pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

मच्छर भी "हाईटेक" और "लाइफ कॉन्शस" हो गए हैं

अब यह पहले की तरह ज्यादा गुंजार नहीं करता। इसका आकार भी कुछ छोटा हो गया है। उड़ने की शैली भी कुछ बदल कर सुरक्षात्मक हो गयी है। रक्त रूपी आहार भी कम लेने लगा है। इन सब परिवर्तनों का फायदा इस प्रजाति को मिलने भी लगा है। पहले गले तक रक्त पी, उड़ने से लाचार हो, यह आपके आस-पास ही पड़ा रहता था, चाहे बिस्तर पर या फिर तकिए पर या फिर पास की दिवार पर और देखते-देखते हाथ के एक ही प्रहार से वहीँ चिपक कर रह जाता था। पर अब बदलाव के कारण यह जरुरत के अनुसार भोग लगा.. यह-जा ! वह-जा ! होने लगा है........   
#हिन्दी_ब्लागिंग      
हम इंसान अपनी उपलब्धियों पर ही इतना इतराते और मग्न रहते हैं कि हम अपने आस-पास के जीव-जंतुओं, कीड़े-मकौड़े-कीटाणु-जीवाणुओं की उपलब्धियों पर ध्यान ही नहीं देते। हालांकि हमारी ज्यादती से सैकड़ों प्रजातियां इस दुनिया से विदा ले चुकी हैं और अनेकों का अस्तित्व खतरे में हैं। फिर भी जहां मानव दसियों बीमारियों से ग्रसित हो दम तोड़ देता है वहीँ जीव-जंतु अपने को परिस्थियों के अनुसार ढाल लेते हैं ! कभी सोचा है कि तिलचिट्टा (Cockroach) हजारों हजार साल से, एक से एक विकट परिस्थियों के बावजूद कैसे बचा हुआ है ! कैसे कछुआ दशकों तक जीवित रह जाता है। कैसे हीमांक के नीचे या जानलेवा तपिश में भी प्राणी जिंदगी को गले लगाए रखते हैं, बिना किसी अप्राकृतिक साधन के ! कैसे प्राकृतिक आपदाओं में मनुष्यों की मौत ज्यादा होती है बनिस्पत दूसरे प्राणियों के ! कैसे छोटे-छोटे तुच्छ कीटाणु-जीवाणु कीट नाशकों के प्रति प्रतिरक्षित हो जाते हैं।  है ना आश्चर्य की बात !!

मच्छर को ही लें ! एक-डेढ़ मिलीग्राम के इस दंतविहीन कीड़े ने वर्षों से हमारे नाक में दम कर रखा है। करोड़ों-अरबों रूपए इसको नष्ट करने के उपायों पर खर्च करने के बावजूद इसकी आबादी कम नहीं हो पा रही है। तरह-तरह की सावधानियां, अलग-अलग तरह के उपाय आजमाने के बावजूद साल में करीब चार लाख के ऊपर मौतें इसके कारण हो जाती हैं। इतने लोग तो मानव ने आपस में लडे गए युद्धों में भी नहीं खोए ! मच्छर तथा मलेरिया पर वर्षों से इतना लिखा पढ़ा गया है कि एक अच्छा खासा महाकाव्य बन सकता है। 1953 में इस रोग की रोकथाम के उपायों की शुरुआत की गयी, जिसे 1958 में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप दे दिया गया। पर नतीजा शून्य बटे सन्नाटा ही रहा। सरकारें थकती नहीं नियंत्रण की बात करने में और उधर मच्छर भी डटे हैं रोगियों की संख्या बढ़ाने मेँ। अब तो यह भी खबर है कि ज़िंदा तो जिंदा मरे हुए मच्छर के रोएं इत्यादि भी इंसान की सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर तरह-तरह की एलर्जी से ग्रसित करवा देते हैं। 

मच्छर तथा मच्छरी दोनों फूल-पत्ती इत्यादि का रस पी कर ही जीते हैं; पर मादा को प्रोटीन की आवश्यकता
होती है जिसे वह मानव व दूसरे जीवों के रक्त से पूरा करती है। वैसे एक कहावत है "नारी ना सोहे नारी के रूपा" मच्छरी इस बात की हिमायतिन है, वह अपनी सम-लिगिंयों से ख़ास बैर रखती है। वैज्ञानिकों के अनुसार महिलाओं के पसीने में एक विशेष गंध होती है। वही मच्छरों को अपनी ओर आकर्षित करती है और  इसके साथ ही लाल रंग या रोशनी भी इन्हें बहुत लुभाती है।  
 पर इधर अपने भार से तीन गुना ज्यादा रक्त पी, कुछ समय के लिए अजगर के समान पड जाने वाले इस कीट में कुछ बदलाव सा नजर आने लगा है। खासकर दिल्ली में। तटीय क्षेत्रों में शायद यह "वैज्ञानिक बदलाव" अभी नहीं पहुंचा है ! अब लग रहा है कि यह पहले की तरह ज्यादा गुंजार नहीं करता। इसका आकार भी कुछ छोटा हो गया है। उड़ने की शैली भी कुछ बदल कर सुरक्षात्मक हो गयी है। एक बार में रक्त रूपी आहार की खुराक भी कम लेने लगा है। इन सब परिवर्तनों का फायदा इस प्रजाति को मिलने भी लगा है। पहले गले तक रक्त पी कर, उड़ने से लाचार हो, यह आपके आस-पास ही पड़ा रहता था, चाहे बिस्तर पर या फिर तकिए पर या फिर पास की दिवार पर और देखते-देखते हाथ के एक ही प्रहार से वहीँ चिपक कर रह जाता था। पर अब बदलाव के कारण यह
जरुरत के अनुसार, भोग लगा यह-जा ! वह-जा ! होने लगा है। लगता है इन्होंने भी अपने को बचाने के लिए काफी शोध किए हैं। जिससे ये  "हाईटेक" और "लाइफ कॉन्शस" हो गए हैं। पहले "फ्लिट" की एक ही बौछार से इसके सैंकड़ों साथी भू-लुंठित हो जाया करते थे; वहीँ अब इस पर किसी भी धूम्र, द्रव्य या क्रीम का उतना प्रभाव नहीं पड़ता। कोई माने या ना माने पर जिस कीट को इतनी समझ है कि अपने डंक के साथ एक ऐसा रसायन अगले के शरीर में छोड़ता है जिससे रक्त अपने जमने की विशेषता कुछ समय के लिए खो बैठता है और उतनी देर में यह खून चूस, किटाणु छोड़ हवा हो जाता है ! तो क्या, उसने समय के साथ-साथ अपनी सुरक्षा के बारे में शोध नहीं किया होगा !      

जितना पैसा दुनिया भर की सरकारें इस कीट से छुटकारा पाने पर खर्च करती हैं; वह यदि बच जाए तो दुनिया में कोई इंसान भूखा नंगा नहीं रह जाएगा। इससे बचने का उपाय यही है कि खुद जागरूक रह कर अपनी सुरक्षा आप ही की जाए। क्योंकि ये महाशय "देखन में छोटे हैं पर घाव करें गंभीर"।  

शनिवार, 9 सितंबर 2017

भजनों, आरतियों, गीतों से छेड़-छाड़ !

हमारे देश में, गीता को छोड़ दीजिए, वह तो प्रभू की वाणी है। पर जिस तरह मानव-रचित रामायण व महाभारत, सदियों से हमारे सबसे पवित्र, सम्माननीय व लोकप्रिय ग्रंथ हैं; उसी तरह विष्णु जी की सबसे जनप्रिय, घर-घर में गायी जाने वाली, सबसे पमुख, प्रमाणिक मानी जाने वाली आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है। उसको भी इन कुंठित दिमाग वालों ने नहीं बक्शा।  जिस तरह के वस्त्र पहना कर एक प्रतिस्पर्द्धी से इसे पाप संगीत (पॉप म्युजिक) में गवाया गया है उसे किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं किया जाना चाहिए

#हिन्दी_ब्लागिंग  
पता नहीं ऐसा क्यूँ है कि जब हमारे सामने कुछ गलत होता है तो हम उसे चुपचाप देखते रहते हैं और जब उसकी बुराई पूरी तरह खुल कर सामने आती है तो फिर हफ़्तों हाय-तौबा मचाए रखते हैं। इधर जितनी भी बड़ी  घटनाएं हुई हैं वे सब इस बात का प्रमाण हैं। वैसा ही कुछ एक तथाकथित "रिएलिटी शो" में, जो अपनी सफाई में भजन
विधा को नई ऊंचाइयों और लोगों में स्थापित करने के दावे के साथ शुरू हुआ है, जिस तरह भजनों-आरतियों की बखिया उधेड़ी जा रही है, उस के बारे अभी कहीं से कोई आवाज नहीं उठ रही; पर जैसे ही एक बड़ा जनमत इसका विरोध करेगा तब सभी इसके विरोध में बोलना शुरू कर देंगे। इस पर एक पोस्ट पहले भी लिखी थी; पर उस पर भी लोगों की प्रतिक्रिया, सब चलता है, जैसी ही थी।  

बाबा रामदेव को ढाल बना इस शो में जिस तरह भजनों को "फ्यूज" कर अन्धकार को लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न हो रहा है वह किसी भी तरह ग्राह्य नहीं है। आश्चर्य है कि इतने दिनों बाद भी किसी तरह की आलोचनात्मक आवाज नहीं उठी है ! हो सकता है बाबा रामदेव के इससे जुड़े होना ही कारण हो और यही इस शो
शो के जज 
के आयोजकों का उद्देश्य और उनकी सफलता है। जबकि   इस    शो    की गंभीरता इसके मंचन, यहां की भाषा, वहाँ उपस्थित ख्यातिप्राप्त हस्तियों, उनके उपक्रमों, विवरणों से ही लग जाती है।

हमारे देश में, गीता को छोड़ दीजिए, वह तो प्रभू की वाणी है। पर जिस तरह मानव-रचित रामायण व महाभारत, सदियों से हमारे सबसे पवित्र, सम्माननीय व लोकप्रिय ग्रंथ हैं; उसी तरह विष्णु जी की सबसे जनप्रिय, घर-घर में गायी जाने वाली, सबसे पमुख, प्रमाणिक मानी जाने वाली आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है। उसको भी इन कुंठित दिमाग वालों ने नहीं बक्शा।       जिस तरह के वस्त्र पहना कर एक प्रतिस्पर्द्धी से इसे  पाप संगीत
(पॉप म्युजिक) में गवाया गया है उसे किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं किया जाना चाहिए। पर  विडंबना है कि मंच पर उपस्थित बाबा रामदेव सहित तथाकथित जज व अन्य, तालियां बजा - बजा कर उसे,   भक्ति-गायन को एक अलग तरह की ऊंचाइयों पर ले जाने की उपलब्धि मान रहे हैं।  कम से कम बाबा रामदेव से ऐसे मंच पर उपस्थित होने की उम्मीद नहीं थी जबकि उन्होंने बड़ी मेहनत से अपनी छवि एक देशभक्त, योग-गुरु, स्वदेशी और अपनी परंपराओं का सम्मान करने वाले के रूप में बनाई है।  

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

ब्रह्मदेश, बर्मा या म्यांमार का काली माता का मंदिर

बर्मा का भारतीय फ़िल्मी दुनिया से भी संबंध काफी पुराना है। फ़िल्मी जगत की सबसे सफल नर्तकी-अभिनेत्री हेलेन मूल रूप से बर्मा की ही हैं। वर्षों पुराना सदाबहार गीत "मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से टेलीफून" को लोग आज भी गुनगुनाते हैं। बर्मा को लेकर कई फ़िल्में भी बन चुकी हैं............. 

#हिन्दी_ब्लागिंग
म्यांमार, हमारे पड़ोसी देशों में से एक; पर जिसके बारे में हम शायद सबसे कम जानते हैं। इतना कम कि हमें यह भी नहीं मालुम कि 1937 के पहले भारत का ही एक अंग हुआ करता था, जिसे ब्रह्मदेश के नाम से जाना जाता था। पर 1937 के बाद अंग्रेजों ने इसे भारत से अलग कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस पर जापान ने कब्जा कर लिया; जिससे 1945 में इसे मुक्ति मिली। 1948 में यह स्वतंत्र देश बन गया। पर इसके बारे में जानकारी इतनी कम है कि अधिकाँश को इसकी आज की राजधानी का नाम नाएप्यीडॉ (Naypyidaw) भी मालूम नहीं होगा। कारण भी है, यह देश सालों साल मिलिट्री शासन के कारण एक लौह-कपाट के पीछे ही रहा है। अब दुनिया के साथ चलने के लिए जैसे ये नींद से जागा है। पिछले दिनों भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी की यहां की यात्रा के बाद लोगों की इसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी है।



पहले म्यांमार को बर्मा के नाम से जाना जाता था। जो यहां की बर्मी आबादी के कारण पड़ा था। तब इसकी राजधानी का नाम रंगून था, जिसे बाद में यांगून कहा जाने लगा। यह 2006 तक यहां की राजधानी रहा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का मुख्यालय यहीं बनाया था। भारत के बौद्ध प्रचारकों के प्रयासों से यहाँ बौद्ध धर्म की स्थापना हुई थी। वैसे भी यहां भारत से लोग अलग-अलग कारणों से आते रहते थे।  जिन्होंने यहां रह कर अनेक मंदिरों का निर्माण किया। सही संख्या तो नहीं मालुम पर पचास से ज्यादा मंदिर अभी भी यहां हैं। पिछले दिनों अपनी म्यांमार यात्रा के दौरान उन्हीं में से एक, माँ काली के प्राचीन मंदिर में जा नरेंद्र मोदी जी ने पूजा-अर्चना की थी। 

म्यांमार के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण शहर यांगून में स्थित इस मंदिर को अट्ठारवीं शताब्दी में भारत से गए तमिल लोगों ने बनवाया था। यह मंदिर अपनी कलात्मकता और खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। खासकर इसकी छत पर उकेरी गयी देवी-देवताओं की मूर्तियां मन मोह लेती हैं। अभी इसका रख-रखाव का जिम्मा वहां के भारतीय समुदाय के लोगों पर है।

 यहीं पर विश्व-प्रसिद्ध  श्वेडागोन पैगोडा तथा भारत के अंतिम मुग़ल बादशाह, बहादुर शाह जफ़र का मकबरा भी है, जिन्हें अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह के बाद भारत से लाकर यहां दफना दिया था। बरसों बाद बाल गंगाधर तिलक को भी यहां की मांडले जेल में कैद रखा गया था। रंगून और मांडले की जेलें अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की गवाह हैं। 

यहां बड़ी संख्या में गिरमिटिया मजदूर ब्रिटिश शासन की गुलामी के लिए ले जाए गए जो लौट कर नहीं आ सके। इनके अलावा रोज़गार और व्यापार के लिए गए भारतियों की भी बड़ी संख्या यहां निवास करती है। 1962 के दंगों के दौरान हिंदुओं द्वारा बड़ी संख्या में बर्मा छोड़ देने और अभी कुछ प्रतिबधों के बावजूद भी करीब दस लाख हिंदू यहां के नागरिक हैं; जिनके पूर्वज वर्षों-वर्ष पहले आ कर यहाँ बस गए थे। उन्हें यह अपना ही देश लगता है। 
बर्मा का भारतीय फ़िल्मी दुनिया से भी संबंध काफी पुराना है। फ़िल्मी जगत की सबसे सफल नर्तकी-अभिनेत्री 'हेलेन' बर्मा की ही हैं। वर्षों पुराना सदाबहार गीत "मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से टेलीफून" को लोग आज भी गुनगुनाते हैं। बर्मा को लेकर कई फ़िल्में भी बन चुकी हैं। 

छोटा होने के बावजूद बर्मा की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह हमारे और चीन के बीच पड़ता है इसलिए भी उसकी स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। वैसे भी वह पहले हमारा ही अंग रह चुका है सो हमसे जुड़ाव होना नैसर्गिक है; हमें आशा करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में अपने इस पड़ोसी से हमारी नजदीकियां और भी बढ़ेंगी। 


"चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से" 

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

#एक्सिस_बैंक.....परिवारों को जोड़ने का काम कीजिए, तोड़ने का नहीं !!

#एक्सिस_बैंक_अपने_विज्ञापन_को_सकारात्मक_नजरिये_से_भी_बनवा_सकता_था, जिससे बैंक की बात और माँ की दूरदर्शिता दोनों परिलक्षित हो जातीं। माँ अपने बेटे को ऐसे भी समझा सकती थी कि शादी के पहले अपने घर की बची हुई  किश्तों को चुका देना चाहिए क्योंकि ब्याज दरें बहुत कम हैं। इस तरह ब्याहोपरांत तुम अच्छी तरह बिना चिंता के लाइफ एंज्वॉय कर सकोगे। पर यहाँ इश्तहार निर्माता और #बैंक_बिना_सोचे-समझे #उल्टी_सीख देने पर उतारू हैं ! 
                       
आए दिन टूटते परिवारों, बिगड़ते संबंधों, दरकते रिश्तों की ख़बरें पढ़ते-सुनते-देखते हुए मन बेचैन सा हो जाता है। पर जहां इस ओर परिवार, समाज व सरकारों को ध्यान देने की जरुरत है वहीँ कुछ संस्थाएं अपने  जरा से लाभ के लिए जाने-अनजाने इस किले में सेंध लगाने से नहीं चूकतीं ! इन दिनों #एक्सिस_बैंक का एक इश्तहार टी.वी. पर आ रहा है जिसमें एक माँ अपने अविवाहित बेटे को भविष्य में शादी के बाद घर में होने वाली पारिवारिक कलह का डर दिखा पहले ही अपना अलग घर लेने की सलाह देती है !  माँ होते हुए भी सिर्फ इसलिए 
क्योंकि अभी बैंक की होम-लोन पर ब्याज दरें  बहुत कम हैं ! सतही तौर पर एड ठीक लगता है; माँ-बेटे का प्यार भी जाहिर होता है; पर संदेश क्या है ? क्या माँ को अपने या अपने बेटे पर विश्वास नहीं है ? क्या वह अपने साम्राज्य में किसी और का दखल नहीं चाहती ? क्यों उसके दिमाग में सास-बहू के झगड़ों का डर बना हुआ है ? क्यों वह घर बसने से पहले उसे तोड़ना चाहती है ? आज जैसे परिवार टूट रहे हैं उसमें कमी लाने की बजाए ऐसे विचार तो आग में और घी का ही काम करेंगे ! 

एक्सिस बैंक अपने इस विज्ञापन को सकारात्मक नजरिये से भी बनवा सकता था ! इससे बैंक की बात और माँ की दूरदर्शिता दोनों परलक्षित हो जातीं। वह अपने बेटे को समझा सकती थी कि शादी के पहले अपने घर की बची हुई  किश्तों को चुका देना चाहिए क्योंकि ब्याज दरें बहुत कम हैं। इस तरह ब्याहोपरांत तुम अच्छी तरह बिना चिंता के लाइफ एंज्वॉय कर सकोगे। पर यहाँ इश्तहार निर्माता और बैंक बिना सोचे-समझे उलटी सीख देने पर उतारू हैं !

आजकल के माहौल में एकल परिवार के बढ़ते चलन, उसके परिणाम  अंजाम को देख जब अपने ददिहाल और ननिहाल के परिवारों की ओर नजर डालता हूँ तो किसी भी तरफ दूर-दूर तक कोई भी ऐसा कुटुंब नहीं दिखता जिसमें बड़े-बुजुर्गों का साथ न हो, उनका प्रेमल साया घर के सदस्यों पर ना हो। यहां तक कि मेरे दोस्त-मित्रों में भी कोई ऐसा नहीं है जिनके माता-पिता परिवार से अलग रहते हों; यदि घर का कोई सदस्य मजबूरीवश, रोजगार के सिलसिले में कहीं दूर भी चला गया है तब भी बड़ों का ख्याल रखने के लिए घर का कोई ना कोई सदस्य उनके साथ ही रहता है। ऐसे संयुक्त परिवारों से मिल, उनके साथ समय गुजार , पग-पग पर उनकी सलाह, उनके आशीर्वाद, उनकी ममता से सकून तो मिलता ही है साथ ही एक ,मानसिक संबल भी बना रहता है। हमें तो गर्व होना चाहिए अपनी संस्कृति पर, अपने संस्कारों पर, अपने ऋषि-मुनियों-गुरुओं पर जिन्होंने संयुक्त परिवार की महत्ता को समझते हुए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाई। रोजगार की मजबूरीवश घर के सदस्यों के बाहर जाने से तो रोका नहीं जा सकता पर सिर्फ अहम, संपत्ति या आपसी तालमेल ना बैठने के कारण लाचार वयोवृद्धों को उनके हाल पर छोड़ देना अत्यंत दुखद है। क्योंकि अपनी पारी खेल चुकी इस पीढ़ी के पास अपने अनुभवों की वह अनमोल संपत्ति है जो अपने खजाने से हमें हमारी जिंदगी में आने वाली हर मुश्किलों, हर अड़चनों, हर कठिनाइयों का सामना करने की राह और हौसला प्रदान करने की क्षमता रखती है। समाज को इनके अनुभवों की सदा सहायता लेनी चाहिए।   
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शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

रियलिटी शो (!) और बाबा रामदेव

मेरी सोच है कि जिस तरह आयोजकों ने रामदेव जी के हाथों में एक पाश्चात्य वाद्य यंत्र थमा कर चित्र को मुख्य आकर्षण बनाना चाहा है उससे बाबा जी की वर्षों की मेहनत से बनी उनकी छवि शायद निखरेगी तो नहीं ! उल्टा लोगों को और बातें बनाने का मौका मिल जाएगा। हम कितना भी कहें कि हमें किसी की परवाह नहीं पर कुछ बातों का कहीं ना कहीं, कुछ ना कुछ असर तो पड़ता ही है !!

देश-दुनिया में हरेक इंसान को अपनी मन-मर्जी से जीने का, काम करने का, व्यवसाय को आगे बढ़ाने का, अपने भले-बुरे को समझने का पूरा हक़ है। पर जब कोई इंसान समाज में ख़ास पद, ख़ास मुकाम या किसी क्षेत्र में ख़ास दर्जा हासिल कर लेता है तो उससे आम जनता की कुछ और अघोषित अपेक्षाएं जुड़ जाती हैं। ज्यादातर लोगों के मानस में नेता, अभिनेता, आध्यात्मिक गुरुओं, साधू-संत-महात्मा इत्यादि की एक छवि बनी हुई है उसी के अनुसार लोग उनसे एक आदर्श और उच्च आचरण की अपेक्षा रखते हैं। हालांकि इन दिनों हर छवि खुद को खंडित करने पर तुली हुई है फिर भी अपेक्षाएं पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई हैं। पर जब इन ख़ास लोगों को आम आदमी की तरह हरकतें करते पाया जाता है तो मन में अंदर ही अंदर ठेस तो लगती ही है, मोह-भंग भी हो जाता है। पता नहीं यह बात कुछ लोगों की समझ में क्यों नहीं आती जबकि उनके सामने इसके दुष्परिणामों के दसियों उदाहरण मौजूद होते हैं !!

इसी के तहत जो एक नाम जेहन में आता है वह है, बाबा रामदेव का। ढेरों विरोध, आरोपों व आलोचनाओं के बावजूद उनमें लोगों की आस्था और विश्वास बना हुआ है; यूँही उनके उत्पाद दिनों-दिन लोकप्रिय नहीं होते चले जा रहे हैं। पर कभी-कभी उनका प्रदर्शन के प्रति मोह दिलों में कहीं ना कहीं ठेस जरूर पहुंचा जाता है। कुछ दिनों "ॐ" का उच्चारण किया जाता हो: पर उसका स्तर किसी भी आम शो से ज्यादा नहीं है। हाँ यदि देश के अव्वल दर्जे के गायक, दिग्गज संगीतकार, निष्णात कलाकार इस आयोजन से जुड़े होते तो भी बात समझ में आती कि सचमुच भजन जैसी विधा को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जा रही है। पर लगता है कि सिर्फ विषय-वस्तु ही बदली गयी है बाकी सब कुछ जस का तस ही है।

पहले एक भौंडे हास्य मंच, जो द्विअर्थी संवादों और छिछले हास्य के लिए जाना जाता है, पर उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी और फूहड़ता से बच नहीं पाए थे। अभी फिर एक तथाकथित रियल्टी शो में उनका प्रमुख स्थान है। भले ही शो पर आयोजकों ने भक्ति की चाशनी चढ़ा दी हो, कोशिश कर के हिंदी शब्दों को प्रमुखता से बोला जाता हो, हर शुरुआत के पहले



आज जिस जगह पर रामदेव जी हैं वहां उन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं है। उन्हें यह समझना चाहिए कि उल्टी-सीधी किसी भी जगह पर जा कुछ भी करने से सिर्फ और सिर्फ उस आयोजन को आयोजित करने वालों को ही फ़ायदा होता है इनको तो नुक्सान के सिवा कुछ नहीं मिलने वाला ! किसी शो का हिस्सा बनने में भी कोई बुराई नहीं है पर उस मंच का एक स्तर होना चाहिए, उस विधा के लिए समर्पित कलाकारों की उपस्थिति होनी चाहिए। नाटकबाजी, फूहड़ता, दिखावे, नकली संवेदनाओं की जगह नहीं होनी चाहिए। आप एक जानी-मानी हस्ती हैं। करोड़ों लोगों की निगाहें आप पर लगी रहती है। लाखों की आस्था का आप केंद्र बिंदु है। कुछ ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे लोगों की आपके प्रति आस्था, विश्वास, आदर के साथ-साथ आपकी गरिमा में भी कमी आए।

ये मेरे अपने विचार हैं ! मेरी सोच है कि जिस तरह आयोजकों ने रामदेव जी के हाथों में एक पाश्चात्य वाद्य यंत्र थमा कर चित्र को मुख्य आकर्षण बनाना चाहा है उससे बाबा जी की वर्षों की मेहनत से बनी उनकी छवि शायद निखरेगी तो नहीं ! उल्टा लोगों को और बातें बनाने का मौका मिल जाएगा। हम कितना भी कहें कि हमें किसी की परवाह नहीं पर कुछ बातों का कहीं ना कहीं, कुछ ना कुछ असर तो पड़ता ही है !!
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मंगलवार, 29 अगस्त 2017

क्या सच्चे संतों और धर्मगुरुओं से लोगों का मोहभंग हो गया है ?

इन सब घटनाओं को देखते हुए यह प्रश्न मन में उठता है कि क्यों लोग सच्चे साधू-संतों से मार्ग-दर्शन लेने के बदले, उनके प्रवचन सुनने की बजाय इन ढोंगियों की चालों में फंस अपना सब कुछ लुटा बैठते हैं ? क्यों हमारे बड़े-बड़े संत, महात्मा, शंकराचार्य, धर्माधिकारी इस बाबत चुप्पी साध लेते हैं ? क्यों नहीं वे लोग आगे आ लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते ?
#हिन्दी_ब्लागिंग  

एक पारिवारिक शादी के कारण 25 अगस्त को पंचकुला में ही उपस्थिति थी। अब शादी-ब्याह का मुहूर्त तो महीनों पहले से ही तय हो जाता है उसी के अनुसार 22 शाम को पहुँच कर 25 सुबह की रवानगी थी। यह संयोग ही था कि गुरमीत राम रहीम जैसे ढोंगी को भी अपनी करनी का फल पच्चीस को ही मिलना तय हुआ । वहाँ रहने के दौरान वैसे तो सब सामान्य लग रहा था पर जिस तरह से आस-पास के गांव-देहात-कस्बों के लोग, धारा 144 लगे होने के बावजूद, ट्रेन, बस, ट्रैक्टर, गाडी या फिर पैदल ही, जैसे भी संभव था, हर रास्ते से छोटे-छोटे गुटों में आ रहे थे। हालाँकि न्यायालय के काफी पहले ही उन्हें रोक दिया गया था पर हजारों की तादाद में
पुरुष-महिलाओं के हुजूम ने, अपनी हर तरह की जरूरतों को नजरंदाज कर जिस तरह वहीँ सड़कों पर डेरा डाल दिया था,  उससे शहर निवासियों को आसन्न अनिष्ट की आशंका का आभास मिल रहा था, पुलिस की भारी तादाद के बावजूद ! कार्यक्रम के दौरान माहौल को भांपते हुए कुछ लोग  चौबीस की रात को  और  कुछ पच्चीस की सुबह मुंह-अँधेरे अपने-अपने साधनों से अपने घरों को लौट लिए थे। मेरे छोटे बेटे की ट्रेन सुबह करीब पौने सात की थी, उसी के हिसाब से निकले पर पाया कि स्टेशन पहुँचने के तमाम मार्ग सील कर दिए गए थे। हमारी रवानगी दोपहर की थी पर हालात देखते हुए उसे कैंसिल करवाना पड़ा। 

गुरमीत का फैसला अढ़ाई बजे आना था। पर वातावरण में पहले ही भारीपन आ चुका था। शाम होते-होते तो सारा शहर खौफ के धुंए में घिर गया, अराजकता पूरी तरह फ़ैल चुकी थी। इंटरनेट सेवा रोक दी गई थी। कालोनियों के बड़े गेट बंद कर दिए गए थे। लोग पुलिस की चेतावनी के बावजूद बिगड़ते माहौल को देखने के लिए अपने घरों की छतों पर चढ़े हुए थे। काफी मशक्क्त के बाद किसी तरह उपद्रव पर काबू पाया गया। 

कुछ देर बाद घर के पास का जायजा लिया तो साफ़ लगा कि यह सब जो हुआ या किया गया वह गांव-देहात के सीधे-साधे लोगों का नहीं, पेशेवरों का काम था।   हमारे  घर के पीछे के पार्क के पेड़ों की मजबूत डालियाँ काट कर
उनसे लाठियां बनाई गयी थीं। पैदल पथ पर लगी टायल्स को उखाड़ कर उनसे पत्थरबाजी की गयी थी। रेलिंगे उखाड दी गयी थीं। पुलिस द्वारा लगाई गयी कटीली तारों को भी हथियार बना लिया गया था। यह तो सिर्फ एक जगह का हाल था।  इस सब के क्यूँ-कैसे के बारे में तो अखबारें, टी.वी. चैनल बता ही रहे हैं ! पर यह सब सामने घटता देख, बरबस कुछ दिनों पहले आई  "नायक" फिल्म की याद आ जाती है। इन सब घटनाओं को देखते हुए यह प्रश्न मन में उठता है कि, भोले-भाले लोगों को अपने झांसे में फंसा करोड़ों इकठ्ठा करने वाले, धर्म के नाम पर गुमराह कर अपना घर भरने वाले, आम आदमी की भावनाओं से खेल उनका शोषण करने वाले, अपने आप को भगवान मनवाने वाले ढोंगियों की कैसे बन आती है ? क्यों लोग सच्चे साधू-संतों से मार्ग-दर्शन लेने के बदले, उनके प्रवचन सुनने की बजाय इन ढोंगियों की चालों में फंस अपना सब कुछ लुटा बैठते हैं ? क्यों हमारे बड़े-बड़े संत, महात्मा शंकराचार्य, धर्माधिकारी इस बाबत चुप्पी साध लेते हैं ? क्यों नहीं वे लोग आगे आ लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते ?

प्रशासन क्या नहीं कर सकता, इसका उदाहरण 28 अगस्त है, जिस दिन तथाकथित बाबे की सजा की अवधि निश्चित होनी थी, मजाल है किसी परिंदे ने कहीं भी बिना इजाजत पर मारा हो। पर घूम-फिर कर बात वहीँ आ जाती है कि कब हम जागरूक होंगे ? कब ढोंगी बाबाओं, चंट नेताओं, भ्रष्ट अफसरों को आईना दिखा पाएंगे ? कब हमें अपने अच्छे-बुरे की पहचान होगी ? कब हम दूसरों के बहकावे में आ अपना ही अहित करने से बचेंगे ? ऐसा करना या होना मुश्किल जरूर लगता है पर आज हर तरह से सशक्त, समर्थ, बाहुबली को उसकी सही जगह पहुंचाने में जिस तरह मुकदमे से जुडी दोनों महिलाओं ने हर मुसीबत, हर डर, हर धमकी को असहनीय तनाव झेलते हुए जैसा साहस दिखलाया है, उसका तो कोई सानी ही नहीं है  उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है। डेढ़ दशक कोई छोटा-मोटा समय नहीं होता। अच्छे-अच्छे मजबूत इरादे वाले धराशाई हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं।  

सोमवार, 21 अगस्त 2017

गैजेट्स पर निर्भरता हमें अपंग ना बना दे

सुबह की फ्लाइट के लिए रात दो बजे प्रवेश की हिदायत दी गयी थी। डेढ़ बजे रात 'कैब' का इंतजाम कर रवानगी करवा दी ।  उनके जाने के बाद शयन-शय्या पर पहुंचा ही था कि कुछ देर के लिए बिजली गायब हो गयी साथ ही कॉर्ड-लेस भी सेंस-लेस हो गया। बिजली आने पर कैब चालाक का फोन मिला कि आपका फोन नहीं लग रहा था इधर मेरे नेट बंद होने की वजह से मेरा जी.पी.एस. काम नहीं कर रहा है ! अब आप इंतजार करेंगे या गाडी छोड़ना चाहेंगे ?

आजकल "गैजेट्स" पर हमारी निर्भरता भविष्य में खतरनाक रूप ले सकती है। हम समझ नहीं पा रहे हैं पर धीरे-धीरे परवश होते चले जा रहे हैं। बहुत पहले "मैन्ड्रेक जादूगर कॉमिक्स" में एक कहानी थी जिसमें रोबॉट इंसान को अपने वश में कर गुलाम बना लेते हैं। मशीन इंसान पर पूरी तौर से हावी हो जाती है। इस पर शायद फिल्म भी बन चुकी है। प्राथमिक स्तर पर ऐसी कुछ घटनाओं की शुरुआत हो भी चुकी है। हालांकि नए गैजेट्स के अपार फायदे हैं पर इन्होंने ही कई बातों का भट्ठा भी बैठा दिया है। अबाल-वृद्ध सब उसके शिकंजे में कसते चले जा रहे हैं। याद कीजिए कुछ ही सालों पहले जब घर में स्थिर फोन हुआ करता था तो घर के प्रत्येक सदस्य को दस-पांच जरुरी नंबर तो याद रहते ही थे, आज कइयों को अपना नंबर ही याद नहीं रहता क्योंकि इसकी जिम्मेवारी चलित फोन ने ले ली है और जब किसी कारणवश उसकी यादाश्त लुप्त हो जाती है तो कैसी परिस्थिति सामने आती है वही बताने जा रहा हूँ।                  

अभी दो दिन पहले पंजाब निवासी मेरे मामाजी ने अपनी बेटी के पास नार्वे जाने की खबर मुझे दी। उड़ान सुबह पांच बजे की थी। कुछ समय मेरे साथ बिताने के लिए वे अपने पुत्र के साथ एक दिन पहले दिल्ली आ गए। मैं उन्हें लेने नई दिल्ली स्टेशन गया था, पर कुछ हुआ और उनका फोन लगना बंद हो गया, स्थिति अपंगता सी हो गयी। घर फोन कर उनसे बात करने को कहा, वह फोन भी ना लगे ! फिर बेटे राम को कॉन्टेक्ट करने को कहा, फिर किसी तरह संचार विभाग की मेहरबानी से संपर्क हुआ और उन्हें ले मैं घर पहुंचा। 

सुबह की फ्लाइट के लिए रात दो बजे प्रवेश की हिदायत दी गयी थी। डेढ़ बजे रात 'कैब' का इंतजाम कर रवानगी करवा दी गयी।  उनके जाने के बाद शयन-शय्या पर पहुंचा ही था कि कुछ देर के लिए बिजली गायब हो गयी साथ ही कॉर्ड-लेस भी सेंस-लेस हो गया। बिजली आने पर कैब चालाक का फोन मिला कि आपका फोन नहीं लग रहा था इधर मेरे नेट बंद होने की वजह से मेरा जी.पी.एस. काम नहीं कर रहा है ! अब आप इंतजार करेंगे या
गाडी छोड़ना चाहेंगे ? मेरे पूछने पर कि क्या उसे रास्ता नहीं पता ? तो उसने बताया कि वह गाजियाबाद में काम करता है इधर के मार्गों की उसे जानकारी नहीं है। मैंने उसे धौला कुआं का रास्ता बताया तो उसने अपनी पोजीशन पंखा रोड की बताई क्योंकि "उसकी गाइड" ने बंद होने के पहले द्वारका का रास्ता सुझाया था। कार सवार दोनों रास्ते से अंजान, रात के दो बजे कोई कुत्ता तक सड़क पर नजर नहीं आ रहा था, नाहीं कोई पुलिस बूथ, समय निकलता जा रहा था। ऐसे में मुझे यही सूझा कि गाडी निकाल खुद ही चला जाए "रेस्क्यू आप्रेशन" पर। जल्दी-जल्दी चालाक को जहां है वहीँ रुकने को कहा और रात्रि-विहार पर निकला ही था कि उसका फोन आ गया कि नेट शुरू हो गया है। सुन कर सर से तनाव दूर हुआ राहत की सांस ली और वापस घर आ बिस्तर पर जा गिरा। तीन बजते-बजते उन लोगों के पोर्ट पहुँच जाने की खबर भी मिल गयी। तब सोना हो पाया।

बात छोटी सी ही थी यह भी कहा जा सकता है कि आधुनिक टेक्निक के कारण ही बात बन सकी पर यह घटना हमारी, दिन पर दिन  मशीनों पर निर्भर होती जाती, जिंदगी को भविष्य का आइना भी दिखा रही है !!
#हिन्दी_ब्लागिंग   

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