मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अमर्यादितता छिछलेपन को दर्शाती है

किसी पद पर नियुक्ति के पहले, वर्षों का अनुभव होने के बावजूद, संस्थाएं नए कर्मचारी को कुछ दिनों का प्रशिक्षण देती हैं। नई नौकरी पाने वाले को प्रशिक्षण-काल पूरा करना होता है। अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी संस्था में ज्यादातर लोग निचले स्तर से शुरू कर ही उसके उच्चतम पद पर पहुंचते हैं। तो फिर राजनीति में ही क्यों अधकचरे, अप्रशिक्षित, अनुभवहीन लोगों को थाली में परोस कर मौके दे दिए जाते हैं ?

कहावत है कि, यथा राजा तथा प्रजा।  पर समय बदल गया है और इसके साथ-साथ हर चीज में बदलाव आ गया है। कहावतें भी उलट गयी हैं। अब यथा प्रजा तथा राजा हो गया है। जैसे प्रजा में असहिष्णुता, असंयमिता, अमर्यादितता तथा विवेक-हीनता बढ़ रही है वैसे ही गुण लिए जनता से उठ कर सत्ता पर काबिज होने वाले नेता यानी आधुनिक राजा हो गए हैं। 
वर्षों से गुणीजन सीख देते आये हैं कि जुबान पर काबू रखना चाहिये। पर अब समय बदल  गया है। जबान की मिठास धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। खासकर राजनीति के पंक में लिथड़े अवसरवादी और महत्वाकांक्षी लोगों ने तुरंत ख़बरों में छाने और अपने दल की  अग्रिम पंक्ति में स्थापित होने के लिए यह रास्ता अख्तियार किया है। इसका फायदा यह है कि एक ही झटके में उस गुमनाम-अनजान अग्नि-मुख का नाम हरेक की जुबान पर आ जाता है, रातों-रात वह खबरों में छा अपनी पहचान बना लेता है। कुछ हाय-तौबा मचती है पर वह टिकाऊ नहीं होती। अगला हंसते-हंसते माफी-वाफी मांग दल की जरुरत बन जाता है। यह सोचने की बात है कि इस तरह की अनर्गल टिप्पणियों की निंदा या भर्त्सना होने के बावजूद लोग क्यों जोखिम मोल लेते हैं। समझ में तो यही आता है कि यह सब सोची समझी राजनीति के तहत ही खेला गया खेल होता है। इस खेल में ना कोई किसी का स्थाई दोस्त होता है नही दुश्मन। सिर्फ और सिर्फ अपने भले के लिए यह खेल खेला जाता है। इसके साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों में गहराई नहीं होती, अपने काम की पूरी समझ नहीं होती इन्हीं कमजोरियों को छुपाने के लिए ये अमर्यादित व्यवहार करते हैं।  इसका साक्ष्य तो सारा देश और जनता समय-समय पर देखती ही रही है।

कभी-कभी नक्कारखाने से तूती की आवाज उठती भी है कि क्या सियासतदारों की कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए, क्या देश की बागडोर संभालने वालों की लियाकत का कोई मापदंड नहीं होना चाहिए? जबकि किसी पद पर नियुक्ति के पहले, वर्षों का अनुभव होने के बावजूद, संस्थाएं नए कर्मचारी को कुछ दिनों का प्रशिक्षण देती हैं। नई नियुक्ति के पहले नौकरी पाने वाले को प्रशिक्षण-काल पूरा करना होता है। शिक्षक चाहे जब से पढ़ा रहा हो उसे भी एक ख़ास कोर्स करने के बाद ही पूर्ण माना जाता है। अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी संस्था में ज्यादातर लोग निचले स्तर से शुरू कर ही उसके उच्चतम पद पर पहुंचते हैं। तो फिर राजनीति में ही क्यों अधकचरे, अप्रशिक्षित, अनुभवहीन लोगों को थाली में परोस कर मौके दे दिए जाते हैं ? कम से कम उन्हें संयम की, मर्यादा की, नैतिकता की, मृदु भाषिता की सीख तो दी ही जा सकती है।

यह जग जाहिर है कि किसी के कटु वचनों पर उनके पाले हुए लोग तो ताली बजा सकते हैं पर आम जनता को ऐसे शब्द और उनको उवाचने वाला नागवार ही गुजरता है। बड़े और अनुभवी नेताओं को ऐसे लोगों की अौकात पता भी होती है, पर चाह कर भी वे ऐसे लोगों को रोक नहीं पाते क्योंकि किसी न किसी  स्वार्थ के तहत इन लोगों को झेलना उनकी मजबूरी बन जाती है और यही बात ऐसे लोगों की जमात बढ़ते जाने का कारण बनती जा रही है।      



रविवार, 7 दिसंबर 2014

सीख तो किसी से भी ली जा सकती है

इस बार आगामी जनवरी माह में "परिकल्पना" परिवार द्वारा चौथे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन  हमारे छोटे मगर प्यारे पड़ोसी देश भूटान में होने जा रहा है। है तो यह बेहद छोटा सा देश पर इसने अपने सुदृढ़ भविष्य के लिए जो किया है शायद वैसा करने की हम हिम्मत भी नहीं कर सकते !


पचीसों साल बंगाल में रहने और अदम्य इच्छा के बावजूद कभी देश के नक़्शे में और ऊपर स्थित सप्त बहानियों के यहां जाना संभव नहीं हो पाया, फिर शस्य-श्यामला धरती छूटने के बाद तो वहाँ जाना और भी मुश्किल हो गया था। पर इस बार आगामी जनवरी माह में "परिकल्पना" द्वारा चौथे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन  हमारे छोटे मगर प्यारे पड़ोसी देश भूटान में होने की वजह से मेरा एक स्वप्न जैसे साकार होने जा रहा है। है तो यह बेहद छोटा सा देश पर इसने अपने सुदृढ़ भविष्य के लिए जो किया है शायद वैसा करने की हम हिम्मत भी नहीं कर सकते। क्योंकि हम ज्यादातर भूत काल  में जीते हैं, अपने गौरवमय अतीत की दुहाई देते हैं, बातें ज्यादा करना हमारा शगल है, पर जब काम करने की बारी आती है तो हम दूसरों का मुंह जोहने लगते हैं। यहां तक कि यदि कोई कुछ अच्छा करना भी चाहता है तो उसकी टांग खींचने से बाज नहीं आते। यही कारण है कि सदियों से जगद्गुरु  होने का दावा करने वाला हमारा  देश आज कहां आ खडा हुआ है ?  चारों ओर भ्रष्टाचार, बेईमानी, चोर-बाजारी का आलम है । कारण शीशे की तरह साफ है। साफ सुथरी छवि वाले, पढ़े-लिखे, ईमानदार, देश-प्रेम का जज्बा दिल में रखने वालों के लिए सत्ता तक पहुँचना एक सपना बन गया है। धनबली और बाहुबलियों के सामने सत्ता तक पहुँचना साधारण नागरिक के लिए  दुरूह कार्य हो गया है।

वहीं शायद हमारी राजनीति और लाल फीताशाही का दुष्प्रभाव देख भूटान ने  निचले स्तर से ही योग्य लोगों को अवसर देने के लिए कमर कस ली है। जिसके चलते  उसने अपने स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए भी कुछ मापदंड तय कर दिए हैं। उसके लिए पढ़े-लिखे योग्य व्यक्तियों को ही मौका देने के लिए पहली बार लिखित और मौखिक परीक्षाओं का आयोजन किया गया है। इसमें प्रतियोगियों की पढ़ने-लिखने की क्षमता, प्रबंधन के गुण, राजकाज करने का कौशल तथा कठिन समय में फैसला लेने की योग्यता को परखा जाएगा। इस छोटे से देश ने अच्छे तथा समर्थ लोगों को सामने लाने का जो कदम उठाया है, क्या हम उससे कोई सीख लेने की हिम्मत कर सकते हैं ?

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

बहुत टेंशन है

पति बोला,  देखा मेरा कारनामा, मैने खटिये को इतना पीटा, तुम्हें छुआ भी नहीं। पत्नी भी कहां कम थी बोली, मैं भी गला फाड़ कर चिल्लाई, रोई मैं भी नहीं। इतने में मेहमान ने कमरे में आते हुए कहा, मैं भी ऐसे ही बाहर बैठा था, गया मैं भी नहीं।

सब जानते हैं  कि तनाव सेहत के लिए ठीक नहीं होता पर आज की जीवन शैली ने परिस्थितियां ही कुछ ऐसी बना दी हैं कि  हर दूसरा व्यक्ति इससे ग्रस्त  मिलता है। अपवाद भी हैं जैसे, कुछ लोग अपने-आप को व्यस्त दिखाने के लिए ऐसा दिखने की कोशिश करते हैं, तो कुछ ऐसा दिखावा करना अपना बड़पन्न समझते हैं तो कुछ महानुभाव एवंई बिना बात के ही, "काजी जी परेशान क्यों ? शहर के अंदेशे से" की तर्ज पर टेंशनाए घूमते रहते हैं। इनकी बात छोड़ें तो कोई भी इंसान तनाव को जान-बूझ कर मोल नहीं लेता यह बला तो खुद ब खुद गले आ पड़ती है। 
यह कहना बहुत आसान है कि अरे भाई टेंशन मत लो, पर कहने और होने में बहुत फर्क होता है। सभी जानते हैं , पर कोई क्या इसे जान-बूझ कर पालता है ? फिर भी कोशिश तो की जा सकती है इसे कम करने के लिये। मेरे एक डाक्टर मित्र ने मुझे तनाव मुक्त होने के पांच गुर बताये हैं। फायदा ज्यादा नुक्सान कुछ नहीं। बिना टेंशन के आप इन्हें आजमा सकते हैं। 

1 :- तनाव में सांस की प्रक्रिया आधी रह जाती है। इसलिये दिमाग में आक्सीजन की कमी को दूर करने के लिये गहरी सांस लें।

2 :- तनाव के क्षणों में चेहरा सामान्य बनाए रखें। क्योंकि स्नायुतंत्रं की जकड़न से शरीर पर बुरा असर पड़ता है। थोड़ा मुस्कुराने की चेष्टा करें। ऐसा करने से मष्तिष्क में रक्त संचार बढ़ता है।   भृकुटि तनने से 72 मांसपेशियों को काम करना पड़ता है। मुस्कुराने में सिर्फ 14 को। इसलिये ना चाहते हुए भी मुस्कुरायें। 

3 :- सर्वे में देखा गया है कि तनाव में शरीर खिंच जाता है, भृकुटि तन जाती है, गाल पर रेखायें खिंच जाती हैं। तनाव ग्रस्त इंसान कंधे झुका, सीने-गर्दन को अकड़ा, माथे पर हाथ रख, गुमसुम हो जाता है। इससे रक्त संचरण कम हो जाता है तथा तनाव और बढ़ जाता है। इससे बचने के लिये, करवट बदलिये, बैठने का ढ़ंग बदलिये। खड़े हैं तो बैठ जायें, बैठे हैं तो खड़े हो जायें या लेट जायें। कमर सीधी रखें। पेट को ढ़ीला छोड़ दें, आराम से सांस लें। इतने से ही राहत का एहसास होने लगेगा।

4 :- तनाव में अनजाने में ही जबड़े, गर्दन, कंधे और पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिससे शरीर में जकड़न आ जाती है। हर मनुष्य की यह जकड़न, गठान अलग-अलग होती है। इसे सामान्य रखने की कोशिश करनी चाहिये।

5 :- तनाव के क्षणों में कोई भी काम करने से पहले थोड़ा रुकें। क्या हो रहा है, इस पर थोड़ा सोचें। जल्दि या हड़बड़ी में निर्णय लेने से तनाव बढ़ सकता है। सबसे बड़ी बात, सकारात्मक सोच ही तनाव से मुक्ति दिलाने के लिये काफी है।

यह तो रही डाक्टर की सलाह। लगे हाथ मेरी भी सुन लें। आजमाया हुआ नुस्खा है। अपना बड़पन्न  भूल कर
कार्टून देखें, समय हो तो कोई हास्य फिल्म, पूरी ना सही उसका कुछ ही हिस्सा देख लें। नहीं तो यह चुटकुला तो है ही, जो  पंजाबी में लयबद्ध रूप में है, हिंदी में पढ़वाता हूं।  पूराना है पर असरकारक है :-

बंता के घर रात को अनचाहा मेहमान आ गया। पति-पत्नी ने उसे भगाने की एक तरकीब निकाली। मेहमान को बाहर बैठा दोनों अंदर कमरे में जा जोर-जोर से लड़ने लगे। फिर पत्नी  के पिटने और उसके जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। इसे सुन मेहमान उठ कर घर के बाहर चला गया। बंता ने झांक कर देखा तो मेहमान नदारद था। उसने पत्नी से कहा, देखा मेरा कारनामा, मैने खटिये को इतना पीटा, तुम्हें छुआ भी नहीं। पत्नी भी कहां कम थी बोली, मैं भी तो गला फाड़-फाड़  कर चिल्लाई, रोई मैं भी नहीं। इतने में मेहमान ने कमरे में आते हुए कहा, मैं भी ऐसे ही बाहर जा बैठा था, गया मैं भी नहीं।
(पति - देक्खी मेरी चतुराई, डांग नाल  कित्ती मंजी दी कुटाई, तैन्नू छूया बी नईं। 
पत्नी - मैं बी तां  संग फाड़  चिल्लाई,  रोई मैं बी नईं।   
तभी मेहमान कमरे में आ बोला -  मैं बार जा खलोत्ता, गया मैं बी नईं।)
डांग = डंडा,  नाल = साथ,  मंजी = खटिया, संग = गला, खलोत्ता = खड़ा      

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

बाबाओं से कब बाज आएंगे हम

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, तकरीबन साल भर पहले की ही बात है जब एक बाबा के कारण देश में हंगामा मचा हुआ था। तब भी लोगों को ऐसे तथाकथित संतों से बचने की समझाइश, सोच समझ कर किसी पर विश्वास करने की नसीहत दी गयी थी। पर हुआ कुछ नहीं पहले की तरह ही लोग फिर अपनी नित की परेशानियों, समस्याओं, कष्टों को फौरी तौर से  दूर करने की चाहत के चलते तिकड़मबाजों के चंगुल में फसते चले गए। 

आज फिर एक तथाकथित बाबा को ले कर कोहराम मचा हुआ है। प्रिंट और दृश् मीडिया होड ले रहे हैं उसकी बखिया उधेडने की। पर इसके पहले ढेरों विवादों, दसियों आरोपों के बावजूद उस पर किसी ने ऊंगली उठाने की जहमत या हिम्मत नहीं दिखाई ? कारण साफ है, उस आदमी का रसूख और असीमित जन-सहयोग, जो बाबा के एक इशारे से वोट बैंक बन जाता है, उसे हासिल होती है उच्च पदों पर बैठे हुओं की सरपरस्ती। तो कौन बेवकूफी करेगा बाबा रूपी छत्ते को छेड़ कर मधुमक्खियों के खौफ का सामना करने का। तिकड़मी, मौका-परस्त, बिना जनाधार के धन और बाहुबल से मुखिया बने लोगों की अपनी कुर्सी और सत्ता बचाने की लालसा जन्म देती है ऐसे ही लोलुप लोगों को जो अपनी रोटी सेकने के लिए कुछ भी करने और किसी हद तक जाने को तत्पर रहते हैं और आम इंसान वर्तमान की जद्दोजहद से त्रस्त हो सुखद भविष्य की चाह में इनके मकड़जाल में फसता चला जाता है। 

हमारे देश में परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गरीबों, अशिक्षित लोगों, गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा तथा कुछ हद तक भोजन की भी व्यवस्था होती रहती थी धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से सच्चे संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया था। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा ऐसी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए। युवा पीढी के कुछ भटके नवजवान भी सहज ढंग से मिलने वाली सहूलियतों के लालच में ऐसे ढोगियों का साथ देने लगे। धीरे-धीरे पुरानी परम्राएं ध्वस्त होती गयीं और ऐसी जगहें असमाजिक तत्वों की गिरफ्त में आ बुराइयों का अड्डा बनती चली गयीं।

इसी संदर्भ में वर्षों पहले की एक सच्ची बात याद आ रही है। तब के कलकत्ता में मेरे कॉलेज में एक लड़का हुआ करता था जो शनैः - शनैः  नेता बनने के पथ पर अग्रसर था। पढ़ाई को छोड़ उसका दिमाग हर चीज में तेज था। उसने कॉलेज में यह फैला दिया था कि उसकी पहुँच विश्वविद्यालय में रसूख वाले लोगों तक है और वह वहाँ कोई भी काम करवा सकता है। काम होने पर ही पैसे लगेंगे न होने की सूरत में सब वापस हो जाएगा।  धीरे-धीरे उसके पास गांठ के पूरे दिमाग के अधूरे छात्रों का जमावड़ा लगने लगा जो किसी भी तरह पास हो डिग्री पाना चाहते थे। परीक्षा ख़त्म होते ही ये उनसे अच्छी-खासी रकम ले अपने घर जा बैठ जाता था। अब सौ-पचास छात्रों में बीस-तीस तो अपने बूते पर किसी तरह पास हो ही जाते थे।  ये उनके पैसे रख बाकियों के लौटा देता था। इस तरह इसने अच्छा-खासा व्यापार शुरू कर रखा था, जिसमें न हरड़ लगती थी नाहीं फिटकरी। पर जैसा कि होता है किसी तरह इसकी पोल खुल गयी, हुआ तो कुछ नहीं पर धंदा बंद हो गया।

ठीक यही कार्य-शैली इन तथाकथित बाबाओं की है। सीधे-साधे लोगों के अंधविश्वास, अकर्मण्यता, मानसिक कमजोरियों, भविष्य के डर, धर्मांधता का पूरा फ़ायदा उठा ये ढोंगी अपना वर्तमान और भविष्य संवारते चले जाते हैं।  बार-बार धोखेबाजों, अवसर परस्तों, ढोगियों द्वारा भोली-भाली जनता को ठगे जाने, उनकी भावनाओं का फायदा उठाने वालों की असलियत सामने आने पर भी ऐसे लोगों की जमात की बढोतरी चिंता का ही विषय है। कब हम समझ पाएंगे कि खुद को भगवान कहलवाने वाले की क्या मानसिकता है, क्या वह इस लायक भी है कि वह इंसान कहलवा सके ? कब हम इस तरह के स्वघोषित "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत उठाएंगे, भगवान ही जाने।

रविवार, 16 नवंबर 2014

बैंक लोन के साथ तनाव मुफ्त

पिछले शनिवार, 15 नवंबर को दैनिक भास्कर पत्र के "असंभव के विरुद्ध" कालम में श्री कल्पेश याग्निक जी का बैंक लोन पर लेख पढ़ कर ऐसा लगा जैसे किसी ने दुखती राग पर हाथ रख दिया हो। वे दिन याद आ गए जब बैंकों के लुभावने इश्तहार देख कर 2006 में छोटे बेटे की शिक्षा के लिए बैंक से लोन लेने की हिमाकत की थी। तब यह भी हकीकत सामने आई कि यह बैंक बने किनके लिए हैं। 

"किसी तरह" हफ़्तों की दौड़-धूप के बाद ऋण प्राप्त हो गया। उस समय बैंक के अधिकारी महोदय ने लोन पर लगने वाले ब्याज के दो रूप बताए, पहला जो सदा एक सा रहता है।  दूसरा जो आर्थिक नीतियों के साथ घटता-बढ़ता रहता है। उन्होंने ही पहले वाले रूप को अख्तियार करने की सलाह भी दी। बात हो गयी। ऋण मिल गया। किश्तों का भुगतान भी संख्या को 'पूर्ण' करने के लिए  निर्धारित रकम से 25-50 रुपये ज्यादा ही दिए जाते रहे। छ: - सात साल निकल गए, कभी भी किस्त चुकाने में कोई गफलत नहीं हुई पर अचानक 2013 में बैंक के वकील की तरफ से एक नोटिस मिला कि आपकी तरफ 250000/- की रकम पेंडिग है, जिसे तुरंत न चुकाने पर आप पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। साथ ही चल-अचल संपत्ति की नीलामी की धमकी भी दी गयी थी। यहां तक कि बिना पूरी जांच  किए  इस मनगढ़ंत कार्यवाही के खर्च के रूप में 2600/- के भुगतान को भी मेरे सर डाल दिया गया था। जबकि अभी भी लोन की बाक़ी रकम को लौटाने में करीब चार साल बचे हुए थे। इस नोटिस की एक प्रति लोन लेते समय मेरी 'ग्रांटर' बनी मेरी बहन को भी भेज दी गयी, जिससे उनका तनाव ग्रस्त होना स्वाभाविक था। पूरा परिवार पेशोपेश में पड़ गया था। कानूनी पत्र का उत्तर भी कानूनी टूर से दिया जाना ठीक समझ अपने वकील द्वारा सारी बात बता कैफियत माँगने पर बैंक के तथाकथित जिम्मेदार अफसरों ने बताया कि मेरे ऋण पर ब्याज दर तीन प्रतिशत बढ़ा दी गयी है। उसी के कारण मुझे नोटिस भेजा गया है। मेरे द्वारा पूछने पर कि इस बढ़ोत्तरी के बारे में मुझे सूचित क्यों नहीं किया गया, तो बैंक में किसी के पास इसका जवाब नहीं था। एक बार मन तो हुआ कि मान-हानि का दावा कर दिया जाए, पर फिर मध्यम वर्ग की मजबूरी और मानसिकता, जिसका फायदा अक्सर उठाया जाता रहा है, के चलते मामला ख़त्म कर दिया गया। 

मन में आक्रोश तो बना ही रहता है, कल्पेश जी के लेख ने उसे फिर ताजा कर दिया। 

गगन शर्मा 
gagansharma09@gmail.com                                                

बुधवार, 5 नवंबर 2014

लंबा इतिहास है खूनी दरवाजे का

इतनी रक्तरंजित घटनाओं का गवाह बनने का यह नतीजा निकला कि अवाम ने  इस जगह को अभिशप्त और मनहूस मान लिया और इसे "खूनी दरवाजे" का नाम अता कर दिया गया।

दरवाजे की इमारत 
दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के पास बहादुरशाह जफ़र मार्ग के "डिवाइडर" पर एक दरवाजेनुमा इमारत खडी है। पर यह उन 14 दरवाजों में से नहीं है जिन्हें शाहजहाँ ने शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) को दीवाल से घेरने के बाद उसमें बनवाए थे। इसका निर्माण तो वर्षों पहले 1540 में शेरशाह सूरी ने अपने राज्य के अंतर्गत आने वाले फीरोजाबाद के प्रवेश द्वार के रूप में करवाया था।  उस समय अफगानिस्तान से आने वाले व्यापारियों इत्यादि को इसी में से होकर गुजरना पड़ता था।  करीब 51 फ़ीट ऊंचे दरवाजे की तीन मंजिलें हैं जो अंदर बनी सीढ़ियों से जुडी हुई हैं। किसी अलग मकसद से बनाए
गए इस दरवाजे को और इसके बनाने वालों को भी कहाँ अंदाज था कि भविष्य में यह इमारत अभिशप्त कहलाने लग जाएगी।  

सीलबंद प्रवेश 

# इसकी बदकिस्मती तब शुरू हुई जब जहाँगीर ने अपने वालिद अकबर के नवरत्नों में से एक, अब्दुल रहीम खानखाना को अपने खिलाफ बगावत करने के दंड स्वरूप उसके  बेटों को  मरवा कर उनके शरीर को सड़ने के लिये यहां लटकवा दिया था। उसके बाद जो एक के बाद एक नृशंस घटनाएं यहां घटनी शुरू हुईं उनका अंत आज तक नहीं हो पाया है।   

# फिर नादिरशाह ने जब दिल्ली को लूटा और कत्ले-आम का हुक्म दिया तो सबसे ज्यादा रक्तपात भी इसी जगह हुआ था।

# समय के साथ जब औरंगजेब दिल्ली का शासक बना तो निरंकुश राज्य करने के लिए उसने अपने भाई दारा शिकोह को मार कर उसका सर भी यहीं टंगवा दिया था। 

# इतिहास अपने को दोहराता रहा। 22 सितम्बर 1857 को बहादुरशाह जफर के आत्मसमर्पण के बावजूद अंग्रेज कमांडर विलियम हडसन ने बहादुरशाह के तीन शहजादों, मिर्जा मुगल, मिर्जा खिज्र सुल्तान  और पोते मिर्जा अबू बकर को हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार  करने के बाद अपने खिलाफ जनता के विरोध को देखते हुए हड़बड़ी में इसी जगह की सुनसानियत का फ़ायदा उठा उन्हें यहीं लाकर  उनका क़त्ल कर दिया  था।      

रख-रखाव का अभाव 
# इतने खून-खराबे के बाद भी इसकी बदनामी का अंत नहीं हुआ। देश को आजादी मिलने के पश्चात 1947 में हुए दंगों में भी इस दरवाजे पर काफी रक्तपात हुआ था। शरणार्थी शिवरों की ओर जाते अनेक लोगों को यहां  पर मौत के घाट उतार दिया गया था।


# इसे इसकी बदकिस्मती ही कहेंगे कि देश की राजधानी में स्थित होने के बावजूद 2002 में  फिर इस जगह को नापाक साबित करते हुए कुछ दरिंदों ने एक युवती के साथ यहां शर्मनाक कृत्य को अंजाम दिया।  उसी के बाद इस स्थान को पूरी तरह सील कर प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर  दिया गया है।   

बदहाल स्थिति 
इतनी रक्तरंजित घटनाओं का गवाह बनने का यह नतीजा निकला कि अवाम ने  इस जगह को अभिशप्त और मनहूस मान लिया और इसे "खूनी दरवाजे" का नाम अता कर दिया गया। इसे क्या कहेंगे कि जिस बहादुरशाह जफ़र के नाम पर इस मार्ग का नामकरण हुआ है उसी के शहजादों को इसी सड़क पर  क़त्ल कर दिया गया था।

आज यह दरवाजा भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक है। पर उस रख-रखाव का पूर्णतया अभाव है जो की ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को मिलना चाहिए। 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

हनुमान जी की स्वचालित प्रतिमा, नयी दिल्ली

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी चीज को हम अक्सर देखते हैं फिर भी उसके बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते। ऐसी ही एक जानकारी जब करोल बाग मेट्रो स्टेशन के पास बनी हनुमान जी की विशाल प्रतिमा के बारे में पता लगी तो विस्मित होना स्वाभाविक ही था। इतनी बार इधर से गुजरना होता रहा पर यह नहीं पता था कि इस प्रतिमा में स्वचालन से भी कुछ होता है। दिल्ली में रहने वाले और रोज उधर से गुजरने वाले अधिकाँश लोगों को भी यह बात पता नहीं है।

कुछ दिनों पहले अपनी पोस्ट "भूली भटियारी"  की खोज-खबर के सिलसिले में जब करोल बाग में यहां आना हुआ तब पता चला कि हनुमान जी की 108 फुट की यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वचालित प्रतिमा है। हनुमान जी की छाती में उनके हाथों के पीछे श्री राम-सीता विराजमान हैं।  मूर्ती के हाथ की उँगलियां स्वचालित हैं। जब वे हटती हैं तो ऐसा लगता है जैसे हनुमान जी ने अपनी छाती फाड़ कर श्री राम-सीता को प्रगट किया हो।

http://www.youtube.com/watch?v=_LO7uOVSuxE 
लिंक पर प्रतिमा का स्वचालन देखा जा सकता है। 

बताया जाता है कि अरसा पहले एक संत नागबाबा सेवागिरी जी महाराज घूमते-घूमते यहां आ पहुंचे। तब यहां शिवजी की धूनी और हनुमान जी की छोटी-छोटी मूर्तियां विद्यमान थीं।  प्रभुएच्छा से बाबा जी का मन यहां रम गया और वे यहीं अपनी तपस्या में लीन हो गए। वर्षों की आराधना के फलस्वरूप हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए और वहां एक मंदिर के निर्माण का निर्देश दिया।  प्रभू के आदेशानुसार हनुमान जी की प्रतिमा और मंदिर का निर्माण 13.05.1994 से आरम्भ हुआ जो लगातार 13 वर्षों तक चलते हुए  02 अप्रैल, 2007 को सम्पन्न हुआ। हनुमान जी की प्रतिमा को नई तकनीक से बनाते हुए उसे स्वचालित रूप दिया गया है। इसमें हनुमान जी अपनी छाती फाड़ते हैं और भक्तों को  भगवान श्री राम व  सीताजी के दर्शन  होते हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए अपार जन समूह के उमड़ने से होने वाली दिक्कतों को देखते हुए मंदिर के ट्रस्ट ने इस स्वचालन की क्रिया को केवल मंगलवार व शनिवार को प्रातः 8.15 बजे और सांय 8.15 बजे के लिए निर्धारित कर दिया है।

बाबाजी ने ज्वालाजी, हिमाचल प्रदेश, से  माँ की ज्योति 30 मार्च, 2006 को यहां लाकर स्थापित की जो तबसे  निरन्तर प्रज्जवलित है।  समय के साथ-साथ मंदिर का विस्तार होता चला गया और अब शिव जी की धूनी के अलावा माँ वैष्णव देवी, शनि देव के साथ ही शिरडी के सांई बाबा के दर्शन भी यहां भक्तों को  उपलब्ध हैं।                
अपने संकल्पानुसार सेवागिरी महाराज मंदिर निर्माण कार्य पूरा होते ही 25 जनवरी, 2008 को अपना शरीर त्याग कर प्रभू की शरण में चले गये।  मंदिर में उसी स्थान पर उनकी समाधि बना दी गयी जहां अब हर वर्ष 25 जनवरी के दिन उनकी याद में भण्डारा कराया जाता है।

तो यदि अभी तक सिर्फ मेट्रो रेल के अंदर से या सड़क मार्ग से गुजरते हुए ही इनके दर्शन किए हों तो अब ज़रा रुक कर इसकी भव्यता को निहारें और कोशिश करें की समयानुसार मंगल या शनिवार को सुबह या शाम 8. 15 पर वहाँ पहुँच प्रतिमा का स्वचालन देख सकें। 

विशिष्ट पोस्ट

यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...