pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

गणेश जी का मोरेश्वर मंदिर

गणेश जी. देश में सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले, अबाल-वृद्ध सबके चहेते, सबके सखा, निर्विवाद रूप से सबके प्रिय। देश-विदेश में स्थापित अनगिनित मंदिरों की तरह ही उनके बारे में असंख्य कथाएं भी जन-जन में प्रचलित हैं। जो पूजा स्थलों के साथ-साथ ही अभिन्नरूप से गुंथी हुई हैं। उनका ऐसा ही एक पावन स्थल है पुणे का मयूरेश्वर मंदिर। 

गणेश पुराण के अनुसार त्रेता युग में उस समय मिथिला के राजा चक्रपाणी की रानी उग्रा ने सूर्य देव द्वारा पुत्र पाने की इच्छा की थी। पर सूर्य देवता के तेज और ताप को सहन ना कर पाने के कारण उसने अविकसित बच्चे को सागर के हवाले कर दिया। पर बच्चा बच गया और सागर ने उसे वापस राजा चक्रपाणी को सौंप दिया। चुंकि शिशु को सागर ने लौटाया था इसलिए उसका नामकरण सिंधू कर दिया
गया। सूर्य देव ने अपने इस अंश को अमृत कुंभ प्रदान किया था, जो उसके शरीर के अंदर स्थित था। अमर होने की भावना के कारण वह अपने मार्ग से भटक उच्श्रृंखल और आताताई बन गया। सारी प्रकृति उससे कांपने लगी। तब देवताओं ने उसके संहार के लिए प्रभू शिव और माता पार्वती की शरण ली. माँ ने जगत हित के लिए गणेश जी को पुत्र रूप में पाने के लिए लेंयाद्री की गुफाओं में कठोर तप किया। जिसके फलस्वरूप गणेश जी ने अवतार लिया और प्रभू शिव ने उनका नाम गुनेशा रखा। शुभ्र रंग तथा छह हाथों वाले गणेश जी ने अपने वाहन के रूप में मोर को चुना जिससे उनका नाम मोरेश्वर भी पडा।  

गुनेशा जी ने सिंधू की सेना उसके सेनापति कमलासुर को नाश किया। फिर सिंधू दानव के दो टुकडे कर उसके अंदर स्थित अमृत कुंभ को खाली कर उसका भी संहार कर डाला।   

परम पिता ब्रह्मा ने खुश हो सिद्धि और बुद्धि का विवाह गुनेशा जी के साथ कर दिया। अपने कार्य को संम्पन्न कर अपना वाहन अपने भाई कार्तिकेय को सौंप कर प्रभू फिर वापस अपने लोक को लौट गये।

गणेश पुराण के अनुसार गणेश जी के तीन प्रमुख स्थान हैं। जिनमें से मोरगांव धरती पर अकेला है। बाकि के दोनों स्थान शिवलोक तथा पाताल लोक में स्थित हैं। इसलिए भी इसकी महत्ता बहुत बढ जाती है। मोरगांव पुणे शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मोरेश्वर मंदिर के निर्माण की निश्चित तिथि का तो पता नहीं चलता पर इसे पेशवा राज्य काल में भव्य रूप प्रदान किया गया था। 

कुछ लोगों का मानना है कि जिस जगह गणेश जी ने अवतार लिया था वहां मोर बहुतायत में पाए जाने के कारण वहां का नाम मोरगांव पड गया था, इसलिए वहां अवतार लेने के कारण उनका नाम मोरेश्वर पडा।

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

कब हम स्वघोषित "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत उठाएंगे?

आज देश में एक तथाकथित बाबा को ले कर कोहराम मचा हुआ है। प्रिंट और दृश् मीडिया होड ले रहे हैं उसकी बखिया उधेडने की। पर इसके पहले ढेरों विवादों, दसियों आरोपों के बावजूद उस पर किसी ने ऊंगली उठाने की हिम्मत या जहमत क्यों नहीं उठाई?  शायद  रसूख, पहुँच या असीमित जन-सहयोग से डर कर. पर यह सामाजिक कर्तव्य का निर्वाह भी तो नहीं हुआ!!!

हमारे देश में परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गरीबों, अशिक्षित लोगों, गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा तथा कुछ हद तक भोजन की भी व्यवस्था होती रहती थी धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से सच्चे संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया था। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा ऐसी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए। युवा पीढी के कुछ भटके नवजवान भी सहज ढंग से मिलने वाली सहूलियतों के लालच में ऐसे ढोगियों का साथ देने लगे। धीरे-धीरे पुरानी परम्राएं ध्वस्त होती गयीं और ऐसी जगहें असमाजिक तत्वों की गिरफ्त में आ बुराइयों का अड्डा बनती चली गयीं।  

कुछ वर्षों पहले पंजाब के एक "गांव" में जाने का मौका मिला था। वहां कुछ देखने सुनने को तो था नहीं सो परिचितों के आग्रह पर गांव के किनारे स्थित मठ को देखने चला गया। शाम का समय था। अंदर जा लगता ही नहीं था कि मठ किसी ठेठ गांव में बना हुआ है। बडे से अहाते में वहां के "सेवादार" युवक-युवतियों का आचरण और उनकी आपसी चुहल भी कोई अच्छा प्रभाव नहीं डाल रही थी। अहाते में एक तरफ विदेशी नस्ल की चार-पांच गायें जुगाली कर रही थीं वहीं खुंखार ब्रीड के दो कुत्ते बंधे हुए थे। मठ में काफी चहल-पहल थी।  मंदिर का अहाता पार कर जैसे ही वहां के संतजी के कमरे के पास पहुंचा तो ठगा सा रह गया। उस ठेठ गांव के मठ के वातानुकूलित कमरे की धज ही निराली थी। सुख-सुविधा की हर चीज वहां मौजूद थी। उस बड़े से कमरे के एक तरफ तख्त पर मोटे से गद्दे पर मसनद के सहारे एक 35-40 साल के बीच का नाटे कद का इंसान गेरुए वस्त्र और कबीर नूमा टोपी लगाए अधलेटा पड़ा था। नीचे चटाईयों पर उसके भक्त हाथ जोड़े बैठे थे। मुझे बताया गया कि बहुत पहुंचे हुए संत हैं। बंगाल से हमारी भलाई के लिए यहां उजाड़ में पड़े हैं। बंगाल का नाम सुन मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पूछा कि कौन से जन-हित के काम यहां किए गये हैं, क्योंकि मुझे गांव तक आने वाली आधी पक्की आधी कच्ची धूल भरी सडक की याद आ गयी थी। मुझे बताया गया कि मठ में स्थित मंदिर में चार कमरे बनाए गये हैं, मंदिर का रंग-रोगन किया गया है, मंदिर के फर्श और दिवार पर टाईल्स लगाई गयीं हैं, मंदिर के हैंड पम्प पर मोटर लगाई गयी है।

मुझे उनके कमरे और "भलाई के कामों" को देख उनके महान होने में कोई शक नहीं रहा। इधर साथ वाले लोग मुझे बार-बार संतजी के चरण स्पर्श करने को प्रेरित कर रहे थे पर मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैंने आगे बढ कर बंगला में संत महाशय से पूछा कि बंगाल से इतनी दूर इस अनजाने गांव में कैसे आए? मुझे बंगाली बोलते देख जहां आसपास के लोग मेरा मुंह देखने लगे वहीं दो क्षण के लिए संत महाशय सकपका से गये, पर तुरंत सम्भल कर धीरे से बोले कि बस ऐसे ही घूमते-घूमते। मैं पूछना तो बहुत कुछ चाहता था पर वहां के माहौल और उनके प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा को देख कुछ हो ना पाया और मन में बहुत सारे प्रश्नों को ले बाहर निकल आया। बाहर आते ही पिछवाड़े की ओर कुछ युवकों को "सुट्टा" मारते देख मैंने साथ के लोगों से पूछा कि ये "चिलमिये" कौन हैं तो जवाब मिला, बाबाजी के सेवादार हैं।

मन कुछ अजीब सा हो गया। रोज धोखेबाजों, अवसर परस्तों, ढोगियों द्वारा भोली-भाली जनता को ठगे जाने, उनकी भावनाओं का फायदा उठाने वालों की असलियत सामने आने पर भी ऐसे लोगों की जमात की बढोतरी चिंता का ही विषय है। कब हम समझ पाएंगे कि खुद को भगवान कहलवाने वाले की क्या मानसिकता है, क्या वह इस लायक भी है कि वह इंसान कहलवा सके? कब हम इस तरह के स्वघोषित "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत उठाएंगे, भगवान ही जाने।

सोमवार, 2 सितंबर 2013

क्या हश्र हुआ शाहजहाँ के तख्ते ताऊस या मयूर सिंहासन का ?

आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस मनो सोने का भी  कुछ पता नहीं चला जिसकी खपत इस सिंहासन को बनाने  में हुई थी.................  

बाबर द्वारा रोपित मुगल साम्राज्य का पौधा, हुमायूं के समय के थपेडों को सह, अकबर द्वारा सिंचित और रक्षित हो जहांगीर के समय तक धीरे-धीरे एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था। जिसकी जडें गहराई तक पैठ गयीं थीं। विशाल मुगल साम्राज्य की स्थापना हो चुकी थी। छुटपुट हरकतों को छोड उसे किसी बडे खतरे या विनाश का डर नहीं रह गया था। उसी की शांति छाया में चिंता मुक्त शाहजहां ने देश की बागडोर संभाली थी। वतन में अमन ओ चैन और आय के अजस्र स्रोतों का लाभ उठा उसने अपना सारा ध्यान और समय इतिहास प्रसिद्ध इमारतों के निर्माण में लगा दिया था। 

ऐसे ही एक समय उसके कोषपाल ने आ कर उसे बताया कि शाही खजाना तरह-तरह के बहुमूल्य हीरे-जवहरातों से लबरेज है। उसने सलाह दी कि उन्हें इसी तरह ना पडे रहने दे कर उनका कुछ सही उपयोग करना चाहिए। इस विषय पर मंत्रणा की गयी और तय पाया गया कि इन नायाब रत्नों का उपयोग सम्राट के लिए एक बेशकीमती, अनोखे और बेजोड सिंहासन को बनाने में किया जाए। तत्काल देश के चुनिंदा स्वर्णकारों को तलब किया गया और उन्हें सब कुछ समझा कर कार्य सौंप दिया गया। 

स्वर्णकारों के मुखिया बेबदल खान को बादशाह की उपस्थिति में 1150 किलो सोना और 230 किलो रत्नों का भंडार इस नायाब कार्य हेतु सौंप दिया गया। कुशल, कलात्मक कार्यों में माहिर स्वर्णकारों को सिंहासन बनाने में सात साल का समय लग गया। उस समय इस पर आई  लागत का आज सिर्फ आंकलन ही किया जा सकता है। इस ठोस सोने के सिंहासन को दो मोरों का रूप दिया गया था, जो अपने पंख फैलाये खडे थे। तरह-तरह के रंग-बिरंगे रत्नों से उन्हें मोर के पंखों की तरह ही सजाया गया था। जिनके बीच एक पेड की आकृति भी थी जिसे हीरे-पन्ने, लाल और मोतियों से जडा गया था। मोरों की सोने से बनी आकृतियां भी रत्नों से ढकी हुई थीं तथा उनकी पूंछ पर नीलम जडे गये थे। सिंहासन के मध्य फारस के शाह द्वारा भेंट किया गया एक बडा और अनमोल हीरा जडा गया था। फ्रांस के यात्री ट्रैवर्नियर ने अपने यात्रा वृतांत में इसका वर्णन करते हुए बताया है कि यह सिंहासन बादशाह के आराम को ध्यान में रखते हुए 6 फिट गुणा 4 फिट के आकार का बनाया गया था जिसके आसन की ऊंचाई 5 फिट थी और वह एक तख्त का रूप लिए हुए था। उसमें चार सोने के पाए लगे हुए थे। पृष्ठ भाग में दो अत्यंत सुंदर पर फैलाये मोरों की आकृतियां बनी हुई थीं। उन दोनों के बीच एक वृक्ष था जिसके बीचोबीच इतिहास प्रसिद्ध "कोहेनूर हीरा" जडा हुआ था।  सिंहासन के ऊपर एक छत्र भी बनाया गया था और यह सब कुछ बेशकीमती रत्नों से जडा और भरा हुआ था। कहीं भी जरा सी जगह खाली नहीं छोडी गयी थी। सब कुछ अप्रतिम व नायाब था। उसे तख्ते-ताऊस या मयूर सिंहासन का नाम दिया गया।  

यह सिंहासन मुगल कला का बेहतरीन नमूना था। इस पर बैठ कर शाहजहां दिवाने खास का काम-काज देखा करता था। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था, उसने मुगल साम्राज्य की भावी पटकथा लिखनी शुरु कर दी थी। जिसके नायक औरंगजेब ने पिता की बिमारी का लाभ उठा, उसे कारागार में डाल, अपने भाइयों को रास्ते से हटा खुद को बादशाह घोषित कर दिया। सत्ता में तो वह वर्षों रहा पर अपने जीवन के तीस साल उसे युद्ध करते ही बिताने पडे। उसकी मृत्यु होते ही कमजोर पडते साम्राज्य पर बाहरी खतरों ने सर उठाना शुरु कर दिया। जिसमें सबसे अहम था नादिरशाह का हमला। ऐतिहासिक कत्लेआम के बाद उसने दिल्ली को इस तरह लूटा और रौंदा कि विनाश भी दहल कर रह गया। उस दौर का बयान करना मुश्किल है। कहते हैं कि वह उस बेशकीमती मयूरासन के अलावा 15 करोड नकद तथा उसके साथ 300 हाथी, दस हजार घोडे, इतने ही ऊंट जो सभी किमती सामानों, हीरे, जवाहरातों से लदे थे, अपने साथ ले गया। इस बात के तो प्रमाण मिलते हैं कि तख्ते-ताऊस फारस पहुंच गया था पर उसके बाद उसका क्या हश्र हुआ पता नहीं चलता।  

कुछ इतिहासकारों के अनुसार कुर्दों  द्वारा नादिरशाह की हत्या के बाद सिंहासन को तोड कर उसकी अमूल्य संपत्ति को आपस में बांट लिया था। कुछ लोगों का कहना है कि मूल सिंहासन सुरक्षित था और 18वीं शताब्दि के अंत में वह अंग्रजों के अधिकार में आ गया था। जिसे “ग्रासनेवर” नामक जहाज द्वारा बडे गोपनीय ढंग से कोहेनूर हीरे की तरह इंग्लैंड भिजवा दिया गया था। पर बदकिस्मति से ग्रासनेवर अपनी यात्रा के दौरान उस बेशकीमती सिंहासन के साथ एक भयंकर समुद्री तूफान की चपेट में फंस कर अफ्रिका के पूर्वी तट पर सागर में डूब गया। पिछले दो सौ सालों से उसका पता लगाने के कई प्रयास हो चुके हैं पर कोई भी अभियान सफल नहीं रहा।

एक कोहेनूर हीरा ही हमारे दिलों की टीस को बार-बार चीर जाता है. इस सिंहासन में तो कई-कई कोहेनूरों के बराबर  रत्न तथा मनो सोना खपा हुआ था।    
#हिन्दी_ब्लागिंग              

बुधवार, 28 अगस्त 2013

श्रीकृष्ण जी और उनकी सोलह कलाएं

श्री राम ने  बारह कलाओं के साथ अवतार लिया था. श्रीकृष्ण जी ही अब तक  सोलह कलाओं  के साथ अवतरित हुए हैं।  इसीलिए उनके अवतार को संपूर्ण तथा  सर्व गुण संपन्न अवतार माना जाता है.

हमारे वेद-पुराणों में समय-समय पर हुए दिव्यांशों के अवतार के साथ-साथ उनकी कलाओं की भी बात की गयी है. तंत्र शास्त्र में "कला" का बहुत गहरा और रहस्यात्मक विवेचन है. जिसे जीव के सात बन्धनों माया, अविधा, राग, द्वेष, नियति, काल और कला, में से एक बताया गया है. कला के सोलह प्रकार बताए गए हैं। जिसमें भी यह सोलह गुण होते हैं उसे पूर्ण सामर्थ्यवान माना जाता है. इसका सबसे सरल और प्रत्यक्ष उदाहरण चन्द्रमा है. जिसकी सोलह कलाएं होती हैं. हर कला के साथ उसकी रोशनी बढ़ती जाती है. चन्द्रमा वही रहता है पर यह कला ही है जो बढ़ने के साथ उसे तेजस्वी बनाती है. जिस दिन वह सोलह कला संपूर्ण हो जाता है, यानी पूर्णिमा की रात को, तो उसकी छ्टा भी अपूर्व हो जाती है. पर प्रकृति के नियमानुसार उसकी कला के घटने के साथ ही उसकी आभा भी घट जाती है. कला को सरल शब्दों में एक तरह गुण या विशेषता भी कहा जा सकता है. हमारे वेद-पुराणों में कला को अवतार लेने वाली देव्यांशों की शक्ति के रूप में दर्शाया गया है. जिसमें सिर्फ श्रीकृष्ण जी में ही ये सारी खूबियाँ समाविष्ट थीं।  इन सोलह कलाओं और उन्हें धारण करने वाले का विवरण इस तरह का है -  

१. श्री-धन संपदा 
जिसके यहाँ लक्ष्मी का स्थाई निवास हो, जो आत्मिक रूप से धनवान हो और जहां से कोई खाली हाथ न जाता हो. 

२. भू-अचल संपत्ति
जिसके पास पृथ्वी का राज भोगने की क्षमता हो तथा जो  पृथ्वी के एक बड़े भू-भाग का स्वामी हो. 

३. कीर्ति-यश प्रसिद्धि
जिसके प्रति लोग  स्वतः ही श्रद्घा और विश्वास रखते हों.  ।

४. वाणी की सम्मोहकता
जिसकी वाणी  मनमोहक हो. यानी दूसरे पर अपना असर डालने वाली हो. जिसे सुनते ही सामने वाले का क्रोध शांत हो जाता हो.  मन में प्रेम और  भक्ति की भावना भर उठती हो.  

५. लीला- आनंद उत्सव
पांचवीं कला का नाम है लीला। जिसके दर्शन मात्र से आनंद मिलता हो।

६. कांति- सौदर्य और आभा
जिसके रूप को देखकर मन अपने आप  आकर्षित हो प्रसन्न हो जाता हो.  जिसके मुखमंडल को  बार-बार निहारने का मन करता हो.

७. विद्या- मेधा बुद्धि
सातवीं कला का नाम विद्या है। जो  वेद, वेदांग के साथ ही युद्घ और संगीत कला, राजनीति एवं कूटनीति में भी सिद्घहस्त हो.

८. विमला-पारदर्शिता
जिसके मन में किसी प्रकार का छल-कपट नहीं हो, सभी  के प्रति समान व्यवहार रखता हो.

९. उत्कर्षिणि-प्रेरणा और नियोजन
जो लोगों को प्रेरणा दे कर अपने कर्म करने को प्रोत्साहित कर सके. जिसमें इतनी शक्ति हो कि लोग उसकी बातों से प्रेरणा लेकर अपना लक्ष्य पूरा कर सकें।

१०. ज्ञान-नीर क्षीर विवेक
जो विवेकशील हो. जो अपने विवेक से लोगों का मार्ग प्रशस्त कर सके.

११. क्रिया-कर्मण्यता
जो खुद तो कर्म करे ही लोगों को भी कर्म करने की प्रेरणा दे उन्हें सफल बना सके.

१२. योग-चित्तलय
जिसने मन को वश में कर लिया हो, जिसने  मन और आत्मा का फर्क मिटा योग की उच्च सीमा पा ली हो.  

१३. प्रहवि- अत्यंतिक विनय
जो विनयशील हो. जिसे अहंकार छू भी न गया हो. जो सारी  विद्याओं में  पारंगत होते हुए भी गर्वहीन हो.

१४. सत्य-यथार्य
जो सत्यवादी हो. जो जनहित और  धर्म की रक्षा के लिए कटु सत्य बोलने से भी परहेज नहीं करता हो.

१५. इसना -आधिपत्य
जिसमें लोगों पर अपना प्रभाव स्थापित करने का गुण हो.  जरूरत पड़ने पर लोगों को अपने प्रभाव का  एहसास दिला अपनी बात समझा उनका भला कर सके.  

१६. अनुग्रह-उपकार
जो बिना किसी लाभ या  प्रत्युपकार की भावना से लोगों का उपकार करना जानता हो. जो भी उसके पास किसी कामना से आए  उसकी हर मनोकामना पूरी करता हो.   

हमारे ग्रन्थों में अब तक हुए अवतारों का जो विवरण है उनमें मत्स्य, कश्यप और वराह में एक-एक कला, नृसिंह और वामन में दो-दो और परशुराम मे तीन कलाएं बताई गयीं हैं। 
श्री राम ने  बारह कलाओं के साथ अवतार लिया था. श्रीकृष्ण जी ही अब तक  सोलह कलाओं  के साथ अवतरित हुए हैं।  इसीलिए उनके अवतार को संपूर्ण तथा  सर्व गुण संपन्न अवतार माना जाता है.

बुधवार, 21 अगस्त 2013

समाज का अंग बनती उच्छ्रिंखलता

यही कारण है कि देश में जगह-जगह लगी महान हस्तियों की प्रतिमाओं को जब-तब अपमानित होना पड़ता है. कभी किसी वीर योद्धा की तलवार गायब हो जाती है तो कभी किसी के चश्मे या लाठी से खिलवाड़ किया जाता है कभी किसी पर गंदगी पोत  दी जाती है तो कभी जाति और धर्म के नाम पर उसे खंडित ही कर दिया जाता है. वो भी उन लोगों के साथ जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपने कर्म के आगे कभी जात-पात, धर्म या भाषा को आड़े नहीं आने दिया.

कहावत है कि जैसा राजा वैसी प्रजा। परिवार, समाज, देश के मुखिया से अघोषित अपेक्षा रहती है कि वह विवेकशील, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, समदर्शी तथा मृदुभाषी हो. पर लगता है कि आज के कुछ असंयमित, विवाद प्रेमी, अवसरवादी लोगों की जिव्हा पर सरस्वती के बजाए ताड़का ने अपना अधिकार जमा लिया है.  इनमें ज्यादातर वे लोग हैं, जिन्हें निकट भविष्य में अपने आप को हाशिए पर धकेल दिए जाने का खौफ सता रहा होता है. फिर चाहे वे सत्ता सुख भोगने वाली पार्टी के हों या फिर उसे संभालने को आतुर विपक्षी दल के. 

इन्हीं की देखा-देखी समाज में भी विवेकहीन, उच्छ्रिंखल लोगों के एक तबके का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है. इसका प्रमाण आए दिन यहाँ-वहाँ की घटनाएं देती रहती हैं। ये लोग अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए, अपने बलप्रदर्शन की चाहत के चलते किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही कारण है कि देश में जगह-जगह लगी महान हस्तियों की प्रतिमाओं को जब-तब अपमानित होना पड़ता है. कभी किसी वीर योद्धा की तलवार गायब हो जाती है तो कभी किसी के चश्मे या लाठी से खिलवाड़ किया जाता है कभी किसी पर गंदगी पोत  दी जाती है तो कभी जाति और धर्म के नाम पर उसे खंडित ही कर दिया जाता है. वो भी उन लोगों के साथ जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपने कर्म के आगे कभी जात-पात, धर्म या भाषा को आड़े नहीं आने दिया. हद तो तब हो जाती है जब सरकार की तरफ से उनके प्यादों के, जो सदा अपने आकाओं का मुंह और मूड ताक कर अपने कर्म करते हैं,  अनर्गल, तथ्यहीन बयान आग में घी का काम कर अपनी अक्ल के दिवालियापन का परिचय दे देते हैं।

इसी संदर्भ में एक कहानी याद आती है. किसी गुरुकुल में गुरु जी के पास दो शिष्य भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे. पर वे लकीर के फकीर ही थे. आपस में उनकी कभी बनती नहीं थी इसके अलावा एक दूसरे को सदा नीचा दिखाने की फिराक में भी रहते थे. गुरु जी पर भी अपना हक़ जमाते रहते थे. इसी होड़ से बचने के लिए रोज रात को गुरु की सेवा के अंतर्गत उन्होंने गुरु के पाँव भी बाँट लिए थे. एक दिन गलती से दोनों दुसरे के नाम वाले पैर दबाने बैठ गए, पर अपने पास दूसरे का पैर देख उसे नुक्सान पहुंचाने की नीयत से पैरों को ही तोड़ कर रख दिया.
यह तो कहानी थी, पर कहानी के पात्र भी तो असल जिन्दगी से ही आते हैं. कुछ ऐसा ही देश के एक शहर में तब हुआ जजब कुछ दिनों पहले ऐसे ही कुछ विवेकहीन लोगों ने वीर शिरोमणी, देश के प्रमुख क्रान्तिकारीयों में अग्रणी सबके प्रिय शहीद की प्रतिमा पर लगे हैट पर आपत्ति जताते हुए प्रतिमा को ही खंडित कर दिया. कुछ दिनों शोर मचा, हल्ला-गुल्ला हुआ फिर सब कुछ अपने ढर्रे पर चलने लगा. राज्य की बागडोर संभालने वाले भी प्रतिमा पर कपड़ा लपेट अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पा चुप बैठ गये. क्या अपनी जान, अपने परिवार, अपने भविष्य की परवाह न करने वालों ने गुलाम देश की बेड़ियाँ तोड़ने की कोशिश करते हुए ऐसी आजादी की कल्पना भी की होगी?          

इस तरह की घटनाओं और परिस्थितियों के लिए  हमारी वर्तमान शिक्षा-प्रणाली भी किसी हद तक जिम्मेदार है जो बच्चों को देश और उसके लिए कुर्बान या समर्पित शहीदों, नेताओं, पूजनीय हस्तियों की जानकारी विस्तार और गहराई से उपलब्ध नहीं करवा पाती है. इसके विपरीत लोगों को सस्ती राजनीति के चलते महापुरुषों को भी जात, धर्म और राजनैतिक दलों की संकीर्णता के दायरे में बाँध कर रख दिया गया है. 
              

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

एक अद्भुत तीर्थस्थल बिजलेश्वर महादेव

बिजलेश्वर महादेव , जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भावविभोर हो जाता है। जिव्हा एक ही वाक्य उच्चारण करती है - त्वं शरणम ।   

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा ले। 

सावन जाने-जाने को है पर बरसात अभी भी मेहरबान है. इसी मौसम से जुडी एक हैरतंगेज जानकारी एक अद्भुत स्थल के बारे मे. 

बिजलेश्वर महादेव का मंदिर 

हिमाचल के कुल्लू जिले में शिव जी का एक अति प्राचीन मंदिर है, बिजलेश्वर महादेव। जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादेव के नाम से भी जाना जाता है। हिमाचल के कुल्लू शहर से 18 की.मी. दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर मथान नामक स्थान में यह स्थित है. इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे कुलांत पीठ के नाम से भी जाना जाता है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत यहां के पुजारी जी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। व्यास नदी पार कर 15 की. मी. का सडक मार्ग चंसारी गांव तक जाता है। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। चढ़ाई चढाते समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है।

मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणीकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।

मक्खन से लिपटा शिवलिंग 
कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है जिसके बाद गर्भ गृह है जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जिसका व्यास करीब ४ फ़िट तथा उंचाई २.५ फ़िट के लगभग है।                                                          
ऊपर मंदिर परिसर में बिज़ली-पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है यह मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।

कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों
दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। पर जो भी हो यह शिव भूमि है चमत्कारी।  

बुधवार, 14 अगस्त 2013

बखेड़ा बिजली का बरसात में

कई दिनों से लगी झड़ी आज सुबह ही बंद हुई थी. मौसम खुशगवार था. मैंने चाय का प्याला थामा ही था कि ठाकुर जी नमूदार हो गये. उन्हें भी चाय दी जिसकी एक चुस्की ले बोले, पता है कल शाम अपने जैन साहब को करेंट लग गया था.

मैं चौंका, अरे नहीं मुझे तो नहीं पता ! कैसे हैं ? कुछ ज्यादा चोट तो नहीं आई ? और यह सब हुआ कैसे ?
ठाकुर जी बोले, लगातार बारिश से दीवारों में सीलन आ गयी थी, उसी के कारण शायद स्विचों में भी करेंट आ गया था, काम से लौटने पर मुंह-हाथ धो जैसे ही लाईट बंद करने लगे जोर का झटका खा गये. वैसे डाक्टर देख गया था, खतरे से बाहर हैं। 
चाय में  दो बिस्कुट डूबा कर उदरस्त करते हुए बोले, देखो इसी बिजली के बिना हम अपनी दिनचर्या की कल्पना भी नहीं कर सकते पर यही कभी-कभी मुसीबत भी बन जाती है. 

मैं बोला, वो तो है, जब तक उसे चेरी बना कर रखेंगे तब तक आप के सारे काम सुचारू रूप से होते जाएंगे जैसे ही  आपने अपनी असावधानी की ढील दी वह जानलेवा हो जाएगी. इसलिए सावधानी बहुत जरूरी है..

ठाकुर जी ने चाय ख़त्म करते हुए कहा, भईये कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि यह सदा निरापद रहे ?

मैंने कहा ठाकुर जी ऐसा है कि शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन  काल में कभी बिजली का झटका न खाया हो. वैसे झटका खाने वाले हर व्यक्ति को नुक्सान नहीं होता. दुर्घटना की गंभीरता इसके वोल्टेज, अर्थिंग, बिजली के स्वरूप, व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसे संपर्क में आने वाले हिस्से पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है. इसके झटके का असर ऐसे लोगों पर कुछ ज्यादा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। बच्चे, बूढ़े, ह्रदय रोगी और डायबिटिक व्यक्तियों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. कड़ी, खुरदरी या कठोर चमड़ी पर भी कोमल त्वचा के बनिस्पत कम असर पड़ता है. 

ठाकुर जी ने इसी बीच एक प्रश्न और उछाल दिया, अच्छा भईये, या बताओ कितने वोल्ट की बिजली निरापद होती है ? 

मैं बोला, घरों में बिजली महकमे द्वारा जो विद्युत प्रवाह  भेजा जाता है वह २२०-२४० वोल्ट का होता है. जिसके संपर्क में ५-६ सेकेण्ड का समय भी जानलेवा हो सकता है. निरापद तो यह होती ही नहीं फिर भी पचास वोल्ट तक के करेंट को सहा जा सकता है. 

ठाकुर जी ने जेब से सौंफ की डिबिया निकाल  कर कुछ दाने मुंह के हवाले किए और बोले, अब लगे हाथ यह भी बता दो कि किसी को करेंट लग ही जाए तो क्या किया जाना चाहिए ?

मैंने भी उनकी डिबिया कुछ हल्की कर कहा, हर दुर्घटना में समय का बहुत महत्व होता है. पीड़ित को जितनी जल्द हो सके सहायता उपलब्ध करवानी चाहिए. बिजली के मामले में यदि करंट लगाने वाला व्यक्ति तार से चिपका हो तो उसे किसी सूखी लकड़ी से या रबर के दस्ताने पहन या फिर हाथों पर सूखे कपडे की कई परतें लपेट कर ही छूना और हटाना चाहिए. यदि व्यक्ति बेहोश हो तो उसे कृत्रिम सास देनी चाहिए. यदि उसकी नब्ज धीमी पड़ रही हो तो कार्डियक मसाज जरूरी होती है. यदि पीड़ित बेहोश न हो तो उसे गरम काफी पिलाना फायदेमंद रहता है. झटका खाए व्यक्ति को कुछ दिन आराम जरूर करना चाहिए. जिससे किसी अंदरूनी नुक्सान से बचाव हो सके.

ठाकुर जी सबसे अहम् बात तो बिजली से किसी भी तरह का पंगा, असावधानी या लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. मौसम कैसा भी हो गीले हाथों से स्विच वगैरह या बिजली के उपकरणों को नहीं छूना चाहिए. ज़रा सी भी कोई भी खराबी हो तो उसे तुरंत सुधारवा लेना चाहिए. घर के छोटे बच्चों की पहुँच से साकेट वगैरह दूर होने चाहिए यदि ऐसा संभव न हो तो उन्हें ढक कर रखना उचित रहता है. घर की तारों, फिटिंग और उपकरण अच्छी क्वालिटी के तथा सही अवस्था में होने चाहिए। बरसात में कड़कती बिजली या घनघोर वर्षा के समय टी.वी, फ्रिज वगैरह बंद ही कर दिए जाएं तो बेहतर है. 
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थोड़ी सी सावधानी से इसे चेरी बना कर इसका असीमित लाभ उठाया जा सकता है. 
ठाकुर जी उठते हुए बोले, भईये चलूं, तुम्हारी भाभी को भी कुछ सीख दे दूँ।          

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