गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

सत्ता की भूख ने उघाड़े चेहरे

कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी, "जमीन", जो हाईजैक हुए हवाई जहाज के यात्रियों को बचाने के प्रयास पर फिल्माई गयी थी।  उसमें एक बड़बोले नेता का चरित्र रचा गया था, जिसे जब कमांडो ऑपरेशन में सम्मिलित होने को कहा जाता है तो उसकी धोती ढीली हो जाती है। क्यों नहीं ऐसे प्रमाण-इच्छुक लोगों को भविष्य में होने वाले किसी "सफाई अभियान" में जबरन शामिल कर उन्हें वातानुकूलित कमरे और प्राकृतिक सरहद का भेद समझा दिया जाए  


अभी तक कुछ गिने-चुने ऐसे संस्थान बचे हुए हैं जिनका क्रिया-कलाप तथा दामन, इक्की-दुक्की घटनाओं के बावजूद पाक-साफ़ माना जाता है।       देश की जनता का जिन पर अटूट विश्वास और  श्रद्धा है।    इनमें हमारे वैज्ञानिक, न्यायालय तथा फ़ौज सर्वोपरि हैं। ऐसी धारणा है कि इनका हर कदम देश हित के लिए ही उठता है।पर इन दिनों सत्ता के लोभियों ने  जनता  के विश्वास    को डांवाडोल कर दिया है। अपने छुद्र स्वार्थ,   ओछी- राजनीति, तथा आकाओं की नज़र में बने रहने के लिए ऐसे लोग, जिनका अपना ना कोई आधार होता है नाही कोई पहचान, अपनी कमियों, अपनी खामियों को ढकने के लिए दूसरे दल   के हर   कदम या फैसले को गलत साबित करने के लिए किसी भी हद  तक चले जाते हैं। ऐसे मंदबुद्धि लोग जिसके इशारे पर ऐसा करते हैं उसको कोई कुछ नहीं कहता क्योंकि वह तो परोक्ष में बैठा है, लानत-मलानत इन छुट्भइयों की होती है मजे की बात यह है कि इनका दल भी इनके व्यक्तव्य को इनकी निजी राय बता पल्ला झाड़ लेता है और ये मुंह बाए बगलें झांकते रह जाते हैं।

अभी हुई हमारी सेना की कार्यवाही भी इन मूढ़मतियों के बयानों के दायरे में आ गयी। आश्चर्य होता है कि हमने कैसे-कैसे लोगों को कैसी-कैसी जिम्मेदारियां सौंप अपनी और देश की बागडोर थमा दी है, जिन्हें संभालना तो दूर वे तो उसका नाम लेने लायक भी नहीं हैं ! उन्हें समझ ही नहीं है कि वे क्या बोल, कर या चाह रहे हैं ! ना उन्हें, ना उनको उकसाने वालों को अंदाजा है कि उनकी नासमझी संसार में हमारी क्या तस्वीर पेश करेगी !  उनके ऐसे अमर्यादित बयानों से सेना के जवानों पर क्या असर पडेगा ! वह तो शुक्र है कि हमारी सेना इतनी संयमित और समझदार है कि वह ढपोरशंखों की आवाज और उनकी मंशा समझती है। पर आज यह जरूरी हो गया है कि ऐसे तिकडमी लोगों की नकेल ऐसे कसी जाए जिससे ये लोग न्यायालय की अवहेलना या फ़ौज की शूरवीरता पर सवाल उठाने की जुर्रत ही न कर पाएं।  

ऐसे माहौल में किसी फिल्म की बात करना मौके की गंभीरता को कम करना लग सकता है पर यह बात सामयिक है। कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी, "जमीन", जो हाईजैक हुए हवाई जहाज के यात्रियों को बचाने के प्रयास पर फिल्माई गयी थी। फिल्म कैसी थी, अच्छी थी, बुरी थी, मुद्दा यह नहीं है, बात यह है कि उसमें भी एक ऐसे ही बड़बोले नेता का चरित्र रचा गया था, जिसे जब कमांडो ऑपरेशन में सम्मिलित होने को कहा जाता है तो उसकी धोती ढीली हो जाती है। क्यों नहीं ऐसे प्रमाण-इच्छुक लोगों को भविष्य में होने वाले किसी "सफाई अभियान" में जबरन शामिल कर उन्हें वातानुकूलित कमरे और प्राकृतिक सरहद का भेद समझा दिया जाए। 

शनिवार, 17 सितंबर 2016

प्रतिमा का अनादर न हो

आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को इस आस्था व मान्यता के साथ स्थापित करता है जैसे कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं। इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता।  उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि प्रेम भाव से उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है  

हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, निश्चित अवधि के बाद विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना एक तरह का चलन हो गया है या फिर परिपाटी चली आ  रही है या फिर शुद्ध धन कमाने का जरिया बन  गया है।  

हमारे यहां वर्षों से अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती रही है। पर सबसे ज्यादा ख्याति बंगाल की दुर्गा पूजा की और महाराष्ट्र के गणपति पूजन की ही रही है। पहले देश के
किसी भी क्षेत्र का रहवासी वहीँ बने रह कर अपना जीवन व्यतीत कर देता था। बहुत कम लोग रोजगार  अपना इलाका छोड़ते थे। पर समय के साथ जब रोजगार के अवसर बढे तो जीवन-यापन, काम-धंधे के लिए विभिन्न क्षेत्रों के लोग देश के अन्य हिस्सों में जा वहाँ के लोगों के साथ अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाज, अपने तीज-त्यौहारों के साथ घुल-मिल गए। धीरे-धीरे माँ दुर्गा की पूजा, गणपति बप्पा की आराधना, राम लीला, दही मटकी लूट, कांवर यात्रा, गरबा नृत्य इत्यादि अपने-अपने क्षेत्र से निकल आए, सारी हदें ख़त्म हो गयीं। हर त्यौहार हरेक का हो सारे देश में सार्वजनिक तौर पर मनाया जाने लगा। देश के उत्सव-प्रिय लोगों को
ऐसे धार्मिक मनोरंजन खूब रास आने लगे। लोगों की भीड़ बेतहाशा बढ़ने लगी। ज्यादा भीड़, ज्यादा आमदनी। लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए
प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी। पैसे के लालच ने एक ही इलाके में दसियों पंडालों को खड़ा कर दिया। मेले-ठेलों की भरमार हो गयी। स्पर्द्धा ने आयोजनों को भव्य बनाने की होड़ मचा दी। लोगों को आकर्षित करने के नए-नए रास्ते अपनाए जाने लगे। प्रतिमाएं गौण हो गयीं, पंडालों और अन्य विधाओं पर करोड़ों खर्च होने लगे। आकर्षण बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े कलाकारों को जिनकी फीस ही करोड़ों में होती है, बुलाया जाने लगा। अध्यक्ष पद के लिए रसूखदार लोगों का आह्वान होने
लगा। पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव हाशिए पर चले गए, दिखावा, शोर-शराबा अन्य बुराइयों के साथ हावी हो गए। धीरे-धीरे यहां ऐसे लोगों की पैठ होती चली गयी जिनका आस्था, संस्कृति, धर्म, पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव से कुछ लेना-देना नहीं था उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, पैसा।

एक तरफ आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को स्थापित कर पूरे मनोयोग से अपनी हैसियत के अनुसार
यथासाध्य विधि पूर्वक पूजता है। उसकी आस्था व मान्यता होती है कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं।
इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता। उसे ऐसा  लगता है जैसे उसके घर का कोई प्रिय सदस्य दूर जा रहा हो। उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है। नदी, तालाब, सागर में उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है।



सवाल यह उठता है कि आयोजन इतना भारी-भरकम क्यों किया जाता है, जिसमें बेहिसाब खर्च आए ?  क्यों इतनी विशाल प्रतिमाएं बनाई जाती हैं कि जिन्हें संभालना भारी पड़ जाए ? क्यों विज्ञ-जनों के प्रवचनों और भजन सन्ध्या की जगह चलताऊ गायक और गानों को प्राथमिकता दे कर धार्मिक भावनाओं को तिरोहित किया जाता है।  आज जरुरत है इस फिजूल-खर्ची पर रोक की। धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की। अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों को बचाने की।  अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण रखने की। ऐसा तभी संभव हो पाएगा, जब हम, सब चलता है की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इधर ध्यान देंगे।  

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

पंचकुला का कैक्टस पार्क

आज कैक्टस लोकप्रियता में सिर्फ गुलाब और ऑर्किड के पौधों से ही पीछे है। आज इस को देखने के लिए दक्षिणी अमेरिका जाने वालों की संख्या में दिन प्रति दिन इजाफा हो रहा है। हालांकि हमारे  पंचकुला के  कैक्टस पार्क में प्राकृतिक रूप से पनपे पौधे नहीं हैं पर फिर भी दुर्लभ प्रजातियों को देखने के लिए लोग यहां जरूर आना चाहेंगे 

अभी पिछले दिनों चंडीगढ़ के उपनगर हरियाणा के पंचकुला शहर जाने का मौका मिला तो वहां स्थित नागफनी बाग़ यानी कैक्टस पार्क को देखने का भी अवसर प्राप्त हो गया। कांटेदार पौधे भी इतने सुंदर हो सकते हैं कि वे मन मोह लें, यहां आ कर ही जाना। करीब सात एकड़ में फैले इस सुव्यवस्थित, करीने से सजे बगीचे का अपना ही सम्मोहन है। 
















मेरे कानूनी भाई
तरह-तरह के रूप-रंग, आकार-प्रकार, देसी-विदेशी करीब ढाई हजार किस्मों के कांटेदार पौधे सहज ही किसी को भी थम कर उन्हें निहारने को मजबूर कर देते हैं। कोई इतना ऊँचा है कि सर की टोपी गिर जाए, कोई ऐसा है जो मुट्ठी में समा जाए, किसी में फूल भी लगे हैं तो कोई अपने काँटों से ही सम्मोहित कर लेता है। कोई गोल-मटोल है तो कोई सींकिया पहलवान। कोई गुच्छे में परिवार की तरह है तो कोई अकेला मस्त-मलंग। यहां मेक्सिको का पेड़ नुमा कैक्टस भी है तो साथ ही एरिजोना की वह किस्म भी है जिसकी ऊंचाई चालीस फिट तक पहुँच जाती है। दुनिया की दुर्लभ, लोकप्रिय, दर्शनीय, मशहूर प्रजातियों जैसे Opuntias, Ferocactus, Agaves, Echinocereus, Columnar और Mammillarias को भी यहां देखा जा सकता है। यहां की नर्सरी से अपने मनपसंद पौधे ख़रीदे भी जा सकते हैं।   













पंचकुला के सेक्टर पांच में डॉक्टर जे. एस. सरकारिया द्वारा, जो एक सर्जन, पेंटर, प्रकृति प्रेमी तथा 'नेशनल कैक्टस ऐंड सकुलेंट्स प्लांट्स' के संस्थापक यानी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न इंसान थे, 1987 में इसकी नींव रखी गयी थी। उनकी अथक मेहनत, लगन और पौधों के प्रति प्यार ने इस बाग़ को शहर का "लैंड मार्क" तो बनाया ही अपने प्रकार का एशिया का सबसे बड़ा पार्क भी बना दिया जिसने पंचकुला को भी विश्व में एक पहचान दिला दी। इसीलिए इस पार्क को सरकारिया कैक्टस पार्क के नाम से भी जाना जाता है। इसमें तीन सरोवर और करीब पच्चीस टीले नुमा निर्माण किए गए हैं जो बरबस दर्शकों का मन मोह लेते हैं। टाइलों लगा घुमावदार मार्ग पर्यटकों को पूरे बाग़ को देखने में सहायक सिद्ध होता है।  













कुछ साल पहले तक इसके कांटेदार होने की वजह से हमारे यहाँ इसे घरों में लगाना शुभ तथा निरापद नहीं माना जाता था पर समय के साथ-साथ इसको भी लोग पसंद करने लगे हैं और आज कैक्टस लोकप्रियता में सिर्फ गुलाब और ऑर्किड के पौधों से ही पीछे है। इस को देखने के लिए आज दक्षिणी अमेरिका जाने वालों की संख्या में दिन प्रति दिन इजाफा हो रहा है। हालांकि हमारे पंचकुला के कैक्टस पार्क में प्राकृतिक रूप से पनपे पौधे नहीं हैं पर फिर भी दुर्लभ प्रजातियों को देखने के लिए लोग यहां जरूर आना चाहेंगे जो पंचकुला शहर के लिए शुभ संकेत ही है। पर इसके लिए व्यवस्थापकों और सरकारी महकमे को इस पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है। अभी वहां जाने पर सिर्फ एक सज्जन को खड़े पाया जो गेट किपरी के साथ ही अनमने भाव से टिकट भी दे रहा था। 







अपने को #कैक्टस पार्क का #हेड माली बताने वाले #जागर नामक इस शख्स के पास हमें बताने के लिए एक वाक्य तक नहीं था। उल्टे बात करने का लहजा ऐसा था जैसे हम अवांछनीय तत्व हों। करीब पांच बजे शाम का समय था। देश के हर शहर-कस्बे में उग आई कैक्टसी बिमारी यहां भी पार्क के सुनसान, निर्जन, पथ-मार्ग से दूर कोनों में मौजूद थी। जिसे शायद गेट-कीपर महोदय का संरक्षण प्राप्त था। हमें आता देख एक-दो जोड़े तो ऐसे भागे जैसे इंसान को देख खरगोश झाड़ियों से भागता है। इसलिए जरूरी है कि इस बिमारी के चलते लोग यहां आने से झिझकें उसके पहले ही सुरक्षा गारद की उचित व्यवस्था कर दी जाए। नहीं तो यह सुंदर, अनुपम, अनोखी जगह सिर्फ मनचलों की ऐशगाह बन कर रह जाएगी।     







यदि आपका कभी भी चंडीगढ़ जाना हो तो वहाँ के सुखना झील, रॉक-गार्डेन इत्यादि दर्शनीय स्थलों की सैर के साथ ही चंडीगढ़ की कार्बन कॉपी पंचकुला के इस मनोहारी, अजूबे से पार्क को देखने का समय जरूर निकालें।सिर्फ दस रुपये में यहां गुजारा गया समय आपको निराश नहीं करेगा।    

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

हजार सावन झेल चुकी, गणेश प्रतिमा

इस क्षेत्र में एक कैलाश गुफा भी है, मान्यता है कि परशूरामजी तथा गणेशजी का युद्ध इसी जगह हुआ था, लगता है उसी प्रसंग को स्थाई करने के लिए इस प्रतिमा की रचना की गयी होगी। पहाड़ी के नीचे के गांव का नाम फरसपाल होना भी इस मान्यता की पुष्टि करता है

हमारा देश इतनी विविधताओं से भरा पड़ा है कि उनको देखने समझने में वर्षों लग जाएं। इसका प्रमाण हैं वे लाखों पर्यटक जो विदेशों में हमारे बारे में किए जाते दुष्प्रचारों या फैली हुई भ्रांतियों के बावजूद भारत आने का लोभ संवरण नहीं कर सकते।  हजारों ऐसी अनजानी-अनदेखी विरासतें, धरोहरें, सम्पदाएँ बिखरी पड़ी हैं जिनकी खोज और जानकारी पाना अभी भी बाकी है। 

ऐसा ही एक स्थान है, छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के दंतेवाड़ा से करीब  25-30 की. मी. की दूरी पर ढोलकल नामक जगह पर, घने जंगलों में करीब तीन हजार फीट ऊँची एक पहाड़ी के सिरे पर स्थापित, छह फिट की ग्रेनाइट पत्थर से तराशी गयी भगवान् गणेश की मूर्ति। ऐसी मान्यता है कि दसवीं शताब्दी में छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा इस  कलात्मक प्रतिमा की स्थापना की गयी थी। ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि मूर्ति में गणेश जी के उदर पर नाग चिन्ह उकेरा गया है।  



तकरीबन हजार साल पुरानी इस प्रतिमा में भगवान गणेश के ऊपरी दाएं हाथ में फरसा तथा बाएं हाथ में टूटा हुआ एक दांत दर्शाया गया है और निचला दायां हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है तथा बाएं हाथ में मोदक धारण किए हुए है। बाएं हाथ में टूटा हुआ दांत गणेश जी तथा भगवान परशुराम युद्ध का स्मरण करवाता है। जिसमें परशुराम जी के फरसे से गणेश जी का दांत कट गया था। इस क्षेत्र में एक कैलाश गुफा भी है, मान्यता है कि वह युद्ध इसी जगह हुआ था, लगता है उसी प्रसंग को स्थाई करने के लिए इस प्रतिमा की रचना की गयी होगी। पहाड़ी के नीचे के गांव का नाम फरसपाल होना भी इस मान्यता की पुष्टि करता है।

तीन हजार फीट की उंचाई पर, जहां पहुँचना आज भी बेहद जोखिम भरा काम है, स्थित यह विशाल, भारी-भरकम, कलात्मक प्रतिमा आश्चर्य के साथ-साथ जिज्ञासा भी उत्पन्न करती है कि सदियों पहले इतने दुर्गम इलाके में इतनी ऊंचाई पर, जहां कुछ समय व्यतीत करना ही मुश्किल हो, किन लोगों ने, किस प्रकार, कैसी परिस्थितियों में इस प्रतिमा को गढ़ा होगा ? इस जगह को देख कर सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है कि उस समय यह कार्य कितना मुश्‍किल तथा जोखिम भरा रहा होगा। उन कलाकारों ने एक तपस्या की तरह अपनी भूख-प्यास, सुख-चैन, आराम-थकान सब भूल कर इस अप्रतिम, आश्चर्यजनक कला की रचना की होगी। 
ऐसा माना जाता है कि कारण कुछ भी हो बस्तर की सही तस्वीर पर्यटकों के सामने नहीं आ पायी है। प्रकृति के अनमोल खजाने से भरपूर इस इलाके में अभी भी सैंकड़ों मूर्तियां, मंदिर तथा जगहें ऐसी हैं जिनका पता लगना या लगाया जाना बाकि है। इसमें आने वाली अड़चनों में इसका दुर्गम तथा नक्सल प्रभावित होना है। फिर भी कभी संयोगवश या किसी पर्यटक के भाग्यवश कोई ना कोई ना कोई विचित्रता दुनिया के सामने आती रही है। जैसे यह अद्भुत प्रतिमा जिसका पता सबसे पहले एक अंग्रेज भूशास्त्री क्रुकशैंक ने 1934 में बैलाडीला की खदानों का सर्वेक्षण करते समय लगाया था।

स्थानीय निवासियों के अनुसार ढोल की बनावट के कारण इस पहाड़ी का नाम ढोलकल पड़ा है। पहाड़ी के शिखर पर स्थित प्रतिमा तक पहुंचने के लिए दंतेवाड़ा होते हुए फरसपाल जाना पड़ता है। यहां से कोतवाल पारा होकर जामपारा तक पहुंच मार्ग है। जामपारा पहाड़ के नीचे है। यहां से पैदल संकरी पहाड़ी पगडंडियों से होकर ऊपर पहुंचना पड़ता है। घने जंगल, दुर्गम मार्ग तथा और कई विषमताओं के बावजूद यहां श्रदालुओं, पर्यटकों और जिज्ञासुओं का आना बदस्तूर जारी है इसीलिए धीरे-धीरे ही सही इस जगह के बारे में लोगों की जानकारी बढ़ ही रही है।  

सोमवार, 5 सितंबर 2016

सिर्फ अंदर न जाने देने से ही शिवजी ने बालक का वध नहीं किया होगा

पांच साल पहले मन को मथती एक सोच को पोस्ट का रूप दिया था। उसी को एक बार फिर पोस्ट कर साथी-मित्रों की राय अपेक्षित है। शिवजी पर गहरी आस्था के कारण यह सोच उपजी है। किसी की धारणा को ठेस पहुंचाने की कतई मंशा नहीं है इसलिए इसे अन्यथा ना लें।       

शिवजी मेरे इष्ट हैं, उनमें मेरी पूरी आस्था है। दुनिया जानती और मानती है कि वे देवों के देव हैं, महादेव हैं। भूत-वर्तमान-भविष्य सब उनकी मर्जी से घटित होता है। वे त्रिकालदर्शी हैं। भोले-भंडारी हैं। योगी हैं। दया का सागर हैं। आशुतोष हैं। असुरों, मनुष्यों यहां तक कि बड़े-बड़े पापियों तक को उन्होंने क्षमा-दान दिया है। उनके हर कार्य में, इच्छा में परमार्थ ही रहता है। इसीलिए लगता नहीं है कि सिर्फ अंदर ना जाने देने की हठधर्मिता के कारण उन्होंने एक बालक का वध किया होगा। जरूर कोई दूसरी वजह इस घटना का कारण रही होगी। उन्होँने जो भी किया वह सब सोच-समझ कर जगत की भलाई के लिए ही किया होगा। 


घटना श्री गणेशजी के जन्म से संबंधित है, तथा कमोबेश अधिकाँश लोगों को मालुम भी है कि
कैसे अपने स्नान के वक्त माता पार्वती ने अपने उबटन से एक आकृति बना उसमें जीवन का संचार कर द्वार की रक्षा करने हेतु कहा और शिवजी ने गृह-प्रवेश ना करने देने के कारण उसका मस्तक काट दिया। फिर माता के कहने पर पुन: ढेर सारे वरदानों के साथ जीवन दान दिया। पर माँ गौरी इतने से ही संतुष्ट नहीं हुईं, उन्होंने शिवजी से अनुरोध किया
 कि वे उनके द्वारा रचित बालक को देव लोक में उचित सम्मान भी दिलवाएं। शिवजी पेशोपेश में पड़ गये। उन्होंने उस छोटे से बालक के यंत्रवत व्यवहार में इतना गुस्सा, दुराग्रह और हठधर्मिता देखी थी जिसकी वजह से उन्हें उसके भविष्य के स्वरूप को ले चिंता हो गयी थी। उन्हें लग रहा था कि ऐसा बालक बड़ा हो कर देवलोक और पृथ्वी लोक के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। पर पार्वतीजी का अनुरोध भी वे टाल नहीं पा रहे थे इसलिए उन्होंने उस बालक के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल देने का निर्णय किया। 


भगवान शिव तो वैद्यनाथ हैं। उन्होंने बालक के मस्तक यानि दिमाग में ही आमूल-चूल परिवर्तन कर ड़ाला। एक उग्र, यंत्रवत, विवेकहीन मस्तिष्क की जगह  एक धैर्यवान,  विवेकशील, शांत,
विचारशील, तीव्रबुद्धी, न्यायप्रिय, प्रत्युत्पन्न, ज्ञानवान, बुद्धिमान, संयमित मेधा का प्रत्यारोपण कर उस बालक को एक अलग पहचान दे दी। उनके साथ-साथ अन्य देवताओं ने भी अपनी-अपनी शक्तियां  प्रदान कीं। जिससे हर विधा व गुणों ने उसे इतना सक्षम कर दिया कि महऋषि वेद व्यास को भी अपने महान, वृहद तथा जटिल महाकाव्य की रचना के वक्त उसी बालक की सहायता लेनी पड़ी।


इन्हीं गुणों, सरल ह्रदय, तुरंत प्रसन्न हो जाने, सदा अपने भक्तों के साथ रह उनके विघ्नों का नाश करने के कारण ही आज श्री गणेश अबाल-वृद्ध, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सब के दिलों में समान रूप से विराजते हैं।     इतनी लोक प्रियता किसी और देवता को शायद ही  प्राप्त हुई हो। आज वे फिर अपने भक्तों को सुख प्रदान करने तथा उनके दुखों को हरने पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। इस शुभ अवसर पर सभी   इष्ट-मित्रों, बन्धु-बांधवों, सगे-संबंधियों को हार्दिक मंगलकामनाएं।    

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

जब हनुमान जी को राम जी के विरुद्ध खड़ा होना पड़ा

जब गुरु विशिष्ट को यह घटना मालुम पड़ी तो उन्होंने ऋषि विश्वामित्र को समझाया कि आपके क्रोध से पता नहीं आज कैसा अनर्थ हो जाता। आपने तो भक्त और भगवान् को ही आमने-सामने खड़ा करवा दिया था। विश्वामित्र जी को भी अपनी भूल का एहसास हुआ उन्होंने विशिष्ट जी से क्षमा  मांगते हुए  राम जी से अपना वचन वापस ले लिया

हमारे ग्रन्थों-पुराणों में जो कथा-कहानियां कही-बताई गयीं हैं, उनमें भगवान् की लीलाओं का वर्णन है जो किसी ना किसी प्रयोजनवश रचाई गयी होती हैं और अपने-आप में गूढार्थ समेटे रहती हैं। नहीं तो कोई सोच तो क्या कल्पना भी नहीं कर सकता कि हनुमान जी जैसे भक्त-शिरोमणि, खुद राम के ह्रदय समान, विनयशील, पूर्णतया समर्पित भक्त को भी अपने आराध्य, अपने इष्ट के सामने खड़ा होना पड़ा था !  
कथा इस प्रकार वर्णित है कि एक बार राजा शकुंतन शिकार के बाद लौट रहे थे। उनके मार्ग में पड़ने वाले एक आश्रम में गुरु वशिष्ठ, ऋषि विश्वामित्र और अत्रि मुनि यज्ञ कर रहे थे। बाहर से सिर्फ गुरु वशिष्ठ ही नज़र आ रहे थे। राजा को लगा कि मैं शिकार से लौट रहा हूँ, खून-पसीने से  अपवित्र शरीर के साथ यज्ञ में शामिल होना उचित नहीं होगा। यह सोच उसने वहीँ से गुरु वशिष्ठ को प्रणाम किया और आगे बढ़ गया। यह बात नारद जी ने विश्वामित्र जी को बताई कि शकुंतन ने सिर्फ वशिष्ठ जी को प्रणाम किया आपको नहीं। इतना सुनते ही ऋषि विश्वामित्र अत्यंत क्रोधित हो गए और क्रोधवश उन्होंने राम  पास जा अपने अपमान की बात कही और उनसे कहा की सूर्यास्त होने से पहले शकुंतन का कटा हुआ सर मेरे समक्ष होना चाहिए अन्यथा तुम्हे मेरे श्राप का सामना करना पड़ेगा।  
उधर नारद जी ने विश्वामित्र जी के क्रोध की बात शकुंतन को भी बताई और उसे अपनी रक्षा के लिए हनुमान जी की शरण में जाने को कहा क्योंकि उनके अलावा किसी में भी इतना सामर्थ्य नहीं था कि उसकी राम जी से रक्षा कर सके। परन्तु नारद जी को यह भी पता था कि अगर वह सीधे हनुमान जी के पास जाकर राम से अपनी प्राणो की रक्षा के लिए कहेगा तो हनुमान जी उसकी मदद नही करेंगे। इसलिए उन्होंने राजा को पहले हनुमान जी की माता अंजनी के पास जा उनसे बिना पूरी बात बताए अपने प्राण रक्षा का आशिर्वाद लेने को कहा।  शकुंतन ने ऐसा ही किया। जब हनुमान जी को पूरी बात का पता चला तो वे धर्मसंकट में पड़ गए। एक तरफ उनके सब कुछ प्रभू राम थे तो दूसरी तरफ माँ का वचन और उनकी आज्ञा ! पर हनुमान जी से बड़ा
विद्वान और नीतिवान भी कौन था, उन्हें एक युक्ति सूझि, उन्होंने राजा को सरयू नदी के तट पर बैठ राम का नाम जपने को कहा और खुद उसके पीछे छोटा कद बना कर बैठ गए। श्री राम जब शकुंतन को ढूंढते हुए वहां पहुंचे तो उसे अपना ही नाम जपते पाया, श्री राम भी दुविधा में पड़ गए कि अपने भक्त का वध कैसे करें ! ऐसे समय में उन्हें हनुमान जी याद आ रहे थे परन्तु उनका भी कहीं पता नहीं था। हार कर अपने वचनों की रक्षा के लिए राम ने अपने बाणों से शकुंतन पर वार किया पर राम नाम के जप के प्रभाव से उनका कोई असर न होते देख उन्होंने दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने की सोची। हनुमान जी ने स्थिति की नाजुकता समझ राजा को सिया-राम उच्चारण करने को कहा। भयभीत राजा ने डर के मारे इस उच्चारण के साथ हनुमान जी का नाम भी जपना शुरू कर दिया। इससे श्री राम के सारे दिव्यास्त्र उन्हीं के नाम के प्रभाव से बेअसर हो गए। राम भी कुछ-कुछ स्थिति को समझ गए थे, उन्होंने बाण चलाना रोक दिया क्योंकि उन्हें वहां हनुमान जी की उपस्थिति का आभास हो गया था सो उन्होंने हनुमान जी को पुकारा, सब कुछ ठीक होता देख हनुमान जी अपने रूप में हाथ जोड़ प्रभू के सामने आ खड़े हुए और सारी बात बताई। राम जी ने प्रसन्न हो उन्हें  अपने गले लगा लिया और कहा कि तुमने आज फिर सिद्ध कर दिया कि स्वयं भगवान से भी बढ़कर ताकत उनके सच्चे भक्त में होती है। 

उधर जब गुरु विशिष्ट को यह घटना मालुम पड़ी तो उन्होंने ऋषि विश्वामित्र को समझाया कि आपके क्रोध से पता नहीं आज कैसा अनर्थ हो जाता। आपने तो भक्त और भगवान् को ही आमने-सामने खड़ा करवा दिया था। विश्वामित्र जी को भी अपनी भूल का एहसास हुआ उन्होंने विशिष्ट जी से क्षमा  मांगते हुए  राम जी से अपना वचन वापस ले लिया और राजा को भी अभय प्रदान कर भय-मुक्त कर दिया।  

सोमवार, 29 अगस्त 2016

श्री कृष्ण-अर्जुन युद्ध

यदि स्वामिभक्ति और सखा प्रेम की बात की जाए तो इनमें सर्वोच्च स्थान राम-हनुमान और श्री कृष्ण-अर्जुन को प्राप्त है। हनुमान जी जैसी निष्ठा और अर्जुन जैसे समर्पण से बढ़ कर और कोई उदाहरण नहीं मिलता। भक्ति और दोस्ती का चरमोत्कर्ष है। पर आश्चर्य की बात है कि पौराणिक कथाओं में इन को भी अपने वचन और धर्म की रक्षार्थ एक दूसरे के विरुद्ध अस्त्र उठाते बताया गया है

हमारे ग्रन्थ, पुराण, काव्य, महाकाव्य सब विभिन्न तरह की रोचक, उपदेशात्मक, मार्गदर्शक, नीतिवान, ज्ञानवर्धक कथाओं से भरे पड़े हैं। पर कहीं-कहीं कुछ ऐसी कथाएं भी मिलती हैं जो रोचक होने के साथ-साथ विस्मयकारी भी होती हैं। ऐसी ही दो कथाएं हैं जिनमें अपने वचन और धर्म को निभाने के लिए भक्त को अपने इष्ट के विरुद्ध, या यूँ कहिए कि आम आदमी को सर्वोच्च सत्ता के सामने खड़ा होने की प्रेणना देती हैं। आज यदि स्वामिभक्ति और सखा प्रेम की बात की जाए तो इनमें सर्वोच्च स्थान राम-हनुमान और श्री कृष्ण-अर्जुन को प्राप्त है। हनुमान जी जैसी निष्ठा और अर्जुन जैसे समर्पण से बढ़ कर और कोई उदाहरण नहीं मिलता। भक्ति और दोस्ती का चरमोत्कर्ष है। पर आश्चर्य की बात है कि पौराणिक कथाओं में इन को भी अपने वचन और धर्म की रक्षार्थ एक दूसरे के विरुद्ध अस्त्र उठाते बताया गया है। आज पहले वह कथा जिसमें अर्जुन को अपने सबसे प्रिय सखा, संरक्षक, मार्गदर्शक, जीवन रक्षक श्री कृष्ण के सामने युद्ध के लिए खड़ा होना पड़ा था।       
एक बार महर्षि गालव जब प्रात: सूर्यार्घ्य दे रहे थे तभी उनकी अंजलि में आकाश मार्ग से जाते हुए चित्रसेन नामक गंधर्व की थूकी हुई पीक गिर गई। इससे मुनि को क्रोध आ गया। वे उसे शाप देना चाहते थे पर अपनी साधना की हानि होने के भय से उन्होंने जाकर भगवान श्रीकृष्ण से सारी बात बता चित्रसेन को दंड देने को कहा। श्री कृष्ण ने भी गंधर्व की धृष्टता को देखते हुए चौबीस घण्टे के भीतर  उसका वध कर देने की शपथ ले ली। कुछ ही देर बाद वहां देवर्षि नारद पहुंच गए और प्रभू को चिंतित देख उसका कारण पूछने पर श्री कृष्ण ने गालव जी के प्रसंग और अपनी प्रतिज्ञा बता दी। अब नारद मुनि ठहरे नारद मुनि उन्होंने यह बात जा कर चित्रसेन को बता अपनी रक्षा का उपाय करने को कहा। उसने हर जगह जा अपनी रक्षा की गुहार लगाईं पर श्री कृष्ण से कौन दुश्मनी मोल लेता।  हार कर वह फिर नारद की ही शरण में आया जिन्होंने उसे सुभद्रा के पास जा, पहले अपनी रक्षा की प्रतिज्ञा करवा तब पूरी बात बताने को कहा। सारी बात जान सुभद्रा धर्मसंकट में पड़ गयी फिर भी उसने  अर्जुन को सारी बात बता दी। भाग्यवश चित्रसेन अर्जुन का भी मित्र था फिर सुभद्रा का वचन पूरा करना था, अर्जुन पेशोपेश में था फिर भी उसने गंधर्व को  बचाना ही धर्मयुक्त समझा। यह बात जान नारद मुनि ने द्वारका जा श्री कृष्ण को सारी वस्तुस्थिति से अवगत करवा दिया। प्रभू ने नारद को फिर एक बार अर्जुन को समझाने के लिए भेजा पर अर्जुन ने सब सुनकर कहा कि मैं हर समय श्रीकृष्ण की ही शरण में हूं, मेरे पास उन्हीं का बल है, पर उनके दिए हुए क्षात्र धर्म के उपदेश के कारण मैं अपनी बात से विमुख नहीं हो सकता। मैं उनके बल पर ही अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करूंगा। हाँ, प्रभू समर्थ हैं, वे चाहें तो अपनी प्रतिज्ञा छोड़ सकते हैं। देवर्षि ने आ कर फिर सारी बात प्रभू को बताई ! अब क्या था, तुमुल युद्ध छिड़ गया। बड़ी घमासान लड़ाई हुई। पर कोई जीत नहीं सका। अंत में श्रीकृष्ण ने क्रोधित हो सुदर्शन चक्र छोड़ा, इधर अर्जुन ने पाशुपातस्त्र छोड़ दिया। पर प्रलय के लक्षण देखकर अर्जुन को अपनी भूल का एहसास 
 हुआ और उसने भगवान शंकर को स्मरण कर भूल निवारण करने की प्रार्थना की। शिव जी ने दोनों शस्त्रों को रोका और  फिर वे भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और बोले, भक्तों की बात के आगे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाना तो आपका सहज स्वभाव है, ऐसा कई बार  हुआ है। अब इस लीला को यहीं समाप्त कीजिए। प्रभु युद्ध से विरत हो गए। अर्जुन को गले लगाकर उसके घावों को दूर किया तथा चित्रसेन को भी अभय-दान दिया। 

पर गालव ऋषि को यह बात अच्छी नहीं लगी। उनके अपमान का परिमार्जन नहीं हुआ था।  उन्होंने क्रोध में आकर कहा कि मैं अपनी शक्ति प्रकट कर कृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा समेत चित्रसेन को भस्म कर दूँगा ! ऋषि के क्रोध से सभी सकते में  आ गए, पर उन्होंने ज्यों ही जल हाथ में लिया, सुभद्रा बोल उठी, मैं यदि कृष्ण की भक्त होऊं और अर्जुन के प्रति मेरा पातिव्रत्य पूर्ण हो तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर न गिरे। ऐसा ही हुआ। तब तक गालव ऋषि को भी अपनी भूल समझ में आ गयी थी। उन्होंने प्रभु को नमस्कार कर क्षमा मांगी और अपने स्थान पर लौट गए। 

कल, क्यों हनुमान जी को राम जी के सम्मुख खड़ा होना पड़ा 

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