pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

फिर बसंत आया

हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।" इसीसे स्पष्ट है कि प्राचीन काल में काम के प्रति कितना स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में जगह-जगह उल्लेखित भी हुआ है।कामोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने की प्राचीन परंपरा है।मर्यादित रह कर, शालीनता के साथ, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए  बिना मनाने में ही इसकी सार्थकता है।   
शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट के बीच आगमन होता है बसंत का। इसे ऋतुओं का राजा माना गया है अर्थात ऋतुराज। आदिकाल से कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब कर अपनी रचनाओं में इसका वर्णन करते आए हैं। पर ऐसा क्या है इस ऋतु में कि इंसान को यह इतनी प्रिय है। इसका जवाब तो यही है कि इसमें वह सब कुछ है जिसकी चाहत इंसान को रहती है। इसमें फूल सिर्फ खिलते हैं, झडते नहीं। बयार तक बासंती हो जाती है। धरा धानी चुनरी ओढ़ अपने सर्वोत्तम निखार से जीवन का बोध कराती है। जीव-जगत  में उल्लास छा जाता है। जिंदगी से मोह उत्पन्न होने लगता है, और चाहता भी क्या है इंसान?

दूसरी ऋतुओं से तुलना करें तो पाएंगे कि गर्मियों में फसलें जरूर पकती हैं पर जैसे नैराष्य चारों ओर बिखरा पडा होता है। हर जगह सुखा, गर्मी, पतझड जैसे सब का अंत आ गया हो। वर्षा धरा को जिंदगी जरूर देती है पर जब तक रहती है मेघों का अंधकार धरती पर छाया रहता है, उजाला गायब सा हो जाता है। पानी अपनी मर्यादा खो देता है। शीत में ठिठुरन होती है। जीव जगत संकुचित सा हो रह जाता है। उतनी जीवनी शक्ति नहीं रह पाती।

तभी शीत की विदाई के साथ ही आगमन होता है बसंत का। यही वह समय होता है जब सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। यह महीना होता है फागुन का यानि मधुमास का अर्थात मधुऋतु का। जब सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। "हल्की सी शोखी, हल्का सा नशा है, मिल गयी हो भंग जैसे पूरी बयार में" बसंत के आते ही टहनियों में कोंपलें फूटने लगती हैं। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। वायु के नर्म-नर्म झोंकों से फल-फूल, लताएं-गुल्म, पेड-पौधे सभी जैसे मस्ती में झूमने लगते हैं। इसी समय आम की मंजरियों में भी बौर आने लगते हैं जैसे ऋतुओं के राजा ने फलों के राजा को दावत दी हो।

जब सारी प्रकृति ही मस्ती में डूबी हो तो इस आलम से जीव-जंतु कैसे दूर रह सकते हैं। उनमें भी एक नयी चेतना आ जाती है। भौंरों का गुंजाएमान होना, पक्षियों का नये नीडों को बनाने की तैयारियों में जुट जाना, कोयल की कूक। चारों ओर नज़र दौडा कर देखें हर कोई एक नये जोश से अपने काम में जुटा नज़र आएगा। मनुष्य तो मनुष्य, कीट-पतंग, पशु-पक्षी, पेड-पौधे अर्थात सारी प्रकृति ही जैसे बौरा जाती है। मौसम की अनुकूलता से मानव जीवन में भी निरोगता छाई रहती है, मन प्रफुल्लित रहता है जिससे चारों ओर हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इसी माहौल में शुमार होती है होली की फगुनौटी फिजा, रंगों की रंगीली फुहार, फागों की गमगमाती गमक, धमालों की धमधमाती धमक के साथ भांग का भनभनाता सरूर। चारों ओर उल्लास ही उल्लास। इन्हीं गुणों के कारण अनादिकाल से इसी समय बसंतोत्सव मनता चला आ रहा है। एक ऐसा उत्सव जिसमें जात-पात, धनी-गरीब, राजा-रंक, छोटे-बडे का कोई भेद-भाव नहीं बरता जाता। इतिहास गवाह है कि रंगों के इस उत्सव में धर्म भी आड़े नहीं आता था। मुगल बादशाह और नवाब भी इसकी मस्ती से अछूते नहीं रह पाए थे। चाहे वह वाजिद अली शाह हों चाहे सम्राट अकबर या फिर अमीर खुसरो। मानव की तो बात ही क्या स्वंय भगवान कृष्ण ने इसे आध्यात्म की उंचाईयों पर ले जा बैठाया था। उन्हें तो इस ऋतु से इतना लगाव था कि ब्रज में सदा बसंत ही छाया रहता था। वृंदावन सदा प्रफुल्लित रहता था। पशु-पक्षी मुग्ध और उन्मत्त बने रहते थे। कुंज-कुंज को भौरे गुंजायमान किए रहते थे। चारों ओर उल्लास छाया रहता था।

बसंत को कामदेव का पुत्र माना जाता है। इसीलिए इस समय मनाए जाने वाले उत्सव को मदनोत्सव भी कहते हैं। मदन का अर्थ होता है काम। जो मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है। हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।" इसीसे स्पष्ट है कि प्राचीन काल में काम के प्रति कितना स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में जगह-जगह उल्लेखित भी हुआ है।

पर पता नहीं धीरे-धीरे कैसे सब बदलता चला गया। कहते हैं बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता। ऐसा नहीं है यह तो अबाध रूप से सारे जग में संचरण करता है। यह दूसरी बात है कि इस की आहट प्रकृति-विहीन माहौल और संगदिलों को सुनाई नहीं पडती। इसीलिए लोग इसे भूल आयातित त्योहारों को गले लगाने लग गये हैं। उस सात्विक उन्मुक्त वातावरण और व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचर और कुठाएं लेती चली गयीं। भाईचारे, प्रेम की जगह नफरत और बैर ने ले ली। कामोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने की प्राचीन परंपरा है। इसे मर्यादित रह कर शालीनता के साथ बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, बिना किसी को कष्ट या दुख दिए मनाने में ही इसकी सार्थकता है। आज फिर जरूरत है लोगों को अपने त्योहारों,  उनकी विशेषताओं, उनकी उपयोगिताओं को बताने की, समझाने की। जिससे इन उत्सवों की गरिमा वापस लौट सके।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

आइए जानें अपने संसद भवन को


किन्हीं कारणों से जब अंग्रेजों ने 1912 में भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने का फैसला किया तो वहां दिवार से घिरी दिल्ली के बाहर भी राजधानी के अनुरुप बहुत कुछ नया बसाने की जरूरत सामने आई। लिहाजा खोज के दौरान रायसीना की पहाडियों के पास की जगह को सबसे उपयुक्त पाया गया, और इसे नई दिल्ली का नाम दे कर निर्माण कार्य शुरु कर दिया गया। 

इस योजना के अंतर्गत बनने वाली इमारतों में वायसराय भवन, जो आज का हमारा राष्ट्रपति निवास  है, सचिवालय, इंडिया गेट के साथ-साथ जरुरत की अन्य इमारतें भी थीं। निर्माण का दारोमदार एडविन लुटियंस पर था जिनके सहायक थे वास्तुकार हर्बर्ट बेकर। पर उनकी योजना में संसद भवन जैसी किसी इमारत का कोई स्थान नहीं था। होता भी कैसे अंग्रेजों ने कहां सोचा था कि कभी यहां भी राजशाही का अंत हो प्रजातंत्र का सागर हिलोरें मारने लगेगा। उस समय जो विधानमंडल के लिए भवन बनाया गया था वही हमारा आज का संसद भवन है।
आज दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र की पहचान, देश के गौरव के प्रतीक, आजादी की लडाई के गवाह इस भवन का निर्माण 12 फरवरी 1921 को शुरु हो कर छह साल बाद 18 जनवरी 1927 को खत्म हुआ था। उस समय इस पर कुल लागत 83 लाख रुपये आई थी। शुरु में इसके स्वरूप को लेकर दोनों निर्माताओं में कुछ मतभेद थे। वास्तुकार हर्बर्ट इसे त्रिकोणीय रूप देना चाहते थे जिसके उपर एक विशाल गुंबद हो। जबकि लुटियंस वृताकार। काफी जद्दोजहद, विचार-विमर्ष के पश्चात आखिर ऐसा नक्शा सामने आया जिसमें वृताकार भवन पर एक गुंबद हो जो किसी के भवन के पास आते जाने पर अपने को भवन के अंदर समाहित करता नज़र आए। 
 
छह एकड में फैली इस इमारत का घेरा एक तिहाई मील का है। जिसे चारों ओर से दस फुट ऊंची, लाल पत्थर की जालीदार दिवार से घेर दिया गया है जिससे बाहर सडक से भी इसकी सुंदरता को निहारा जा सकता है। सुंदर बाग से घिरा यह भवन पहले तल पर 27 फुट ऊंचे 144 खंभों द्वारा निर्मित खुले और गोलाकार बरामदे के अंदर बना है। जिसमें प्रवेश हेतु 12 दरवाजे हैं। छत के पानी की निकासी के लिए जहां भारतीय वास्तुकला के अनुसार शेर की मुखाकृति वाली नालियां बनाई गयीं हैं वहीं इसकी खूबसूरत मेहराबें इस्लामी कारीगरी का बेहतरीन नमूना पेश करती हैं। सारा भवन लाल बलुए पत्थरों के बने चबूतरे पर अवस्थित है। भवन का निर्माण लाल और पीले पत्थरों से किया गया है। 
इसका उद्घाटन वायसराय लार्ड इरविन ने किया था। उनके आने पर वास्तुकार हर्बर्ट ने उन्हें सोने की चाबी भेंट की थी। दरवाजा खोलते समय इरविन को भान भी नहीं होगा कि इसी जगह ब्रिटिश साम्राज्य को भारतियों के हाथ सत्ता की चाबी सौंपनी पडेगी।

सेंट्रल हाल - 
इस बेहतरीन भवन के तीन मुख्य भागों में एक है, सेंट्रल हाल। इसकी बनावट गोलाकार है। इसी  के ठीक उपर 98 फुट डायमीटर वाला अष्टकोणीय गुंबद है। ऐसा कहा जाता है कि यह गुंबद संसार में अपने आप में अनोखा है। इस हाल की ऐतिहासिक महत्ता दो कारणों से अहम है, पहला यही वह जगह है जहां 1947 में देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन हुआ था। दूसरी यहीं पर हमारे संविधान की रुपरेखा तैयार की गयी थी। आज कल यह दोनों सदनों की और बाहर से आए अन्य देशों के प्रमुखों की खास सभाओं के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। यहां आज के समय की हर आधुनिक संचार व्यवस्था उपलब्ध है। यह तीन ओर से लोकसभा, राज्य सभा और यहां के बृहद पुस्तकालय से घिरा हुआ है।  जिसमें प्रवेश की खातिर तीन दरवाजे हैं। साल के पहले सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति यहीं दोनों सदनों के सदस्यों को संबोधित करते हैं। यहां की ऐतिहासिकता को बनाए रखने के लिए पुराने जमाने की घंटी बजा कर सदस्यों को बुलाने की प्रथा को वैसा ही रखा गया है अलबत्ता घंटी का स्थान बिजली के बजर ने ले लिया है। पुरानी चीजों को देखें तो अभी भी हाल के अंदर खंभों पर लगे उल्टे पंखे यथावत रखे गये हैं जो इसकी पहचान बन चुके हैं। हाल में अध्यक्ष के लिए बेश-कीमती लकडी कि कुर्सी है जिस के पीछे उपर की ओर महात्मा गांधी की फोटो लगी हुई है। 

लोक सभा - 
सेंट्रल हाल के साथ ही वह विख्यात कक्ष है जहां चुनावों के बाद हमारे द्वारा भेजे गये प्रतिनिधी जा कर देश का भविष्य निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसे लोकसभा का नाम दिया गया है। लोक सभा को हाउस आफ़ पीपल या लोवर हाउस के नाम से भी जाना जाता है। इसके सदस्य सीधे चुनाव जीत कर आते हैं सिर्फ दो को छोड जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है। देश का कोई भी नागरिक जो 25 साल के उपर हो और मानसिक रूप से स्वस्थ और किसी भी प्रकार के कानूनी दोष से मुक्त हो यहां के लिए चुनाव लड पांच साल तक की सदस्यता हासिल कर सकता है। यह एक 4800 वर्ग फुट का अर्द्ध गोलाकार हाल है। इसमें 550 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है। हरे कालीन से ढके इस कक्ष को खूबसूरत बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया गया है। अध्यक्ष की कुर्सी के उपर संस्कृत का वेदवाक्य “धर्मचक्रपर्वतनीय” के साथ ही राष्ट्रीय ध्वज और चिन्ह भी सुशोभित हैं। यहां की कार्यवाही देखने के लिए दर्शक दीर्घा भी बनी हुई है।

राज्य सभा - 
इसके साथ ही है राज्यसभा का वह सदन जहां देश के विशिष्ट लोग चयनित हो कर आते हैं। इसे कौंसिल आफ़ स्टेट या अपर हाउस भी कहा जाता है। इसके सदस्यों को राज्यों की विधान सभाओं के सदस्यों की अप्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया द्वारा चुन कर आना पडता है। इन्हें छह सालों के लिए चुना जाता है। राज्यसभा भंग नहीं होती अलबत्ता हर दो साल बाद इसके एक तिहाई सदस्य रिटायर हो जाते हैं और नये सदस्य चुन कर आते रहते हैं। इसके 250 सदस्य में 238 विधायकों द्वारा और 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं। जो समाज के सभ्रांत वर्ग, कला, विज्ञान, खेल या अपने क्षेत्र की विशिष्ट हस्ती हो सकते हैं। इसके सदस्यों की न्युनतम उम्र 30 साल होनी चाहिए। 
 
नक्काशित संगमरमर और काली लकडी से निर्मित, लाल रंग के कालीन से ढके इस सदन की शोभा देखते ही बनती है। यहां 250 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। सभापति की कुर्सी के उपर अशोक चिन्ह लगा हुआ है। पत्रकारों, विशिष्ठ अतिथियों और आम लोगों के लिए दर्शक दीर्घा भी बनी हुई है। इसकी खूबसूरती एक मिसाल है जिसे बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोडी जाती। 
   
पुस्तकालय - 
किसी जमाने में राजाओं-महाराजाओं के लिए बनाए गये इस सदन को अब पुस्तकालय का रूप दे दिया गया है। यह सेंट्रल हाल को घेरने वाला तीसरा कक्ष है। यह अपने आप में देश के सबसे स्मृद्ध पुस्तकालयों में से एक है। यहीं पर देश के संविधान की हिंदी और अंग्रेजी प्रतिलिपि भी मौजूद है जिसे आम लोग भी देख सकते हैं। वहीं यहां आप हर विषय पर पुस्तक और देश के  हर हिस्से से निकलने वाले अखबार का अवलोकन भी कर सकते हैं। 

इस बेहतरीन इमारत में आम जन भी प्रवेश पा सकता है बशर्ते उसके पास किसी सांसद द्वारा प्रदत्त अनुमोदन पत्र हो।      
साल दर साल बढती सांसदों की संख्या को मद्देनज़र रख अब कुछ दिनों से एक नये संसद भवन की जरूरत महसूस की जा रही है। क्योंकि इसकी क्षमता को जितना हो सकता था बढाया जा चुका है। फिर यह भवन करीब 85 साल पुराना हो चला है, कुछ ही सालों में यह विश्व धरोहरों में शामिल हो जाएगा। 

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

विवादित होते पद्म पुरस्कार

अब समय आ गया है कि इन पुरस्कारों की हालत भी टी.वी. पर हर पखवाडे दिखने वाले पुरस्कारों जैसी हो जाए, इसके चयन का तरीका तुरंत बदल देना चाहिए और यदि तुष्टीकरण जैसी मनोदशा के कारण ऐसा संभव ना हो तो इस प्रथा को खत्म ही कर देना श्रेयस्कर होगा।

पद्म पुरस्कार। देश का सर्वाधिक सम्मानित सम्मान।अपने को इसके लायक बनाने के लिए अथक परिश्रम किया जाता रहा है। जिसे पा कर वर्षों से अपने-अपने फन में सिद्धहस्त लोग गौरवान्वित होते रहे हैं। कुछ ऎसी भी हस्तियाँ होती हैं जिनके पास पहुँच कर ये सम्मान भी  कृतार्थ होते हैं, पर इसके साथ ही अब   ऎसी झोली में भी ये जा पड़ते हैं जहां इनका सम्मान ही कम हो जाता है। इसीलिए अब साल दर साल इनकी घोषणा होते ही विवाद खडे होने लगे हैं। किसी को पुरस्कार न मिलने की हताशा है, कुछ अपनी उपलब्धियों को पद्म सम्मानों में न बदलते देख दुखी हो जाते हैं। तो किसी को पुरस्कार अपनी उपलब्धि के मुकाबले कमतर लगता है। कई ऐसे भी हैं जो अपने से कमतर या सिफारिशी लोगों को यह सम्मान पाते देख इसे ना लेने का मन बना लेते हैं।

ये तो वे लोग हैं जिनका परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इन सम्मानों से सम्बंध बनता है। पर अब तो आम जन की उंगली भी इनके चयन पर उठने लगी है जब वह देखता है कि जहां अनेक उपलब्धियां बिना पहचान और सम्मान पाए रह जाती हैं वहीं कुछ ऐसे लोग इस पुरस्कार को हथिया लेते हैं जो इसकी गरिमा, इसकी मर्यादा को ताक पर रख, सार्वजनिक स्थानों पर भी मीडिया में चर्चित होने के लिए अपनी हरकतों से बाज नहीं आते।  इसके महत्व को समझने की बात तो दूर रही। उन्हें अपना कद इन पुरस्कारों से ज्यादा बडा लगता है। ऐसा हो भी क्यूं ना जब ये पुरस्कार सत्ता से नजदीकी रखने वाले ऐसे लोगों को को दे दिए जाएं, जिन्होंने अपने क्षेत्र में ही कोई खास मुकाम हासिल ना किया हो। जो इन सम्मानों का ही असम्मान है। इसीलिए हर साल चयन पर उठते विवाद इस ओर भी इशारा करते हैं कि अब पद्म पुरस्कार सचमुच अपनी चमक खो चुके हैं। पर फिर भी चयन का तरीका ना बदलने से यही इशारा मिलता है कि अंधा बांटे रेवडी, मुड-मुड खुद को दे। तो जब तक हैसियत है, रसूख है, कोई भी अपनों को लाभान्वित करने का मौका छोडना नहीं चाहता। चाहे पाने वाला अपात्र ही क्यों ना हो। और जो सचमुच हकदार हैं उन्हें इस तरह सम्मानित किया जाता है जैसे पुरस्कार देकर उन पर एहसान किया जा रहा हो। इसीलिए कई वरिष्ठ, बुजुर्ग या वयोवृद्ध फनकार, जिन्होंने अपने फन से अपना और देश का भी नाम ऊंचा किया हो वे अब पद्म पुरस्कारों से दूरी बनाए रखना ही ठीक समझते हैं।

अब समय आ गया है कि इन पुरस्कारों की हालत भी टी.वी. पर हर पखवाडे दिखने वाले पुरस्कारों जैसी हो जाए, इसके चयन का तरीका तुरंत बदल देना चाहिए और यदि तुष्टीकरण जैसी मनोदशा के कारण ऐसा संभव ना हो तो इस प्रथा को खत्म ही कर देना श्रेयस्कर होगा।

बुधवार, 30 जनवरी 2013

गांधीजी के जीवन का अंतिम दिन

30 जनवरी 1948, शुक्रवाररात के साढे तीन बजे थे। सुबह होने में वक्त था अभी रात की कालिमा गहराई हुई ही थी पर समयनिष्ठ गांधी जी नींद से जाग उठे। कौन जानता था कि यह उनकी अंतिम सुबह होगी। 
देश का माहौल काफी तनावपूर्ण था। भयंकर दंगों से सारा देश सहमा हुआ था। लोगों को शांत कराने में व्यस्त बापू ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के समारोह में भी शिरकत नहीं की थी। उस समय वह कलकत्ता में थे। वह देश की राजधानी में 9 सितम्बर 1947 पर ही आ पाए थे और अब बिरला हाउस के निचले तल में रह कर लोगों के दिलों से आपसी नफरत दूर करने में जी-जान से जुटे थे। अभी दस दिन पहले ही शाम की प्रार्थना में उन पर जान लेवा हमला हो चुका था। फिर भी वह देश की एकता और अखंडता के लिए जूझ रहे थे।
नित्य क्रम से निवृत हो सब उतनी ठंड में भी रोज की तरह 3.45 पर बरामदे में सुबह की प्रार्थना के लिए इकट्ठा हो गये। प्रार्थना के बाद "मनु" और "आभा" उन्हें कमरे में ले गयीं। बाहर अभी भी अंधेरा छाया हुआ था।  पिछले उपवास की कमजोरी के बावजूद गांधीजी अपने काम में जुट गये।  पत्रों को पढने और उनका जवाब  देने के बाद उन्होंने कांग्रेस के  नये संविधान में संशोधन करे,   जिसे आज उनकी अंतिम वसीयत माना जाता है।  काम करते-करते उन्होंने 4.45 पर संतरे का  रस लिया  और अत्यधिक थकान के कारण थोडी देर के लिए नींद के आगोश में चले गये।  पर सिर्फ आधे घंटे बाद उठ कर फिर काम में जुट गये।
सुबह सात बजे से उनसे मिलने लोगों का आना शुरु हो गया। बीच-बीच में वे अपने सचिव प्यारेलाल को भी निर्देश देते जाते थे तथा समाचार पत्र पर भी नजर दौडा लेते थे। उन्हें नोआखाली के दंगों के साथ-साथ मद्रास की भी चिंता थी जहां खाने की भयंकर किल्लत हो रही थी। मनु के बार-बार टोकने पर वे बोले पता नहीं मैं कल रहूं ना रहूं पर काम अधुरा नहीं रहना चाहिए।  
नहाने के बाद वे कुछ अच्छा महसूस करने लगे, उपवास के बाद वजन भी कुछ बढा था। 9.30 बज रहे थे यह उनका नाश्ते का समय था। खाने के दौरान ही प्यारेलाल से सलाह मशविरा भी चल रहा था। करीब 10.30 बजे वे फिर सो गये।

तनाव का साथी चरखा 
12.30 बजे फिर लोगों से मिलना जुलना शुरु हुआ, जिसमें मुस्लिम लीग के भी लोग थे जो देश की हालत पर बात करने आए थे। समय बीत रहा था, तरह-तरह के लोगों का आना लगा हुआ था। देश से विदेश से, राज्यों से, कोई इंटरव्यू के लिए आ रहा था तो कोई अपना दुखडा लेकर, नेता अपने भविष्य की चिंता लिए आ रहे थे,  कोई मार्गदर्शन के लिए तो कोई सिर्फ दर्शन कर निहाल होने। सबसे बात करते-करते 4 बज चुके थे। बहुत दिनों बाद गांधीजी खुद बिना सहारे के स्नानागार तक गये। ये देख सब को थोडी तसल्ली हुई। इसी बीच सरदार पटेल भी आ पहुंचे। पटेल और नेहरु के कुछ आपसी तनावों पर उन्होंने अपनी राय दी। वे थोडे उदग्विन थे। तभी काठियावाड से आए दो व्यक्तियों ने मिलने का समय मांगा तो पटेल के सामने ही उन्होंने कहा कि जिंदा रहा तो प्रार्थना के बाद उनसे मिलूंगा। ये दूसरी या तीसरी बार आज उन्होंने अपनी मौत की बात की थी। फिर उन्होंने कुछ संतरे, गाजर का जूस तहा थोड़ा बकरी का दूध खाने में लिया। यही उनका अंतिम भोजन था।  फिर वे चर्खा कातने बैठ गये।

आज अलसुबह पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के 6 नम्बर के रिटायरिंग रूम मे गोडसे और उसके दो साथी नारायन आप्टे और विष्णु करकरे ने मिल कर योजना पर अंतिम दृष्टि डाली थी।
दोपहर बाद वे लोग कमरे से बाहर निकल कर बिरला मंदिर गये वहां गोडसे को छोड दोनों ने भगवान से प्रार्थना की। 4.30 चार बजे गोडसे ने नयी खरीदी हुई खाकी जैकेट पहनी और तांगे पे सवार हो बिरला हाउस पहुंचा। करकरे और आप्टे दूसरा तांगा कर वहां गये।  
 पांच बजने के पहले तीनों बिरला हाउस पहुंच चुके थे। 20 जनवरी को हुए हमले के बाद नेहरु और पटेल के जोर देने पर सिर्फ उनकी खुशी के लिए गांधी जी ने अपनी सुरक्षा के लिए 30 पुलिस वालों को वहां तैनात होने की अनुमति अनमने मन से दे दी थी। पर इस शर्त के साथ कि वहां आने वालों की किसी तरह की जामा-तलाशी नहीं ली जाएगी। इसी कारण गोडसे की पार्टी को अंदर आने में कोई दिक्कत नहीं हुई।
गांधीजी और सरदार पटेल 
पांच बज चुके थे। गांधी जी अपना हर काम समयानुसार ही करते थे,  देर उन्हें जरा भी पसंद नहीं थी खास कर प्रार्थना के समय। आभा और मनु परेशान थीं, गांधी जी पटेल के साथ जरूरी मसले पर मंत्रणा कर रहे थे। उस दिन उनकी जेब-घड़ी उनके पास नहीं थी। जब 5.10 हो गये तो मनु ने घडी की ओर इशारा किया। गांधी जी ने उसी समय वार्ता खत्म की,  उठे,  चप्पल पहनी,  मनु और आभा का सहारा लिया और बाहर आ गये। रोज की तरह सहायक बृजकृष्ण कुछ और लोगों के साथ उनके पीछे थे। पर सदा उनके आगे चलने वाली सुशीला नायर और सहायक गुरुबचन सिंह आज साथ नहीं थे। सादे कपडों में उनके साथ चलने वाले पुलिस कर्मचारी ए. एन. भाटिया की ड्युटी आज कहीं और लगी हुई थी।     

प्रार्थना स्थल की ओर जाते हुए 
गांधी जी अपनी 200 गज की अंतिम यात्रा पर निकले,  देर हो जाने के कारण उन्होंने लान के बीच से हो कर अपने कदम प्रार्थना स्थल की ओर बढाए। दिन भर की तरह-तरह की समस्याओं के बावजूद वे अच्छे मूड में लग रहे थे। आभा मनु से बात करते-करते वे प्रार्थना स्थल तक पहुंच ही रहे थे कि गुरुबचन सिंह भी इनसे आ मिला पर वह उनके सामने नहीं चला। वहां देश दुनिया के सैंकडों लोग इकट्ठा थे सब की आंखें बापू पर टिकी हुईं थीं। गांधीजी हाथ जोडे अभिवादन स्वीकारते आगे बढ रहे थे, लोग उन्हें आगे जाने का रास्ता दे रहे थे। उनके रास्ता बदलने के कारण गोडसे ने भी अपना निर्धारित प्लान बदल लिया। बीच लान में चलते हुए वे ठीक गोडसे के सामने आ गए। उसने अपने हाथ जोडे जिसमें
बिरला हॉउस, जहाँ गोली मारी गयी  
 छोटी इटालियन बेरेट्टा पिस्तौल दबी हुई थी। उन्हें सामने पा  वह बोला "नमस्ते गांधीजी",  गांधीजी ने भी उसे हाथ जोड कर जवाब दिया। गोडसे कुछ झुका,  मनु ने सोचा वह गांधी जी के पांव छूना चाहता है, उसने कहा भाई बापू को पहले ही देर हो चुकी है उन्हें परेशान ना करो। जाने दो। तभी गोडसे ने मनु को धक्का दिया और गांधीजी पर तीन  गोलियां दाग दीं, जो उनके पेट और सीने में जा धसीं।  गांधी जी धीरे-धीरे जमीन पर गिरते चले गये,  उनके मुंह से हे  राम, हे राम....  का उच्चारण हो रहा था। हाथ अभी भी जुडे हुए थे,  चेहरा पीला पडता जा रहा था, शाल पूरी तरह खून से लाल हो चुका था। कुछ क्षणों में ही उनकी आत्मा परमात्मा से जा मिली। इस समय घडी 5.17 बजा रही थी।
चिर निद्रा 

पता नहीं उन्हें अपनी मौत का एहसास हो चुका था तभी तो उन्होंने मनु से कहा था कि यदि कोई मुझे गोली मारे तो मरते वक्त मेरे मुंह पर कराह नहीं भगवान का नाम हो।
  
राज घाट 
जिंदगी भर यात्रा कर,  सच्चाई का पक्ष लेते हुए,  अहिंसक तरीके से अपनी बातों को मनवाते हुए देश भर में शांति की अलख जगाने वाले,  अपने लिए रत्ती भर की चाह ना रखने वाले एक आम इंसान की महात्मा बनने की कहानी कैसे खौफनाक तरीके से खत्म हुई। शायद प्रभू को यही मंजूर था।
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सहायता,  स्टीफन मर्फी, गांधीजी के सचिव व सहायक, की 30 जनवरी 47 की रिपोर्ट से साभार  

सोमवार, 28 जनवरी 2013

सरकारी अस्पतालों मे ही हो "क्रीमी लेयर" का भी इलाज

मंत्री महोदय की यह सदेच्छा पूरी होती तो नहीं लगती, पर फिर भी यदि ऎसी कोइ नीति बन जाती है या कुछ लोग स्वप्रेरणा से ही सरकारी अस्पताल को अपनाते हैं तो हर साल खर्च होने वाली भारी-भरकम रकम को देश, समाज के कल्याण में लगाया जा सकेगा। 

अपने से उम्र में  बड़े लोग बताते हैं कि आजादी के कई सालों बाद भी लोग गुरुजनों, नेताओं की बात को पत्थर की लकीर मानते थे। उन्होंने  कह दिया तो बात सच ही होगी नहीं तो उसे सच करने पर तुल जाते थे। बड़े और जिम्मेदार लोग भी अपनी जिम्मेदारी समझते थे। मजाल है की कभी हल्की  बात उनके मुंह से निकल जाए। पर अब सब कुछ उलट-पलट गया है। कोइ किसी की बात का सहज ही विश्वास नहीं  करता (टी वी पर विराजमान स्वयंभू महाराजाओं को छोड़)  खासकर नेता बिरादरी कुछ ज्यादा ही ग्रसित है इस अभिशाप से। वे यदि दिन की बात करते हैं तो लोग आकाश में सूर्य को खोजने लगते हैं। ऐसे में  साफ दिल, कर्तव्यनिष्ठ, कुछ करने का जज्बा रखने वाले नेताओं की मंशा को भी आम लोग गंभीरता से लेने में हिचकिचाते हैं।

अभी कुछ दिनों पहले मध्य-प्रदेश के पंचायत और विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने मुख्य मंत्री समेत सारे मंत्रियों, विधायकों और सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों को यह कह कर हैरत और असमंजस  में डाल दिया कि सरकारी सेवा में प्रवृत्त हर इंसान का इलाज सरकारी अस्पताल में होना चाहिए और उनके मेडिकल बिलों पर रोक लगनी  चाहिए। उनके अनुसार जब सरकारी अस्पताल में इलाज और दवाएं मुफ्त में मिलती हैं तो फिर सरकारी आदमी अपना इलाज बाहर क्यों करवाते हैं? वहाँ भी जेनेरिक दवाओं का उपयोग होना चाहिए। इससे सरकारी खजाने पर से एक बड़ा बोझ खत्म करने में सहायता मिलेगी। इससे सबसे बड़ा फ़ायदा यह होगा कि जब  मंत्री और आला अधिकारी  अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में करवाएंगे तो वहाँ की व्यवस्था  ठीक होगी। वहाँ की दवाएं, उपकरण, आपात कालीन सेवाएं समय पर सबको हासिल हो पाएंगी। डाक्टर, नर्स, स्टाफ सब चुस्त-दुरुस्त रहेंगे। इलाज की गुणवत्ता बढ़ेगी तो  लोगों की धारणा कि सरकारी अस्पतालों में ढंग से इलाज और देखभाल नहीं होती वह भी दूर हो जाएगी। साथ ही उनहोंने कहा कि शायद मेरा प्रस्ताव लोगों को पसंद न आए पर मैं हमेशा इसके पक्ष में रहूँगा।

मंत्री जी ने बात तो पते की कही और वह स्वागत योग्य है। जब मंत्री, नेताओं का इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में आना-जाना होगा तो वे वहाँ  की तकलीफों, मजबूरियों, अव्यवस्थाओं को समझ कर उसे दूर करने की कोशिश  करेंगे, जिससे अस्पताल के साथ-साथ गरीब जनता का भी भला हो सकेगा।  पर क्या उन्हीं की पार्टी के लोग उसे मानेंगे? क्या भारी-भरकम बिलों की अदायगी से प्राप्त होने वाली रकम का लोभ संवरण कर पाएंगे? सबसे बड़ी बात क्या सरकारी अस्पताल पर अपना विश्वास ला पाएंगे?

पर फिर भी यदि ऎसी कोइ नीति बन जाती है या कुछ लोग स्वप्रेरणा से ही सरकारी अस्पताल को अपनाते हैं तो हर साल खर्च होने वाली भारी-भरकम रकम को देश, समाज के कल्याण में लगाया जा सकेगा। 



           

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

गांधीजी के बंदर भी हैरान हैं


 उन तीनों  बंदरों  की साख, उनके आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

मिजारु, मिकाजारु, मजारु, तीन बंदर, पर कितने बुद्धिमान, बुरा कहने, सुनने  और देखने की मनाही करने वाले। गांधीजी को ये इतने भाए और उन्होंने तीनों को ऐसे अपनाया कि  वे गांधीजी के बंदर ही कहलाने लग गए। ये तीनों भी जापान से ऐसे ही भारत नहीं चले आए थे। वे आए थे यहाँ की संस्कृति, यहाँ का ज्ञान, यहाँ का पांडित्य, यहाँ की मर्यादा, यहाँ के सर्व-धर्म समभाव का गुणगान सुन कर। यहाँ की क्षमा शीलता की, मानवता की, भाई-चारे की,  माता-पिता-गुरु जनों के सम्मान की गाथाएं सुन कर। यहाँ के रहवासियों के  प्रकृति-पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम की कहानियां सुन कर।   यहाँ आकर शरण भी ली तो ऐसे इंसान के यहाँ जो सदा  दूसरों के प्रति समर्पित रहा और फिर तीनो  यहीं के हो कर रह गए।

शीर्ष पर पहुँचने  के बाद हर मार्ग अवनति की ओर  ही जाता है। यह उन तीनों ने भी सुन रखा था पर इतनी जल्दी मूल्यों का ह्रास हो जाएगा वह भी भारत में, यह तो किसी ने भी नहीं सोचा था। समय चलायमान है, उसके साथ हर चीज बदलती जाती है। यहाँ भी वैसा ही हुआ, समय बदला, ज़माना बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, साथ ही साथ नेता भी बदले और उन्होंने  अपने मतलब के तहत हर चीज की परिभाषा भी बदल डाली।

गांधीजी हमारे मार्गदर्शक रहे, झंझावातों के बावजूद उनके दिखाए रास्ते पर चल कर देश आजाद हुआ। पर अब उनके आदर्शों,  उनकी बातों का लोग अपनी सुविधानुसार उपयोग कर अपना मतलब निकालने में जुटे हुए हैं। बेचारे बंदर भी वैसी ही  कुटिल चालों का शिकार हो गए।  बंदर वही हैं उनकी सीखें भी वही हैं पर कुछ मौका-परस्त, चंट  लोगों ने  उनका अलग अर्थ निकाल कर  आम इंसान की मति  भ्रष्ट करनी  शुरू कर दी  है।  

पहले मजारु  के संकेत का अर्थ बुरा न कहने से लिया जाता था। अब उसका अर्थ निकाला जाता है कि कुछ भी होता रहे, देखते रहो, सुनते रहो पर बोलो मत कुछ भी। लाख अन्याय हो अपना मुंह फेर लो। मजलूमों पर जुल्म होता रहे तुम अनदेखा कर अपनी राह चलते रहो।  एक  चुप हजार नियामत। 

पहले मिजारु  के संकेत का अर्थ समझा जाता था कि बुरा मत देखो। अब उसका अर्थ हो गया है कि कुछ देखो ही  मत। बस बिना सोचे-समझे जो मुंह में आए  बोलते रहो। जितना हो सके दूसरों की बुराई करते हुए हदें पार कर दो।  किसी को नेक नामी मिलते ही उसकी बखिया उधेड़ दो। किसी के अच्छे काम को भी मीन-मेख निकाल कर निकृष्ट सिद्ध कर दो। वादे करो, सब्ज बाग़ दिखाओ और भूल जाओ। 

उसी तरह पहले मिकाजारु  के संकेत का अर्थ बुरा ना सुनने में किया  जाता था पर आज उसके अर्थ का भी  अनर्थ कर दिया गया है। अब उससे यह समझाया जाता है कि अपने स्वार्थ के लिए किसी की भी मत सुनो। कोइ लाख चिल्लाता रहे तुम अपनी रेवड़ियां बाँटते रहो, जनता के खून-पसीने की कमाई से अपने घर भरते रहो। कोइ विरोध करे तो उसकी ऐसी की तैसी करवा दो। कोइ कुछ भी बोले, कुछ भी कहे तुम अपने कानों पर जूँ मत रेंगने दो।

तीनों बंदर भी  हैरान हैं कि क्या यह वही देश है जिसकी किसी समय संसार भर में तूती बोला करती थी। जो ज्ञान और शिक्षा में जगत-गुरु कहलाता था। जिसके ऋषि-मुनियों के उपदेश दुनिया को राह दिखाते थे।  क्या  हो गया है यहाँ के गुणी जनों को, वीरों को, देश भक्तों को। क्यों मुट्ठी भर पथ भ्रष्ट लोगों के कारनामों पर पूरा देश चुपपी साधे बैठा है?  क्यों  देश को रसातल की और जाते देख भी आक्रोश नहीं उमड़ता? क्यों महिलाओं की, दलितों की चीखों पर भी कान बंद किए हुए हैं लोग?

औरों की तो क्या कहें उन तीनों की अपनी साख, उनके अपने आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

सोमवार, 14 जनवरी 2013

जीती-जागती "की-चेन"


पैसा कमाने के लिए इंसान क्या-क्या तरीके इजाद करता है और उसके लिए कहां तक नृशंस हो सकता है इसका उदाहरण चीन में शुरु हुए एक नये खब्त से समझा जा सकता है। चाहे "पेटा" वाले लाख कोशिश कर लें पर इंसान का शैतानी दिमाग जीव-जंतुओं पर जुल्म करने से बाज नहीं आता। चीन में भी हमारी तरह वास्तु इत्यादि पर विश्वास करने वाले लाखों लोग हैं। जो मानते हैं कि जल-जीवों को अपने साथ रखने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी धारणा को भुनाने के लिए किसी खब्ती दिमाग के व्यापारी ने वहां आजकल छोटी-छोटी मछलियों और कछुओं को प्लास्टिक की थैलियों में बंद कर "की चेन" की तरह बेचना शुरु कर दिया है। जिससे आशातीत कमाई होने की वजह से अब यह 'सोवेनियर' सडकों पर मिलना आम बात हो गयी है।   

हांलाकि जीव-जंतु की सुरक्षा को ले कर चिंतित रहने वाले लोग इससे काफी नाराज हैं पर बीजींग में इन "जिंदा की चेनों" की बिक्री पर कोई असर नहीं पड रहा है। बेचने वालों का कहना है कि वे इन जंतुओं के लिए खाने और आक्सीजन का पूरा ख्याल रख की-चेन बनाते हैं जिसमें वे महीनों जिंदा रह सकते हैं। पर जानकारों का कहना है कि वैसे वातावरण में ये नन्हें जीव ज्यादा दिन नहीं रह सकते। पर ये लोग चाहे जितना भी विरोध कर लें चीन में यह व्यापार बंद होते नहीं दिखता क्योंकि वहां इन नन्हें जीवों के बचाव के लिए कोई कानून है ही नहीं। सिर्फ जंगली जानवरों की रक्षा के लिए कानून बना हुआ है। 

वैसे वहां भी कुछ दयालू, नरम दिल लोग हैं जो इन सोवेनियर को खरीद कर इन जीवों को मुक्त कर देते हैं पर उससे कोई फायदा होते नहीं दिखता। क्योंकि  सात से.मी. का एक पैक दस यूआन यानि लगभग 1.5 डालर में ले कुछ सिरफिरे इसकी खरीदी में कई फायदे देखते हैं, एक तो किसी जीव को पालतू बनाने का सुख फिर जब तक जीव जिंदा हैं वे उनके लिए सौभाग्य कारक हैं और उनके मरने पर वे उन्हें भून कर खा भी सकते हैं।

तो जब तक इंसानों में ऐसी सोच रहेगी तब तक इन निरीह प्राणियों की जान सांसत में ही बनी रहेगी।                    

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