pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 2 मार्च 2013

कलकत्ते का राजभवन

इसको देखने के लिए आम जनता को अनुमति नहीं होने के कारण देश की यह भव्य इमारत उतनी मशहूर नहीं हो सकी है जितनी प्रसिद्धि दिल्ली के राज भवन को प्राप्त है। पर इससे इसकी भव्यता, सुंदरता या कलात्मकता को कम कर के नहीं आंका जा सकता। 

 दिल्ली के राजधानी बनने के पहले अंग्रेजों ने कलकत्ते को अपनी राजधानी बना रखा था। आज भी उनके द्वारा बनाई गयी सरकारी इमारतें, रिहायशी भवन, पुल, सडकें अपनी मजबूती और भव्यता की कहानी आप कह रहे हैं। इन्हीं वास्तु-कला के भव्य, विशाल, अनुपम नमूनों के कारण आज भी कलकत्ता, जो अब कोलकाता हो गया है, को महलों के नगर के रूप में जाना जाता है। अपनी सुंदरता के कारण इसे पूर्व का पीटर्सबर्ग भी कहा जाता रहा है। उस समय यह देश का सबसे बडा, सुंदर, धनी और सुरुचिपूर्ण शहर था।   
आजादी के पहले की बात है। बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज था। पर वहां का गवर्नर जनरल रहता तो था एक आलीशान बंगले में पर वह था किराए का। अंग्रजों का मानना था कि उन्हें इस देश में सदा के लिए रहना है सो गवर्नर जनरल के लिए एक महल की आवश्यकता महसूस होने लगी। उसी को पूरा करने के लिए विशाल पैमाने पर एक भव्य इमारत का निर्माण कैप्टन चार्ल्स वाट की देखरेख में 1799 में शुरु किया गया जो 1803 में जा कर पूरा हुआ। उस समय 27 एकड में 84000 स्क्वा. फुट पर बने इस महल पर आज के हिसाब से करीब चार मिलियन पाउंड का खर्च आया था। इस तब तक के सबसे सुंदर भवन के खिताब वाले महल के प्रतिष्ठापन पर 800 अतिथि आमंत्रित किए गये थे।  

पर तब से अब तक इसका नाम परिस्थितियों वश कई बार बदला जा चुका है। निर्माण के बाद इसे गवर्मेंट हाउस का नाम दिया गया था। फिर जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बाद में राज-काज ब्रिटिश हुकुमत को 1858 में सौंपा तो इसे वायसराय निवास बना दिया गया। फिर जब राजधानी कलकत्ते से दिल्ली चली गयी तो फिर यह महलनुमा इमारत बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर का आवस बनी और आखिरकार आजादी के बाद से अब तक और प्रदेशों की तरह यह बंगाल के गवर्नर के निवास "राज भवन" के रूप में विख्यात है। 

शहर के बीचोबीच "मैदान यानि ईडेन गार्डेन" और "राइटर्स बिल्डिंग" के पास, कोलकाता के दिल धर्मतल्ला यानि एस्प्लैनेड से मुश्किल से पैदल दस मिनट की दूरी पर बने इस भवन में प्रवेश के छह रास्ते हैं। जिन पर उत्तर-दक्षिण दिशा में एक-एक तथा पूर्व और पश्चिम दिशा में दो-दो विशाल "गेट" बने हुए हैं। पूर्व और पश्चिम के गेटों पर विशाल मेहराबों पर शेर की मुर्तियां बनी हुई हैं। बाकि छोटे गेटों पर स्फिंक्स की मूर्तियां स्थापित हैं। बाहर से भवन का सबसे सुंदर रूप उत्तरी दरवाजे से दिखता है जो कि अंदर जाने का प्रमुख द्वार भी है। इसका केंद्रीय भवन जो एक सुंदर गुंबद से आच्छादित है, चारों  ओर से गोलाकार निर्माणों से घिरा है। जिसमें दफ्तर तथा रिहायशी जगहें शामिल हैं। उस समय भी जब वातावरण इतना दुषित नहीं होता था तब भी इसमें प्राकृतिक हवा के आवागमन का पूरा ख्याल रखा गया है। तीन मंजिला भवन के उपर जाने के लिए चार कोनों में चार सीढियां बनी हुई हैं।      

करीब साठ कमरों वाले इस भवन को सुंदर और भव्य बनाने के लिए हर संभव कोशिश की गयी है। यहां की कलाकृतियां, मुर्तियां, चित्र, पेंटिंग्स, फर्निचर, बागीचे उनका रख-रखाव हर चीज अनमोल, भव्य और अनूठी है। जगह-जगह से अनुठी वस्तुएं ला कर यहां संग्रहित की गयी हैं। कलकत्ते की पहली स्वचालित सीढी भी सर्वप्रथम यहीं लगाई गयी थी। इसको देखने के लिए आम जनता को अनुमति नहीं होने के कारण देश की यह भव्य इमारत उतनी मशहूर नहीं हो सकी है जितनी प्रसिद्धि दिल्ली के राज भवन को प्राप्त है। पर इससे इसकी भव्यता, सुंदरता या कलात्मकता को कम कर के नहीं आंका जा सकता। यह बंगाल का ही नहीं देश का भी गौरव है।  काश इसे आम जनता भी निहार पाती !!!

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

रेल की पटरियों पर दौड़ती सियासत

चारों फोटो ३६ गढ़ से चलने वाली उपेक्षित राजधानी एक्स. के है।
भारतीय रेल। राजनीतिक दलों के लिए कामधेनू. कोइ भी क्षेत्रीय दल जो केंद्र को हड़काने की क्षमता पा जाता है उसकी पहली मांग रेल मंत्रालय ही होता है. इसे पाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। क्योंकि इसका सीधा संबंध जनता से होता है इसलिए जो भी इसे हथियाता है वह अपने क्षेत्र के लोगों को बरगलाने के लिए अपने इलाके में "पटरियां बैठाना" शुरू कर देता है. भले ही वहाँ जरूरत या गुंजायश हो या ना हो. 


बाहर के हाल से अन्दर का मजमून भांपा जा सकता है 

इस बार 17 सालों के बाद फिर कांग्रेस को मौका मिला है इसे दूहने का। सियासत तो सियासत ही होती है . जब इतने वर्षों तक क्षेत्रीय दल इसके बूते अपने इलाकों का तथाकथित भला करते रहे तो कांग्रेस कैसे पीछे रह सकती थॆ. संबंधित महोदय ने इस बार मौके का फ़ायदा उठा अपने आकाओं को खुश करने का जैसे जरिया पा लिया और कांग्रेसी रेल चला डाली   

विडंबना है कि इस गाय का दूध तो सब पीना चाहते हैं पर उसको चारा कोई नहीं डालना चाहता। उसके दिन प्रति दिन क्षीण होती अवस्था का रोना सभी रोते हैं पर इलाज कोई नहीं करना चाहता। इलाज हो भी कहां से जब उसकी देख-भाल करने वाले ग्वालों की फौज पर ही आमदनी का 80'/. खर्च हो जाता हो। 

जंग लगे खस्ता हाल डिब्बे 
इस बार भी कुछ आश्चर्य चकित करने वाले उल्टे-सीधे निर्णय लिए गये, पर पूछे कौन कि मंत्री महोदय जब अनगिनत प्लास्टिक की बोतलों में पानी का व्यापार करने वाली कंपनियां लाइन लगाए खडी हैं तो आप क्यों अपना पानी जबरदस्ती पिलवाना चाहते हैं? क्यों नहीं बिना साफ किए ही उस पानी का उपयोग गाडियों और खासकर उनके बजबजाते शौचालयों को साफ कर यात्रियों को बेहतर परिवेश मुहैया करवाने की कोशिश करते? क्यों नहीं एक सुराख को शौचालय का नाम देने के बदले बायो शौचालयों की शुरुआत की जाती जिससे भारतीय पटरियां खुले 'टायलेट' के नाम से और वातावरण प्रदूषण से मुक्ति पा सकते? क्यों नहीं रखरखाव पर और ध्यान दिया जाता जिससे राजधानी जैसी गाडियों को चूहों और काक्रोंचों से मुक्ति दिलाई जा सकती? क्यों नहीं कोई आप का ध्यान इस ओर दिलाता कि जब इन प्रतिष्ठित गाडियों का यह हाल है तो साधारण गाडियां कैसे होंगी? यात्री  क्यों नहीं बिना किसी को बताए कभी साधारण गाडी में सफर कर उसकी हालत का जायजा लेते? क्यों नहीं चमकीले रैपरों में लिपटे बेस्वाद, बदरंग खाने का स्वाद चखते? क्यों पहले से ही ना संभल रही गाडियों की स्थिति सुधारने की बजाय और गाडियों की भीड बढाते हैं? दलालों पर अंकुश लगना तो बहुत जरूरी है पर क्यों नहीं दौडती गाडी में अनाप-शनाप "दौलत" कमाते टिकट चेकरों पर लगाम कसते?  सवाल अनगिनत हैं इतने कि जवाब देते-देते इनका कार्यकाल पूरा हो जाए। 
कितने सुरक्षित हैं ये? 

पर यदि सभी दलों को इसकी इतनी चिंता है कि इसे अपने वश में कर इसका, देश का, देश की जनता का, भला करना चाहते हैं तो इसे क्यों नहीं "प्रायवेट सेक्टर" को दे देते। भले ही उन्हें इसे सुधारने की एक निश्चित अवधी भी दे दी जाए, पांच साल या दस साल की। दसियों ऐसी कर्मवीर कंपनियां मिल जाएंगी जो किराये का बोझ जनता पर डाले बिना इसकी सेहत सुधारने का वचन दे सकती हैं। पर इस दूधारू की ऐसी किस्मत कहाँ ? कामधेनू  के लिए तो महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र तक में ठन गयी थी, ये तो हाड-मांस के बने साधारण इंसान हैं। इसके बिना राजनीति की गाडी नहीं चलने की।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

जीवन को जीएं, काटें नहीं

अपनी दिनभर की दिनचर्या में रोज ही ऐसे कई युवा मिलते हैं जो निढाल, निस्तेज, सुस्त नजर आते हैं। जैसे जबरदस्ती शरीर को ढो रहे हों। अधिकांश नवयुवकों को किसी ना किसी व्याधि से ग्रस्त दवा फांकते देखना बडा अजीब लगता है। आज के प्रतिस्पर्द्धात्मक समय में हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी समस्या से जुझता हुआ किसी यंत्र की कसी हुई तार की तरह हर वक्त तना रहता है। जिसके फलस्वरूप देखने में बिमारी ना लगने वाली, सर दर्द, कमर दर्द, अनिद्रा, अपच, कब्ज जैसी व्याधियां उसे अपने चंगुल में फंसाती चली जाती हैं, जिससे अच्छा भला युवा उम्रदराज लगने लगता है।

सदियों से हमारे यहां प्रभू से प्रार्थना की जाती रही है कि "हे प्रभू हमें सौ साल की उम्र प्राप्त हो"। पर यदि 30-35 साल के बाद ही रो-धो कर, दवाएं फांक कर, ज्यादातर समय बिस्तर पर गुजार कर जीना पडे तो ऐसे जीवन से क्या फायदा।      

निश्चिंतता 
पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। अनियमित दिनचर्या, कुछ भी खाने-पीने का शौक, लापरवाही, मौज-मस्ती युक्त अपना रख-रखाव इस मशीन को भी बाध्य कर देता है अपने से ही विद्रोह के लिए। युवावस्था में यदि थोडी सी भी "केयर" अपने तन-बदन की कर ली जाए तो यह एक लम्बे अरसे तक मनुष्य का साथ निभाता है। लोग भूल जाते हैं कि मौज-मस्ती भी तभी तक रास आती है जब तक शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है। 

पर इस नैराश्य पूर्ण स्थिति में भी आप अपने चारों ओर देखें तो आपको ऐसे अनेक लोग दिख जाएंगे जो अपने कर्मों से, अपने आचरण से, अपने अनुभवों से हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। जिन्हें देख जिंदगी को खुशहाल बनाने के तौर-तरीकों को समझा जा सकता है, उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। ऐसे ही एक शख्स हैं मेरे मामा जी। जो 82 साल के होने के बावजूद किसी 35 साल के युवा से कम नहीं हैं। आज देश-प्रदेश के लोगों के बीच बहुचर्चित शतायु मैराथन धावक फौजा सिंह के प्रांत पंजाब के एक कस्बे फगवाडा के पास के गांव हदियाबाद के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में श्री प्यारे लाल सुंधीर बचपन से ही सामान्य कद-काठी के इंसान रहे। पर लाख विषमताओं, हजारों अडचनों, सैंकडों परेशानियों के बावजूद उन्होंने अनियमितता का सहारा नहीं लिया। यहां तक कि छोटी उम्र में ही जीवनसाथी की असमय मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपने को संभाले रखा और अपने बच्चों को सही तालीम दिलवा कर उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर और स्थापित किया। आज जब वे हर तरह से सम्पन्न हैं, घर में हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध है फिर भी इस उम्र में में भी उन्हें खाली बैठना ग्वारा नहीं है। आज भी सिर्फ व्यस्त रहने के लिए उन्होंने अपने व्यवसाय को तिलांजली नहीं दी है।  घर में कार होने के बावजूद अपनी सेहत की खातिर इस उम्र में भी रोज 10 से 15 की.मी. सायकिल पर चलना उनका शौक है। किसी भी तरह की चिंता, फिक्र, तनाव को वे पास नहीं फटकने देते। इसी वजह से बिना किसी का साथ ढूंढे अपनी बिटिया के पास नार्वे तक हर ढेढ दो साल बाद चक्कर लगाने से नहीं घबराते। वहा भी घर पर नहीं रुकते, आस-पास के दूसरे देशों को देखना, घूमना भी उनका शगल है, फिर चाहे किसी का साथ मिले या ना मिले। अपना देश तो इनका घूमा हुआ ही है वह भी अकेले. हमारे यहां तो उनका हर साल आना हमारी जरूरत है। उनके 10-15 दिनों का प्रवास हमें एक नई शक्ति प्रदान कर जाता है।  यह सब उन लोगों के लिए सबक है जो बचपन के खान-पान की कमी, अपनी उम्र, किसी का सहारा ना होने या अपनी जीवन में ना टाली जा सकने वाली मुसीबतों को अपने द्वारा पैदा की गयीं मुसीबतों का जिम्मेदार मानते हैं। सीधी  सी बात है जिसमे जीने की उद्दाम इच्छा हो उसके लिए कोइ बाधा कोइ मायने नहीं रखती।    

सोचिए जब होनी को टाला नहीं जा सकता तो फिर परेशान क्यों? जब जो होना है, हो कर ही रहना है तो फिर नैराश्य क्यों? जब भविष्य अपने वश में नहीं है तो उसके लिए वर्तमान में चिंता क्यों?
जरा सोचिए, मैं भी सोचता हूं। कठिन जरूर है पर मुश्किल नहीं.

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

समय तो आम आदमी का भी कीमती है भाई


वो दिन इतिहास बन गये हैं जब नेता आदरणीय हुआ करते थे। खुल कर लोगों से मिला करते थे। कोई ताम-झाम नहीं होता था खुली गाडियों में उन्हें आसानी से देखा पहचाना जा सकता था। अब तो गाडी को देख कर उसमें सफर करने वाले का अंदाज लगाना पडता है।


हर प्रांत की राजधानी में मुख्य सडकों पर सायरन बजाती पुलिस की गाडियों के साथ हमारे नेताओं का गोली रोधक कारों में दुबक कर फर्राटे से निकलना एक आम बात है। आदत पड गयी है जनता को, इनके कारण, अपने जरूरी से जरूरी काम को दोयम दर्जे पर रखने की। आदत पड गयी है उसे अपनी सुरक्षा की चिंता आप करने की। आदत पड गयी है उसे अपने ही द्वारा चुने गये अपने प्रतिनिधि को अपने से ही डरता देखने की। आज अति व्यस्तता का समय है। काम-काजी आदमी के पास जरा भी फाल्तु वक्त नहीं होता कहीं ठहरने, रुकने, इंतजार करने का। अफरा-तफरी मची रहती है अपने काम पर पहुंचने और उसे पूरा करने की। ऐसे में एक बात बडी अखरती है कि जब कोई विशिष्ट व्यक्ति बंदुकों के साये में, बख्तर बंद गाडियों में बंद हो निकलता है तो आम जनता को हर मोड-चौराहे पर रोक दिया जाता है। उन लोगों में अधिकांश किसी ना किसी जरुरी काम से निकले होते हैं,किसी को दूरगामी ट्रेन पकडनी होती है, कोई किसी बिमार अस्पताल ले जा रहा होता है, कोई अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए निकला होता है, किसी को परीक्षा भवन में जाने में देर हो रही होती है। समझ में नहीं आता कि जब सारी सडक पडी होती है तो उनका दक्ष ड्रायवर सायरन बजा दाहीने तरफ से क्यों नहीं निकल जाता? क्यों पायलेट जीप में बैठा कोई काफिले के आगे-आगे गाडी दौडाते हुए बाहर हाथ निकाले डंडा लहरा कर जबरदस्ती भय का महौल उत्पन्न करता जाता है। क्यों अपनी ही जनता से लोग दूरीयां बना कर रुआब दिखाना चाहते हैं? काले शीशों के पीछे बैठे आम से ही खास बने लोगों को भी जनता की परेशानी समझनी चाहिए। रास्ता चलता रहे तो किसी को कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी और विशिष्ट व्यक्ति भी जनता की मन ही मन निकलती गालियों से बचे रहेंगे।  

वो दिन इतिहास बन गये हैं जब नेता आदरणीय हुआ करते थे। खुल कर लोगों से मिला करते थे। कोई ताम-झाम नहीं होता था खुली गाडियों में उन्हें आसानी से देखा पहचाना जा सकता था। अब तो गाडी को देख कर उसमें सफर करने वाले का अंदाज लगाना पडता है। धर्म, जाति, भाषा, को मुद्दा बना, धन,बल से सिंहासनारूढ होने वाले से वैसे खुलेपन की आशा भी बेमानी है। मन ही मन शायद वह भी अपनी कारस्तानियों से डरा रहता है। उसे लगता है कि उसके झूठ को जनता जानती है। इसीलिए उसे अपनी सुरक्षा की चिंता होने लगती है।  

जिस देश के हर प्रांत में बलात्कार, लूट, डकैती, अपहरण जैसी घटनाओं से आम इंसान त्रस्त हो। जहां 761 लोगों के पीछे एक पुलिसकर्मी होने के कारण उसे ठीक से और समय पर मदद ना मिल पाती हो, वहीं के एक विशिष्ट व्यक्ति के लिए दर्जनों सुरक्षा-कर्मी उसे  सुरक्षित रखने को तैनात हों तो ऐसी व्यवस्था को क्या कहा जाएगा। इसी अव्यवस्था पर सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठाया है। कुछेक लोग तो सिर्फ अपने अहम, रुतबे, और रौब को दिखाने के लिए ही इन सुविधाओं के लिए अड जाते हैं। फिर उन्हीं सुविधाओं, लाल बत्ती और विशेष सुरक्षा घेरे का भय दिखाकर रौब गांठने से बाज नहीं आते। इसी का नतीजा है कि एक बार फिर सर्वोच्च अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को आम आदमी की सुरक्षा का एहसास कराया है और जानना चाहा है कि वे कौन अति विशिष्ट लोग हैं और उनकी सुरक्षा पर किस आधार पर कितना खर्च किया जा रहा है? साथ ही यह भी जानकारी चाही है कि जिन लोगों को सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है, उनमें ऐसे कितने लोग हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। यह भी विडंबना ही है कि देश और देश की जनता की सुरक्षा, रख-रखाव, उसकी प्रगति, उसके सुख-चैन की जिम्मेदारी का वचन देने वालों की जगह सर्वोच्च न्यायालय को हर हफ्ते, पखवाडे देश मे पनपते नासूरों की रोक-थाम करने के लिए हिदायत देनी पडती है।

इसके पहले कि यह चाहत और शौक, समस्या बन विकराल रूप ले ले, उन विशिष्ट लोगों खासकर राजनितिक वर्ग को भी समय की नब्ज को समय रहते आंक लेना चाहिए कि उनके प्रति लोगों के घटते विश्वास की एक वजह क्या यह भी तो नहीं है।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

पैन कार्ड


पैन कार्ड, अधिकांश को तो इसके बारे में अच्छी खासी जानकारी होगी, कुछ मुझ जैसे भी होंगे जिन्हें देर से इसकी जानकारी मिली और बहुतेरों ने शायद ध्यान ही ना दिया हो। जिसे धीरे-धीरे सरकार बहुत सारे कामों के लिए जरूरी बनाती जा रही है। तो आइए लेते हैं अपने इस अनोखे बहूद्देशीय कार्ड की कुछ जानकारी - 

आयकर विभाग ने देश के टैक्स देने वाले नागरिकों के लिए एक कार्ड जारी किया हुआ है, जिसे PAN CARD (परमानेंट अकाउंट नंबर) के नाम से जाना जाता है। जो आयकर खातों की जांच वगैरह में मदद तो करता ही है सरकार ने उसे और भी बहुतेरे कामों के लिए उपयोगी और आवश्यक बना दिया है।

इसमें संबंधित व्यक्ति की फोटो लगी होती है जिससे इसे पहचान पत्र के बतौर भी काम में लाया जा सकता है। इसमें दी गयी कूट संख्या अक्षरों और अंकों के मेल (Alphanumeric Combination) से बनी होती है। शुरुआती तीन अक्षरों का चयन कंप्यूटर द्वारा होता है। चौथा अक्षर स्टेटस दर्शाता है। जिसमें 'पी' व्यक्तिगत, 'सी' किसी कंपनी द्वारा, 'एच' हिंदू संयुक्त परिवार, 'एफ' साझेदार फर्म, 'टी' किसी 'ट्रस्ट' और 'जी' का मतलब सरकार से होता है। पांचवां अक्षर संबंधित व्यक्ति के नाम या उपनाम का पहला अक्षर होता है। जैसे किसी का नाम राधा रमण यादव है तो यहां आर या वाइ हो सकता है। छठे से नौवें अंक 0001 से लेकर 9999 तक हो सकते हैं, जो आवेदन करने वाले के दस्तावेजों के आधार पर होते हैं और दसवें अक्षर से आयकर विभाग कार्ड होल्डर के रेकार्ड की जानकारियां प्राप्त करता है। 

अब तो यात्रा, बैंकों आदि में खाता खोलने, एक निश्चित रकम जमा करने या निकालने में इसको दर्शाना आवश्यक हो गया है। 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

कमरहट्टी, है ना कुछ अजीब सा नाम?


“कमरहट्टी”।  बंगाल की राजधानी कोलकाता से कुछ ही दूर चौबीस-परगना जिले के सोदपुर और अगरपाडा कस्बों के बीच स्थित इस जगह से वर्षों संबंध रहा है पर इसके नामकरण का कारण नहीं जाना जा सका।

हर शहर, गांव, कस्बे यहां तक की सडकों, गलियों के नामकरण के पीछे कोई न कोई वजह या कहानी जरूर होती है। जो या तो किसी यादगारिता को बनाए रखने के लिए होती है या फिर कुछ नाम यूंही किसी प्रसंगवस रख दिए जाते हैं। समय के साथ नाम तो याद रह जाता है पर कारण भुला दिया जाता है और एक प्रश्न या विस्मय बोधी चिंह रह जात है, उस नाम और जगह के प्रति। 

ऐसा ही एक नाम है “कमरहट्टी”।  बंगाल की राजधानी कोलकाता से कुछ ही दूर चौबीस-परगना जिले के सोदपुर और अगरपाडा कस्बों के बीच स्थित इस जगह से वर्षों संबंध रहा है पर इसके नामकरण का कारण नहीं जाना जा सका। अचानक एक दिन इससे संबंधित एक कहानी नजर आई। सोचा बांट लूं।

काफी पुरानी बात है इस जगह रहने वाले लोग बहुत सरल, भोले, विनम्र, दूसरों का आदर करने वाले, अपने मे मग्न रहने के बावजूद बहुत विद्वान हुआ करते थे। इतने की उनकी ख्यति उस समय के विद्वानों के गढ नवद्वीप तक पहुंच गयी। वहां के पंडितों ने सच्चाई जानने के लिए अपना एक प्रतिनिधिमंडल वहां भेजा। गांव वाले भी सारी बात जान गये थे पर संकोचवश वे शास्त्रार्थ करना नहीं चाहते थे नहीं अतिथियों को नीचा दिखाने की उनकी इच्छा थी। इसीलिए उन्होंने सोच विचार कर गांव के एक कुमार नामक युवक को स्त्री रूप धर एक छोटे बच्चे के साथ पंडितों की सेवा के लिए भेज दिया।  दूसरे दिन सबेरे ही घर की मुंडेर पर कौवों के एक दल ने कांव-कांव का शोर मचाना शुरु किया तो बच्चे ने अपनी "मां" बने युवक से पूछा कि ये कौवे क्या बोल रहे हैं। उसने कहा कि मैं तो एक अनपढ स्त्री हूं मुझे क्या पता, तुम इन विद्वान पंडितों से पूछ लो। बच्चे ने पंडितों के पास जा कर अपना सवाल दोहराया तो वे बोले कि भोर होने पर काग ऐसे ही चिल्लाते हैं, क्या कहते हैं हमें क्या पता।  बच्चा फिर अपनी “मां” के पास आया और बोला मां उन्हें कुछ नहीं पता तुम बताओ ना। बार-बार बच्चे के तंग करने पर उसने संस्कृत में एक श्लोक बना सुना दिया जिसका अर्थ था कि उगते सूर्य से मिटती कालिमा को देख कौवे डर गये हैं कि इससे हमें भी कालिमा समझ कहीं सूर्य खत्म ना कर दें इसी से चिल्ला रहे हैं। 
पास ही बैठे नवद्वीप के पंडितों ने जब एक गंवार स्त्री के मुख से ऐसी सुंदर व्याख्या सुनी तो वे आश्चर्य चकित रह गये। उन्होंने उस “स्त्री” से पूछा कि तुम यदि अनपढ हो तो ऐसा श्लोक कैसे रचा? इस पर उसने जवाब दिया कि आपके आने के पहले मैं यहां के पंडितों के यहां काम करती थी। उन लोगों की बात सुन- सुन कर ही थोडा-बहुत सीख लिया है। उसका जवाब सुन पंडितों ने सोचा कि यदि सिर्फ सुन कर यहां की अनपढ नारी इतना ज्ञान रखती है तो यहां के पंडित निश्चित रूप से परम ज्ञानी होंगे। ऐसा सोच वे बिना शास्त्रार्थ किए ही वहां से वापस चले गये। 

तभी गांव को धर्म-संकट से बचाने के लिए सबने मिल उस कुमार के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए गांव का नाम कुमार हट्टा यानि कुमार बाजार रख दिया। जो समय के साथ बदल कर कमरहट्टी के रुप में आज भी विद्यमान है।    



शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

फिर बसंत आया

हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।" इसीसे स्पष्ट है कि प्राचीन काल में काम के प्रति कितना स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में जगह-जगह उल्लेखित भी हुआ है।कामोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने की प्राचीन परंपरा है।मर्यादित रह कर, शालीनता के साथ, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए  बिना मनाने में ही इसकी सार्थकता है।   
शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट के बीच आगमन होता है बसंत का। इसे ऋतुओं का राजा माना गया है अर्थात ऋतुराज। आदिकाल से कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब कर अपनी रचनाओं में इसका वर्णन करते आए हैं। पर ऐसा क्या है इस ऋतु में कि इंसान को यह इतनी प्रिय है। इसका जवाब तो यही है कि इसमें वह सब कुछ है जिसकी चाहत इंसान को रहती है। इसमें फूल सिर्फ खिलते हैं, झडते नहीं। बयार तक बासंती हो जाती है। धरा धानी चुनरी ओढ़ अपने सर्वोत्तम निखार से जीवन का बोध कराती है। जीव-जगत  में उल्लास छा जाता है। जिंदगी से मोह उत्पन्न होने लगता है, और चाहता भी क्या है इंसान?

दूसरी ऋतुओं से तुलना करें तो पाएंगे कि गर्मियों में फसलें जरूर पकती हैं पर जैसे नैराष्य चारों ओर बिखरा पडा होता है। हर जगह सुखा, गर्मी, पतझड जैसे सब का अंत आ गया हो। वर्षा धरा को जिंदगी जरूर देती है पर जब तक रहती है मेघों का अंधकार धरती पर छाया रहता है, उजाला गायब सा हो जाता है। पानी अपनी मर्यादा खो देता है। शीत में ठिठुरन होती है। जीव जगत संकुचित सा हो रह जाता है। उतनी जीवनी शक्ति नहीं रह पाती।

तभी शीत की विदाई के साथ ही आगमन होता है बसंत का। यही वह समय होता है जब सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। यह महीना होता है फागुन का यानि मधुमास का अर्थात मधुऋतु का। जब सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। "हल्की सी शोखी, हल्का सा नशा है, मिल गयी हो भंग जैसे पूरी बयार में" बसंत के आते ही टहनियों में कोंपलें फूटने लगती हैं। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। वायु के नर्म-नर्म झोंकों से फल-फूल, लताएं-गुल्म, पेड-पौधे सभी जैसे मस्ती में झूमने लगते हैं। इसी समय आम की मंजरियों में भी बौर आने लगते हैं जैसे ऋतुओं के राजा ने फलों के राजा को दावत दी हो।

जब सारी प्रकृति ही मस्ती में डूबी हो तो इस आलम से जीव-जंतु कैसे दूर रह सकते हैं। उनमें भी एक नयी चेतना आ जाती है। भौंरों का गुंजाएमान होना, पक्षियों का नये नीडों को बनाने की तैयारियों में जुट जाना, कोयल की कूक। चारों ओर नज़र दौडा कर देखें हर कोई एक नये जोश से अपने काम में जुटा नज़र आएगा। मनुष्य तो मनुष्य, कीट-पतंग, पशु-पक्षी, पेड-पौधे अर्थात सारी प्रकृति ही जैसे बौरा जाती है। मौसम की अनुकूलता से मानव जीवन में भी निरोगता छाई रहती है, मन प्रफुल्लित रहता है जिससे चारों ओर हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इसी माहौल में शुमार होती है होली की फगुनौटी फिजा, रंगों की रंगीली फुहार, फागों की गमगमाती गमक, धमालों की धमधमाती धमक के साथ भांग का भनभनाता सरूर। चारों ओर उल्लास ही उल्लास। इन्हीं गुणों के कारण अनादिकाल से इसी समय बसंतोत्सव मनता चला आ रहा है। एक ऐसा उत्सव जिसमें जात-पात, धनी-गरीब, राजा-रंक, छोटे-बडे का कोई भेद-भाव नहीं बरता जाता। इतिहास गवाह है कि रंगों के इस उत्सव में धर्म भी आड़े नहीं आता था। मुगल बादशाह और नवाब भी इसकी मस्ती से अछूते नहीं रह पाए थे। चाहे वह वाजिद अली शाह हों चाहे सम्राट अकबर या फिर अमीर खुसरो। मानव की तो बात ही क्या स्वंय भगवान कृष्ण ने इसे आध्यात्म की उंचाईयों पर ले जा बैठाया था। उन्हें तो इस ऋतु से इतना लगाव था कि ब्रज में सदा बसंत ही छाया रहता था। वृंदावन सदा प्रफुल्लित रहता था। पशु-पक्षी मुग्ध और उन्मत्त बने रहते थे। कुंज-कुंज को भौरे गुंजायमान किए रहते थे। चारों ओर उल्लास छाया रहता था।

बसंत को कामदेव का पुत्र माना जाता है। इसीलिए इस समय मनाए जाने वाले उत्सव को मदनोत्सव भी कहते हैं। मदन का अर्थ होता है काम। जो मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है। हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।" इसीसे स्पष्ट है कि प्राचीन काल में काम के प्रति कितना स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में जगह-जगह उल्लेखित भी हुआ है।

पर पता नहीं धीरे-धीरे कैसे सब बदलता चला गया। कहते हैं बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता। ऐसा नहीं है यह तो अबाध रूप से सारे जग में संचरण करता है। यह दूसरी बात है कि इस की आहट प्रकृति-विहीन माहौल और संगदिलों को सुनाई नहीं पडती। इसीलिए लोग इसे भूल आयातित त्योहारों को गले लगाने लग गये हैं। उस सात्विक उन्मुक्त वातावरण और व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचर और कुठाएं लेती चली गयीं। भाईचारे, प्रेम की जगह नफरत और बैर ने ले ली। कामोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने की प्राचीन परंपरा है। इसे मर्यादित रह कर शालीनता के साथ बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, बिना किसी को कष्ट या दुख दिए मनाने में ही इसकी सार्थकता है। आज फिर जरूरत है लोगों को अपने त्योहारों,  उनकी विशेषताओं, उनकी उपयोगिताओं को बताने की, समझाने की। जिससे इन उत्सवों की गरिमा वापस लौट सके।

विशिष्ट पोस्ट

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...