ओसामा को तलाशने और मार गिराने में अमेरिका के सील कमांडो ने बिना किसी शारिरिक क्षति के अपने काम को निर्धारित समय में पूरा कर सारे संसार में अपनी धाक जमा दी। यह सब उस कठोर ट्रेनिंग के कारण संभव हो पाया था जिसे करने के दौरान करीब 80 प्रतिशत कैडेट बीच में ही मैदान छोड़ देते हैं। पर जो इसे पूरा कर लेते हैं वे इस्पात साबित होते हैं।
जिज्ञासा होना जरूरी है कि इनके मुकाबले हमारे कमांडो कहां ठहरते हैं। तो यह खुशी का विषय है कि हमारे ‘मरीन कमांडो’ जिन्हें मारकोस के नाम से जाना जाता है, किसी भी दृष्टि से सील से कम नहीं ठहरते हैं। उनकी ट्रेनिंग भी सील जितनी ही कठोर होती है, कई मायनों में तो उनसे भी ज्यादा कठिन होती है। तभी तो अपनी ट्रेनिंग के दौरान सील भारत आ अपने को और बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हमारे कमांडो अमेरिका और ब्रिटेन जा कर करते हैं।
मारकोस की ट्रेनिंग अलसुबह शुरु हो जाती है जिसमें कसरत के साथ-साथ 18 किलो का वजन उठा कर 30 किमी की दौड़, मार्शल आर्ट्स, हर तरह के हथियारों का संचालन, पैराशूट और फ्री फाल जंप, उड़ते हेलीकाप्टर से रस्सी के सहारे उतरना, टार्च की रौशनी या अंधेरे में भी अचूक निशाना लगाना, साढे छह मिनट में 400 मीटर की दूरी पार करते हुए रास्ते में अचानक उभरते ‘टारगेट’ को निशाना बनाने जैसे दुष्कर कार्यों को पूरा करना पड़ता है। मारकोस का नारा ही है कि “जीतने के लिए ही हम लड़ते हैं।”
पर अपने देश में ढेरों विड़म्बनाओं की तरह ही यहां भी कुछ ऐसा ही है। जहां अमेरिका में सील का वेतन दो लाख रुपये माहवार है वहीं हमारे मारकोस को मिलते हैं अठ्ठाइस हजार रुपये। पैसे की बात ना भी करें पर देश के हित का सोच अपना खून-पसीना एक कर, इतने कठोर प्रशिक्षण और हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर जो लियाकत और उपलब्धि हासिल की, समय आने पर बहुतेरे मारकोस उसका उपयोग देश की सेवा या सुरक्षा में कर ही नहीं पाते। पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय देश का अहित करने वाले नेताओं की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे।




