गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

अधजल गगरियां !!!

अब तो यह जुमला भी घिस-पिट गया है कि आजकल के बच्चे बहुत स्मार्ट हैं ! पर यह स्मार्टनेस तो तभी आई ना जब इन्होंने आँख खोलते ही दसियों गैजटों को अपने इर्द-गिर्द पाया, देखा-भाला-समझा-उपयोग किया और महारत हासिल की। पर माँ-बाप फूले नहीं समाते, उनकी उपलब्धि पर। फिर गुण-गान शुरू हो जाता है, इस टिपण्णी के साथ की हमें तो आज की चीजों के बारे में कुछ भी नहीं पता, यही बतलाता/ती है ! बार-बार यही सुन-सुन कर जड़ पकड़ने लगता है, अहम भाव बच्चों के मन में। उसे लगता है कि वह सर्वज्ञानी है, बाकियों को कुछ पता ही नहीं है। धीरे-धीरे घमंड, अक्खड़ता, अवमानना, दूसरों को कुछ ना समझना उसका स्वभाव बन जाता है......... 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
मेरी उम्र की पीढ़ी बहुत भाग्यशाली है। इसने विज्ञान की मदद से दुनिया में होते बदलावों को अपनी आँखों से  अपने सामने घटते देखा है। देखते-देखते सैकड़ों ईजादों-सुविधाओं ने अपनी अच्छाई और बुराई के साथ हमारी जिंदगी में पैठ बना ली है। छोटे-बड़े आदि हो चुके हैं सुविधाओं के। अब तो यह जुमला भी घिस-पिट गया है कि आजकल के बच्चे बहुत स्मार्ट हैं ! बात तो सही है पर यह स्मार्टनेस तो तभी आई ना जब सारी सुविधाएं मौजूद थीं ! इन्होंने आँख खोलते ही दसियों गैजटों को अपने इर्द-गिर्द पाया, देखा-भाला-समझा-उपयोग किया और महारत हासिल की। माँ-बाप फूले नहीं समाते, गर्व महसूस करते हैं उनकी उपलब्धि पर। फिर गुण-गान शुरू हो जाता है, जान-पहचान-परिवार में, इस टिपण्णी के साथ की हमें तो आज की चीजों के बारे में कुछ भी नहीं पता, यही बतलाता/ती है ! बार-बार यही सुन-सुन कर जड़ पकड़ने लगता है, अहम भाव बच्चों के मन में। उसे लगता है कि वह सर्वज्ञानी है, बाकियों को कुछ पता ही नहीं है। धीरे-धीरे घमंड, अक्खड़ता, अवमानना, दूसरों को कुछ ना समझना, उसका स्वभाव बन जाता है। इसका पहला असर घरवालों पर ही दिखता है जब उन्हें सुनना पड़ता है, पापा से यह कहाँ होगा ! मम्मी को तो कुछ पता ही नहीं है, किसी चीज के बारे में !!  बुआ तुम तो रहने ही दो !!! और घर वाले फिर भी लाड-प्यार में मुस्कुराते रहते हैं।

धीरे-धीरे वह नीम-ज्ञानी बाहर वालों पर भी रोब ग़ालिब करने लगता है। अब सोचिए कि यदि कोई पाबला जी को अपने पालतू के रख-रखाव, उनके स्वभाव, उनकी देख-रेख के बारे में बताने लगे या सुब्रमनियम जी को फूल-पत्तीयों के बारे में बता उनके चित्र लेने की विधि समझाने लगे, ललित जी को घुम्मकड़ी के फायदे बताने लगे तो उन सब की क्या प्रतिक्रिया होगी ? ललित तो झापड़ ही रसीद कर देंगे। तो इतनी बकैती का मुद्दा यह था कि कल शाम कुछ काम-अध्ययन करते समय, बाहरी द्वार के सामने एक श्वान पुत्र लगातार अपने दूर कहीं खड़े साथी से वार्तालाप करे जा रहा था। काफी देर सहन करने के पश्चात मैंने एक मग पानी को कुकुर के पास जमीन पर दे मारा, उसकी आवाज और छीटों से आदतन उसने दुम को दबाया और निकल लिया। मैं अंदर आ गया: उसके बाद जो हुआ वह तो मेरे लिए गजबे का हादसा था..........

कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बजी, जाकर देखा एक बालक नुमा युवा, मन तो लखनवी सम्बोधन का हो रहा है,  खड़ा था ; बोला अंकल आपने डॉगी पर पानी डाला ? ऐसा नहीं करना चाहिए ये बहुत मासूम होते हैं ! सुनते ही BP तो झट से बढ़ा पर फिर भी शांत स्वर में जवाब दिया कि आधे घंटे से वह भौंके जा रहा था, काम में विघ्न पड़ रहा था, हटाना जरुरी था। बोला, पानी डालने से वह भौंकना बंद तो नहीं करेगा ! मैंने कहा तो तुम्हीं उपाय बताओ ! बोला, नहीं पानी डालना था तो दूसरी तरफ डालते ! मैं, तो क्या इससे वह चुप हो जाता ? नहीं ये मासूम होते हैं। मेरे दरवाजे पर डोलते रहते हैं। हम कुछ नहीं कहते। अब थोड़ा BP का असर होने लगा था। मैंने कहा यदि मेरे दरवाजे पर खड़ा हो वह यदि फिर चिल्लाएगा तो मेरी समझ में जो आएगा वह मैं करूंगा: यदि तुम्हें तकलीफ है तो ये जितने भी आठ-दस हैं इन्हें अपने घर के अंदर ले जा कर रख लो !! आवाज की तुर्शी शायद उसको समझ आ गयी थी, कुछ बुड़बुड़ाते हुए गुगलाई जानकारी से भरा ज्ञान-हीन, रहमदिल इंसान चल दिया। बाद में पता चला कि दो घर छोड़ कर ही रहता है।

अब क्या मैं उसे बताता या अपनी सफाई देता, कि इन "मासूमों" के लिए मेरा और मेरे परिवार का क्या योगदान है, कितनों को कैसे-कैसे बचाया है ! कितने रोज खुराक पाते हैं: और यह जो महाशय अपने मित्र से वार्तालाप कर रहे थे और पानी के छीटों से भगे, वे मेरे सामने ही इस दुनिया में आए थे और रोज अपनी खुराक का हिस्सा यहीं से पाते हैं। यहां तक कि उसके माँ-बाप का राशन भी हमारे यहां से ही जाता था वह भी उनकी सेहत को ध्यान में रख। यदि उनके प्रति मुझे सहानुभूति है तो उनकी गलती को सुधारने का हक़ भी है !!

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

दवा की कीमतों का चक्रव्यूह

कंधे छीलती, एक-दूसरे को धकियाती, सड़क तक को घेरे भीड़ में से रास्ता बनाते, पुरानी दिल्ली की कुंज गलियों को पार करते, सामान से अटी पड़ी राहों में किसी तरह निकल, भागीरथ प्लेस की पुरानी सीढ़ियों को फलांग जब दवा मिली तो उसकी कीमत देख हैरानी की सीमा ना रही..........

#हिन्दी_ब्लागिंग
पिछले हफ्ते कुछ व्यापारियों द्वारा बिल को लेकर ग्राहकों को गुमराह करते पाया था, जिसका न कोई उल्लेख करता है ना हीं उस पर ध्यान दिया जाता है ! ऐसा ही एक और रहस्य है, वस्तुओं के कवर पर छपा उसका M.R.P. यानी  अधिकतम खुदरा मूल्य। मतलब इससे अधिक मूल्य पर उस वस्तु को नहीं बेचा जा सकता। यह कीमत निर्माता अपने सारे खर्चे और खुदरा विक्रेता के लाभांश को जोड़ कर तय करता है। पर यह लाभांश कितना होना चाहिए इसका कोई निर्देश है कि नहीं पता नहीं !


पिछले दिनों श्रीमती जी के लिए शुगर चेक करने वाली स्ट्रिप के बारे में पता चला था कि भागीरथ प्लेस में यह काफी सस्ती मिल जाती हैं। इस बार जबा ख़त्म हुई तो वहीँ से लाने की सोची। पर कंधे छिलती, एक-दूसरे को धकियाती, सड़क तक को घेरे भीड़ में से रास्ता बनाते, पुरानी दिल्ली की कुंज गलियों को पार करते, सामान से अटी पड़ी राहों में किसी तरह निकल, भागीरथ प्लेस की पुरानी सीढ़ियों को फलांग जब दवा मिली तो उसकी कीमत देख हैरानी की सीमा ना रही। जो चीज अब तक 875/- में लेते रहे थे वह मात्र 470/- में मिल रही थी। जबकि उस पर M.R.P. 999/- दर्ज था ! यही हाल शुगर परिक्षण में काम आने वाली सुइयों का भी था, 100-150/- में मिलने वाला इनका पैकेट मात्र 50/- में मिल रहा था ! मन में तुरंत नकली-असली का संदेह आया पर बिल तो ले ही लिया था। वहाँ से निकल चांदनी-चौक आकर ऐसे ही एक बड़ी सी दवा-दूकान पर उसी स्ट्रिप के बारे में पूछा तो कीमत 750/- और सूइयों की 100/- बताई गयी ! आधा की.मी. से भी कम की दूरी में ही 300/- और 50/- का फर्क ! यही चीज जनकपुरी तक पहुंचते-पहुंचते उनके हिसाब के मुताबिक 999/- + 250/- का दस-बारह प्रतिशत कम कर 875/- + 200/- की मिलती है। कीमतों का फर्क देख वस्तु की गुणवत्ता पर शंका हो जाती है। सो उसका भी क्रास चेक किया गया तो नतीजा एक सा ही मिला। इस तरह की और ऐसी ही प्राण-रक्षक दवाओं पर इतना लाभांश ? सौ-सौ गुना ज्यादा ? यह सोचने और विचारने का विषय है।


M.R.P. छापना और उससे ज्यादा न लिया जाना उपभोक्ता के हित में हो सकता है पर वह कीमत जायज है कि नहीं इस पर शायद ध्यान नहीं दिया जाता ! खासकर दवाओं के मामले में। दवा खरीदते समय शायद आपने ध्यान दिया होगा कि बिल पर दवा विक्रेता कुछ न कुछ रियायत देता है, जो पांच से बारह प्रतिशत तक कुछ भी हो सकती है। हम बिना उसका उचित मूल्य जाने उसी में खुश हो जाते हैं और दस प्रतिशत वाले को अपना स्थाई दुकानदार बना लेते हैं: बिना ज्यादा खोज-खबर किए ! दवा निर्माता जब M.R.P. निर्धारित करता है तो उसके दिमाग में सिर्फ खुदरा विक्रेता का ही हित ही क्यों होता है ? क्यों आम इंसान को ही हर बार बली का बकरा बनाया जाता है ? कोई जिम्मेवार इस ओर ध्यान देगा ? लगता तो नहीं ! पर आवाज तो उठनी चाहिए !!

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

जब मुझे यह बुरा लगता है तो बहुतों को लगता होगा !

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब चुनाव जाति-पाति-भाषा को किनारे कर संपन्न हुए थे, अच्छा लगा था कि योग्य लोग बागडोर संभालेंगे। पर अब फिर वही पुरानी चाल ! दलों ने "राग-जाति", "राग-धर्म" अलापने के साथ-साथ असंयमित आचरण, अमर्यादित भाषा के साथ-साथ एक दूसरे पर बेबुनियादी लांछन लगाना, छीछालेदर करना, कीचड़ उछालना शुरू कर दिया है। जनता तंग आ चुकी है ऐसे कृत्यों से, ऊब चुकी है ऐसी स्तरहीन नौटंकियों से, उनके व्यवहार से, उनकी ओछी राजनीती से ..................
#हिन्दी_ब्लागिंग 
माहौल ऐसा बनता जा रहा है कि आप कुछ कहना चाह कर भी कुछ नहीं कहना चाहते ! कुछ बोलते ही आपको कोई ना कोई सिरफिरा किसी ना किसी पाले में धकेल देगा। क्योंकि निरपेक्षता जैसा कुछ तो रहने ही नहीं दिया गया है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब चुनाव जाति-पाति-भाषा को किनारे कर संपन्न हुए थे, अच्छा लगा था कि योग्य लोग बागडोर संभालेंगे। पर अब फिर वही पुरानी चाल, दलों ने "राग-जाति", "राग-धर्म" अलापने के साथ-साथ असंयमित आचरण, अमर्यादित भाषा के साथ-साथ एक दूसरे पर बेबुनियादी लांछन लगाना, छीछालेदर करना, कीचड़ उछालना शुरू कर दिया है। जनता तंग आ चुकी है ऐसे कृत्यों से, ऊब चुकी है ऐसी स्तरहीन नौटंकियों से, उनके व्यवहार से, उनकी ओछी राजनीती से ! पर पता नहीं इतने पढ़े-लिखे, समझदार, ज्ञानी लोगों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती कि अवाम सरे-आम किसी की बेइज्जती ज्यादा देर सहन नहीं कर पाती उल्टे उसकी सहानुभूति दूसरे पक्ष की ओर ही हो जाती है।

याद कीजिए 1977 के आस-पास का समय सारे दिग्गज नेता एक-जुट हो इंदिरा गांधी के पीछे पड़ गए थे, उनकी छवि धूमिल करने और उन्हें जेल भिजवाने के लिए ! नतीजा क्या हुआ ? जनता ने इंदिरा जी को ही सर्वोच्च स्थान पर ले जा बैठाया। अभी भी वैसा ही हुआ, जैसे ही भाजपा ने अनर्गल बोलना बंद कर विकास का पल्ला थामा वैसे ही लोगों ने राज्य पर राज्य उनकी झोली में ला डाले। इतना सब होने के बावजूद कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा है कि मीठी वाणी का सहारा ले तथ्यों की बात की जाए ! किसी के चरित्र हनन की बजाए देश की उन्नति की बात की जाए ! जाति-भाषा-धर्म को छोड़ सर्वहारा की बात की जाए ! 

बहुत सकून मिला था जब राहुल जी ने कहा था कि मतभेद व्यक्ति से होना चाहिए, पद की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी प्रधान मंत्री के पद का सम्मान करने के निर्देश दिए थे, पर अगले दिन वे खुद ही सीमा का उल्लंघन कर प्रधान मंत्री को निशाना बनाते नज़र आने लगे ! कौन है जो उनकी रणनीति तैयार करता है ? कौन है जो विभिन्न चैनलों पर अपने मेक-अप पुते चेहरों से अनर्गल वार्तालाप करवाता है ? कौन है जो शह देता है सोशल मीडिया पर बकैती करने वालों को, जिनकी बातें पार्टी के प्रति सहानुभूति कम विरोधी ज्यादा बनाती है ?  कौन है, जिसको इतनी समझ नहीं है कि उसकी अधकचरी हरकतें राहुल ही नहीं वर्षों पुरानी कांग्रेस की जड़ों को भी कमजोर कर रही हैं ? और ये बातें उनके दिग्गज, अनुभवी, सक्षम नेताओं को भी क्यों नहीं दिखाई पड़ रहीं ? क्या वे इतने कमजोर पड़ गए हैं कि दल की भलाई की बात कहने में भी डरते हैं ? क्या उन्हें दिख नहीं रहा कि गलत सलाहों और सलाहकारों की वजह से पार्टी के ऐसे दिन आ गए हैं कि गुजरात में शतायु कांग्रेस को उनकी बात माननी पड़ रही है जिनका ना कोई इतिहास है, ना ही समझ, ना ही अनुभव, सिर्फ थोड़ी सी भीड़ का साथ है, वह भी ना जाने कब साथ छोड़ जाए ! क्या इतने चुनाव परिणाम भी कुछ समझा नहीं सके ? दुःख होता है ऐसी पार्टी का ऐसा हश्र देख कर, और भी ज्यादा इसलिए कि अभी भी सुधरने की सार्थक कोशिश नहीं की जा रही !  

उधर भाजपा अपनी रणनीति के तहत हिन्दू-गैर हिन्दू साबित करने में, मंदिर आने-जाने में को ले कर जमीन-आसमान एक करे दे रही है। आम आदमी को समझ नहीं आ रहा है कि किसी के मंदिर जाने में किसी को क्या और क्यों आपत्ति होनी चाहिए ? क्या हो जाएगा यदि कोई गैर हिन्दू है भी तो, इंसान तो है ना वह ! उसकी नियत साफ़ है, देश के लिए, समाज के लिए, जन-हित के लिए यदि वह कुछ करना चाहता है तो हिन्दू होंना क्यों जरुरी है ? कतई जरुरी नहीं है पर नौसिखिए सलाहकारों ने जनेऊ-दर्शन काण्ड में राहुल को ही फंसा डाला ! ऐसे अधकचरे लोग दोनों तरफ हैं जो बिन सर-पैर के ऊल-जलूल प्रयासों द्वारा एक दूसरे का चरित्र-हरण करने की ओछी हरकतें करते रहते हैं।  

कहते हैं कोई राजा तभी सफल हो सकता है, कोई राज्य तभी तरक्की कर सकता है, जब उसके सलाहकार गुणी, विचारक व विद्वान हों। चापलूसों, चारणों, खुशामिदियों और हाँ में हाँ मिलाने वाले दरबारियों से घिरा दिगभ्रमित राजा और उसका राज्य कहीं का नहीं रहता !          

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

GST, निरुत्साहित किया जाता है ग्राहक को !

घडी का सेल बदलने के लिए टाइटन के शो रूम से काम करवा कर बिल माँगा तो वही जवाब मिला, 12 % GST लग जाएगा ! मैंने कहा तो क्या हुआ ? बोला, देख लीजिए ! मैंने कहा, देखना है, मुझे चाहिए ! तो दूसरे ग्राहकों तथा उसकी अजीब सी नज़रों का सामना करते हुए मैंने बिल लिया। यही हाल आगे दवा की दूकान पर भी हुआ ,  GST लग जाएगा ...जैसे टैक्स न हो कोई बला हो ! पिछले हफ्ते उत्तराखंड के एक होटल में भी ऐसा ही कुछ हुआ था ! देश में अलग-अलग जगहें, अलग-अलग लोग, अलग-अलग तरह का वातावरण, पर व्यापारिक मानसिकता सब जगह एक जैसी !
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पिछले दिनों कराधान करते समय सरकार की तरफ से बार-बार कहा गया कि आप अपनी हर खरीदी का बिल जरूर लें ! पर क्या व्यापारियों को भी ऐसा कुछ कडा निर्देश दिया गया कि आपको भी हर बिक्री का बिल काटना ही है ! क्योंकि भले ही यह कानून हो पर इस वर्ग के अधिकाँश भाग में बिल ना देना, आदत में शुमार है ! टैक्स पहले भी थे, शायद कुछ ज्यादा  होंगे ! पर  इधर बहुत हो-हल्ला मचा, GST को लेकर, तरह-तरह की अफवाहें उड़ीं, दोनों तरफ से उलटे-सीधे आंकड़े प्रस्तुत होते रहे ! विरोध के लिए विरोध हुआ पर "कुछेक" की आदत सुधारने का किसी ने भी कोई सुझाव नहीं दिया ! 

अभी कुछ दिन पहले अल्मोड़ा जाना हुआ था, ट्रेन विलंब से काठगोदाम पहुंची, रात का एक बजने को था सो बिना ज्यादा हंडराए, स्टेशन के सामने के ही एक होटल में रुकना हुआ। काउंटर पर उपस्थित व्यक्ति ने 1200/- लिए और कमरे में पहुंचा दिया, ना कोई एंट्री ना कोई रजिस्टर ! रात काफी हो चुकी थी: सो सुबह चलते समय बिल माँगा तो जवाब मिला GST लग जाएगा ! मैंने कहा, तो क्या ! बिल दो।  फिर भी कुछ ना-नुकुर, झिझक पर कुछ मेरे अड़े रहने पर ही वह एंट्री कर बिल देने पर मजबूर हुआ। यह बात थी दिल्ली से करीब 300 की.मी. दूर की। अब दिल्ली की देख लीजिए। पता चला था कि चांदनी चौक के भागीरथ प्लेस में दवा वगैरह के मूल्यों में काफी फर्क है।  दो दिन पहले चांदनी चौक गया इसी सिलसिले में। लगे हाथ घडी का सेल भी बदलने के लिए टाइटन के शो रूम से काम करवा कर बिल माँगा तो वही जवाब मिला, 12 % GST लग जाएगा ! मैंने कहा तो क्या हुआ ? बोला, देख लीजिए ! मैंने कहा, देखना है, मुझे चाहिए ! तो दूसरे ग्राहकों तथा उसकी अजीब सी नज़रों का सामना करते हुए मैंने बिल लिया। यही हाल दवा की दूकान पर भी हुआ !!! GST लग जाएगा जैसे टैक्स न हो कोई बला हो। वहाँ भी थोड़ी हूँ-हाँ, आना-कानी  के बाद ही बिल मिला। यह तो देश के सिर्फ दो राज्यों की बानगी है, अलग-अलग जगहें, अलग-अलग लोग, अलग-अलग तरह का वातावरण, पर व्यापारिक मानसिकता एक जैसी !

सोचने की बात यह है कि ईमानदारी से टैक्स देना क्या आम आदमी का ही फर्ज है ? क्या देश सुधारने का सारा जिम्मा इसी वर्ग पर है ? क्या सबकी धौंस इसी जमात पर चलती है ? क्या डरा-धमका कर सिर्फ इन्हें ही नीबू की तरह अंतिम बूँद लेने के लिए निचोड़ा जाता रहेगा ? यह भी एक कारण है उसके सौ-पचास बचाने का। उसे लगता है कि जब हर तरह की उगाही सिर्फ उसीसे होती है तो वह क्यों नहीं जहां बचता है वहाँ से बचा ले !
क्या कभी उन CA या Tax Consultants से सवाल-जवाब किए जाते हैं जो ऐसे व्यापारियों को कानून की आडी-टेढ़ी गलियों में घुमा कर चोरी करना सिखाते हैं ? क्यों नहीं ऐसे गलत लोगों के काम  रोक लगाई जाती ? क्यों नहीं कर चोरी करने वाले तिजारतदारों को किसी का भय रहता ? क्यों नहीं लाखों की पगार लेने वाले अफसर इन पर हाथ डाल पाते ? या डालना नहीं चाहते ? क्यों ? 

सोमवार, 27 नवंबर 2017

जवाब तो जिम्मेदारों से मांगा जाना चाहिए !!

कोई आम आदमी एक ठेला तो लगा कर  दिखा दे कहीं, उसे छठी का दूध न याद दिला दें पुलिस और कमेटी वाले तो कहिएगा ! पर सारे देश में हजारों-लाखों ऐसी जगहें बना दी गयी  हैं जहां बिना हरड-फिटकरी लगे करोड़ों का वारा-न्यारा हो रहा है ! जवाब तो उनसे माँगा जाना चाहिए जिनकी इजाजत के बगैर कहीं एक ईंट भी नहीं लग सकती पर उनकी ही मेहरबानी से सारे देश में कुकुरमुत्तों की तरह पूजा स्थल उगते जा रहे है ! 
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अभी पिछले दिनों अखबारों में करोलबाग़ और झंडेवाला के बीच स्थित संकट मोचन धाम की, क़ुतुब मीनार की तरह दिल्ली की पहचान सी बन गयी, 108' ऊँची हनुमान जी की मूर्ति को हटाने की काफी चर्चा रही। तय है कि इस पर तरह-तरह के विवाद भी जन्म लेंगे ! हम ज्यादातर धर्म-भीरु लोग हैं। हमें इससे कोई मतलब नहीं
कि फलाना मंदिर कहाँ बना, कैसे बना, किसने बनवाया, क्यूँ बनवाया ! वहाँ विधिवत पूजा होती भी है कि नहीं, पूजा करने वाले को इस विधा का ज्ञान है भी कि नहीं !  हमें तो सिर्फ वहाँ स्थापित मूर्ति से मतलब होता है ! फिर चाहे वह विवादित स्थल पर बनी हो, चाहे नाले पर, चाहे सड़क के किनारे, चाहे कूड़ेदान के पास या फिर किसी पेड़ के नीचे ही कुछ रख दिया गया हो ! लोगों की आस्था और भावनाओं का फायदा उठा कुछ भी कहीं भी बना दिया जाता है और लोग पहुँच जाते हैं पैसा चढ़ाने, मत्था टेकने, मन्नत मांगने ! विश्वास नहीं होता तो आइए जनकपुरी के "ग्रैजुएट बालाजी धाम" जो डिस्ट्रिक सेंटर के कुछ पहले, पैदल पथ पर बना हुआ है। लोग मंगल-शनि यहां चढ़ावा चढ़ा मन्नतें माँगते हैं। जबकि इसकी एक दीवाल पर शीशा टांग हजामत भी बनाई जाती है और वही सज्जन आरती वगैरह का जिम्मा भी उठाते हैं: वह भी कभी-कभी बिना नहाए-धोए ! पर हमें इन सब चीजों से कोई मतलब नहीं है ! हमें तो अपनी मनोकामना की पूर्ती चाहिए, बस !!

शातिर लोग जानते हैं कि मानव इच्छा चीज ही ऐसी है जो कई बार बिना कहीं गए प्रभू की अनुकंपा से ही, बिना मन्नत के भी पूरी हो जाती है, सौ-पचास में पांच-सात तो ऐसे लोग होते ही हैं। जब उनका काम हो जाता है तो श्रद्धा-वश वे सारा श्रेय उस जगह को देने लगते हैं और उनके  इस मुख-प्रचार  (mouth publiity)  से सैंकड़ों लोग
वहाँ पहुँचने लगते हैं और उन ठगों की बन आती है। लोगों की यादाश्त तो कमजोर होती ही है जिससे कुछ ही दिनों बाद ऐसी जगहें "प्राचीन" और "सिद्ध" जैसे विशेषणों से सुशोभित होने लगती हैं ! सवाल यह नहीं है कि ऐसे पूजा स्थल क्यूँ बन रहे हैं: सवाल यह है कि यदि जगह विवादित, सरकारी, हथियाई गयी या घेरी गयी है तो वहाँ निर्माण की इजाजत किसने दी ? क्योंकि बिना किसी का पीठ पर हाथ हुए कोई ऐसी हिम्मत कर ही नहीं सकता ! कोई आम आदमी एक ठेला तो लगा कर  दिखा दे सड़क के किनारे: शाम होते-होते उसे छठी का दूध न याद दिला दें पुलिस और कमेटी वाले तो कहिएगा ! पर सारे देश में हजारों-लाखों ऐसी जगहें बना दी गयी  हैं जहां चंट लोग बिना हरड-फिटकरी लगाए करोड़ों का वारा-न्यारा कर रहे हैं। जवाब तो उनसे माँगा जाना चाहिए जिनकी इजाजत के बगैर कहीं एक ईंट भी नहीं लग सकती पर उनकी ही मेहरबानी से सारे देश में कुकुरमुत्तों की तरह पूजा स्थल उगते जा रहे है !

अब इस मंदिर को ही लें, जिसको बनने में करीब तेरह साल लगे, मूर्ति कोई तीन-चार फिट की नहीं जो किसी को दिखी ही ना हो, वह भी दिल्ली के बीचो-बीच, सबकी निगाहों में ! फिर कैसे, किसकी शह पर, बिना किसी डर व  झिझक के आस-पास अतिक्रमण होता चला गया ? कौन हैं वे लोग जिनको इंसान तो क्या भगवान् का भी डर नहीं ! क्यों नहीं मंदिर के आस-पास की सफाई के पहले उनकी धुलाई की जाए, जिससे भविष्य में कोई  ऐसी बेजा हरकत करने के पहले दस बार सोचे ! पर कड़वी सच्चाई यही है कि हमारे देश में रसूख और जुगाड़ बहुत बड़ी बीमारी है जिसका इलाज बहुत मुश्किल है, पर लाइलाज नहीं है। एक बार इस तरह के लोगों के गिरेबान पर कानून का शिकंजा कस जाए तो काफी हद तक इस नासूर से मुक्ति मिल सकती है। वैसे ज्यादा मुश्किल भी नहीं है: सिर्फ जिम्मेदार लोगों को फरमान मिल जाना चाहिए कि उनके कार्यक्षेत्र के तहत कुछ भी गलत होता है तो दंड भी उन्हें ही भुगतना पडेगा, सारी बात साफ़ होने तक उन्हें निलंबित तो किया ही जाए पर बिना किसी तनख्वाह के: अभी तो लोग काम पर भी नहीं जाते और घर बैठे आधा पैसा ले मौज करते हैं !  बस !! इतना ही काफी है अपराधों में 60 से 70 प्रतिशत की कमी लाने के लिए। 

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

यहां 15-20 की.मी. के लिए 1000/- तक मांगने वाले वाहन चालकों से बचें !!

पर्यटकों को होने वाली असुविधाओं को देखते हुए देश के दक्षिणी हिस्से से आए दो युवाओं को उत्तराखंड के इस हिस्से में "ओला कैब" जैसी सुविधा प्रदान करने का ख्याल आया और उन्होंने इस तरह की सेवा का भविष्य भांप एक टैक्सी सेवा #GO-9 के नाम से शुरू कर दी। उनके अनुसार उत्तराखंड में यह पहली टैक्सी सेवा है जिसे आप सिर्फ एक फोन कर या उनकी वेब-साइट पर जा बुक कर सकते हैं.........

#हिन्दी_ब्लागिंग   
कुछ सालों पहले तक किसी नई, अनजानी जगह जाने के पहले लोग दस बार सोचते थे। क्योंकि वहाँ के बारे में उसके नाम या छोटी-मोटी जानकारी को छोड़ और कुछ भी खबर नहीं रहती थी। इसलिए ज्यादातर लोग वहीँ जाना पसंद करते थे जहां या तो उनके परिचित रहते हों या फिर कोई जान-पहचान का जा-आया हो। क्योंकि नई जगह में परिवार के साथ जाने में थोड़ी हिचकिचाहट होती ही थी। संचार क्रान्ति के बाद आज देश-विदेश की सारी जानकारी हमें घर बैठे उपलब्ध हो जाती है। प्रसिद्ध जगहों में रहने-ठहरने, आने-जाने की सारी बुकिंग चलने के पहले ही की जा सकती है। निर्धारित स्थल पर पहुँचने पर किसी तरह की चिंता नहीं रहती। पर अभी भी ऐसे अनेक पर्यटन स्थल हैं, जहां होटल वगैरह में भले ही पहले से बुकिंग हो जाए पर घूमने के लिए वाहन इत्यादि के लिए वहाँ के वहां-चालकों की गोलबंदी से जूझना ही पड़ता है। भले ही आपको रूट या किराए का अंदाज हो पर वहाँ जेब ढीली होने से बचा नहीं जा सकता। नेट की जानकारी भी पूरी तरह खरी नहीं उतरती। 

अभी पिछले महीने अल्मोड़ा जाना हुआ था। उसके लिए काठगोदाम उतरना हुआ। सुबह जब अल्मोड़ा के लिए वाहन की खोज शुरू हुई तब नेट की सारी जानकारी धरी की धरी रह गयी। जहां नेट पर काठगोदाम से अल्मोड़ा की दूरी 60-70 की.मी. बताई गयी थी वह 96 की.मी. निकली, आभासी जानकारी में जहां सड़कों की हालत अच्छी बताई जा रहा थी, वहीँ एक जगह कच्चे पहाड़ों के बीच करीब दस की.मी. की सड़क तकरीबन गायब ही थी और किराया 1400-1500/- की जगह 1800/- से 2000/- के बीच; कोई-कोई तो 3000/- तक को सही ठहरा रहा था, इनके अनुसार  वापस लौटने में सवारी नहीं मिलती और इन्हें खाली आना पड़ता है। हालांकि इनकी आपस में सब सेटिंग होती है पर ग्राहकों को यही बताया जाता है। हाँ यदि किसी लौटने वाले वाहन से सम्पर्क हो जाए तो 1000-1200 में बात बन जाती है। पर यह बात अनजान मुसाफिर को कोई क्यूँ और कौन बताए ? और फिर घूमने-फिरने आए पर्यटक 400-500/- के लिए अपनी छुट्टियों को बेमजा नहीं करना चाहते और सौ-सवा सौ कम करवा खुश हो लेते हैं क्योंकि टैक्सी के बिना घूमने के लिए और कोई  ढंग की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। बसें तो हैं पर उनका कोई ख़ास फायदा घूमने आए पर्यटक के लिए नहीं है।

यही मोनोपली, परिस्थितियां, परेशानियां नए उद्योगों की प्रेरणा बनती हैं और जोखिम उठा हिम्मत करने वालों के लिए नई राहें खोल देती हैं। ऐसे ही देश के दक्षिणी हिस्से से आए दो युवाओं को उत्तराखंड के इस हिस्से में "ओला कैब" जैसी सुविधा प्रदान करने का ख्याल आया और उन्होंने पर्यटकों की असुविधाओं को ध्यान में रख एक टैक्सी सेवा #GO-9 के नाम से शुरू कर दी। उनके अनुसार उत्तराखंड में यह पहली टैक्सी सेवा है जिसे आप सिर्फ एक फोन कर या उनकी वेब-साइट पर जा बुक कर सकते हैं। अभी यह शैशवावस्था में ही है और कम ही टैक्सी चालक इनसे जुड़े हैं पर धीरे-धीरे इनका ग्राफ ऊपर की ओर उठ रहा है। शुरुआत में इन्होंने नौ जिलों नैनीताल, रानीखेत, हल्द्वानी, कसौनी, पिथौरगढ़, रुद्रपुर, बागेश्वर और भीमताल से अपना काम शुरू किया है इसीलिए अपना नाम भी #GO-9 रखा है। इनका पता हमें अल्मोड़ा पहुँचने पर ही लगा। इनकी मिलनसारिता, पेशेवर अंदाज और सहयोग के कारण अगले तीन दिन इन्हीं ने हमारी यात्रा का बंदोबस्त किया। कहने का अभिप्राय यह है कि जब भी किसी ऐसी जगह जाना हो; जहां यातायात का पुख्ता इंतजाम न हो; तो ऐसी किसी सेवा का जरूर पता कर लें। नहीं तो 20-30 की.मी. आने-जाने का किराया 1000/- तक मांगने वाले वाहन चालकों की कहीं कोई कमी नहीं है !!  

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

यहाँ मानव भस्मी-विसर्जन शुचिता के साथ संभव है

हिंदू परंपरा के अनुसार शव-दाह के बाद अस्थियों का किसी धार्मिक स्थल पर विसर्जन तथा भस्मी को बहते जल में प्रवाहित करने का विधान है। पर अब नदियों-सरोवरों की स्वच्छता को बनाए रखने के हेतु भस्मी-विसर्जन के लिए दिल्ली में कुछ स्थान निर्धारित कर दिए गए हैं। दिल्ली के अंतर्राजीय बस-अड्डे के पास, यमुना से लगा, मजनू के टिला भी एक ऐसा ही स्थान है। लोगों की भावनाओं को समझते हुए, सिख समुदाय ने यहां भस्मी-विसर्जन की अति उत्तम व्यवस्था कर एक बड़ी समस्या को हल कर समाज के सामने एक मिसाल पेश की है.....   

समय बहुत तेजी से घूम रहा है। आज की ईजाद दूसरे दिन पुरानी पड़ जाती है। रोज ही किसी ना किसी क्षेत्र में बदलाव महसूस किया जा रहा है। रोजमर्रा की जिंदगी में भी विभिन्न प्रकार के पहलू सामने आ रहे हैं। हर क्षेत्र अपने उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की सहूलियतें देने पर उतारू है। पर कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां के बदलावों का, मानव जीवन का अभिन्न अंग होते हुए भी, जल्द पता नहीं चलता ! हालांकि वहाँ कार्यरत या वहाँ से संबंधित लोग अपनी तरफ से आम लोगों की परेशानियों को समझते हुए कुछ ना कुछ बेहतरी के लिए कदम उठाते ही रहते हैं। ऐसी ही एक जगह है, मानव के ब्रह्म-लोक की यात्रा पर निकलने के पहले इस धरा पर का अंतिम पड़ाव, मुक्तिधाम !     
   
मुक्तिधाम या श्मशान या कायांत ! शम का अर्थ है शव और शान का अर्थ शयन यानी बिस्तर। जहां मरे हुए शरीरों को रखा जाता है। मौत के बाद काया या शरीर का अंत होता है जीवन का अंत नहीं होता है, इसीलिए यह कायांत है, जीवांत नहीं। पर इस दुनिया में देह से ही मोह है, संबंध हैं, रिश्ते-नाते हैं, अपनत्व है, ममता है, इसीलिए इसके ख़त्म होने पर, नष्ट होने पर परिजनों का दुखी होना अत्यंत स्वाभाविक है। दुखी और व्यथित दिलो-दिमाग से उस समय सारे इंतजाम करना, व्यवस्था करना बहुत मुश्किल हो जाता है। उन हालातों और परेशानियों को समझते हुए अब सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त, उस समय की जरुरत की सारी सामग्री और वस्तुओं को एक ही जगह उपलब्ध करवाने की व्यवस्था मुक्तिधामों में ही कर दी गयी है। नहीं तो बांस, बल्ली, पुआल, पूजा का सामान, कपडे-लत्ते, जूता-चप्पल इत्यादि दसियों तरह के सामान के लिए अलग-अलग जगहों पर जाना पड़ता था। अब तो जैसे क्रिश्चियन समाज में ताबूत मिलते हैं उसी तरह बनी-बनाई अर्थी भी उपलब्ध होने लगी है। इससे समय और परेशानी में काफी कमी आ गयी है। 

हिंदू परंपरा के अनुसार शव-दाह के बाद अस्थियों का किसी धार्मिक स्थल पर विसर्जन तथा भस्मी को बहते जल में प्रवाहित करने का विधान है। पर अब नदियों-सरोवरों की स्वच्छता को बनाए रखने के लिए हर जगह भस्मी विसर्जन नहीं किया जाना उचित तो है पर एक समस्या का सबब भी बनता जा रहा है। क्योंकि दोनों ही कार्य अपनी जगह अति आवश्यक हैं। इसलिए भस्मी-विसर्जन के लिए दिल्ली में कुछ स्थान निर्धारित कर दिए गए हैं। जिससे किसी की भावना को ठेस भी ना पहुंचे और वातावरण भी सुरक्षित रहे। ऐसा ही एक स्थान है दिल्ली के अंतर्राजीय बस-अड्डे के पास, यमुना से लगा, मजनू के टिले का स्थान। जहां इसी नाम से एक भव्य गुरुद्वारा भी बना हुआ है। लोगों की भावनाओं को समझते हुए, सिख समुदाय ने यहां भस्मी-विसर्जन की अति उत्तम व्यवस्था कर एक बड़ी समस्या को हल कर समाज के सामने एक मिसाल पेश की है। 
  






गुरूद्वारे के ठीक नीचे, बगल से दूषित जल-निरूपण के बाद पानी की एक धारा यमुना में मिलती है। उसी के ऊपर एक चबूतरा बना ऊके एक किनारे "फ्नेल" जैसा छेद बना भस्मी को पानी में डालने की व्यवस्था कर दी गयी है। जिससे लोगों को पानी-कीचड़ से छुटकारा तो मिल ही गया है, भस्मी का भी हवा में उड़ने से होने वाली समस्या से मुक्ति मिल गयी है। साफ़-सुथरे, सम्मान जनक तरीके से यह काम पूरा होने लगा है। इसके साथ ही पहले जो भस्मी के बोरे वगैरह को लोग यूँ ही इधर-उधर फेंक देते थे उसके लिए भी संस्था ने एक जगह बना, एक ना दिखने वाली बड़ी समस्या का निदान कर दिया है। सलाम है ऐसे लोगों को जिन्होंने इन सारी समस्याओं का निदान किया !       

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