काम पर जाने वाले हम जैसे लोग, हाथ में पानी का लोटा या जग लिए घर के दरवाजे पर खड़े रहते थे कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार, स्वागत कर अपने काम पर जाएं। देर हो रही होती थी, पर आफिस के बॉस से तो निपटा जा सकता था घर के बास से कौन पंगा ले, वह भी तब, जब बात धर्म की हो, आस्था की हो। वैसे निश्चिंतता इस बात से भी रहती थी कि आज के दिन तो आफिस का बॉस भी "अपने बॉस" से डरता अपने घर लोटा लिए खड़ा होगा .……
आज सुबह, करीब पौने सात का समय था, थोड़ी हवाखोरी के लिए निकला तो देखा बच्चियों के झुण्ड हाथ में प्लेट नुमा थाली लिए आ-जा रहे हैं। उनके साथ ही दो-तीन नन्हें बालक, जिन्हें "लैंकडा" कहा जाता है वे भी काफी व्यस्त दिख रहे थे। सुबह-सुबह सारे बच्चे नहाए-धोए, टीप-टॉप नज़र आ रहे थे। बच्चियों के कंधों पर बाकायदा पर्स नुमा बैग लटके हुए थे। कमाई और उपहार सहेजने के लिए। नवरात्र की अष्टमी जो थी, कमाई के साथ-साथ मौज-मस्ती का दिन। बच्चों को तो मौज-मस्ती का कोई न कोई बहाना चाहिए। उन्हें ना खाने से मतलब होता है ना पैसों से। रोजमर्रा के बंधे-बधाए नियमों से छुटकारा ही उनको प्रफुल्लित करने के लिए बहुत होता है। नहीं तो इन्हें ही रोज स्कूल भेजने के लिए सुबह उठाते-उठाते माँ-बाप की परेड हो जाती है। कुछ सालों पहले स्कूल वगैरह में इन दिनों लंबी छुट्टियां हुआ करती थीं। हड़बड़ाहट नहीं होती थी, सो ऐसे दृश्यों की शुरुआत साढ़े आठ-नौ बजे दिन से शुरू होती थी। परसमय के साथ घटती छुट्टियों और बढ़ती आपा-धापी ने इस उत्सव के साथ भी तनाव को जोड़ दिया है। अल-सुबह कार्यक्रम की शुरुआत होने लगी है। आस्तिक गृहणियां इन दिनों सदा से ही चिंतित रहती हैं, कन्याओं की आपूर्ती को लेकर। जरा सी देर हुई और कहीं अघाई कन्या ने खाने से इंकार कर दिया तो हो गया अपशकुन। इसीलिए होड़ रहती है पहले अपने घर कन्या बुला कर जिमाने की। हैं तो आखिर बच्चियां ही ना ! कम-ज्यादा
वर्षों के बाद इस बार इन दिनों दिल्ली में होने का सुयोग मिला है। तो फिर पुरानी यादें ताजा हो गयीं हैं। अस्सी
के दशक की याद आती है। दिल्ली में हमारी कालोनी में, खास कर अष्टमी के दिन, कैसे आस - पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता था। सप्तमी की रात से ही कंजकों की बुकिंग शुरु हो जाती थी। फिर भी सबेरे-सबेरे 'हरकारे' दौड़ना शुरु कर देते थे। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं ? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी ? "पिंकी" आ कर फिर कहाँ चली गयी ? कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है !
इधर काम पर जाने वाले हम जैसे लोग, हाथ में लोटा - जग लिए घर के दरवाजे पर खड़े रहते थे कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार, स्वागत कर अपने काम पर जाएं। देर हो रही होती थी, पर आफिस के बॉस से तो निपटा जा सकता था, घर के इस बास से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो। वैसे निश्चिंतता इस बात से भी रहती थी कि आज के दिन तो आफिस का बॉस भी "अपने बॉस" से डरता अपने घर लोटा लिए खड़ा होगा ।





