "चतुराई" पर इतराता यह इंसान, इस साल अपने छोटे बेटे को, भाई-बहन वाले कोटे के अंतर्गत दाखिला दिलवाने फिर वहीँ पहुँच गया। पर कहते हैं ना कि अपराध कभी ना कभी सामने आ ही जाता है; तो इस बार स्कूल के संचालकों को कागजों पर शक हुआ। छानबीन के दौरान सारी बातें सामने आ गयीं। नतीजा बाप को तो जेल हुई ही, तीसरी क्लास में पढ़ रहे उसके बड़े लड़के को भी स्कूल से निकाल दिए जाने के कारण उसका भविष्य भी अंधकारमय हो गया !  क्या चाहता था यह आदमी ? क्यूँ किया उसने ऐसा ? क्या सिर्फ अपने को चतुर साबित करने के लिए ? एक बार भी उसके दिमाग में यह बात नहीं आई कि सच सामने आने पर उसके बच्चों का भविष्य क्या होगा ? और तो और जब बच्चों को अपने पिता की इस करतूत का पता चलता तो क्या होता ?
अभी तक कई बार ऐसा सुनने में आया है कि अपराधी ने पकडे जाने पर अपने अपराध को किसी फिल्म से प्रेरित होना बताया है। पर यहां तो उल्टा हुआ है ! रियल लाइफ के नाटक को सालों बाद रील लाइफ में तब्दील किया पाया गया। क्या यह संयोग था या कहीं "हिंदी मीडियम" फिल्म बनाने वालों को इस हेरा-फेरी की भनक तो नहीं लग गयी थी ?

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

समय की पाबंदगी, आज एक संस्मरण, श्रीमती जी की जुबानी

शादी-ब्याह में बेचारे समय को कौन पूछता है, खासकर पंजाबियों के यहां तो दो-तीन घंटे की बात कोई मायने ही नहीं रखती, ना ही उभय-पक्ष इस पर ध्यान देते हैं। पर उस समय हम सब आश्चर्य चकित रह गए जब ठीक छह बजे बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुयी। थोड़ी हड़बड़ी तो हुई पर साढ़े आठ बजते-बजते पंडाल तकरीबन खाली हो चुका था। आदतन देर से आने वाले दोस्त-मित्रों को शायद पहली बार ऐसे "समय" से दो-चार होना पड़ा था....!   

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मेरे स्कूल का घर से पैदल पांच-सात मिनट का रास्ता था। ऐसा माना जाता है कि नजदीक वाले ही ज्यादातर विलंब से पहुंचते हैं। पर मुझे शायद ही कभी देर हुई हो। देख-सुन कर अच्छा लगता था जब लोग कहते थे कि मिसेज शर्मा के आने पर अपनी घडी मिलाई जा सकती है। समय की पाबंदगी मुझे अपने पापा से विरासत में मिली थी। यह संयोग ही था कि मेरे ससुराल में भी हर काम घडी की सुइयों के साथ चलता था। वहां तो बाबूजी के काम के साथ जैसे घडी को चलना पड़ता था। शर्मा जी भी समय के पूरे पाबंद हैं, लेट-लतीफी उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं है। इसी पाबंदगी के कारण हमारे दोनों परिवारों का पहला परिचय भी लोगों के लिए एक उदाहरण बन गया था।

बात मेरी शादी के समय की है। दिसंबर का महीना था। दिल्ली की ठंड अपने चरम पर थी। इसी को देखते हुए स्वागत समारोह छह बजे शाम का और रात्रि भोज का समय सात बजे का रखा गया था। शादी-ब्याह में बेचारे समय को कौन पूछता है, खासकर पंजाबियों के यहां तो दो-तीन घंटे की बात कोई मायने ही नहीं रखती, ना ही उभय-पक्ष इस पर ध्यान देते हैं। पर उस समय हम सब आश्चर्य चकित रह गए जब ठीक छह बजे बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुयी। थोड़ी हड़बड़ी तो हुई पर साढ़े आठ बजते-बजते पंडाल तकरीबन खाली हो चुका था। आदतन देर से आने वाले दोस्त-मित्रों को शायद पहली बार ऐसे "समय" से दो-चार होना पड़ा था। इस बात पर मेरी सहेलियां शर्मा जी से अक्सर मजाक में कहती रहीं कि आप को बड़ी जल्दी थी दीदी को ले जाने की। 

आज बच्चे बड़े हो गए हैं, समझदार हैं, फिर भी उन्हें समझाते रहती हूँ कि समय की कीमत को समझो, इस बेशकीमती चीज की कद्र करो, इसे फिजूल बरबाद न करो, यह एक बार गया तो फिर कभी हाथ नहीं आता !आता है तो सिर्फ पछतावा। मुझे ख़ुशी है कि बच्चे भी इस परंपरा को चलाए रख रहे हैं। इस बात को मैं सदा अपने छात्रों को समझाती रही हूँ और मुझे ख़ुशी है कि मेरी बात को किसी ने अनसुना नहीं किया। इसके लिए प्रभु की शुक्रगुजार हूँ। 

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

गुड़ फ्राइडे यानी पावन शुक्रवार

आज  गुड़फ्रायडे की छुट्टी थी । सुबह- सुबह   एक सज्जन का फोन आ गया।  छूटते ही बोले,  सर हैप्पी गुडफ्रायडे।  मुझसे कुछ बोलते नहीं  बन पडा ! पर फिर धीरे से कहा, भाई; कहा तो गुड फ्रायडे ही जाता है, लेकिन है यह  एक  दुखद दिवस।   इसी दिन ईसा मसीह को मृत्यु दंड दिया गया था । किसी  क्रिश्चियन दोस्त को बधाई  मत दे बैठना.....!
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ऐसे बहुत से  लोग हैं,  जिन्हें  सिर्फ छुट्टी  या  मौज - मस्ती  से  मतलब   होता है।  उन्हें  उस दिन  विशेष  के  इतिहास या उसकी प्रासंगिकता से कोई लेना - देना  नहीं होता !   ऐसा  ही  कुछ  "हादसा"  मेरे संस्थान में होते-होते बचा था जब एक भले आदमी ने "गुडफ्राइडे के उपलक्ष्य में" छुट्टी का नोटिस जारी कर दिया था।  समझाने   पर   वही  तर्क    कि जब गुड़ कहा जाता है तो इसका  मतलब अच्छा ही हुआ ना  ? और उन महाशय जी ने इतिहास में M.A. की डिग्री ले रखी थी !                                            
वैसे यह सवाल बच्चों को तो क्या बड़ों को भी  उलझन  में डाल  देता  है  कि जब  इस  दिन इतनी दुखद घटना घटी थी तो इसे "गुड़" क्यों कहा जाता है?  ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सिर्फ छुट्टी या मौज - मस्ती से मतलब    होता    है,   उन्हें   उस दिन   विशेष के   इतिहास  या उसकी     प्रासंगिकता से कोई  मतलब नहीं होता अब इसी दिन को लें, सुबह की बधाई को याद रख, दूसरे दिन काम पर जा बहुतेरे लोगों से इस दिन के बारे में पूछने पर, इक्के - दुक्के को छोड कोई ठीक जवाब  नहीं  दे पाया।    उल्टा  उनका  भी यही प्रश्न  था  कि फिर इसे  गुड  क्यों  कहा जाता है। इसका यही  उत्तर है कि   यहाँ "गुड"   का  अर्थ  "HOLY"  यानी पावन  के अर्थ में लिया जाता है. क्योंकि  इस  दिन  यीशु   ने  सच्चाई  का साथ  देने और लोगों की  भलाई  के लिए, पापों  में डूबी  मानव  जाति    की  मुक्ति    के  लिए उसमें  सत्य,  अहिंसा,   त्याग और  प्रेम  की भावना जगाने के लिए अपने  प्राण त्यागे थे।  उनके अनुयायी उपवास रख पूरे दिन प्रार्थना करते हैं, और यीशु को दी गई यातनाओं को याद कर उनके वचनों पर अमल करने का संकल्प लेते हैं। 
शुक्रवार का दिन बाइबिल में अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुडा हुआ है जैसे सृष्टि पर पहले मानव का जन्म शुक्रवार को हुआ। प्रभु की आज्ञाओं का उल्लंघन करने पर आदम व हव्वा को शुक्रवार के दिन ही अदन से बाहर निकाला गया। ईसा शुक्रवार को ही गिरफ्तार हुए, जैतून पर्वत पर अंतिम प्रार्थना प्रभु ने शुक्रवार को ही की और उन पर मुकदमा भी शुक्रवार के दिन ही चलाया गया।

मंगलवार, 27 मार्च 2018

तम्बोला, हाउजी या बिंगो...खेल या जुआ !

अपने यहां सार्वजनिक रूप से मेले-ठेले या होली-दिवाली मिलन पर इसका आयोजन तो फिर भी समझ में आता है पर अभी पिछले दिनों  "हिंदू नव वर्ष" समारोह में इसे आयोजित होते देख, पता नहीं कुछ अजीब सा क्यों लगा !  हालांकि खेल मजेदार है, उत्सुकता, मनोरंजन, एकाग्रता, रोमांच, तत्परता, सरलता सभी कुछ समेटे हुए है ! पर पैसे दांव पे लगे होने से जूए का ही एक स्वरुप नहीं बन गया है.... ?
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तम्बोला, हाउजी या बिंगो, एक ही "बोर्ड खेल" के विभिन्न नाम। जो दुनिया भर में और भी नामों से खेला और पसंद किया जाता है। वैसे तो यह आयातित खेल वर्षों से हमारे यहां भी खेला जा रहा है, पर इधर कुछ सालों से इसकी लोकप्रियता दिन दूनी  रात चौगुनी बढ़ी है और अभी भी बढती ही जा रही है। पहले यह कहीं-कहीं क्लब
या पार्टियों  वगैरह में खेला जाता था। पर अब यह महिलाओं की "किटी पार्टियों" का एक आवश्यक अंग बनने के साथ-साथ मेले-ठेले-उत्सवों इत्यादि में भी अपनी पैठ बना चुका है। इसकी लोकप्रियता का कारण इसका रोमांचक स्वभाव, संभावना-युक्त और सरल होना है जिसके कारण कोई बच्चा भी इसे खेल सकता है।  

पर्ची या टिकट 
ऐसा माना जाता है कि इस खेल की ईजाद इटली में हुई थी। जहां से यह सारे विश्व में फ़ैल गया। उस समय इसे परिवार को एकजुट  खेल बतला कर प्रचारित किया गया था। पहले मौज-मस्ती के लिए इसे क्रिसमस के दौरान भी खेला जाता था और जीतने वाले को इनाम मिलता था। धीरे-धीरे इसका स्वरूप बदलता गया और अब यह पैसों से खेला जाने लगा है। दुनिया भर में यह कई तरह से खेला जाता है पर मूल पद्यति एक जैसी ही होती है। 

अपने यहां खेले जाने वाले इस खेल के दो भाग हैं ! एक तो खेलने वाले, जिनकी संख्या कुछ भी हो सकती है, उन्हें एक पर्चीनुमा टिकट मिलता है जिसकी तीन पंक्तियों में एक से नब्बे तक के अंकों में से कोई पंद्रह अंक,
हर पंक्ति में पांच के हिसाब से छपे होते हैं। दूसरा भाग खिलवाने वाले का होता है जिसमें एक या दो जने होते हैं।
उनके पास एक बोर्ड, जिसमें सिलसिलेवार एक से नब्बे अंकों से अंकित खाने बने होते हैं तथा एक कटोरेनुमा बर्तन होता है, कई जगह एक घूमने वाला यंत्र भी उपलब्ध होता है, जिसमें एक से नब्बे तक के अंकित छोटे-छोटे
नंबर वाले गुटके 
"डायस" या गोले होते हैं। खेल शुरू होने के पहले प्रत्येक खेलने वाले को एक निश्चित दर पर पर्ची बेचीं जाती है तथा संग्रहित पैसों से जीतने के विभिन्न मानक तय कर दिए जाते हैं और पूरी राशि को विभिन्न मानकों में बाँट दिया जाता है। जैसे किसी भी पंक्ति के पाँचों नंबर कट जाने पर कुछ राशि, पर्ची पर के किनारे के चारों नंबर कटने पर कुछ राशि, जिस खिलाड़ी के सबसे पहले पांच अंक कट जाएं उसे कुछ राशि इत्यादि। उसके बाद जिस खिलाड़ी के सबसे पहले पूरे पंद्रह यानी सारे नंबर कट जाएं, जिसे "फुल हाउस" कहा जाता है, उसे विजेता माना जाता है और सबसे ज्यादा राशि उसी को मिलती है।   

बोर्ड 
खेल शुरू  होने पर खिलवाने वाला व्यक्ति  कटोरे में  से बिना  देखे एक  नंबर उठा, उसे सबको बतला कर बोर्ड में बने उसी नंबर की जगह में रख देता है। खेलने वाले की पर्ची में यदि वह नंबर हो तो वह उसे काट देता है नहीं तो अगले अंक का इंतजार करता है।  इसी तरह खेल तब तक चलता रहता है जब तक किसी का फुल हाउस ना हो जाए। फुल हाउस होने पर खिलाड़ी को अपनी पर्ची खिलवाने वाले को पेश करनी पड़ती है जो अपने बोर्ड से उसके नंबर मिला जीत निश्चित करता है। यदि कहीं चूक हुई होती है तो वह पर्ची "बोगी" कहलाती है और खेलने वाला बाहर हो जाता है।
नंबर निकलने वाली मशीन 

वैसे तो खेल मजेदार है, उत्सुकता, मनोरंजन, एकाग्रता, रोमांच, तत्परता, सरलता सभी कुछ समेटे हुए है ! पर पैसे दांव पे लगे होने से जूए का ही एक
स्वरुप बन गया है। अपने यहां सार्वजनिक रूप से मेले-ठेले या होली-दिवाली मिलन पर इसका आयोजन तो फिर भी समझ में आता है पर अभी पिछले दिनों "हिंदू नव वर्ष" समारोह में इसे आयोजित होते देख, पता नहीं कुछ अजीब सा क्यों लगा !    

शनिवार, 24 मार्च 2018

यहां देवी-माँ को भेंट स्वरुप ताले चढ़ाए जाते हैं ! नवरात्र पर विशेष...

काफी कोशिशों के बाद भी न्याय ना मिलने पर पुजारी ताराचंद जी ने देवी  को ताले-जंजीर से  बाँध कर प्रतिज्ञा की कि जब तक देवी माँ  भगत को आशीर्वाद नहीं देंगी  और उसे निर्दोष साबित  नहीं करेंगी वह  ताला जंजीर  नहीं खोलेंगे....
#हिन्दी_ब्लागिंग    
जी हाँ ! यह सच है ! हमारा देश तो विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अब आप भगतों की श्रद्धा, आस्था, प्रेम को क्या कहेंगे ! उसे जो अच्छा लगता है, जैसा समझ में आता है, जिस चलन पर उसका विश्वास जमता है वह वैसी ही राह अख्तियार कर लेता है।  हम  में से  कोई  भी जब किसी मंदिर या धार्मिक स्थल पर जाता है तो खाली हाथ नहीं जाता, मिष्टान,  नारियल,  फल-फूल या मुद्रा कुछ न कुछ उपहार स्वरुप जरूर ले कर जाता है पर कानपुर शहर के एक काली मंदिर में माँ को तालों की भेंट चढ़ाई जाती है। हैरानी की बात तो है पर यह बिल्कुल सच है।  
कानपुर के  बंगाली मोहल्ले (मोहाल) में  काली माता का एक मंदिर है,  जिसका निर्माण सन 1949 का बताया जाता है। यहां की मान्यता है  कि कोर्ट-कचहरी के मामलों में माँ निर्दोषों को न्याय दिलवाती हैं।   इसीलिए बड़ी
संख्या में भक्तजन    यहां देवी के  सामने अपनी समस्यों के समाधान के लिए आते हैं।  नवरात्रि के दिनों में, यहां भक्तों की संख्या हजारों में पहुंच जाती है,   सिर्फ  उत्तर-प्रदेश ही नहीं,   बल्कि देश भर  से  भक्त  अपनी मनोकामना लेकर इस मंदिर में आते हैं।   पर वे फल - फूल  या  मिष्टान ही  अर्पित नहीं  करते  बल्कि माँ को  तालों की भेंट चढ़ाते हैं।   आम तौर पर लोहे के ताले ही चढ़ाए जाते हैं पर  कुछ लोग  अपनी    हैसियत के अनुसार सोने - चांदी के ताले भी अर्पित करते हैं। ताले सीधे माता की मूर्ति के   सामने नहीं रखे   जाते     बल्कि मूर्ति से   कुछ दूर बने खम्भोँ में लगी रस्सियों में बांध दिए जाते हैं। पर उसके पहले मन में  अपनी मनोकामना को  रख पूरे  विधि-विधान से उनकी पूजा अर्चना की जाती है। 

इस परंपरा के पीछे तरह-तरह की कथाएं हैं। कहते हैं कि  करीब 60-65 साल   पहले  यहाँ के पहले पुजारी ताराचंद जी   के  एक   अभिन्न मित्र  और   देवी  के भगत  को  एक झूठे  मुकद्दमे   में  फंसा  दिया  गया था।   काफी कोशिशों के बाद   भी  न्याय ना  मिलने पर  ताराचंद ने देवी माँ  को ही  ताले-जंजीर से  बाँध  कर  प्रतिज्ञा   की, कि जब    तक    देवी माँ   भगत को आशीर्वाद नहीं देंगी और उसे निर्दोष साबित  नहीं करेंगी वह  ताला जंजीर  नहीं खोलेंगे।     भगत को जेल हो जाने के बाद ताराचंद जी ने सामान्य पूजा-आरती भी बंद कर दी।  ऐसा कई महीनों तक चला।  आखिर में भगत को न्याय मिला और अदालत ने उसे बरी कर दिया।  तब से  यहां ताले का चढ़ावा चढ़ाने की विलक्षण रीति का आरंभ हुआ और आज भी यह परंपरा चली आ रही है। 

ऐसी ही एक और कथा है,  जिसके अनुसार इस मंदिर  में रोज सुबह नियम से  पूजा-अर्चना के लिए आने वाली एक  महिला भगत बहुत परेशान रहा करती थी। एक दिन उसको मंदिर प्रागंण में ताला  लगाते देख पुजारी के कारण पूछने पर उसने बताया कि  देवी मां ने सपने में आकर कहा है कि तुम एक ताला मेरे नाम से मेरे मंदिर
में लगा देना तुम्हारी हर इच्छा पूरी हो जाएगी। ताला लगाने के बाद वो महिला फिर कभी नहीं दिखी। अचानक बरसो बाद उस महिला द्वारा लगाया गया ताला भी एक दिन गायब हो गया। साथ ही दीवार पर यह लिखा मिला कि मेरी मनोकामना पूरी हो गई है इस कारण अपना ताला खोल रही हूँ।  उसके  बाद  से  ही यहां ताला अर्पित करने का चलन पड़ गया और माँ का नाम ताले वाली देवी पड़ गया। यहां के पुजारी जी के अनुसार हर अमावस्या को माता का दरबार पूरी रात खुला रहता है। पूरी रात पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन होता है।  अगले दिन माता के दरबार में भंडारा भी कराया जाता है।



है ना ! अनोखी बात, अनोखा चलन, अनोखा मंदिर ? कभी भी कानपुर जाना हो तो यहां माँ के दर्शन जरूर कर के आएं। जय माता की ! 

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

समय के अनुसार ढल जाने में कोई हेठी नहीं है !

ठाकुर साहब, नई पीढ़ी समझदार है, वह हमसे ज्यादा व्यावहारिक है, उनके पास हमसे ज्यादा बड़े और व्यापक कार्य-क्षेत्र हैं। उनकी सोचने-समझने-निर्णय लेने की क्षमता तीव्र है। हमसे ज्यादा खतरा मोल लेने की क्षमता है। ये अपना अच्छा-बुरा खूब समझती है; पीढ़ियों का टकराव वे भी नहीं चाहते !जरुरत है एक-दूसरे की समस्याओं को आमने-सामने बैठ कर हल करने की। तो क्यों न हम अपने-आप को कुछ बदल कर, अपने अहम को किनारे कर, अपने संपूर्ण अनुभवों का उनको लाभ देते हुए उनका सहयोग करें ! मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि वे ही जरूर हमारा साथ देंगे ! कोशिश तो कीजिए ................!
#हिन्दी_ब्लागिंग   
बहुत दिनों बाद ठाकुर जी का मेरे यहां आना हुआ। शाम की चाय का वक्त था, अंदर उनके आने की सुचना भिजवा दी। कुशलक्षेम की जानकारी के पश्चात भी वे कुछ अन्यमनस्क से ही लग रहे थे। चाय के दौरान इधर-उधर की बातचीत में ही अचानक उन्होंने पूछा, शर्मा जी; जमाना बहुत बदल गया है ना ? मैं चौंका ! यह कैसा प्रश्न ! फिर उन्हीं के बोलने का इंतजार करता रहा। वे जैसे पूरी तरह वहाँ उपस्थित नहीं थे। मुझे ही पूछना पड़ा, क्यों ! क्या हो गया ? बोले, नहीं; कुछ ख़ास नहीं ! पर अपने संस्कार और वर्तमान में बहुत फर्क लगने लगा है। मैंने कहा, हाँ, वह तो है ही, हमारे जमाने और आज की पीढ़ी में फर्क तो है ही। पढ़ाई-लिखाई, काम-धंधे की प्रतिस्पर्धा, बदलते समय के साथ बने रहने की चिंता, देशों की सिमटती सीमाएं, रहन-सहन सबका असर तो पड़ता ही है। फिर भी हम भाग्यशाली हैं कि समस्त विडंबनाओं के बावजूद अभी भी हमारे यहा संयुक्त परिवार अस्तित्व में बने हुए हैं। परिवार-बोध बना हुआ है। कुछ अपवादों को छोड़ अभी भी घरों में बड़े-बुजुर्गों का आदर-सम्मान, उनकी देख-रेख, उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है। 

ठाकुर जी मेरी बात मानते हुए भी पूरी तरह सहमत नहीं लग रहे थे। बोले, पर पहले वाली बात नहीं रही ! बुजुर्ग हैं घर में, उनकी देख-रेख-पूछ-परख भी होती है। पर अब उनका एकाधिकार नहीं रहा ! हमारे समय में बिना बड़ों की इजाजत के पत्ता तक नहीं हिलता था। कुछ भी करने के पहले उनकी इजाजत जरूरी होती। पर आज महत्वपूर्ण निर्णयों पर उनकी सलाह को अंतिम नहीं माना जाता। उनकी राय भले ही ले ली जाती हो पर अंतिम फैसला घर को चलाने वाले का  होने लगा है। कई बार तो कोई निर्णय लेने के बाद सिर्फ उन्हें बताना ही काफी समझा जाने लगा है। कहीं आने-जाने के लिए किसी की इजाजत की जरुरत नहीं समझी जाती, बस उन्हें इत्तला दे दी जाती है ! यह घर-घर की कहानी हो गयी है। 

मुझे अब उनका दर्द समझ में आने लगा था। पर उन्हें समझाने के लिए मुझे उचित शब्द ढूँढने पड़ रहे थे। कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने कहा, ठाकुर साहब; यह तो आप मानेंगे कि समय के साथ नई पीढ़ी समझदार हो गयी है, वह हमसे ज्यादा व्यावहारिक है, उनके पास हमसे ज्यादा बड़े और व्यापक कार्य-क्षेत्र हैं। उनकी सोचने-समझने-निर्णय लेने की क्षमता तीव्र है। अपने ऊपर उन्हें पूरा विश्वास है। हमसे ज्यादा खतरा मोल लेने की क्षमता है। ये अपना अच्छा-बुरा खूब समझती है; तो क्यों न हम अपने-आप को कुछ बदल कर, अपने अहम को किनारे कर, अपने संपूर्ण अनुभवों का उनको लाभ देते हुए उनका सहयोग करें ! बेकार की रोक-टोक ना करते हुए उन्हें अपने तरीके से अपने जीवन को जीने का मौका दें। हां, अपने विचारों से उन्हें जरूर अवगत कराएं।  जिस किसी बात पर आपत्ति हो उस पर आमने-सामने बैठ कर बात करें, घुटते ना रहें। आप यदि अपने गुजरे समय का ही ध्यान करेंगे, जब युवा होते युवक-युवती पर तरह-तरह की रोक-टोक होती थी, जब उन पर शादी-ब्याह के बाद भी तरह-तरह की बंदिशें हुआ करती थीं, यदि वही सब आप अब भी लागू करना चाहेंगे, क्योंकि आप पर वैसा हो चूका है; तब तो यह बदला निकलना हुआ ! ऐसे में तो परिवार में कोई भी खुश या सुखी नहीं रह पाएगा ! आप भी नहीं ! क्योंकि आप भी कहाँ अपने बच्चों को परेशान व तनाव में देख पाएंगे ! इसलिए जहां नई पीढ़ी को पुरानी मान्यताओं, चली आ रही, सही परंपराओं तथा विचारों से ताल-मेल बैठाना पडेगा, क्योंकि वे लोग भी टकराव नहीं चाहते ! वहीँ आप को भी थोड़ा सा बदलाव तो अपने-आप में लाना ही पडेगा। आप तो समझदार हैं, आप ही उदाहरण दिया करते थे कि नम्रता, मृदुता व लचीलापन कभी व्यर्थ नहीं जाते। समय के अनुसार ढलना कोई कमजोरी नहीं है।   

हमारे पर जो लागू हुआ था, जो बीता, भले ही वह अनुशासन के नाम पर हो, हमारी सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम हों या समाज का दिखावा हो। हो सकता है उस समय बच्चों के व्यक्तिगत विकास के लिए वही जरुरी समझा जाता रहा हो ! क्योंकि ऐसा तो बिल्कुल ही नहीं माना जा सकता कि हमारे अभिभावकों को हमसे लगाव नहीं था, वे हमारी चिंता नहीं करते थे, हमसे उनका प्रेम नहीं था। हो सकता है कि आज से ज्यादा  हमारी चिंता-फ़िक्र की जाती हो। पर अब परिस्थियाँ, समय, सब में आमूल-चूल परिवर्तन आ चुका है। सोच बदल गयी है, विचार बदल गए हैं तो भी हम वही सब क्यों अपने बच्चों पर थोपना चाहते हैं, खासकर दूसरे घर से आई किसी बेटी पर ! यह क्या हमारी कुंठा है ? हमारी ईर्ष्या है कि जो हमें नहीं मिला वह इन्हें भी नहीं मिले ? यदि हाँ; तो किसके प्रति अपने ही बच्चों के............?  यह सदा ध्यान रखें...बंदिशे चाहे किसी भी रूप में हों, उन्हें कभी भी कहीं भी स्वीकारा नहीं गया है !   

रात घिरने लगी थी। ठाकुर साहब भी कुछ-कुछ तनाव-मुक्त लग रहे थे, जैसे किसी ठोस निर्णय पर पहुँच चुके हों। उन्होंने घडी पर दृष्टि डाली, चाय के लिए शुक्रिया अदा कर उठ खड़े हुए। मैं मंथर गति से उन्हें अपने घर की ओर अग्रसर होते देख रहा था।        

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