शनिवार, 12 नवंबर 2016

"उनका" किफायती धन !

मेरे मित्र ठाकुर जी ने अपनी पत्नी को कहा कि यदि  तुम्हारे पास कुछ 500-1000 के नोट पड़े हैं तो दे दो उन्हें बदलवा लेते हैं। पत्नी भी राजी हो गयीं पर जब उन्होंने अपनी जमा-पूँजी ठाकुर जी के सामने रखी तो वे बेहोश होते-होते बचे, उनके सामने पूरे तीन लाख रुपये पड़े थे, जो उनकी ठकुराइन ने अपने कला-कौशल से इकट्ठा किए थे   

मनुष्य के प्रादुर्भाव के बाद समय के साथ-साथ उसके खान-पान, रहन-सहन सबमें बदलाव आता चला गया। जिंदगी में स्थायित्व आया। जिम्मेदारी का एहसास जगा। घर, परिवार बना जिसमे भरण-पोषण-उपार्जन का जिम्मा पुरुष के कंधों पर आया और नारी ने घर की जिम्मेदारी संभाल ली। यही वह समय होगा जब अधिकतम नारियों को पुरुषों का आश्रित होना पड़ा होगा, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए उसका मुंह जोहना पड़ता होगा, अति आवश्यक जरुरत को पैसे के अभाव के कारण पूरा न कर पाने पर जन्मी होगी असुरक्षा और संबल पाने की भावना। ऐसी स्थितियों से पार पाने के लिए महिलाओं ने घर खर्च से बचे या घर खर्च में कुछ कटौती कर, घर वालों की नज़र से बचा कर, कुछ न कुछ संचय करना शुरू कर दिया होगा। पर इसमें भी उसका कोई अपना स्वार्थ या हित नहीं था। यह सब उसका किसी अनचाही और कठिन घडी में परिवार को उबारने के लिए उठाया गया कदम भर था। पर पता नहीं ऐसी तरकीब सारी भारतीय माताओं और पत्नियों को एक साथ कैसे सूझी, जो समय के साथ-साथ उनमें एक आदत में तब्दील होती चली गयी !! अक्सर यह जमा-पूंजी संचयकर्ता की हैसियत को देखते हुए हैरत-अंगेज आंकड़ों में तब्दील होते पाई गयी है।  

आज सरकार के एक कठोर निर्णय की वजह से पूरे देश में अफरा-तफरी मची हुई है। सर्वोच्च कीमत वाले नोटों को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाईं जा रही हैं। हर कोई बिना नुक्सान के अपने धन को सुरक्षित करना चाहता है और कर भी रहा है। हमारे हर घर में पुरुषों को "आभास" रहता है कि घर की किसी अनजान जगह में, कहीं न कहीं, कुछ ना कुछ नोटों की शक्ल में जरूर पड़ा हुआ है। इसे कोई अन्यथा लेता भी नहीं है। उसी आभास के तहत सहज भाव से अभी दो दिन पहले मेरे मित्र ठाकुर जी ने अपनी पत्नी को कहा कि यदि  तुम्हारे पास कुछ 500-1000 के नोट पड़े हैं तो दे दो उन्हें बदलवा लेते हैं। पत्नी भी राजी हो गयीं पर जब उन्होंने अपनी जमा-पूँजी ठाकुर जी के सामने रखी तो वे बेहोश होते-होते बचे, उनके सामने पूरे तीन लाख रुपये पड़े थे, जो उनकी ठकुराइन ने अपने कला-कौशल से इकट्ठा किए थे।    

सब जगह हड़कंप तो मचा ही है पर उससे ज्यादा बड़ा झंझावात तो ऐसी गृहणियों के मनों में छाया हुआ है जिन्होंने पता नहीं कितनी किफ़ायत कर-कर के, कितनी बार अपनी इच्छाओं को दबा कर, कितनी बार अपनी जरूरतों को किनारे कर परिवार के भविष्य के लिए कुछ न कुछ जमा-जुगाड़ कर रखा है। आज की परिस्थिति में उनको समझ ही नहीं आ रहा है कि अपने पास की "उस तरह" की जमा राशि को वे कैसे बचाएं ! किस की सलाह लें! यदि वे किसी को नहीं बताती हैं तो सारी पूँजी के सिफर हो जाने का खतरा है और बताने पर पोल खुल जाती है और रहस्य उजागर हो जाता है। अभी तो खैर सारा पैसा बैंक में जमा हो जाएगा पर सब को पता चल जाने की वजह से वह "आम संपत्ति" हो जाएगी, जिसे जो चाहेगा, जब चाहेगा, थोड़ा-थोड़ा ले-मांग कर सिफर तक पहुंचा देगा। क्या करें क्या ना करें उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा और इस बारे में तो उनकी सहायता नाहीं मोदी जी कर पाएंगे नाहीं जेटली जी !!!!
आपके पास कोई राह, कोई उपाय, कोई युक्ति है क्या ?                              

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

मेजबानी जुकाम की

फिर वही हुआ जो होना लाज़िमी था, एक दिन घर लौटते ही छींकों की लड़ी ने आँख-नाक के सारे रास्ते खोल दिए, शरीर की टंकी में जमा पानी ऐसे बहने लगा जैसे किसी वाशर के खराब हो जाने पर नल से पानी टपकता रहता है  

पिछले दिनों दिल्ली अपने पर्यावरण के कारण काफी चर्चा में रही थी। सही कहें तो उसने दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर होने का खिताब पाते ही, "बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ" वाले मुहावरे को सही सिद्ध कर दिया। वर्षों-वर्ष बीत गए, चाहे  कहीं भी रहूं, मुझ पर बदलता मौसम कभी भी अपना असर नहीं डाल पाया। ऐसा नहीं है कि कभी सर्दी-जुकाम हुआ ही ना हो पर बदलता मौसम कभी परेशान नहीं कर पाया। पर इस बार उसकी जीत हो ही गयी।   

यूं तो दिल्ली का वातावरण, बरसात के कुछ दिनों को छोड़ सदा प्रदूषित ही रहता है। यहां के वाशिंदे इसके साथ रहने के, मजबूरीवश ही सही, आदी हो गए हैं। उनकी इसी आदत का फायदा यहां का प्रशासन और प्रशासक दोनों उठाते रहे हैं। इस बार अक्टुबर के खत्म होते-होते शाम के समय ठंड की पदचाप सुनाई देने लगी थी।दिल्ली और आस-पास के इलाके धूएं, धूल और कोहरे की कोठरी में सिमटने लग गए थे। दिवाली की रात के बाद जब लोग सुबह अलसाए से उठे तो पाया कि सारा शहर उस कोठरी के दम-घोंटू माहौल के बदले "स्मॉग" के गहरे, मोटे, अपारदर्शी जान-लेवा गैस-चैंबर में कैद हुआ पड़ा है। पहले दिवाली के एक-दो दिन बाद मौसम में बदलाव आ जाता था पर इस बार जैसे यह स्थाई हो कर रह गया था। आँखों में जलन, गले में खराश, सीने में घुटन, सर्दी-जुकाम-खांसी से लोग परेशान हो गए। मरीजों की अस्पतालों में लाइनें लग गयीं। स्कूल बंद कर
दिए गए। अस्वस्थ, बुजुर्गों को घर में ही रहने की सलाह दी गयी। एक अघोषित आपातकाल सा लागू हो गया।

हर तरह के लाभ-हानि, सलाह-उपदेश, जोड़-घटाव के बावजूद मुझसे कभी सुबह की सैर का आंनद स्थाई तौर पर नहीं लिया जा सका। इसीलिए शाम के समय मैंने घूमने की आदत बना रखी थी जो इन दिनों भी जारी थी। इधर सूरज ढलते ही पार्कों में धूएं-धूल की मोटी परत का शामियाना तनने लग गया था। उसके संभावित खतरे के अंदेशे-अंदाजे के होने-लगने के बावजूद बाहर निकलना जारी रहा। फिर वही हुआ जो होना लाज़िमी था, एक दिन घर लौटते ही छींकों की लड़ी ने आँख-नाक के सारे रास्ते खोल दिए, शरीर की टंकी में जमा पानी ऐसे बहने लगा जैसे किसी वाशर के खराब हो जाने पर नल से पानी टपकता रहता है। अब रूमालों की जरुरत और नाक की हालत का हाल मत ही पूछिएगा !            

जुकाम को कोई बिमारी ही नहीं मानता। पर जिसे जकड़ता है उसकी ऐसी की तैसी कर डालता है। पहले कहा जाता था कि इसके होने पर यदि डाक्टर के पास जायें तो यह तीन दिन में ठीक हो जाता है पर यदि कुछ ना भी करें तो यह अपने-आप 72 घंटे में ठीक हो जाता है। पर आजकल यह भी थोड़ा "ढीठ" हो गया है और अब कम से कम पांच दिन का अनचाहा मेहमान तो बन ही जाता है। तो इस अतिथि को पांच दिनों बाद विदा कर अब चैन की सांस ली है।   

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

मैं #छत्तीसगढ हूं

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज सँभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है 

मैं #छत्तीसगढ हूं। आज एक नवम्बर है मेरा जन्मदिन। सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयों से अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को मेरा जन्म-दिन याद रहता है
यह मेरा सौभाग्य है। यह मेरा सोलहवां साल है, सपनों का साल, बाल्यावस्था से किशोरावस्था में पदार्पण करने का साल। कुछ कर गुजरने का साल, सपनों को हकीकत में बदलने के लिए जमीन तैयार करने का साल।   

आप को भी याद ही होगा जब मुझे मध्य प्रदेश से अलग अपनी पहचान मिली थी तो  देश के दूसरे भाग में रहने वाले लोगों को मेरे बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, उनमें मुझे लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां पनपी हुई थीं, लोग मुझे एक पिछडा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते थे । इस धारणा को बदलने में समय तो लगा, मेहनत करनी पड़ी, जितने भी साधन उपलब्ध थे उनका उचित प्रयोग किया गया, धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी जिसका उल्लेख यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों की जुबानी देशवासियों में होने लगा। लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका
मिला तो उनकी आंखें खुली की खुली रह गयीं उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद मैं इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।

वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्न-गर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया।

कालांतर से मेरा नाम बदलता रहा, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-
अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का। है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्र्ंश है। आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी राजधानी "रायपुर" से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढती लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी शुरू हो चुका है, जो पूर्ण होने के बाद देश के सबसे सुन्दर और अग्रणी  शहरों में शुमार हो जाएगा। अभी की राजधानी रायपुर से करीब बीस की. मी. की दूरी पर यह मलेशिया के "हाई-टेक" शहर पुत्रजया की तरह निर्माणाधीन है। जिसके पूर्ण होने पर मैं गांधीनगर, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की श्रेणी में शामिल हो जाऊंगा।

एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम से ओत-प्रोत मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे  आदर्श प्रदेश के  रूप में जाना जाऊं,  जो देश के किसी भी कोने से आने वाले
 देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूं ही उन्हें #छत्तीसगढिया #सबसे #बढिया का खिताब हासिल नहीं हुआ है।

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज
सँभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है।

मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।

जय हिंद
जय छत्तीसगढ़ 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

बंटती थीं खुशियां दिवाली पर

माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था    
      
जब भी कोई त्योहार आता है तब-तब उससे जुडी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। अभी दो-एक दिन के बाद दीपावली आ रही है इसके साथ ही उससे जुडी दशकों पहले की बचपन की यादों ने ताजा-तरीन हो महकना शुरू कर दिया है। जो सबसे पुरानी बातें याद आ रही है वह शायद पचास एक साल पहले की हैं।

बाबूजी (मेरे पिताजी) तब के कलकत्ता के पास एक उपनगर, कोन्नगर, की एक जूट मिल में कार्यरत थे। मिल के स्टाफ में हर प्रांत के लोग थे, मारवाड़ी, पंजाबी, मराठी, बंगाली, बिहारी, ओड़िया, मद्रासी (तब भारत के दक्षिण हिस्से से आने वाले को सिर्फ मद्रासी ही समझा और कहा जाता था) भाषा-रिवाज अलग होने के बावजूद किसी में कोई भेद-भाव नहीं था। कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई जाति-भेद नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। मुख्य त्योहार होली और दिवाली ऐसे मनाए जाते थे जैसे एक ही परिवार उन्हें मना रहा हो।  

हमारे परिसर में तीन बंगले थे, जिनमें हमारे अलावा दो गुजराती परिवार थे। मैं उन्हीं के परिवार का अंग बन गया था इसीलिए मेरा पहला अक्षर ज्ञान गुजराती भाषा से ही शुरू हुआ था। बाकी के स्टाफ के लिए कुछ दूरी पर क्वार्टर बने हुए थे, दोनों रिहायशों के बीच बड़ा सा मैदान था, जो खेल-कूद के साथ-साथ पूजा वगैरह और त्योहारों की गतिविधियों के काम भी आता था। दिवाली के पहले धनतेरस को ही कलकत्ता से मिठाई और ढेर
सी, बड़ा सा टोकरा भर कर, आतिशबाजी मेरे लिए आ जाती थी। वैसे  कहने को सारे पटाखे-फुलझड़ियाँ इत्यादि मेरे लिए ही होते थे, पर माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था। आज भी किसी को कुछ देकर मिलने वाली ख़ुशी पाने की आदत के बीज शायद बचपन से ही पड़ गए थे। इस में मेरे बाबूजी का बहुत बड़ा योगदान था। मैंने जब से होश संभाला तब से ही उन्हें दूसरों के लिए कुछ न कुछ करते ही पाया,  वह भी चुपचाप बिना किसी तरह का एहसान जताए। खुद सादगी और किफायती रहने के बावजूद अपने माता-पिता और चार भाई-बहनों को कभी कोई अभाव महसूस नहीं होने दिया। वे भी उन्हें सदा पिता समान मानते रहे। वैसे भी परिवार के सदस्य हों या फिर दोस्त, मित्र या जान-पहचान वाले, कोई भी कभी भी उनके पास से खाली हाथ नहीं गया था। इसके साथ ही एक और
खासियत, जिसने मेरे गहरी छाप छोड़ी वह थी उनकी ईमानदारी, जिस पोस्ट पर वह थे वहां पर ईमान डगमगाने के अनेक बहाने और अवसर  आते रहते थे पर उनका मन कभी भी नहीं डोला, दो-तीन वाकये तो मेरे सामने ही घटित हुए जिन्हें मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ। उनको यह संस्कार मेरी दादी जी यानी उनकी माँ से मिले थे जिन्होंने अंग्रेजों की खिलाफत करते हुए जेल में अपनी आँखें गवां दी थीं पर एवज में सरकार से कभी कुछ नहीं चाहा।  बात कहाँ की थी कहाँ पहुँच गयी। पर आज जब लोगों को सिर्फ मैं, मेरा, मेरे, करते पाता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या वैसे लोग भी थे, जो सिर्फ दूसरों का सोचते थे ! यदि वे बिल्कुल मेरे ना होते तो शायद विश्वास भी ना होता ऐसी बातों पर !!

चलिए लौटते हैं वर्तमान में क्योंकि रहना तो इसीमें है ! शुभ पर्व दिवाली की आप सभी मित्रों,  अजीजों को सपरिवार शुभकामनाएं। 

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

दिल्ली की गलियां, एक अजूबा

आडी-टेढ़ी, लंबी-चौड़ी, छोटी-मोटी, जानी-अंजानी गलियों से घिरा बाजार। गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। अंतहीन गलियां, गलियों का मकड़जाल। उन्हीं गलियों में अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां

भले ही नई दिल्ली में सब कुछ मिलने लगा हो, दरों में भी पुरानी दिल्ली के थोक बाजार से ज्यादा फर्क ना हो फिर भी अधिकांश खासकर एक पीढ़ी पहले के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पुरानी दिल्ली का
रुख जरूर करते हैं, खासकर तीज-त्योहार के मौसम में। भीड़-भाड़, तंग रास्तों, समय की खपत के बावजूद वहां से सामान लाने पर एक अजीब सा संतोष और सुख सा महसूस किया जाता है।   

पुरानी दिल्ली का बाजार यानी की चाँदनी चौक ! सतरहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट शाहजहां द्वारा बसाया गया, देश के सबसे पुराने थोक बाज़ारों में से एक। चांदनी चौक नामकरण के पीछे दो मत हैं, पहले लाल किले के लाहौरी गेट से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक एक नहर हुआ करती थी जिसका का पानी रात के समय चाँद की रौशनी से जगमगा उठता था इसीलिए इसका नाम चांदनी चौक पड़ा दूसरा यह कि यह बाजार अपने चांदी के व्यवसाय के कारण प्रसिद्ध था, वही चांदी धीरे-धीरे बदल कर चांदनी हो गयी।  

आडी-टेढ़ी, लंबी-चौड़ी, छोटी-मोटी, जानी-अंजानी गलियों से घिरा बाजार। गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। अंतहीन गलियां, गलियों का मकड़जाल। उन्हीं गलियों में अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां। वक्त की आंधी ने चाहे कितना कुछ बदल कर रख दिया हो पर अभी भी दिल्ली की गलियों में कूचा और कटरा जैसे जगहों के नाम जीवित हैं !    

हर गली का अजूबा सा नाम, अपना इतिहास, अपनी पहचान, अपनी खासियत। हर गली पटी पड़ी तरह-तरह
की छोटी-बड़ी दुकानों से। चलाते आ रहे हैं लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने व्यवसाय को एक ही जगह पर। दुकानों में कोई बहुत ज्यादा बदलाव भी नहीं आया है सिवाय पीढ़ी के साथ बदलते काम संभालने वालों के व्यवहार में। दिल्ली के बाहर से आने वाले की तो छोड़ें खुद दिल्ली वाले भटक जाते हैं इन कुंज गलियों में। लखनऊ का भूल-भुलैया भी इनके सामने पनाह मांग ले। तीज-त्योहार तो छोड़ ही दें आम दिनों में भी कंधे से कंधा भिड़े बिना यहां चलना मुश्किल होता है। तिस पर उसी में सायकिल भी, रिक्शा भी, ठेला भी, स्कूटर और मोटर सायकिल भी पर सब अपने-अपने इत्मीनान में ! 

कुछ तो है यहां, इसका सम्मोहन, इसकी ऐतिहासिकता, इसका अपनापन, इसकी आत्मीयता जो लाख अड़चनों, कमियों, मुश्किलों के बावजूद लोगों को अपने से जुदा नहीं होने देता ! 

जौक़ यूं ही तो नहीं फर्मा  गए होंगे,   

इन दिनों गरचे दक्खन मैं हैं बड़ी क़द्र ऐय सुखन, 
कौन जाये ज़ौक़ पर दिल्ली की गलियां छोड़ कर।   

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

#करवा_चौथ, चश्मा बदलने की जरुरत है

करवा चौथ के व्रत की  हर कहानी में एक बात प्रमुखता से दिखलाई पड़ती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, दृढ प्रतिज्ञ, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने का साहस रखने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है 

#करवा_चौथ, हिंदू विवाहित महिलाओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार। जिसमें पत्नियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए दिन भर कठोर उपवास रखती हैं। यह खासकर उत्तर भारत में खासा लोकप्रिय पर्व है, वर्षों से मनता और मनाया जाता हुआ पति-पत्नी के रिश्तों के प्रेम के प्रतीक का एक त्योहार। सीधे-साधे तरीके से बिना किसी ताम-
झाम के, बिना कुछ या जरा सा खर्च किए, सादगी से मिल-जुल कर मनाया जाने वाला एक छोटा सा उत्सव।

इसकी शुरुआत को पौराणिक काल से जोड़ा जाता रहा है। इसको लेकर कुछ कथाएं भी प्रचलित हैं। जिसमें सबसे लोकप्रिय रानी वीरांवती की कथा है जिसे पंडित लोग व्रती स्त्रियों को सुनवा, संध्या समय  जल ग्रहण करवाते हैं। इस गल्प में सात भाइयों की लाडली बहन वीरांवती का उल्लेख है जिसको कठोर व्रत से कष्ट होता देख भाई उसे धोखे से भोजन करवा देते हैं जिससे उसके पति पर विपत्ति आ जाती है और वह माता गौरी की कृपा से फिर उसे सकुशल वापस पा लेती है।
महाभारत में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है जब द्रौपदी पांडवों की मुसीबत दूर करने के लिए शिव-पार्वती के मार्ग-दर्शन में इस व्रत को कर पांडवों को मुश्किल से निकाल चिंता मुक्त करवाती है। 
कहीं-कहीं सत्यवान और सावित्री की कथा में भी इस व्रत को सावित्री द्वारा संपंन्न होते कहा गया है जिससे प्रभावित हो यमराज सत्यवान को प्राणदान करते हैं।
ऐसी ही एक और कथा करवा नामक स्त्री की  भी है जिसका पति नहाते वक्त नदी में घड़ियाल का शिकार हो जाता है और बहादुर करवा घड़ियाल को यमराज के द्वार में ले जाकर दंड दिलवाती है और अपनें पति को वापस पाती है।

कहानी चाहे जब की हो और जैसी भी हो हर कहानी में एक बात प्रमुखता से दिखलाई पड़ती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है।उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है। हाँ इस बात को कुछ अतिरेक के साथ जरूर बयान किया गया है। वैसे भी यह व्रत - त्योहार  प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी।पर आज इसे  कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा पिछडे तथा दकियानूसी त्योहार की संज्ञा दे दी गयी है।  

पर आज कल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज
द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। यह तो  इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं।उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को पाटने के बजाए और गहरा करने में सहायक होते हैं। वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है ! आज समय बदल गया है, पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गयी हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव ख़त्म नहीं हुए हैं।

पर आज सोची-समझी साजिशों के तहत हमारे हर त्योहार, उत्सव, प्रथा को रूढ़िवादी, अंधविश्वास, पुरातनपंथी, दकियानूसी कह कर ख़त्म करने की कोशिशें हो रही हैं। रही सही कसर पूरी करने को "बाजार" उतारू है जिसने इस मासूम से त्यौहार को भी एक फैशन का रूप देने के लिए कमर कस ली है। आज समय की जरुरत है कि हम अपने ऋषि-मुनियों, गुणी जनों द्वारा दी गयी सीखों  उपदेशों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही न जाने उसमें छिपे गूढार्थ को समझने की कोशिश भी करें।

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर पहला "कैथेड्रल" कलकत्ता में बना था

कोलकाता के ह्रदय-स्थल एस्पलेनैड या धर्मतल्ला या चौरंगी से एक डेढ़ की.मी., पैदल 10-15 मिनट की दूरी पर, बिड़ला-प्लेनेटोरियम, विक्टोरिया मेमोरियल, नंदन, रविन्द्र सदन थियेटर, फोर्ट विलियम, गुड़िया घर, रेस कोर्स, गंगा का किनारा बाबू घाट जैसे  स्थलों के बीच खड़ा, यह करीब पौने दो सौ साल पुराना, कैथ्रेडल आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है

कई बातों में पहला स्थान रखने वाले महलों के शहर कलकत्ता (आज का कोलकाता) में ही सर्वप्रथम क्रिश्चियन समुदाय द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर 1847 में पहले "कैथेड्रल" की स्थापना की गयी थी। जिसे "सेंट पॉल कैथेड्रल" के नाम से जाना जाता है। गोथिक शैली में बनी इस इमारत के निर्माण में करीब आठ साल लगे थे। यह बंगाल का सबसे बड़ा कैथेड्रल तो था ही बिशप द्वारा संचालित एशिया का पहला चर्च भी था जिसे भारत में बढ़ते क्रिश्चियन समुदाय को मद्देनज़र रख, इसी जगह स्थित छोटे आकार के सेंट जॉन चर्च को हटा, बनाया गया था।


चर्च और कैथ्रेडल में यही अंतर है कि कैथ्रेडल आकार में बहुत बड़ा होता है और बिशप द्वारा संचालित किया जाता है। बिशप का निवास भी ज्यादातर वहीँ होता है। वहीँ चर्च पादरी की देख-रेख में अपना काम करता है। भारत का सबसे पुराना चर्च, "सेंट थॉमस सायरो मालाबार कैथोलिक चर्च" है, जो केरल के त्रिचूर जिले के पालायूर इलाके में स्थित है। इसका निर्माण 52 AD के आस-पास का माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहीं से धर्म परिवर्तन की शुरुआत भी हुई थी। 
   
सेंट पॉल कैथेड्रल की सुंदर इमारत कलकत्ता के इकलौते हरे-भरे स्थल "मैदान" के दक्षिणी और विश्वप्रसिद्ध "विक्टोरिया मेमोरियल" की पूर्वी दिशा की तरफ स्थित है। इसी के कारण इसके सामने वाली सड़क का नाम भी कैथेड्रल रोड रखा  गया है। करीब सात एकड़ में बने इस कैथ्रेडल में हजार लोग एक साथ खड़े हो प्रार्थना कर सकते हैं। कोलकाता के ह्रदय-स्थल एस्पलेनैड या धर्मतल्ला या चौरंगी से एक डेढ़ की.मी., पैदल 10-15 मिनट की दूरी पर, बिड़ला-प्लेनेटोरियम, विक्टोरिया मेमोरियल, नंदन, रविन्द्र सदन थियेटर, फोर्ट विलियम, गुड़िया घर, रेस कोर्स, गंगा का किनारा बाबू घाट जैसे  स्थलों के बीच खड़ा, यह करीब पौने दो सौ साल पुराना, कैथ्रेडल आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 

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