pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 14 जुलाई 2014

"माले मुफ्त का" ऐंटी रिएक्शन

दृश्य एक :- सात-आठ एकड़ की खेती लायक जमीन के मालिक श्री साहू जी अपनी सेहत ठीक न होने के कारण किसी सहायक के न मिलने से परेशान थे।  एक दिन उन्हें अपना पुराना कामदार दिखाई पड़ा तो उन्होंने उसे फिर काम पर रखना चाहा तो उसने साफ मना कर कहा कि वह अब बेगार नहीं करता। एक ही गांव के होने के कारण साहू जी जानते थे कि वह दिन भर निठ्ठला घूमता है, नशे का भी आदी है. पर कर क्या सकते थे. एक दो साल के बाद तंग आकर मजबूरी में उन्होंने दुखी मन से अपनी आधी जमीन एक बिल्डर को बेच डाली। अब वहाँ धान की जगह कंक्रीट की फसल उगेगी।                 

दृश्य दो :- शहर के करीब रहने वाले श्री पटेल जी को अपने घर में बरसात का पानी इकट्ठा होने के कारण उसकी निकासी के लिए एक पांच-सात फुट की छोटी नाली निकलवानी थी।  पर छोटे से काम  को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था। किसी तरह एक पलम्बर राजी हुआ, उतने से काम के लिए उसने हजार रुपयों की मांग की, ले-दे कर नौ सौ रुपये पर राजी हुआ, जबकि सारा काम बेढंगे तरीके से उसके सहयोगी एक किशोर ने किया। सिमित आय वाले पटेल जी कसमसा कर रह गए।  

तीसरा दृश्य :- शर्मा जी के फ्लैट के बाहर के पाइप में दीवाल में उगे एक पौधे ने किसी तरह पाइप के अंदर जगह बना उसे पूरी तरह  "चोक"  कर दिया। नतीजतन ऊपर के फ्लैट के साथ-साथ अपना पानी भी घर के अंदर बहने लगा. जमीन से ज्यादा ऊंचाई भी नहीं थी जो सीढ़ी इत्यादि की जरुरत पड़ती फिर भी न पलम्बर मिल रहा था न सफाई कर्मचारी। बड़ी मुश्किल से तीन सौ रुपये दे कर यह 15 - 20 मिनट का काम करवाया जा सका।  जो हर लिहाज से ज्यादा कीमत थी।     

चौथा दृश्य :- मिश्रा जी को दूध-दही का शौक है।  सो घर पर सदा एक-दो दुधारू पशु बंधे रहते थे। अब मजबूरन सबको हटा बाजार का मिश्रित दूध लेना पड़ रहा है, कारण पशुओं के रख-रखाव, दाना-पानी, साफ-सफाई के लिए किसी का उपलब्ध न हो पाना था. मजबूरन ऐसे लोगों को या तो ब्रांडेड कंपनियों के उत्पाद खरीदने होंगे या फिर डेयरी का व्यवसाय करने वालों के रहमो-करम पर अपना स्वास्थय गिरवी रखना होगा।  

पांचवां दृश्य :-  एक गांव में एक कौतुक दिखाने वाला आया. खेल दिखाने के बाद जब उसे कुछ लोग धान देने लगे तो वह ऐसे बिदका जैसे सांड को लहराता लाल कपड़ा दिखा दिया हो. कुछ नाराज सा हो बोला, मुझे सिर्फ पैसे चाहिए  दो, धान कितना चाहिए मुझसे ले लो. 

इन सारे दृश्यों में एक वजह कॉमन है. वह है, काम करने वालों की कमी और दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाने की प्रवृत्ति।  ये सरकारों द्वारा लाई जा रही खुशहाली की तस्वीर नहीं है यह है मुफ्तखोरी के कारण उपजी जहालत और काम न करने की प्रवृत्ति की.  कुछ लोगों को ये बातें गरीब विरोधी लगेंगी, पर भयावह सच्चाई यही है कि मुफ्तखोरी ने आज समाज में निष्क्रिय लोगों का एक अलग तबका बना दिया है। कहते हैं न, "माले मुफ्त दिले बेरहम" तो इसमे कोई भी अतिश्योक्ति नहीं है।  हमारी प्रवृत्ति ही ऐसी है कि मुफ्त और आसानी से मिली वस्तु की हम कदर नहीं करते।  उदाहरण के लिए पानी, हवा और हरियाली का हश्र हमारे सामने है। हर धर्म के ग्रंथ में, बड़े बुजुर्गों ने, गुरुओं ने अन्न का निरादर न करने की बात कही है। क्योंकि इसके बिना जीव जगत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर आज दुखद स्थिति यही है कि पूरे देश में बड़ी निर्दयता के साथ अन्न का निरादर किया जा रहा है.      

हालांकि इन योजनाओं और उन्हें लागू करने वालों की मंशा समाज के निचले वर्ग की बेहतरी चाहने की ही है. पर सचमुच के गरीब और बने या बनाए हुए ग़रीबों में जमीन-आसमान का फर्क होता है और उन्हीं बने हुए ग़रीबों ने सब बंटाधार किया हुआ है। अच्छी योजनाएं भी इस तरह के मौकापरस्तों और उनके आकाओं के कारण अपने लक्ष्य तक न पहुँच आलोचनाओं का शिकार हो अप्रियता को प्राप्त हो जाती हैं।             

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

क्या वह सिर्फ संयोग था ?


क्योंकि इन सब घटनाओं की शुरुआत साधना के बंगले से हुई थी, इसलिए इस सब से घबड़ा कर साधना और उनके परिवार ने उस बंगले को ही बेच डाला।

भूत-प्रेत होते हैं कि नहीं इस पर अच्छी-खासी बहस छिड़ सकती है. पर जब कोई समाज में स्थापित और प्रतिष्ठित हस्ती उस के पक्ष में बात करे तो सोचने की बात हो जाती है।  अपने समय की मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री साधना ने एक बार एक घटना का जिक्र किया था. उनके अनुसार, 

पाली हिल पर उनका बंगला हुआ करता था. एक दिन उनके ड्रायवर ईश्वरसिंह ने झिझकते हुए उन्हें बताया कि उसने रात में बंगले में एक अौरत को लॉन में टहलते देखा और साथ ही तरह-तरह की अजीब सी आवाजें भी सुनी. साधना ने यह सब एक वहम समझ कर बात टाल दी. पर कुछ दिनों के बाद उनके यहां मशहूर लेखक श्री अर्जुन देव 'रश्क' का आ कर ठहरना हुआ. रात को लेखन कार्य करते समय उन्हें भी कुछ वैसा ही अनुभव हुआ जिसे सुबह उन्होंने साधना को बताया. तब उन्हें लगा कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है. वैसे उन्हें या उनके परिवार के किसी सदस्य को उस समय तक कोई परेशानी या नुक्सान नहीं हुआ था. पर उन्हीं दिनों जब उन्होंने एक नयी कार खरीदी तब रोज नयी परेशानियां सामने आने लगीं, तकरीबन रोज ही भरवाने के बावजूद पेट्रोल की टंकी खाली रहने लगी तो उन्होंने वह कार बेच डाली।  

बाद में उन्हें पता चला कि जो "कुछ" भी उनके यहां था वह कार के साथ ही लगा रहा. जिसने कार खरीदी थी उसे तरह-तरह की घटनाओं से दो-चार होना पड़ने लगा. हर चीज में नुक्सान होने लगा, यहां तक कि उसे अपने आप को दिवालिया घोषित करना पड़ा. तंग आ कर उसने किसी और को वह कार बेच दी. जिसने इस बार खरीदी, कुछ दिनों के अंदर ही उसके पिता की मृत्यु हो गयी. उसने भी डर कर वह कार एक अस्तबल के मालिक को बेच दी. इस बार तो हादसा और भी भयंकर रहा, खरीदने वाले के अस्तबल में आग लग गयी और उसके रेस में दौड़ने वाले कई घोड़े जल कर मर गये. कार का इतिहास जान उसने भी एक तस्कर को कार सौंप अपना पिंड छुड़ाया। पर उस  बला ने कार का पिंड नहीं छोड़ा. हफ्ते भर के अंदर ही वह कार लाखों के सामान के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ गयी.                       
क्योंकि इन सब घटनाओं की शुरुआत साधना जी के बंगले से हुई थी, इसलिए इस सब से घबड़ा कर साधना और उनके परिवार ने उस बंगले को भी बेच डाला। किसी फ़िल्म की कहानी रूपी इस सच्चाई का संबंध यदि उन जैसे मशहूर व्यक्तित्व से नहीं होता तो शायद कोई इन सारी बातों पर विश्वास भी नहीं करता।                       

बुधवार, 9 जुलाई 2014

कैसे आई रेल, भारत में

अभी कल ही तमाम हो-हल्ले के बीच रेल बजट आया है. उस रेल का जिसकी नींव अंग्रेजों ने करीब एक सौ साठ साल पहले हमारी भलाई के लिए नहीं, अपना मतलब सिद्ध करने के लिए डाली थी। उस समय भारत में अपना वर्चस्व बनाने के लिए जी-जान से लगे हुए थे।  पर उनकी फौजें देसी रियासतों से जगह-जगह मात खाती रहती थीं। एक जगह उन्हें सफलता मिलती तो दूसरी जगह हार का सामना करना पड जाता था. कारण उनकी कुमुक समय पर अपेक्षित स्थान पर नहीं पहुँच पाती थी।

हमारी पहली रेल गाड़ी 
तब तक ब्रितानिया में रेल का आगाज हो चुका था, उसके लाभ से सब वाकिफ भी थे, उसी का फ़ायदा उठाने के लिए यहां भी पटरियां बिछाने की इजाजत मांगी गयी. पर उसमें सबसे बड़ी बाधा उसमें लगने वाले अपार धन की थी. उसका उपाय भी निकाला गया, उस समय पांच प्रतिशत ब्याज का लालच दे पूंजी का इंतजाम किया गया. इस तरह पहली कंपनी सामने आई जिसका नाम  "ग्रेट इंडियन रेलवे कंपनी"  था. 

उस समय एक किलोमीटर तक की पटरी तक यहां नहीं थी तब अंग्रेज इंजीनीयर रॉबर्ट मैटलैंड ब्रेरेटन ने यहां रेल को साकार रूप देने का बीड़ा उठाया। जिसकी अथक मेहनत के फलस्वरूप भारत में पहली रेल गाड़ी का सपना साकार हुआ जब 16  अप्रैल 1853 को बंबई के बोरी बंदर स्टेशन पर हजारों लोगों की उपस्थिति में इक्कीस तोपों की सलामी के बाद चौदह डिब्बों में सवार चार सौ विशिष्ट मेहमानों को लेकर अपरान्ह साढ़े तीन बजे चली इस गाड़ी ने शाम पौने पांच बजे ठाणे तक का 34 किलोमीटर का सफर करीब सवा घंटे में तय कर इतिहास रच एक महान उपलब्धि हासिल की। 

उस समय अंग्रेजों ने भारत छोड़ने की कल्पना सपने में भी नहीं की थी. उन्होंने तो अपने सैन्य बल को मजबूत करने और हमारा आर्थिक शोषण करने के लिए रेल रूपी बीज का रोपण किया था।  देश वासियों में भी इसे लेकर कोई बहुत ज्यादा उत्साह नहीं था पर समय के साथ-साथ रेल की उपयोगिता सामने आती गयी. 

आज यह हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। इसका व्यापक रूप, इसकी क्षमता, इसकी जन-उपयोगिता, इसकी उपादेयता किसी भी साक्ष्य की मोहताज नहीं है।  बस जरूरत है तो इस कामधेनू की साज-संभाल की, क्योंकि इसको दुहने के लिए सभी कतार-बद्ध हैं पर जब इसको "चारा" देने की बात आती है तो सब बगलें झांकने लगते हैं।                 

शनिवार, 5 जुलाई 2014

तीन इंच की जबान के लिए दुनिया भर की भाग-दौड़।

जुझारु जापानी मछुवारों ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने एक तरकीब इजाद की, इस बार उन्होंने मछलियों की सुस्ती दूर करने के लिए उन बड़े-बड़े बक्सों में एक छोटी सी शार्क मछली डाल दी। 

जगत के सारे जीव-जंतुओं में मनुष्य ही शायद अपनी इन्द्रियों का गुलाम है, उनमें भी जीभ का चटोरापन जग जाहिर है। मजे की बात यह है की घंटों की मशक्कत के बाद तैयार भोजन के गले से नीचे उतरने के बाद कोई स्वाद नहीं रह जाता पर तीन इंच की जिह्वा के स्वाद के लिए इंसान क्या-क्या नहीं कर गुजरता। दुनिया भर में इसके उदाहरण मौजूद हैं.  

जापानियों को ही देखें, इनका का मछली प्रेम जग जाहिर है। परन्तु वे व्यंजन से ज्यादा उसके ताजेपन को अहमियत देते हैं। परन्तु आज कल प्रदुषण के कारण समुद्री तट के आसपास मछलियों का मिलना लगभग खत्म हो गया है। इसलिए मछुवारों को गहरे समुद्र की ओर जाना पड़ता है। इससे मछलियां तो काफी तादाद में मिल जाती थीं, पर आने-जाने में लगने वाले समय से उनका ताजापन खत्म हो जाता था। मेहनत ज्यादा बिक्री कम, मछुवारे परेशान। फिर इसका एक हल निकाला गया। नौकाओं में फ्रिजरों का इंतजाम किया गया, मछली पकड़ी, फ्रिजर में रख दी, बासी होने का डर खत्म। मछुवारे खुश क्योंकि इससे उन्हें और ज्यादा शिकार करने का समय मिलने लग गया। 

परन्तु वह समस्या ही क्या जो ना आए। जापानिओं को ज्यादा देर तक फ्रिज की गयी मछलियों का स्वाद
नागवार गुजरने लगा। मछुए फिर परेशान। पर मछुवारों ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी नौका में बड़े-बड़े बक्से बनवाए और उनमें पानी भर कर मछलियों को जिन्दा छोड़ दिया। मछलियां ग्राहकों तक फिर ताजा पहुंचने लगीं। पर वाह रे जापानी जिह्वा, उन्हे फिर स्वाद में कमी महसूस
होने लगी। क्योंकि ठहरे पानी में कुछ ही देर मेँ मछलियां सुस्त हो जाती थीं और इस कारण उनके स्वाद में फ़र्क आ जाता था। पर जुझारु जापानी मछुवारों ने हिम्मत नहीं हारी और एक ऐसी तरकीब इजाद की, जिससे अब तक खानेवाले और खिलानेवाले दोनों खुश हैं। इस बार उन्होंने मछलियों की सुस्ती दूर करने के लिए उन बड़े-बड़े बक्सों में एक छोटी सी शार्क मछली डाल दी। अब उस शार्क का भोजन बनने से बचने के लिए मछलियां भागती रहती हैं और ताजी बनी रहती हैं। कुछ जरूर उसका आहार बनती हैं पर यह नुक्सान मछुवारों को भारी नहीं पड़ता। खाने वाले भी खुश, खिलाने वाले भी खुश और स्वाद का चस्का भी जिंदाबाद

है ना, तीन इंच की जबान के लिए दुनिया भर की भाग-दौड़।

बुधवार, 2 जुलाई 2014

रेगिस्तान का कल्पतरु "शमी"

यही वह वृक्ष है, जिसकी टहनियों और शाखाओं से अपने वनवास के समय श्री राम ने अपनी कुटिया का निर्माण किया था और जिसमें अज्ञातवास के समय पांडवों ने अपने दिव्यास्त्र छिपाए थे।
शमी वृक्ष 

प्रकृति ने इस धरा को सुरक्षित, संवर्धित रखने के लिए इसे तरह-तरह के पेड़ों से नवाजा है।  पेड़ भी कैसे-कैसे, कोई मोटा, कोई छोटा, कोई घना, कोई झिझला, कोई ऊंचा, कोई छोटा, कोई फलदार, कोई कांटेदार, कोई मजबूत तो कोई नाजुक, इनकी विशेषताएं गिनने जाएं तो पोथियाँ भर जाएं। इन्हीं में एक पेड़ है, जिसका नाम है  " शमी या खेजड़ी"  ये इतना पुराना है कि इसकी चर्चा रामायण-महाभारत में भी पाई जाती है. यही वह वृक्ष है, जिसकी टहनियों और शाखाओं से अपने वनवास के समय श्री राम ने अपनी कुटिया का निर्माण किया था और जिसमें अज्ञातवास के समय पांडवों ने अपने दिव्यास्त्र छिपाए थे। कहते हैं कि इसमें अग्निदेव का वास होता है, इसीलिए इसे अत्यंत पवित्र और पूज्य माना जाता है। आदिकाल से ही यज्ञ इत्यादि करते समय अरणी मंथन क्रिया द्वारा इसकी टहनियों को आपस में रगड़ कर अग्नि प्रज्वलित की जाती रही है।  आज भी पारंपरिक वैदिक पंडित यज्ञ के समय इसी का उपयोग कर अग्नि को आमंत्रण देते हैं।   

यह सदाबहार कांटेदार वृक्ष भारत के मरुस्थलों और कम जल वाले क्षेत्रों में बहुतायद से पनप कर, विपरीत परिस्थितियों और तेज गरमी में भी पशु-पक्षियों को शरण देता रहता है। इसकी हरी-हरी पत्तियों में बहुतायद में नमी पाई जाती है और ये ऊंट, भेड, बकरियों का प्रमुख खाद्य हैं जो उनके लिए वरदान स्वरूप है। वहीं इसकी जड़ों में नाइट्रोजन की भरमार होने के कारण यह जमीन को उर्वरक बनाने में सहायक होता है।  इसीलिए जहां शमी या खेजड़ी के पेड़ होते हैं वह जगह उपजाऊ होती है. इसके कारण ही मरुस्थल, रेगिस्तान या कम जल वाले क्षेत्रों में इसे कल्पतरु के रूप में जाना जाता है। सिर्फ यही नहीं यह हानिकारक गैसों को सोखने की भी क्षमता रखता है। इसकी लम्बी मजबूत और जमीन में गहरे तक उतरी जड़ें वहाँ से नमी तो लेती ही हैं जमीन को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ वृक्ष को भी रेत में खड़ा रहने की क्षमता प्रदान करती हैं, जिससे रेगिस्तान में चलने वाले अंधड़ों के वेग को यह कम कर हवा में उड़ने वाली रेत को भी रोक कर जमा कर देता है। इसके अलावा इसकी औषधिय विशेषताएं भी कम नहीं हैं। स्थानीय लोग इसकी पत्तियों और बीजों को तरह-तरह की बीमारियां दूर करने के काम में लाते हैं। इसकी लकड़ियों का जलावन और उससे प्राप्त कोयला भी उच्च कोटि का होता है। इसके तने से पीले रंग का उपयोगी गोंद भी प्राप्त होता है। यही कारण है कि यह बहु-उपयोगी वृक्ष राजस्थान में पूजा जाता है।   

इसकी लकड़ी भी बहुत मजबूत होती है तथा उसका उपयोग गृह-निर्माण के विभिन्न कामों में किया जाता है।  इसमें फल के रूप में फलियां लगती हैं, जिन्हें सांगरी कहा जाता है। स्थानीय भाषा में इन्हें खो-खा कहते हैं। इन फलियों से बेहद स्वादिष्ट सब्जी और अचार बनाया जाता है। इसके खाने से प्यास भी कम लगती है। यह राजस्थान के ख़ास खाद्यों में गिनी जाती है। सूखी सांगरी की कीमत बाजार में सैकड़ो रुपयों तक पहुँच जाती है।  इस तरह देखें तो शमी या खेजड़ी का पेड़ उस रेगिस्तान में जहां गर्मियों में जीना मुहाल हो जाता है, वहाँ नर-नारियों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को भी अपने प्रत्येक अंग से सुरक्षा, भोजन, आश्रय तथा निरोगिता प्रदान कर उनके जीवन को कुछ हद तक सरल बनाने में सदियों से जुटा हुआ है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इसी वृक्ष की सहायता से वैसे दुर्गम स्थल पर जीवन यापन करना संभव हो पाता है।                         

शनिवार, 28 जून 2014

शरीर जरूर विकलांग है पर आत्मा नहीं

क्या कोई विश्वास करेगा कि हाथ ना होने के बावजूद कोई मुंह या पैरों की सहायता से खूबसूरत पेंटिंग बना सकता है. पर यह सच है आज दुनिया में सैकड़ों ऐसे कलाकार  हैं जो ब्रश को मुंह या पैरों में थाम कर खूबसूरत पेंटिंग को उकेरते हैं।  इसे संभव किया है Mouth and Foot painting artists (MFPA)  नामक संस्था ने।  1956 में बनी यह अंतर्राष्ट्रीय संस्था पूरी तौर से ऐसे ही विकलांग लोगों द्वारा चलाई जा रही है,  इसी से अपनी सारी जरूरतें पूरी करते हैं इसके सदस्य, जो जन्म से, बचपन में या किसी दुर्घटना में अपने अंग खो चुके होते हैं, वे अपने मुंह में या पैर में ब्रश अटका कर पेंटिंग बनाते हैं. पचास साले से भी ऊपर हो गए हैं जबसे MFPA ने ऐसे कलाकारों की प्रतिभा को एक मंच दिया, उन्हें एक पहचान दी, स्वाबलंबी बनाया, गर्व और आजादी से जीने का मौका दिया.    

1956 में पोलियो ग्रस्त एरिच स्टेगमैन, जो खुद मुंह से पेंटिंग बनाया करते थे, विकलांग लोगों की कष्ट दायक जिंदगी से बड़े दुखी थे। वे किसी तरह उनकी सहायता करना चाहते थे।     उनका    उद्देश्य   ऐसे    लोगों   को एक
सम्मानजनक जिंदगी देना ही मुख्य लक्ष्य था।  इसीलिए उन्होंने अपने जैसे लोगों को इकट्ठा कर एक सहकारी संस्था बनाई जिसे Mouth and Foot Painting Artists (MFPA) नाम दिया गया. इसके सदस्य मुख्यतया कार्ड, कैलेण्डर और किताबों के लिए पेंटिंग बनाते हैं. आज करीब 74 देशों के 700  से ज्यादा कलाकार इस संस्था के सदस्य हैं। इनकी बनाई गयी कलाकृतियों को बाजार में अच्छे मूल्य मिल सकें इसके लिए कुछ आम स्वस्थ लोगों को यह कार्य-भार सौंपा गया है।  विकलांग सदस्यों के आत्म-सम्मान को ठेस ना पहुंचे इसलिए स्टेगमैन ने कभी कोई दान स्वीकार नहीं किया।       इसीलिए MFPA का आदर्श वाक्य है "self-help, not charity".    
  
भारत में इस संस्था का आगाज 1980 में हुआ. जिसका आफिस मुम्बई में है।  फिलहाल अभी इसमें 16 कलाकार काम कर रहे हैं, अपने घरों में अपनी पेंटिंग बना उसे एसोशिएशन में जमा करवा देते हैं। जिसे विशेषज्ञों द्वारा कार्ड या कैलेण्डर जैसे उचित स्थान पर जगह दे दी जाती है। ये लोग स्कूलों या दूसरी जगहों पर भी जा-जा कर अपनी कला का प्रदर्शन कर समय-समय पर लोगों का उत्साह बढ़ाने, उन्हें स्वाबलंबी होने का मार्ग-दर्शन भी करते रहते हैं।  

तो अब जब भी आप कोई कार्ड या कैलेण्डर लेने की सोचें तो  MFPA  द्वारा पेंट किए हुए उत्पादनों का जरूर ध्यान रखें। जिससे जाने-अनजाने किसी की मदद हो सके।       

बुधवार, 18 जून 2014

और कितने दिन ?

बंगाल की "काल बैसाखी", जिसमें आकाश पर छाए कभी गहरे काले, कभी धूसर, कभी सुरमई,  कभी गहरे हरे रंग के बादलों, जो लगता है जैसे हाथ बढ़ा कर छू लिए जाने की दूरी तक आ गए हों, उनकी हर पल बदलती बनावट, उनकी गति जैसे कोई घुड़सवार सेना सामने वाले को नेस्तनाबूद  करने चली   आ रही हो,    उनकी कान फोडू गर्जना और  उनमें
दौड़ती चपला को जो लगता है कि कभी भी आ कर शरीर को छू जाएगी, का प्रचंड रूप देख अच्छे-अच्छों का कलेजा दहल उठता हो, जिन्होंने भी वैसे तूफान का भीषण प्रकोप देखा होगा, जिसमें 30-30, 40-40 फुट के नारियल के वृक्षों की फुगनियाँ जमीन छूने को आतुर लगती हों, मजबूत से मजबूत पेड़ भी अपनी खैर ना मना पाते हों, छोटी-मोटी चीजें सैंकड़ों फिट दूर जा गिरती हों, सड़क पर वाहन चलना बंद हो जाते हों, पशु-पक्षी, जानवर-मानव सब अपनी जान की खैर मनाने लगते हों, नदी में विशाल  लहरें उठने लगती हों  किताबों में लिखी-पढ़ी "मूसलाधार" साक्षात सामने आ खडी होती हो, जमीन-आसमान का भेद ख़त्म-प्राय हो जाता हो, उन्हें तो दिल्ली की वह आंधी बचकानी सी लगी होगी जो  पिछले महीने यानी मई की 30 तारीख शाम 5 बजे के आसपास आई थी, हालांकि उसने भी दिल्ली की हवा बंद कर दी थी, खुद तो गुजर गयी पर सवा घंटे के उस प्रकोप ने, ख़ासकर दक्षिणी-पश्चिमी दिल्ली वालों की नींद हराम कर
दी थी. जितने भी सुविधा प्रदान करने वाले उपकरण थे सब मुंह बाए हाथ खड़े किए पड़े थे। बच्चे, बुजुर्ग और रुग्ण लोगों के लिए तो यह आफत प्रलयंकारी थी। काम पर जाने वालों की और भी मुसीबत थी, नींद पूरी न होने की वजह से ज्यादातर लोग अस्वस्थता महसूस कर रहे थे।  पर फिर भी सब लोग यही सोच रहे थे कि दो-चार दिनों में हालात सामान्य हो जाएंगे. पर आज 18 जून भी बीतने को है।  अभी भी सही हालात कोई बतला नहीं पा रहा है.  पहले हफ्ता फिर दस दिन फिर पखवाड़े में सुधार का दिलासा दिया जाता रहा पर सारे समय के बीत जाने के बावजूद अभी तक बिजली की बहाली पूरी तरह कायम नहीं हो पायी है। इस बार गर्मी भी अपने पूरे जोशो-खरोश के साथ कहर ढा रही है। सोचने की बात है कि यदि घंटे भर की तेज आंधी से सारी वितरण व्यवस्था को 20-22 दिनों के बाद भी, इतनी उच्च स्तरीय और बेहतरीन तकनीकी के  उपलब्ध होने के बावजूद पटरी पर नहीं लाया जा सका तो यदि यह शहर समुंद्र तटीय इलाके पर स्थित होता तो क्या हाल होता, जहां लम्बे समय तक तेज हवाएं नहीं तूफान आते रहते हैं, वहाँ तो शायद इस रफ्तार से काम होने पर चार-पांच महीने तक बिजली के दर्शन नहीं हो पाते
.

होना तो यह चाहिए कि आम आदमी को वस्तुस्थिति की साफ-साफ हालत बतला दी जाए, नागरिकों की हैसियत को नहीं बल्कि उनकी परेशानी को मद्दे-नजर रख जरूरी सुविधाओं को बराबर-बराबर मुहाल किया जाए. ऐसा नहीं कि दिल्ली के कुछ ख़ास इलाकों को दूसरे इलाकों की कीमत पर तजरीह दी जाए।   

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