मंगलवार, 13 मार्च 2018

FOGG का फॉगी विज्ञापन

ऐसा ही एक उत्पाद है,  #FOGG नाम का परफ्यूम, जो हट कर विज्ञापन देने के चक्कर में कुछ भी ऊल-जलूल, उटपटांग परोसता रहता है। यह  बात अलग है कि आजकल उल्टी-सीधी चीजें ही ज्यादा पसंद की जाती हैं, भले ही उनमें गुणवत्ता न हो ! इस कंपनी के ताजा विज्ञापन का विषय फिर इंडो-पाक बार्डर है..........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
दुनिया भर में उत्पादनकर्ता अपने अच्छे-बुरे उत्पादनों के लिए विज्ञापनों का सहारा लेते रहते हैं। अब तो लगता है कि उत्पाद से ज्यादा जरुरी विज्ञापन हो गए हैं ! होड़ लगी हुई है कि कैसे उपभोक्ता के दिमाग को कुंद कर उसकी बुद्धि को अपने हित के लिए उपयोग किया जाए ! ऐसा नहीं है कि अच्छे विज्ञापन नहीं बनते पर उनका प्रतिशत, उल-जलूल, भ्रामक व घटिया इश्तिहारों से कम ही है। बाजार को हथियाने की कोशिश में बहुतेरी बार इस अंधी दौड़ में शामिल, दूसरों की बजाए अपने उत्पाद को श्रेष्ठ दिखाने के लिए विज्ञापन बनाने वाले अपनी हदें पार कर जाते हैं।

ऐसा ही एक उत्पाद है,  #FOGG नाम का परफ्यूम, जो हट कर विज्ञापन देने के चक्कर में कुछ भी ऊल-जलूल, उटपटांग परोसता रहता है। यह  बात अलग है कि आजकल उल्टी-सीधी चीजें ही ज्यादा पसंद की जाती
हैं, भले ही उनमें गुणवत्ता न हो ! इस कंपनी के ताजा विज्ञापन का विषय फिर इंडो-पाक बार्डर है।  सतही तौर या पहली नजर में इसमें कुछ आपत्तिजनक नजर नहीं आता ! पर ध्यान दिया जाए तो कुछ बातें खटकने लायक हैं।

विज्ञापन दिखलाता है कि  कुछ पाकिस्तानी सैनिक, छिप कर सीमा पार कर इधर आ गए हैं ! तभी इन्हें किसी परफ्यूम की खुशबू आती है। जब ये पलट कर देखते हैं तो अपने पीछे एक भारतीय जवान को अपने पर मशीनगन ताने पाते हैं। पकड़े जाने पर भी उन्हें परफ्यूम के बारे में ही जिज्ञासा रहती है बजाए अपने अंजाम के ! इनके पूछने पर भारतीय जवान बताता है
कि उसने फॉग लगाया हुआ है। सरसरी तौर पर इसमें कुछ अटपटा नहीं लगता; पर चोरी-छिपे पाकिस्तानियों का इस तरह सीमा पार कर लेना क्या हमारे जवानों की कार्य-प्रणाली, उनकी क्षमता, उनकी मुस्तैदी पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाता, कि उनके होते हुए कोई दुश्मन कैसे सीमा पार कर गया ? क्या भारतीय जवान ऐसा परफ्यूम लगा कर गश्त करते हैं जिसकी खुशबू चारों ओर  महकती हो ? यदि कभी यही जवान पाक की सीमा पार करेंगे तो इनकी उपस्थिति तो दुश्मनों को परफ्यूम से ही पता चल जाएगी, बिना किसी मशक्कत के !
क्या इस ओर #रक्षामंत्रालय या #सेनाध्यक्ष महोदय का ध्यान गया होगा ?

@फोटो अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 8 मार्च 2018

अरे ! अब तो जागो, आधा विश्व हो तुम !!

एक ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है, किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या ये कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है  ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना यह है कि वे और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है ! समाज के इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया गया है कि कुछेक को छोड़ वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं........
#हिन्दी_ब्लागिंग 
आज #आठ_मार्च है, #महिलाओं _को_समर्पित_एक_दिन ! उन महिलाओं को जो विश्व का आधा हिस्सा हैं ! उन्हें बराबरी का एहसास करवाने, अपने हक़ के लिए जागरूक करने का दिन। पर सोचने की बात है कि क्या                                                                                                                                     
संसार का यह आधा भाग इतना कमजोर है कि उस पर किसी विलुप्त होती नस्ल की तरह ध्यान  दिया जाए ! सबसे बड़ी बात, क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को बराबरी का हकदार मानता है ? क्या वह दिल से चाहता है कि ऐसा हो, या सिर्फ उन्हें मुगालते में रखने का नाटक है ?  क्या यह पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन उनको समर्पित कर दिया जाए ?  वैसे ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।

आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। कभी हनुमान जी को उनकी शक्तियों की याद दिलाने में जामवंत ने सहायता की थी ! पर आज कोई भी ऐसा करने वाला नहीं है ! उन्हें खुद ही प्रयास
करने होंगे, खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी, खुद को ही सक्षम-सशक्त बनाना होगा !  हाँ,  कुछ तो बर्फ टूटी है पर गति बहुत धीमी है, ऐसे में तो वर्षों-वर्ष लग जाएंगे ! क्योंकि यह इतना आसान नहीं है ! हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन उन्हें परोस कर अपना मतलब साधा जाता है। 

पहले तो उन्हें यह निश्चित करना होगा कि उनका लक्ष्य क्या है ! उन्हें क्या चाहिए ! सिर्फ मनचाहे कपडे पहनने और कहीं भी कुछ भी बोल सकने की छूट, ध्येय नहीं होना चाहिए है, वह भी सिर्फ बड़े शहरों में ! दूर-
दराज के गांवों-कस्बों में आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है। आश्चर्य होता है, इस और ध्यान ना देकर इस दिन वे कुछ, अपने आपको प्रबुद्ध, आधुनिक व खुद को महिलाओं का संरक्षक मान बैठी तथाकथित समाज सेविकाएं जो खुद किसी महिला का सरे-आम हक मारे बैठी होती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए,  आरामदेह वातानुकूलित कक्षों में कुछ ज्यादा ही मुखर हो जाती हैं।  

आज पुरुष केंद्रित समाज ने अपने इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया है कि कुछेक को छोड़, वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की....और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो पड़ेगा ही.......! 

गुरुवार, 1 मार्च 2018

अनहोनी के डर से यहां कोई होली नहीं मनाता !

जहां कानपुर के झिंझक इलाके के ग्राम रामनगर के निवासी खुद को होलिका का वंशज मानते हुए और उसके साथ घटी घटना को अन्याय मानने के कारण होली नहीं मनाते। वहीँ इसके अलावा झारखंड-प्रदेश के बोकारो जिले के दुर्गापुर तथा वहीं के गुण्डरदेही के एक ग्राम चंदनबिरही; कोरबा, छत्तीसगढ़, के धमनागुड़ी तथा खरहरी ग्रामों के निवासी अपनी अलग-अलग मान्यताओं और कारणों की वजह से होली के पर्व से दूर रहते हैं................!
#हिन्दी_ब्लागिंग
अभी जहां पूरा देश अपने सबसे बड़े पर्वों में से एक होली के खुमार में डूबा हुआ है, वहीँ कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां वर्षों से लोगों ने  इस त्यौहार को नहीं मनाया है। मौज-मस्ती की जगह इस दिन यहां सन्नाटा पसर जाता है, मनहूसियत छा जाती है, चिंता व डर का माहौल बन जाता है।  ऐसी ही एक जगह है,  झारखंड प्रदेश  के  बोकारो 
जिले का करीब 9 हजार की आबादी वाला दुर्गापुर गांव, जो राजधानी से लगभग 100 किलोमीटर दूरी पर खांजो नदी के पास, पहाड़ी की तलहटी में बसा हुआ है। इस गांव के लोग होली पर खुशियां नहीं मनाते, रंगों को हाथ तक नहीं लगाते, क्योंकि एक दशक के ऊपर से चली आ रही एक मान्यता के अनुसार उन्हें डर है कि ऐसा करने से गांव को आपदा या महामारी का प्रकोप झेलना पड़ जाएगा।

इसके पीछे की कथा के अनुसार इस जगह को राजा दुर्गादेव ने बसाया था और उन्हीं का राज था। उस समय सब तीज-त्यौहार मनाए जाते थे। पर कुछ समय बाद राजा के बेटे की होली के दिन ही मौत हो गई। उसके बाद जब भी गांव में होली का आयोजन होता था यहां कभी भयंकर सूखा पड़ जाता था या फिर महामारी का सामना करना पड़ता था, जिससे गांव में कई लोगों की मौत हो जाती थी। फिर एक बार होली के ही दिन पास के इलाके रामगढ़ के राजा दलेल सिंह के साथ हुए युद्ध में राजा दुर्गादेव की भी मौत हो गयी जिसकी खबर सुनते ही रानी ने भी आत्म ह्त्या कर ली ! कहते हैं अपनी मौत से पहले राजा ने आदेश दिया था कि उसकी प्रजा कभी होली न मनाए। तब से उसी शोक और आदेश के कारण यहां के लोगों ने होली मनानी छोड़ दी। 

समय बदला तो कुछ लोगों ने त्यौहार के दिन खुशियां मनाने की कोशिश की तो कुछ बीमार पड़ गए तो कुछ की मौत हो गयी, फिर पहाड़ी पर जा पूजा-अर्चना की गयी जिससे शांति लौटी। उस घटना ने लोगों के दिलों में
इस कदर भय पैदा कर दिया कि आज की युवा पीढ़ी भी राजा के भूत के डर से होली खेलने से कतराती है। एक बार इसी दिन बाहर से आए कुछ मछुआरों ने परंपरा तोड़ी तो गांव में महामारी का प्रकोप फ़ैल गया ! इन सब कारणों से यहां इतना भय है कि दुर्गापुर से लगे अन्य गांवों के ग्रामवासी भी डरते हैं, होली मनाने से। अब इसे अपने राजा के प्रति श्रद्धा कहा जाए, विश्वास माने या फिर अंधविश्वास ! लेकिन इसकी जड़े इतनी गहरी हैं कि यहां से बाहर जाकर काम करने वाले लोग भी अपने घरों में रंग नहीं खेलते। यहां तक की उनके ऊपर फेंके गए रंग का वो जवाब भी नहीं देते हैं। 

कुछ गांव वालों का कहना है कि समय के साथ यहां के लोग भी बदल रहे हैं और अब यहां के युवा दुर्गापुर से बाहर जाकर होली मनाने लगे हैं। एक स्थानीय ने बताया कि जो लोग होली मनाना चाहते हैं वे गांव छोड़कर दूसरे गांव में जा कर अपने परिचितों के साथ होली मनाते हैं।
*चित्र अंतर्जाल से 

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

रायपुर के पास भी है, एक सोमनाथ धाम

पता नहीं ऐसी कितनी ही जगहें इंतजार कर रही हैं अपने को खोजे जाने का ! अपने अस्तित्व के सार्थक होने का ! अपने इतिहास का दुनिया के सामने उजागर होने का !  जरुरत है ऐसी जगह जाने, पहुँचने वाले सिर्फ खुद ही देख कर ना रह जाएं, कोशिश करें इन जगहों के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताने और वहां जाने के लिए प्रोत्साहित करने की। खास कर आजकल के मॉल प्रेमी बच्चों-युवाओं को.....!
#हिन्दी_ब्लागिंग 
कभी-कभी इच्छित कार्यक्रम में बदलाव कुछ अनोखा, अलग, सुखद अनुभव दे जाता है। ऐसा ही पिछली रायपुर की यात्रा के दौरान घटित हुआ। सारे परिवार का नव-निर्मित रायपुर सफारी जाने के कार्यक्रम में अचानक व्यवधान पड़ जाने से एक नई जगह जाने का मौका हासिल हुआ, जगह थी, शिवनाथ और खारून नदियों के संगम पर स्थित कुछ अनजान सा सोमनाथ धाम। जिसके बारे में प्रचलित है कि इसे शिवाजी ने अपनी गुजरात विजय के उपलक्ष्य में बनवाया गया था। यह रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर स्थित ग्राम सांकरा से पश्चिम दिशा मे करीब सात कि.मी. की दुरी पर स्थित है। नजदीकी रेलवे स्टेशन तिल्दा है। पर सड़क मार्ग से निजी वाहन से जाना ही सुविधाजनक है। 



पहले तो बच्चों में कार्यक्रम के, जंगल-सफारी से मंदिर की तरफ तब्दील हो जाने से निराशा नज़र आई पर उन्हें जब वर्षों बाद पिकनिक का "स्कोप" नजर आया तो सब फ़टाफ़ट राजी हो गए और एक ही गाडी में मय खाद्य-सामग्री, लद-फद  कर चल दिए प्रभू के दर्शन हेतु। धरसींवा से आगे तक़रीबन 10 किमी की दूरी पर एक मार्ग बायीं ओर मुड़ता है जहां से करीब तीन की.मी. दूर खारून नदी और शिवनाथ नदी के संगम पर भगवान शिव का प्रचीन मंदिर सोमनाथ तीर्थ स्थित है।



मंदिर, अत्यंत शांत, सुरम्य, प्राकृतिक सौंदर्य और हरीतिमा से भरपूर जगह में, एक ऊँचे टीले पर स्थित है। कहते हैं इसी टीले  के उत्खनन में यहाँ स्थपित शिव लिंग मिला था। सीढ़ियां चढ़ते ही लॉन में पहले हनुमानजी की प्रतिमा नजर आती है। उनके पीछे कुछ दुरी पर, छोटे पर अपनी प्राचीनता दर्शाते मंदिर के गर्भ-गृह में करीब 3 फीट ऊँचा शिवलिंग स्थापित है। मंदिर में शिव परिवार, पार्वती देवी, गणेश जी, कार्तिकेय एवं नंदी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। शिव लिगं के बारे में मान्यता है कि वह धीरे-धीरे बडा होता जा रहा है। मंदिर के पास ही उन महिला का निवास है जिन पर यहां की देख-रेख का जिम्मा है। 


मंदिर पहुँचने पर पीछे बह रही नदी से पानी ला कर मंदिर में अभिषेक किया गया और जितना थोड़ा-बहुत ज्ञान है, उसी के अनुसार, गलतियों के लिए क्षमा मांग, शिव परिवार की प्रार्थना-अर्चना की। फोटुएं ली गयीं, यादगार स्वरुप। शाम हो चली थी। सभी की भूख चमक उठी थी। वही लॉन में सबने भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर, दस-पन्द्रह मिनट पीठ सीधी की और प्रभू से इजाजत ले घर का रूख किया। 


पता नहीं ऐसी कितनी ही जगहें इंतजार कर रही हैं अपने को खोजे जाने का ! अपने अस्तित्व के सार्थक होने का ! अपने इतिहास का दुनिया के सामने उजागर होने का !  जरुरत है ऐसी जगह जाने, पहुँचने वाले सिर्फ खुद ही देख कर ना रह जाएं, कोशिश करें इन जगहों के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताने और वहां जाने के लिए प्रोत्साहित करने की। ख़ास कर आजकल के मॉल प्रेमी बच्चों-युवाओं को। 

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

मैं और माइक, माइक और मैं !

लोग "कैमरा कॉन्शस" होते हैं पर मैं तो "माइक कॉन्शस" हूँ। होता क्या है कि जब किसी जुगाड़ु मौके पर कुछ बोलने के लिए खड़ा होता हूँ, तो अपने दाएं-बाएं-पीछे भी नजर डालनी पड़ती है कि सब सुन भी रहे हैं या मुझे हल्के में ले अपने मोबाईल में घुस बैठे हैं और इस कसरत में ये जनाब यदि अपनी जगह जड़-मुद्रा में एक ही जगह फिक्स हों तो अपनी आवाज, चेहरे के लगातार चलायमान रहने और इनसे तालमेल न बैठने के कारण लोगों को मिमियाती सी लगने लगती है........!
#हिन्दी_ब्लागिंग      
यहां मैं सिर्फ अपनी बात कर रहा हूँ, कोई अपने पर ना ले, आगे ही क्लेश पड़ा हुआ है। हाँ तो मैं कह रहा था कि इस दुनिया में बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जिनके आप कितने भी  "used to" हो जाओ, तो भी वे आपको घास नहीं डालेंगी। अब जैसे माइक को ही लेंअरे ! ही माइक्रोफोन ! जिसे बोलते समय मुंह के सामने रखते हैं, जिससे म्याऊं जैसी आवाज भी दहाड़ में बदल जाती है ! जिससे जो नहीं भी सुनना चाहता हो उसे भी जबरिया सुनना पड़ता है ! 
इस नामुराद यंत्र को थामने का मैंने दसियों बार अवसर जुगाड़ा है, 15-20 से ले कर 100-150 तक, मुझे झेलने वाले श्रोताओं के सम्मुख ! पर आज तक यह मुझसे ताल-मेल नहीं बैठा पाया है ! मुझे तो पसीना आता ही है वह तो अलग बात है !! होता क्या है कि जब किसी मौके पर कुछ बोलने के लिए खड़ा होता हूँ, तो अपने दाएं-बाएं-पीछे भी नजर डालनी पड़ती है कि सब सुन भी रहे हैं या मुझे हल्के में ले अपने मोबाईल में घुस बैठे हैं और इस कसरत में ये जनाब यदि अपनी जगह जड़-मुद्रा में एक ही जगह फिक्स हों तो अपनी आवाज, चेहरे के लगातार चलायमान रहने और इनसे तालमेल न बैठने के कारण लोगों को मिमियाती सी लगने लगती है ! यदि काबू में रखने के लिए इन्हें हाथ में जकड़ लेता हूँ तो ध्यान इसी में रहता है कि बोलते समय ये कहीं नाक या चश्में के सामने ना जा खड़े हों ! लोग "कैमरा कॉन्शस" होते हैं पर मैं तो "माइक कॉन्शस" रहता हूँ। इनका एक और भी अवतार है जो बदन पर सितारे की तरह टांक लिया जाता है पर उनसे मिलने का मुझे कभी मौका नहीं मिला। 
यह सही है कि इसका मेरा दोस्ताना रिश्ता नहीं बन सका, पर फिर भी कभी-कभी मेरे दिल में यह ख्याल आता है कि यदि ये ना होता तो क्या होता, क्या होता यदि ये ना होता ? कैसे नेता-अभिनेता जबरन जुटाई भीड़ के अंतिम छोर पर मजबूरी में खड़े व्यक्ति को अपने कभी भी पूरे न होने वाले वादों से भरमाते ! कैसे धर्मस्थलों से धर्म के ठेकेदार अपनी आवाज प्रभू तक पहुंचाते ! शादियों की तो रौनक ही नहीं रहती ! कवि तो ऐसे ही नाजुक गिने गए हैं सम्मेलनों में तो अगली पंक्ति तक को सुनाने के लिए उन्हें मंच से नीचे आना पड़ता ! गायकों के गलों की तो ऐसी की तैसी हो गयी होती ! ऐसे ही छत्तीसों काम जो आज आसान लगते हैं, हो ही नहीं पाते !  
ना चाहते हुए भी तारीफ़ करुं क्या उसकी, जिसने इसे बनाया ! 1876 में, एमिली बर्लिनर (Emile Berliner)  से जब इसकी ईजाद हो गयी होगी तब उसे क्या पता था कि उसने कौन सी बला. दुनिया को तौहफे में दे डाली है, जिसका आनेवाले दिनों में टेलिफोन, ट्रांसमीटरों, टेप रेकार्डर, श्रवण यंत्रों, फिल्मों, रेडिओ, टेलीविजन, मेगाफोनों, कम्प्यूटरों  और कहाँ-कहाँ नहीं होने लगेगा। उस बेचारे को तो यह भी नहीं पता होगा कि भविष्य में ध्वनि प्रदूषण जैसी  समस्या होगी जिसमें उसकी यह ईजाद मुख्य अभियुक्त हो जाएगी !  

अब जरुरी तो नहीं कि जिससे मेरी न पटती हो उसकी किसी से भी न पटे ! हमारा आपसी रिश्ता जैसा भी हो पर है तो यह गजब की चीज इसमें कोई शक नहीं है: है क्या ?    

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

यहां भारतीय रेल के पूर्वज विराजमान हैं

यहीं 1907 में निर्मित एक अनोखा मोनोरेल इंजन, जो पटियाला रियासत की विरासत था भी प्रदर्शित है। इस अनोखे इंजन की विशेषता थी कि इसका एक पहिया पटरी पर और दूसरा, जो आकार में बड़ा है वह सड़क पर चला करता था, देखने में यह एक पहिये वाली ट्रेन मालूम पड़ती है। इसी के साथ यहां राजाओं-महाराजाओं के निजी शाही सैलून भी रखे गए हैं, जिनसे रियासतों के वैभव का अंदाज लगाया जा सकता है, पर ऐसे सैलून आजकल "हैरिटेज ट्रेनों" की शोभा बढ़ा कर रेलवे की आमदनी में इजाफा करने में लगे हुए हैं.............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग      
रेल, एक ऐसा नाम जिसका जादू छोटे-बड़े सबके सर चढ़ कर बोलता है। सैकड़ों गाड़ियां, लाखों लोगों को अपने गंतव्य पर पहुँचाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। शायद ही ऐसा कोई होगा जिसे रेल ने मोहित ना किया
हो। आज भी देश का सर्वसुलभ, सबसे सस्ता, सुरक्षित माध्यम कहीं की भी यात्रा के लिए। तक़रीबन डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा के समय में इसने भी तरह-तरह के बदलाव देखे हैं। अपने देश में तो रेल घोड़े से नहीं खींची गयी; यहां भाप के इंजिन से शुरुआत हुई। धीरे-धीरे उनकी क्षमता में बढ़ोत्तरी होती गयी जिससर रफ़्तार और रख-रखाव में फर्क पड़ा फिर बिजली और डीजल के एक से बढ़ कर एक इंजन आए, जिन्होंने दूरियों की परिभाषा ही बदल दी। जब भी कहीं बदलाव होता है तो पुराने को जगह छोड़नी पड़ती है। उपयोगिता ख़त्म होने के साथ ही लोग उन्हें भूलने लगते हैं। भूला दिया जाता है उसका योगदान जब वह ही सबसे बड़ा सहारा हुआ करता था। ऐसा ही हुआ हमारे पुराने भाप के इंजनों के साथ, पुराने डिब्बों के साथ, पुराने यंत्रों के साथ ! जिनके बारे में आज की पीढ़ी कुछ नहीं जानती। इसी बात को मद्देनजर रखते हुए दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में करीब दस एकड़ के क्षेत्र में 01 फ़रवरी 1977 में  
राष्ट्रीय रेल परिवहन संग्रहालय की स्थापना की गयी। जिससे लोग रेल के इतिहास से रूबरू होते हुए जान सकें कि कैसे भारतीय रेलवे नें देश को एक राष्ट्र के रूप में उभारने में एक अहम भूमिका निभाई।





इस संग्रहालय के दो भाग हैं। एक पूरी तरह खुला तथा दुसरा एक भवन के अंदर। जहां दोनो ही प्रकार की रेल धरोहरें सुरक्षित हैं। इस अनोखे संग्रहालय में भारतीय रेलवे के 100 से अधिक, अपने  वास्तविक आकार के  शानदार और आकर्षक संग्रह है। इनमें इंजन और डिब्बों के स्थिर और चल मॉडल, सिगनिलिंग उपकरण, ऐतिहासिक फोटोग्राफ और संबंधित साहित्य सामग्री आदि शामिल है। इस अनोखे संग्रहालय में भारतीय रेलवे के 100 से अधिक अपने वास्तविक आकार के प्रदर्शित सामान का एक शानदार और आकर्षक संग्रह है। भवन के अंदर वाले हिस्से में भारतीय रेल के इतिहास, क्रमिक विकास और वैभव को दर्शाने वाली अनेक फोटोग्राफ के साथ-साथ सिगनिलिंग उपकरण, संबंधित साहित्य सामग्री और इंजिनों, बोगियों, कल-पुर्जों के मॉडल  आदि प्रदर्शित किए गए हैं। जिनमें विश्व के सबसे पहले इंजन, के साथ ही भारत की पहली रेल का मॉडल, इंजन और उस डिब्बे का स्वरूप भी प्रदर्शित है जिसमें महात्मा गाँधी की अस्थियां देश भर में ले जाई गयीं थीं।










उधर बाहर के खुले में अनेक प्रकार के रेल इंजन, रेल कोच, मालवाहक रेल बोगी के स्थिर और चल मॉडल आदि को उनके मूल स्वरूप में रखा गया है। जिनमें कालका-शिमला रेल बस, माथेरान हिल रेल कार, नीलगिरि माउंटेन रेलवे आदि अन्य आकर्षण को पास से देखने, छूने तथा कुछ पर बैठने का आनंद उठाते हुए पुराने समय का अनुभव लिया जा सकता है। यहीं 1907 में निर्मित एक अनोखा मोनोरेल इंजन जो पटियाला रियासत की विरासत था भी प्रदर्शित है (Patiala State Monorail System) इस अनोखे इंजन की विशेषता थी कि इसका एक पहिया पटरी पर और दूसरा, जो आकार में बड़ा है वह पहिया सड़क पर चला करता था, देखने में यह एक पहिये वाली ट्रेन मालूम पड़ती है। इसी के साथ यहां राजाओं-महाराजाओं के निजी शाही सैलून भी रखे गए हैं, जिनसे रियासतों के वैभव का अंदाज लगाया जा सकता है। पर आजकल बढ़ती भीड़ और कम रखरखाव के कारण उनको क्षति पहुँचने के अंदेशे से उन्हें बंद कर दिया गया है। वैसे भी ऐसे सैलून आजकल "हैरिटेज ट्रेनों" की शोभा बढ़ा कर रेलवे की आमदनी में इजाफा करने में लगे हुए हैं। 






पर्यटकों और खासकर बच्चों के लिए यहां एक छोटी रेल भी चलाई जाती है, जो पांच-छह मिनट में धीरे-धीरे चल कर पूरे संग्रहालय का चक्कर लगवाती है। उसका अपना ही मजा और आनंद है। बड़ी गाड़ियों की तरह टिकट चेक होते हैं, चलने का आदेश होता है, सिटी बजती है और फिर ठक, ठका-ठक, ठक पटरियां बदलती, छोटी सी गुफा से गुजरती, सिटी बजाती, चक्कर पूरा कर अपने स्टेशन "म्यूजियम जंक्शन" पर आ ठहरती है। स्टेशन के ठीक सामने ही बच्चों के एक छोटे से खेल-स्थल के साथ-साथ म्यूजिकल फव्वारों का भी निर्माण पूरा हो चुका है। जिनसे निकलता पानी एक अलग छटा प्रस्तुत करता है। वहीँ IRCTC ने अपना गोल आकार का रेस्त्रां भी खोल दिया है जहां घूमने के पश्चात् थकान और भूख दोनों मिटाई जा सकती हैं। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसकी दिवार के साथ साथ एक खिलौना इंजन लगातार चक्कर लगा आगंतुकों का मनोरंजन करता रहता है। 




कभी भी समय मिले तो अपने बच्चों और बाहर से आए मेहमानों को भारतीय रेलवे के 162 वर्ष पुराने इतिहास व विरासत को देखने-समझने, पुराने दुर्लभ भाप, डीजल व बिजली के इंजन,व बहुत सारी कला कृतियों के बारे में जानने के लिए एक बार यहां जरूर ले कर आएं।

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

बसंत अभी भी उद्विग्न है !

पर जैसे ही प्रकृति खुद कुछ सुधार ला देती है, हम बेफिक्रे हो अपनी पुरानी औकात पर आ जाते हैं। मुसीबत टलते ही फिर ना किसी को पर्यावरण का ध्यान रहता है, ना हीं विषैले वातावरण का, ना हीं दम-घोँटू माहौल का ! सरकारें आलोचना से बच कर राहत की सांस ले अपने जोड़-तोड़ में लग जाती हैं, विरोधी किसी और मसले की तलाश में जुट जाते हैं और जनता अपने धंधे में.....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
साल गुजर गया इस बात को ! पर अभी भी जब याद आती है तो सिहरन तो होती ही है साथ ही विश्वास भी नहीं होता कि उस दिन सचमुच कुछ हुआ था और फिर चेतनावस्था के बाद मेरी क्या हालत हुई थी ! वैसा हुआ हो या ना हुआ हो, पर उस दिन जिस गंभीर समस्या की ओर ध्यान गया या दिलाया गया था उसके निवारण हेतु तो
कुछ भी सकारात्मक कहाँ हो पाया अब तक ! उल्टे समस्या कम होने के बजाए बढ़ी ही है ! पिछले तीन महीने, एक गैस चैंबर का एहसास दिलाते रहे हैं यहां शहरवासियों को ! पर जैसे ही प्रकृति खुद कुछ सुधार ला देती है, हम बेफिक्रे हो अपनी पुरानी औकात पर आ जाते हैं। मुसीबत टलते ही फिर ना किसी को पर्यावरण का ध्यान रहता है, ना हीं विषैले वातावरण का, ना हीं दम-घोँटू माहौल का ! सरकारें आलोचना से बच कर राहत की सांस ले अपने जोड़-तोड़ में लग जाती हैं, विरोधी किसी और मसले की तलाश में जुट जाते हैं और जनता अपने धंधे में ! जहां दुनिया भर में दो या तीन तरह के मौसम होते हैं, प्रकृति ने छह-छह ऋतुओं की नेमत सौंपी है हमें ! पर हमने क्या किया ? उसी प्रकृति की ऐसी की तैसी कर रख दी। अब जैसे बसंत का धीरे-धीरे लोप होता जा रहा है वैसे ही बाकी मौसम भी मुंह फेर गए तो क्या होगा इस शस्य-श्यामला का ?  कब हम अपने दायित्वों को समझेंगे ? यदि हमारे पूर्वज भी हमारी तरह सिर्फ मैं और मेरा करते रहे होते तो क्या कभी हम स्वर्ग जैसी इस धरा पर रहने का सौभाग्य पा सकते थे ? फिर मैं सोचता हूँ कि मैंने ही क्या किया इस विषय को ले कर ! सरकार का मुंह तकने, दूसरों से पहल की अपेक्षा रखने और नुक्ताचीनी के सिवाय ! किसी की ओर उंगली उठाने से पहले मैंने कोई पहल की इस ओर ? कोई जागरूकता फैलाई ? अपनी तरफ से कोई कदम उठाया इस समस्या के निवारण हेतु ? यदि नहीं तो मेरा भी कोई हक़ नहीं बनता कि मैं किसी और पर दोषारोपण करूँ !!

आज भी मुझे उस साल भर पहले की सुबह का एक-एक लम्हा अच्छी तरह याद है। जब पौ फटी नहीं थी और मुझे दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई दी थी। उस दिन रात देर से सोने के कारण अर्द्ध-सुप्तावस्था की हालत हो रही थी, इसीलिए सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस
बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा, होठों पर आकर्षित कर लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास !

मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !
बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत, जिसके आगमन की ख़ुशी में आप सब पंचमी मनाते हैं !
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ?
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया  सत्य है।
मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में एक सर्द लहर सी उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है, मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पेय पदार्थ नहीं लूँगा, आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?


बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा कि मेरे आगमन से सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले, आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब प्रफुल्लित हो जाती है। जिससे चारों ओर प्रेम-प्यार, हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो। मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी। वह मेरी ओर देख रहा था। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब सब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है।  मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं।लोगों को लगने लगा है कि अब बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता। पर  बढ़ते प्रदूषण, बिगड़ते पर्यावरण, मनुष्य की प्रकृति से लगातार बढती दूरी की वजह से मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता। आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि अब वक्त है गहन चिंतन का, लोगों को अपने पर्यावरण, अपने परिवेश, अपनी प्रकृति, अपने माहौल के प्रति जागरूक करने का,  अपने त्योहारों, उनकी विशेषताओं,  उनकी उपयोगिताओं,  को बताने का, समझाने का। जिससे आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें। 

कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण मैं पता नहीं कहाँ खो गया ! पता नहीं ऐसे में कितना वक्त निकल गया !  तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो।  कंप्यूटर अभी भी चल रहा है, कागज बिखरे पड़े हैं, फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो। हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे।  सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी। मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में हम दोनों के सिवाय और कोई नहीं था। पर जो भी घटित हुआ था, वह सब मुझे अच्छी तरह याद था। मन यह मानने को कतई  राजी नहीं था कि मैंने जो देखा, महसूस किया, बातें कीं, वह सब भ्रम था ! कमरे में फैली वह सुबह वाली हल्की सी सुवास मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!

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