गुरुवार, 26 मई 2016

आस्था को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं होती

पाराशर संहिता की एक कथा के आधार पर खम्मम के इस मंदिर में हनुमान जी और सुवर्चला जी की पूजा होती है और दर्शनार्थियों का मेल लगा रहता है। अब इस पर बहस हो, ना हो, वाद-विवाद हो, ना हो ! मंदिर तो है ही और वर्षों से मान्यता भी बनी हुई है। आस्था को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं होती  

अत्यधिक विचित्रताओं से भरा पड़ा है अपना देश ! और देश तो लोगों से ही बनता है ! तो जैसे लोग वैसा देश। इसका मतलब हम ही विचित्र हैं और शायद ही इतनी विचित्रता किसी और देश के लोगों में होगी ! यह गुण हमारी जीवन-शैली के हर पहलू में झलकता है, चाहे हमारा रहन-सहन हो, चाहे हमारे रीती-रिवाज, चाहे हमारे कर्म-काण्ड, चाहे हमारी मान्यताएं, चाहे हमारी पौराणिक गाथाएं। यदि कोई कश्मीर से कन्याकुमारी या गुजरात से बंगाल कहीं भी चले उसको इसका साक्षात प्रमाण मिलता चला जाएगा। हर जगह के विद्वानों ने स्थापित मान्यताओं का, जगह और परिस्थियों के अनुसार, अपनी-अपनी तरह विश्लेषण किया है। यह बात हमारे दोनों महाग्रंथों में भी नज़र आती है जिसमें समयानुसार कई-कई उपकथाएं जुड़ती चली गयी हैं। ऐसी ही एक कथानुसार देश के दक्षिणी भाग में एक मान्यता हनुमान जी के मंदिर से भी संबंधित है।

हमारे सबसे ज्यादा पूजनीय पांच देवों में से एक हनुमान जी हैं। जिन्हें देश-विदेश में शक्ति, शौर्य, धैर्य, भक्ति, निर्भयता, अमरता तथा अजेयता का पर्याय माना जाता है। देश का ऐसा कोई कोना नहीं है जहां इनकी पूजा ना होती हो, इनसे जुडी कथाएं सुनी और कही ना जाती हों। ऐसी अटूट मान्यता है कि इन्होंने बाल ब्रह्मचारी रह कर प्रभू राम के सारे कार्यों को संपन्न करवाया था। परन्तु अपने ही देश में तेलंगाना राज्य के खम्मम जिले में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला की प्रतिमा विराजमान है। यहां की मान्यता है कि जो भी यहां आ कर भक्ति-भाव से हनुमानजी और उनकी पत्नी के दर्शन करता है, उनका वैवाहिक जीवन सदा सुखमय रहता है। इस मंदिर का आधार पाराशर संहिता की उस कथा पर आधारित है, जिसमें हनुमान जी के सूर्यपुत्री सुवर्चला से हुए विवाह का वर्णन है। 
कथा के अनुसार हनुमान जी ने सूर्य देव से उनकी नौ दिव्य विद्याओं को सीखाने के लिए प्रार्थना की थी, जिसके लिए सूर्यदेव भी इन्हें सुयोग्य पात्र मान सहर्ष राजी हो गए थे। शिक्षा के दौरान उन्होंने जब पांच विद्याओं का दान इन्हें दे दिया तो उसके बाद शेष चार विद्याओं को देते समय उनके सम्मुख एक समस्या आ खड़ी हुई। बची हुई उन चार विद्याओं का ज्ञान उसी पात्र को दिया जा सकता था, जिसका विवाह हो चुका हो ! चूँकि हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी थे इसलिए उन्हें यह शिक्षा नहीं दी जा सकती थी पर इसे अधूरा भी नहीं छोड़ा जा सकता था ! सो सूर्यदेव ने उन्हें विवाह कर लेने की सलाह दी पर हनुमान जी इसके लिए राजी नहीं हुए। पर विद्यार्जन करना भी बहुत जरुरी था। प्रभुएच्छा से इसका हल भी निकल आया। सूर्यदेव की एक पुत्री थी, सुवर्चला, जो वर्षों से तपस्यारत थी। सूर्यदेव ने हनुमान जी को उससे विवाह करने के लिए राजी कर लिया क्योंकि सुवर्चला ने विवाह पश्चात फिर अपनी तपस्या में लीन हो जाना था। यह सब बातें जानने के बाद हनुमानजी विवाह के लिए मान गए और सूर्य देव ने दोनों का विवाह करवा दिया। जिसके बाद सुवर्चला पुन: अपनी तपस्या में लीन हो गईं इस प्रकार विवाह के बाद भी हनुमानजी ने ब्रह्मचारी बने रह कर उन चार दैवीय विद्याओं को भी प्राप्त कर लिया। 

इसी कथा के आधार पर खम्मम के इस मंदिर में हनुमान जी और सुवर्चला जी की पूजा होती है और दर्शनार्थियों का मेल लगा रहता है। अब इस पर बहस हो, ना हो, वाद-विवाद हो, ना हो ! मंदिर तो है ही और वर्षों से मान्यता भी बनी हुई है। आस्था को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं होती।   

शुक्रवार, 20 मई 2016

किसी काम को नीचा या हेय समझना, मेहनत-मशक्क्त करने वालों की तौहीन है

दादा भाई नारौजी गरीब परिवार से थे उस पर सिर्फ चार साल की उम्र में उनके पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी माँ ने उन्हें कैसे पाला होगा इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है। हमारे पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बेहद साधारण परिवार से थे। लाल बहादुर शास्त्री को कौन नहीं जानता, पैसों की कमी की वजह से कई बार वे तैर कर नदी पार कर पढ़ने जाते थे। हमारे सबसे लायक राष्ट्रपति कलाम साहब को बचपन में अखबार का वितरण करना पड़ा था। ऐसे नाम कम नहीं हैं सरदार पटेल, गोपाल कृष्ण गोखले, जगजीवन राम, कामराज जैसे नेताओं का जन्म साधारण परिवारों में हुआ बचपन अभावों में बीता पर उन्होंने अपनी लियाकत से देश और अपना नाम ऊंचा किया 

समझ नहीं आता हम लोगों की सोच, विचार, संस्कार सब क्यों और कैसे तिरोहित हो गए हैं। वैचारिक मतभेद तो हर समय से ही रहते आए हैं पर कभी उसके लिए एक दूसरे की छीछालेदर नहीं की जाती थी। पर आज आपसी कटुता अब व्यक्तिगत रूप से निकलने लगी है। अपनी छलनी के छेदों की तरफ ध्यान देने की बजाए दूसरे के सूप की कमियां गिनाई जाने लगी हैं।  

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पक्ष-विपक्ष के लाख वैचारिक मतभेद हों, सदन के अंदर-बाहर एक-दूसरे का मान-सम्मान जरूर रखा जाता था। पंडित नेहरु के कम विरोधी नहीं थे। इंदिरा गांधी के समय विपक्ष चुप नहीं बैठता था, और तो और राजनीती से बिल्कुल अंजान राजीव गांधी पर भी विरोधियों ने कभी घटिया आक्षेप नहीं किए। एक मर्यादा हुआ करती थी, जिसका सदा ध्यान रखा जाता था। पर इधर पिछले दो साल से भी ज्यादा समय से कुछ लोग देश के बदले हालात को हजम नहीं कर पा रहे हैं। खासकर देश की सबसे पुरानी पार्टी के नए तथाकथित नेताओं का बिना कुछ समझे-बूझे, बिना अपने दल का इतिहास जाने, सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने के लिए विपक्ष के नेता का तरह-तरह के संबोधनों और उनके व्यवसाय को लेकर मजाक बनाना रोज का काम हो गया है। उधर विपक्ष में भी संत या साधू नहीं बैठे हैं तो जाहिर है आप जैसा व्यवहार करोगे उसी तरह का जवाब भी उधर से आएगा। दोनों तरफ के जिम्मेदार लोगों को इस तरफ ध्यान दे सामने वाले की मान-मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए। दूसरे का माखौल उड़ाने का मतलब है आप उन लाखों लोगों का मजाक बना रहे हो जिन्होंने उस शख्स को अपना मत दे कर विजयी बनाया है।

 इसमें उस पार्टी का ज्यादा फर्ज बनता है जिसने आजादी के पहले से लोगों के दिलों पर राज किया है। उस के नेताओं को अपने येन-केन-प्रकारेण दल में जगह पा गए उन महत्वाकांक्षी युवकों को समझाने का है, जिन्हें ना देश का नाहीं दल के इतिहास के बारे में कोई ख़ास इल्म है।   उन्हें बताया जाना चाहिए कि किसी की मेहनत और लियाकत को उसके परिवार या उसके व्यवसाय से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। देश में दसियों ऐसे लोकप्रिय नेता हुए हैं जिनका बचपन घोर अभावों  से गुजरा था। दादा भाई नारौजी गरीब परिवार से थे उस  पर सिर्फ चार साल की उम्र में उनके पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी माँ ने उन्हें कैसे पाला होगा इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है।
हमारे पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बेहद साधारण परिवार से थे। लाल बहादुर शास्त्री को कौन नहीं जानता, पैसों की कमी की वजह से कई बार वे तैर कर नदी पार कर पढ़ने जाते थे। हमारे सबसे लायक राष्ट्रपति कलाम
साहब को बचपन में अखबार का वितरण करना पड़ा था। ऐसे नाम कम नहीं हैं सरदार पटेल, गोपाल कृष्ण गोखले, जगजीवन राम, कामराज जैसे नेताओं का जन्म साधारण परिवारों में हुआ बचपन अभावों में बीता पर उन्होंने अपनी लियाकत से देश और अपना नाम ऊंचा किया। यदि कल  नितीश कुमार, लालू यादव, राम विलास पासवान, ममता, मानिक सरकार जैसे लोग देश के सर्वोच्च पद पर पहुँच जाएँ तो क्या उनका
इसीलिए मजाक उड़ाया जाएगा कि ये लोग अभावों की जिंदगी जी कर आए हैं ? फिर इस तरह के नवधनाढ्यों को यह समझना जरुरी है कि देश की संपदा को हड़पने से तो कहीं-कहीं बेहतर है चाय बेचना। काम कोई भी हो यदि उससे परिवार की गाडी चलती हो तो वह हेय नहीं है। और यदि आप उस काम को या उसके करने वाले को नीचा समझते हैं तो आप देश की उस मेहनतकश अधिकाँश आबादी की तौहीन कर रहे हैं जो मेहनत-मशक्कत से अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं।    

सोमवार, 16 मई 2016

एक था जुबली ब्रिज ! सेवा निवृत्ति एक पुल की !!

देश में रेल चलने के करीब 34 साल के अंदर, उस समय हावड़ा-सियालदह रेल लाइनों को जोड़ने वाला, हुगली नदी पर बना यह पहला और देश के पुराने पुलों में से एक सबसे अहम रेल पुल था, जिसे 129 साल की सेवा के पश्चात इसी साल 17 अप्रैल को सेवा-मुक्त कर दिया गया है !  

पिछले दिनों एक रेल पुल, जुबली ब्रिज, को सेवानिवृत्त कर दिया गया। वैसे तो ऐसा होता ही रहता होगा पर इसके साथ मेरी कई यादें जुडी होने के कारण यह घटना मेरे लिए ख़ास बन गयी है। इस पुल के कारण अनगिनत बार मैं करीब 80 की. मी. की अतिरिक्त यात्रा से बचता रहा हूँ, जब बैंडेल स्टेशन पर दूरगामी गाडी से उतर,   लोकल ट्रेन से नैहाटी (नईहट्टी) स्टेशन होते हुए अपने घर आ जाता था  और बैंडेल से   
पुराना पुल 
हावड़ा और फिर सियालदह होते हुए घर आने के 
दो-अढ़ाई घंटों के समय और करीबअस्सी किलोमीटर के फासले को तय करने की जहमत से बच जाता था।  

वैसे तो पश्चिम बंगाल में रेल पटरियों का जाल बिछा हुआ है। पर दो लाइनें प्रमुख हैं, जो हुगली (गंगा) नदी के दोनों तरफ स्थित हैं और रोज लाखों यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचाती हैं। एक शुरु होती है हावड़ा स्टेशन से तथा दूसरी सियालदह से। इन्हीं की बदौलत बंगाल देश के दूसरे हिस्सों से जुड़ा हुआ है। सियालदह वाली लाइन दो पुलों पर से नदी पार कर हावड़ा लाइन से जुड़ती है। उनमें पहला है विवेकानंद सेतु या बाली पुल, 1932 में शुरू हुआ यह एक रेल-रोड़ पुल है। इसकी हालत को देखते हुए इसी के करीब एक और पुल का निर्माण किया गया है जिसका नाम भगिनी निवेदिता के नाम पर रखा गया है और दोनों को एक तरफा रास्ता बना दिया गया है। 

नया पुल 
आज जिसकी बात हो रही है वह है दूसरा पुल, जुबली ब्रिज, जिसका लोकार्पण 16 फरवरी 1885 को किया गया था तथा रानी विक्टोरिया के राज के पचास साल पूरे होने के उपलक्ष्य में इसका नाम जुबली ब्रिज रखा गया था। देश में रेल चलने के करीब 34 साल के अंदर, उस समय हावड़ा-सियालदह रेल लाइनों को जोड़ने वाला, हुगली नदी पर बना यह पहला और देश के पुराने पुलों में से एक सबसे अहम रेल पुल था, जिसे 129 साल की सेवा के पश्चात इसी साल 17 अप्रैल को सेवा-मुक्त कर दिया गया है। सियालदह से करीब 40 की. मी. दूर इसके एक छोर पर, नैहाटी के बाद गरिफा स्टेशन है तथा दूसरी तरफ हुगली घाट और फिर बैंडेल। दूरगामी गाड़ियों के अलावा लोकल ट्रेन की सहूलियत होने के कारण इस इलाके में रहने वाले बहुतेरे लोगों को हावड़ा ना जा कर बैंडेल स्टेशन से ही अपनी दूरगामी गाडी पकड़ने की सहूलियत मिल जाती है। जिस से अतिरिक्त यात्रा और समय दोनों की बचत हो जाती है। यह पूर्वीय रेलवे का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अहम पुल था। 

इस "नट-बोल्ट" की जगह "रिवेट" से जोडे गए करीब सवा सौ साल पुराने जुबली पुल से अंतिम बार गुजरने वाली गाडी तिस्ता-तोरसा एक्स. थी। जिसके बाद रेलवे ने बैंडेल-नैहाटी मार्ग को नए जुबली पुल से जोड़ दिया है। पर वर्षों पहले कठिन परिस्थियों और बेहद कम सहूलियतों के बावजूद इसके निर्माण से इस इलाके में रहने वाले लोगों का गाड़ी पकड़ने के लिए घंटों बर्बाद कर हावड़ा जाने की मजबूरी का ख़त्म होना वर्षों तक पुराने पुल की याद को दिलों में बसाए रखेगा।      

शनिवार, 14 मई 2016

जहां भी देखें पानी की बर्बादी, आवाज उठाएं !

किसी भी शहर में ऐसे नज़ारे आम हैं जहां सुबह-सबेरे अधिकाँश बंगलों में कारें, कुत्ते, आंगन, गलियारों पर हजारों लीटर पानी की बर्बादी एक शगल है, बिना किसी झिझक या अपराध बोध के। इनके लिए पानी की राष्ट्रव्यापी  समस्या की खबर उतनी ही अहमियत रखती है जितनी किसी शुक्रवार को किसी फिल्म की रिलीज !                 

गर्मी की पताका फिर एक बार कमोबेस पूरे देश पर फहरा रही है। उसके साथ ही करीब आधी आबादी का पानी की किल्लत से जूझना भी शुरू हो गया है। साल दर साल से ऐसा होता चला आ रहा है, पर लगता नहीं कि जिम्मेदार लोगों को, चाहे वे किसी भी राजनैतिक दल से हों, इसकी फ़िक्र कभी भी सताती हो। यदि ऐसा होता तो क्या प्यासे खेतों की बजाए क्रिकेट के मैदान पानी से सींचे जाते ? वे भी जानते हैं कि जैसे ही एक-डेढ़ महीने में बरसात का मौसम आया वैसे ही सब को सब कुछ भूल जाएगा। पर शायद उनका ध्यान इस ओर नहीं जाता कि बढ़ती आबादी और घटते जल-स्तर के कारण दिन पर दिन हालात बेकाबू होने की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। दुनिया भर में पीने के पानी की कमी को दूर करने के उपाय हो रहे हैं पर कड़वी सच्चाई है कि हमारे नेताओं को अपनी कुर्सी को बचाने की सियासत के सिवा कुछ नहीं सूझता।  

पानी के खात्मे को लेकर तरह-तरह की डरावनी तस्वीरों को सामने लाने के बजाय लोगों को जागरूक बनाने की जरुरत है। एक तरफ तो सरकार के द्वारा लाखों रुपये खर्च कर पानी को लेकर, आज चारों ओर लोगों को जागरुक बनाने की मुहीम चलाई जा रही है, रोज-रोज डरावनी तस्वीरें पेश कर इसके खत्म होने का डर दिखाया जा रहा है, पर दूसरी तरफ उसी सरकार के मुलाजिम और कुछ रसूखदार लोगों के यहां पानी इतनी बेदर्दी से बहाया जाता है कि उनके अहम और नासमझी को देख कर कोई भी तैश खाए बिना नहीं रह सकता। आम इंसान जो गीले कपडे से अपनी कार को पौंछ कर साफ़ कर लेता है वहीं इनकी कारें पाइप लगा कर धोई जाती हैं, वह भी इंच दर इंच, रेशा दर रेशा। ऐसे लोगों के कान पर किसी भी खबर या समाचार से जूं तक नहीं रेंगती।

ऐसी तस्वीरें लोगों का दिल क्यों नहीं दहलातीं 
अभी कुछ दिनों पहले #रायपुर जाना हुआ था। वहाँ पड़ोस के घर की तीन कारों को, जो रोज चलती भी नहीं थीं, उनको रोज धुलते देखना एक यंत्रणा के समान था। पर एक दिन तो हद ही हो गयी जब उन साहबान के रिश्तेदारों की गाड़ियां भी वहां ला कर धुलते दिखीं, पता चला कि हफ्ते में दो-तीन बार ऐसा होता है। तब तो रहा ना गया और उन साहबान के मुलाजिम को कुछ सख्त लहजे में हड़काया। उसने निश्चित तौर पर अंदर खबर पहुंचाई होगी, तब जा रोज का धुलना तीसरे दिन पर जा करअटका। यह कोई एक घर की बात नहीं है, किसी भी शहर में ऐसे नज़ारे आम हैं जहां सुबह-सबेरे अधिकाँश बंगलों में कारें, कुत्ते, आंगन, गलियारों पर हजारों लीटर पानी की बर्बादी एक शगल है, बिना किसी झिझक या अपराध बोध के। इनके लिए पानी की राष्ट्रव्यापी  समस्या की खबर उतनी ही अहमियत रखती है जितनी किसी शुक्रवार को किसी फिल्म की रिलीज ! ऐसे ही एक और परिवार, जिसमें गिनती के सिर्फ दो लोग हैं, के यहां पानी के संचय और उसके खर्च को देख कोई भी दांतों तले उंगलियां दबा लेगा। ये "सज्जन"
सरकारी इंजिनियर हैं, मेरे पडोसी। इनके यहां करीब दस हजार लीटर पानी की रोज की खपत है। इनके कपड़ों को धोने के बाद, गिन कर, पूरी पांच बाल्टियों के पानी से गुजरना होता है। रसोई, स्नानगृह, छत और नीचे चार टंकियां लगा रखी हैं जिनके अलावा घर में छोटे-बड़े पानी को संगृहित करने के लिए दसियों उपाय और भी हैं और उपयोगकर्ता सिर्फ दो !!     

ऐसा होता है कि लोग अपने रिश्तेदार, दोस्त या पड़ोसी की ऐसी गलत हरकतों पर उन्हें समझाने या कार्यवाही करने में झिझकते हैं या संकोच करते हैं, आपसी संबंध आड़े आ जाते हैं।पर अगला बिना किसी की परवाह किए अपनी दबंगई के सरूर में कुछ भी करने से न तो शर्माता है नाहीं घबराता है। इनको सिर्फ अपने से मतलब होता है।  इनका मानना है कि मेरे 'बोर' के पानी पर मेरा स्वामित्व है, उसे मैं चाहे जैसे भी खर्च करुं ! जाहिर है इनके नौनिहाल भी इन्हीं के नक़्शे-कदमों पर चलेंगे। पर अब जरुरत है ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज उठाने की,
क्यों लोग ओह माई गॉड या सो सैड कह कर किनारे हो जाते हैं  
उनकी गलतियों का खामियाजा उन्हें भुगतवाने की, उनकी लापरवाहियों को मीडिया के सहारे जग जाहिर करने की, उनको एहसास दिलाने की, कि पैसे के दम पर हर चीज खरीदी नहीं जा सकती। जब देश की अधिकांश आबादी एक-एक गिलास पीने के पानी के लिए तरस रही हो, गांवों की बहू-बेटियों को मीलों पानी का भार उठा कर घर लाना पड़ता हो, लोगों को रोज की जरूरतें दूषित पानी से पूरी करनी पड़ रही हों तब तुम्हें कोई हक़ नहीं बनता कि तुम अपने ऐशो-आराम के लिए इसे फिजूल में बर्बाद करो।  


समझाना और राह पर लाना कुछ मुश्किल है पर असंभव नहीं। दोस्त-मित्र, नाते-रिश्तेदार, अड़ोसी-पडोसी जैसे  रिश्तों को एक तरफ कर उन्हें वक्त की नजाकत का, वक्त रहते एहसास तो दिलाना ही पडेगा ! 

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

पर्यावरण सुधारना है तो सख्ती करनी ही पड़ेगी !

आपको क्यों नहीं सुनाई पड रहा कि सी.एन.जी. के स्टीकरों की काला बाजारी हो रही है ? तो क्यों नहीं ऐसी गाड़ियों को भी इस स्कीम के तहत बंद रखा जाए ? उन जुगाडुओं की पहचान और रोक-थाम का कोई उपाय है जो रोज अपनी नंबर प्लेट बदल अपनी गाडी सड़क पर उतार देते हैं ? या फिर गलियों-गलियों से होते हुए कहीं भी पहुंचने वाले, रोके जाने पर भाग जाने वाले, पैसे के बल पर दोनों नंबर की गाड़ियां रख सड़क पर भीड़ बढ़ाने वालों पर शिकंजा या नकेल डालने का कोई उपाय है ? नहीं ना ! तो सीधी सी बात है, दस दिनों तक समुद्र से प्रार्थना करने के पश्चात तो प्रभु को भी गुस्सा आ गया था !आप तो मनुष्य हो, कब तक फूल भेंट करते रहोगे ?  अब चालान नहीं उनका लायसेंस जब्त करें या फिर गाडी ही जब्त हो, जो भारी जुर्माने के साथ स्कीम ख़त्म होने पर ही मिले। अपनी बड़ी-बड़ी फोटो, इश्तेहार लगाने के बदले लोगों को भविष्य के प्रति चेताएं , जागरूक बनाएं, समझाएं .....

पर्यावरण के सवाल को हल करने के लिए सम-विषम के गणित के फार्मूले को दिल्ली की जनता के सामने परीक्षा के लिए फिर पंद्रह दिनों के लिए रख दिया गया है। मुंडे-मुंडे मतिरिभिन्ना, जाहिर है कुछ जागरूक लोग, जो बढ़ते प्रदूषण को लेकर सचमुच चिंतित हैं वे इसके पक्ष में हैं और कुछ को इसकी सफलता में संदेह है वे इसके विपक्ष में हैं। वेिपक्ष में वे लोग भी हैं जो अपनी निजी जिंदगी में किसी तरह का बंधन स्वीकार नहीं कर पाते। इसके अलावा सक्षम लोग, तथाकथित क्रीमी लेयर, विरोधी दलों के लोग, जिन्हें सत्तारूढ़ दल की किसी भी सफलता से अपना भविष्य खतरे में नज़र आने लगता है, और वे भी जो जुगाड़ में सिद्धहस्त हैं ये सब ऐसी स्कीमों पर विश्वास नहीं रखते। 

बात किसी के मानने ना मानने की नहीं है। इस स्कीम को भी किसी ने जनहित या प्रदूषण की चिंता से तब तक कहां लागू किया गया था, जब तक न्याय-पालिका ने अपना डंडा नहीं खड़खड़ाया। यह सच है कि यह व्यवस्था पूर्णरुपेण खामी रहित नहीं है, पर उन खामियों को दूर करने के लिए विपक्ष में खड़ा जत्था कोई सलाह नहीं दे रहा, उसका एक ही मकसद है कि यह सिस्टम बंद हो। पर पक्ष में खड़े लोगों का मानना है कि चाहे दस प्रतिशत ही सुधार हुआ हो, पर हुआ तो है। क्योंकि यह सभी की जिम्मेदारी बनती है कि अपने बच्चों के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए वातावरण, पर्यावरण, माहौल को इतना बेहतर तो बना दें कि वे खुल कर सांस ले सकें। यह बात भी सच है कि सिर्फ गाड़ियां ही पर्यावरण के प्रदूषण की जिम्मेवार नहीं हैं पर कुछ प्रतिशत तो उनकी भागेदारी तो है ही ! सड़क पर गाड़ियां कम होंगी तो यातायात सुधरेगा, यातायात में सुधार होगा तो पर्यावरण में भी फर्क जरूर पडेगा।  

कहने-सुनने में बुरा लगता है, पर हमारी आदत है कि डर के बिना, सीधे शब्दों में कहें तो लतियाये बिना, हम किसी काम को नहीं करते। शायद इसी लिए अंग्रेजों के समय कानून-व्यवस्था चाक-चौबंद थी। अब तो एक कानून बनता है तो उसके दस तोड़ पहले ही सामने ला दिए जाते हैं। और कुछ नहीं तो सौ-पचास लोग आ जुटेंगे नारे-धरने के साथ। कइयों को तो अपना जन-बल दिखाने का मौका मिल जाता है। अब इसी सम-विषम के जोड़-घटाव को लें। सरकार यदि पूर्णतया कटिबद्ध हो पर्यावरण के सुधार के लिए तो क्या नहीं हो सकता ! इसके लिए क्यों किसी को भी छूट दी जाए। सदा बराबरी की रट लगाने वाली महिलाओं को भी पुरुषों की बजाय ज्यादा छूट दे दी गयी तो क्या जब महिला गाडी चलाती है तो कार धूआं कम छोड़ती है ? चलो ठीक है, दे दी तो दे दी, पर फिर उस गाडी में पुरुष के बैठने में आपत्ति क्यों ? उन भले लोगों को भी तो किसी ना किसी तरह अपने गन्तव्य तक पहुँचना ही है, यदि महिला गाड़ीवान के साथ तीन पुरुष चले भी गए तो उस एक वाहन की तो बचत हो ही जाएगी जिसमें ये लोग जाते। 

दुनिया जानती है हमारी फितरत को, हमारे जुगाडपन को, तो आप क्यों आँख बंद किए बैठे हैं ? आपको क्यों नहीं सुनाई पड रहा कि सी.एन.जी. के स्टीकरों की काला बाजारी हो रही है ? क्या कोई उपाय है जो इस धांधली को रोक या पहचान सके ? तो क्यों नहीं ऐसी गाड़ियों को भी इस स्कीम के तहत बंद रखा जाए ? एक बात और उन जुगाडुओं की पहचान और रोक-थाम का कोई उपाय है जो रोज अपनी नंबर प्लेट बदल अपनी गाडी सड़क पर उतार देते हैं ? या फिर गलियों-गलियों से होते हुए कहीं भी पहुंचने वाले, रोके जाने पर भग लिए जाने वाले, पैसे के बल पर दोनों नंबर की गाड़ियां रख सड़क पर भीड़ बढ़ाने वालों पर शिकंजा या नकेल डालने का कोई उपाय है ? नहीं ना ! तो सीधी सी बात है, दस दिनों तक समुद्र से प्रार्थना करने के पश्चात तो प्रभु को भी गुस्सा आ गया था।  आप तो मनुष्य हो, कब तक फूल भेंट करते रहोगे ? अब चालान नहीं उनका लायसेंस जब्त करें, या फिर गाडी ही जब्त हो जो भारी जुर्माने के साथ स्कीम ख़त्म होने पर ही मिले। इस दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाया जाए। अपनी बड़ी-बड़ी फोटो, इश्तेहार लगाने के बदले लोगों को भविष्य के प्रति चेताया जाए, जागरूक बनाया जाए, समझाया जाए। यह भी सच्चाई है कि बदलाव तुरंत तो नहीं आएगा पर धीरे-धीरे ही सही लोगों को समझ में आएगा, जागरुकता बढ़ेगी तो फर्क जरूर पड़ेगा।       

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

I.P.L. में ऐसी कौन सी देश हित की भावना जुडी है ?

पानी की समस्या सिर्फ हमारी ही नहीं है सारा संसार इस से जुझ रहा है। पर विडंबना यह है कि अपने देश में कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें अपने मतलब के सिवा और कुछ भी नज़र नहीं आता। धन-बल और सत्ता के मद में वे कोर्ट के आदेश की भी आलोचना से बाज नहीं आते और अपनी गलत बात पर अड़े रहते हैं...

अपनी बात कहने से पहले नम्रता पूर्वक यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि क्रिकेट बचपन से ही मेरा प्रिय खेल रहा है और अभी भी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में, जहां खिलाड़ी देश के लिए खेलते हैं, गहरी रूचि है। पर समझ नहीं आता कि I.P.L. जैसे तमाशों का, जो पैसे और सिर्फ पैसों के लिए आयोजित किए जाते हों, वह भी आज की विषम परिस्थितियों और परिवेश में आयोजन करने का क्या औचित्य है ? अभी पिछले दिनों महाराष्ट्र में पानी 
की भारी कमी के कारण कानून की  फटकार खाने के बाद ही वहां होने वाले मैचों को दूसरे राज्यों में शिफ्ट किया गया। क्या आयोजकों को यह गंभीर संकट दिखाई नहीं पड रहा था ? फिर सवाल यह भी उठता है कि क्या दूसरे राज्यों में पानी की इतनी बहुलता है कि उसे इस भयंकर गर्मी में खेतों-खलिहानों में उपयोग करने के बजाए  खेल के मैदानों के रख-रखाव में बर्बाद कर दिया जाए ? गर्मी के मौसम में ऐसे नौटंकीनुमा खेलों को अपने देश के किसी भी राज्य या फिर विदेश में करवाने से पानी की बचत तो नहीं हो जाएगी। क्योंकि सच्चाई यही है कि यह समस्या सिर्फ हमारी ही नहीं है सारा संसार इस से जूझ रहा है। पर विडंबना यह है कि अपने देश में कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें अपने मतलब के सिवा और कुछ भी नज़र नहीं आता। धन-बल और सत्ता के मद में वे कोर्ट के आदेश की भी आलोचना करने से 
बाज नहीं आते और अपनी गलत बात पर अड़े रहते हैं।  ऐसे लोगों का बेहूदा तर्क रहता है कि खेल के बदले वह राज्य के राजस्व में योगदान दे रहे हैं ! कोई उनसे पूछे कि उनके दिए गए पैसों से घटते जल-स्तर की भरपाई

कैसे हो सकती है ? अब सवाल यह भी उठता है कि इस तमाशे का आयोजन गर्मी में ही क्यों ? तो आयोजकों का कहना है कि दुनिया भर के कार्यक्रमों से ताल-मेल बिठा कर ऐसा करना पड़ता है,     तो हमारे यहां ही 

ऐसा मौसम क्यों चुना जाता है ?  जब कि दुनिया भर के क्रिकेट के खेल की नकेल हमारे हाथों में है !

अब सारे मसले का लब्बो-लुआब यही है कि इन सब का मूल पैसा है। जिसके लिए बड़े से बड़ा खिलाड़ी वह चाहे देसी हो या विदेशी बिकने तक को तैयार रहता है, जैसे कोई उपभोक्ता वस्तु हो।  फिर नैतिकता जैसी कोई मजबूरी नहीं होती, चाहे जिस किसी की तरफ से किसी के विरुद्ध खिलवा लो। इनकी तुलना उन भाड़े के सैनिकों से की जा सकती है. जो पैसे के लिए किसी भी देश के लिए लड़ने पहुँच जाते थे। ये खिलाड़ी भाई लोग भी कहीं भी, कैसी भी जगह,     किसी के साथ  
भी, किसी भी बेढब मौसम में मैदान में उतर जाते हैं। कई खिलाड़ी तो अपने देश के बोर्ड से बगावत कर भारत सिर्फ पैसे के लिए खेलने आने लगे हैं। उस पर विडंबना देखिए कि जिन खिलाड़ियों के बल-बूते पर यह आयोजन सफल होता है, जिन्हें देखने भीड़ उमड़ती है, उन्हीं की मर्जी- नामर्जी का कोई मूल्य नहीं रहता।  ये बिके हुए खिलाड़ी यह भी प्रतिवाद नहीं कर सकते कि सारे खेल रात को ही हों।  टी. वी. प्रसारण की आमदनी के लालच में जिस दिन दो मैचों के आयोजन की मज़बूरी होती है, वैसे एक चौथाई मैच दोपहर बाद भरी गर्मी में ही शुरू करवा दिए जाते हैं। क्योंकि एक साथ एक ही समय दो मैच होने पर टी.वी. चैनलों पर दर्शकों की संख्या बंटने की स्थिति हो जाती है। जिससे तथाकथित T.R.P. पर फर्क पड़ता है।  अब गुलामों की क्या हैसियत कि मालिकों की इच्छा के विरुद्ध चूँ भी कर सकें ? जैसा कहा जाता है वैसा करने को वे मजबूर होते हैं।

इस तरह के आयोजन की सफलता में सबसे बड़ा हाथ दर्शकों का होता है जो इन तमाशों की असलियत जानते-बूझते हुए  भी अपनी उपस्थिति से इसे सफल बनाते हैं,  भले ही परिस्थितियां कैसी और कितनी भी  प्रतिकूल हों। आज देश के किसी भी स्टेडियम में जहां   I.P.L. खेली जा रही है, वहां दोपहर बाद की धूप से दर्शकों के बचाव के लिए पूरी छत नहीं है। आधे से अधिक दर्शकों को मंहगे टिकट खरीदने पर भी धूप में बैठ कर ही खेल देखना पड़ता है। गर्मी से बचाव तभी हो पाता है, जब सूर्य ढल जाए। पर फिर भी लोग तो जाते ही हैं ! क्या जाने वाले सारे लोग जल की कमी या वातावरण के प्रदूषण से अनभिज्ञ होते हैं ? नहीं ! यही बात और उन लोगों का इस खेल के प्रति प्रेम  इस आयोजन की सफलता का राज है।

घूम-फिर कर  के बात वहीं, जागरूकता पर आ जाती है कि जब तक हम इस जैसे क्षणिक रोमांचों के सुख को त्याग, सामने मुंह बाए खड़ी समस्याओं का सामना करने के लिए एकजुट हो कटिबद्ध नहीं होंगे, तब तक किसी भी समस्या का हल नहीं निकल पाएगा। फिर चाहे वह पानी की हो या हवा के प्रदूषण की !  

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

पड़ना असर थम्स-अप का सलमान पर

जिस तरह अभिनय सम्राट दिलीप कुमार दुखांत फ़िल्में करते-करते उनके आदी हो कुछ गमगीन से रहने लगे थे, ठीक वैसा ही हाल सलमान का इस विज्ञापन को करने के कारण हुआ है। पेय के जबरदस्त स्वाद और फ्लेवर के कारण वे इसको अपने से अलग नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए यह जरूरी है कि पेय के निर्माता द्वारा सलमान के साथ एक आदमी स्थाई तौर पर  नियुक्त किया जाए जो हर समय उनको होने वाली आपूर्ति पर नजर रखे।  जिससे लाखों-करोड़ों दर्शकों के इस चहेते को अपनी जान जोखिम में डालने की जरुरत ना पड़े......... 

जानकारों, डाक्टरों, विशेषज्ञों आदि का कहना है कि आदमी को अपने जीवन में किसी ना किसी हॉबी को जरूर अपनाना चाहिए।  यह किसी भी चीज की हो सकती है, खेलने की, घूमने की, खाने की, बागवानी की, जानवर पालने की यानि किसी भी तरह की हॉबी किसी में भी पल सकती है। हॉबी को हिंदी में शौक और उसे रखने वाले को शौकीन कहते हैं। शौकीन शब्द को हिंदी में कुछ अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता इसीलिए हमारी नई पीढ़ी ने शौक की जगह हॉबी पालना बेहतर समझा। पर शौक हो या हॉबी, उसकी फितरत है कि वह धीरे-धीरे आदत में बदल जाती है। अब आदत का मतलब लत भी होता है और   हमारे पुराने बुजुर्ग कह गए हैं   कि  लत किसी भी
चीज की बुरी ही होती है। इस बात की सच्चाई को जानने के लिए कुछ सर्वे करने की सोची गयी और इसके लिए ऐसे लोगों को चुना गया जो लोकप्रिय हों, प्रतिष्ठित हों और शहर और गांव सब जगह उनकी पहचान हो। 

तो सबसे पहले सर्वे टीम में जो नाम बिना किसी विरोध के उभर कर सामने आया वह था, हिंदी फिल्म जगत के हातिमताई, सबके चहेते, सलमान खान का। चूंकि परदे पर कहानी का पात्र अभिनय करता है, और सर्वे का उद्देश्य "लत" की कहावत की सच्च्चाई को परखना था, इसलिए सारा ध्यान सलमान द्वारा किए गए विज्ञापनों पर, क्योंकि वहां सलमान ही सलमान के रूप में होते हैं, केंद्रित कर आजकल के एक बहुप्रसारित विज्ञापन को चुना गया। गहरे विश्लेषण, खोज और तहकीकात के बाद जो सच सामने आया वह आश्चर्यजनक रूप से कहावत की सच्चाई सिद्ध करता था कि, लत कोई भी अच्छी नहीं होती।
  
यह बात प्रमाणित हुई सलमान के "थम्स-अप" के विज्ञापनों का विश्लेषण करने पर। इस पेय का प्रचार उन्होंने 2002  में शुरू किया था जो अनुबंध समाप्त होने पर बंद हो गया था। इस विज्ञापन को करने के दौरान उन्हें बार-बार इसे पीना पड़ता था और उसके बेहतर स्वाद के कारण वह उन्हें इतना पसंद आ गया था कि मौका मिलते ही उन्होंने फिर उसकी मशहूरी करनी प्रारंभ कर दी। शुरू में तो सब ठीक रहा, अपने दोस्त-मित्रों के साथ दूकान, पार्टी, मॉल वगैरह में जाना थम्स-अप की मांग करना, पीना-पिलाना, पेय की अच्छाइयों को बताना इत्यादि। उनके विज्ञापन से इसकी मांग इतनी बढ़ गयी कि सलमान को भी इसकी कमी का सामना करना पड़ने लगा। तो वे जहां भी इसकी कमी देखते या स्टॉक ख़त्म पाते वहां किसी ना किसी तरह उसे लेकर ही आते और आपूर्ति होने के बाद वहाँ अपनी प्यास बुझाते थे।
फिर चाहे वह कोई दुकान हो, कालेज हो, मॉल हो या पार्टी हो।  उनके द्वारा येन-केन-प्रकारेण की गयी इसकी आपूर्ति की कोशिशों को भी दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। सब कुछ सब को पसंद भी आ रहा था पेय की खपत और लोगों में उसकी मांग भी बढ़ रही थी। पर  किसी ने सल्लू भाई पर इसके पड़ते असर को नहीं आंका। वह बेचारे सब को खुश करने की चाहत में इसकी लत लगा बैठे। सर्वे टीम ने यह बात उनके ताजा विज्ञापन में नोट की, जिसमें स्टॉक ख़त्म होने की बात सुन अपने साथी पर भी ध्यान ना देते हुए, बढ़ी  हुई दाढ़ी और गमगीन चेहरे पर उदास सी मुस्कान के साथ सागर, पहाड़, ऊबड़-खाबड़ राह को नजरंदाज करते हुए अपनी जान को जोखिम में डाल, चलते ट्रक से, बिना उसकी कीमत अदा किए जिस तरह थम्स-अप उठाते हैं वह खतरनाक और नैतिकता के विरुद्ध तो है ही, उसके लिए उनकी दीवानगी  भी चिंताजनक है।

अभियान पूरा होने और कहावत सही सिद्ध होने के उपरांत सर्वे टीम के सदस्यों ने, जो लाखों लोगों की तरह सलमान के जबरदस्त प्रशंसक हैं, देश-विदेश में विशेषज्ञों से सलाह की।   जिसका निष्कर्ष यह निकला कि
जिस तरह अभिनय सम्राट दिलीप कुमार दुखांत फ़िल्में करते-करते उनके आदी हो कुछ गमगीन से रहने लगे थे, ठीक वैसा ही हाल सलमान का इस विज्ञापन को करने के कारण हुआ है। पेय के जबरदस्त स्वाद और फ्लेवर के कारण वे इसको अपने से अलग नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए यह जरूरी है कि पेय के निर्माता द्वारा सलमान के साथ एक आदमी स्थाई तौर पर  नियुक्त किया जाए जो हर समय उनको होने वाली आपूर्ति पर नजर रखे।  जिससे लाखों-करोड़ों दर्शकों के इस चहेते को अपनी जान जोखिम में डालने की जरुरत ना पड़े। प्रस्ताव सर्व-सम्मति से पास हो गया है और सलमान को भी इसकी सूचना दे दी गयी है। 

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