pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 28 जनवरी 2013

सरकारी अस्पतालों मे ही हो "क्रीमी लेयर" का भी इलाज

मंत्री महोदय की यह सदेच्छा पूरी होती तो नहीं लगती, पर फिर भी यदि ऎसी कोइ नीति बन जाती है या कुछ लोग स्वप्रेरणा से ही सरकारी अस्पताल को अपनाते हैं तो हर साल खर्च होने वाली भारी-भरकम रकम को देश, समाज के कल्याण में लगाया जा सकेगा। 

अपने से उम्र में  बड़े लोग बताते हैं कि आजादी के कई सालों बाद भी लोग गुरुजनों, नेताओं की बात को पत्थर की लकीर मानते थे। उन्होंने  कह दिया तो बात सच ही होगी नहीं तो उसे सच करने पर तुल जाते थे। बड़े और जिम्मेदार लोग भी अपनी जिम्मेदारी समझते थे। मजाल है की कभी हल्की  बात उनके मुंह से निकल जाए। पर अब सब कुछ उलट-पलट गया है। कोइ किसी की बात का सहज ही विश्वास नहीं  करता (टी वी पर विराजमान स्वयंभू महाराजाओं को छोड़)  खासकर नेता बिरादरी कुछ ज्यादा ही ग्रसित है इस अभिशाप से। वे यदि दिन की बात करते हैं तो लोग आकाश में सूर्य को खोजने लगते हैं। ऐसे में  साफ दिल, कर्तव्यनिष्ठ, कुछ करने का जज्बा रखने वाले नेताओं की मंशा को भी आम लोग गंभीरता से लेने में हिचकिचाते हैं।

अभी कुछ दिनों पहले मध्य-प्रदेश के पंचायत और विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने मुख्य मंत्री समेत सारे मंत्रियों, विधायकों और सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों को यह कह कर हैरत और असमंजस  में डाल दिया कि सरकारी सेवा में प्रवृत्त हर इंसान का इलाज सरकारी अस्पताल में होना चाहिए और उनके मेडिकल बिलों पर रोक लगनी  चाहिए। उनके अनुसार जब सरकारी अस्पताल में इलाज और दवाएं मुफ्त में मिलती हैं तो फिर सरकारी आदमी अपना इलाज बाहर क्यों करवाते हैं? वहाँ भी जेनेरिक दवाओं का उपयोग होना चाहिए। इससे सरकारी खजाने पर से एक बड़ा बोझ खत्म करने में सहायता मिलेगी। इससे सबसे बड़ा फ़ायदा यह होगा कि जब  मंत्री और आला अधिकारी  अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में करवाएंगे तो वहाँ की व्यवस्था  ठीक होगी। वहाँ की दवाएं, उपकरण, आपात कालीन सेवाएं समय पर सबको हासिल हो पाएंगी। डाक्टर, नर्स, स्टाफ सब चुस्त-दुरुस्त रहेंगे। इलाज की गुणवत्ता बढ़ेगी तो  लोगों की धारणा कि सरकारी अस्पतालों में ढंग से इलाज और देखभाल नहीं होती वह भी दूर हो जाएगी। साथ ही उनहोंने कहा कि शायद मेरा प्रस्ताव लोगों को पसंद न आए पर मैं हमेशा इसके पक्ष में रहूँगा।

मंत्री जी ने बात तो पते की कही और वह स्वागत योग्य है। जब मंत्री, नेताओं का इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में आना-जाना होगा तो वे वहाँ  की तकलीफों, मजबूरियों, अव्यवस्थाओं को समझ कर उसे दूर करने की कोशिश  करेंगे, जिससे अस्पताल के साथ-साथ गरीब जनता का भी भला हो सकेगा।  पर क्या उन्हीं की पार्टी के लोग उसे मानेंगे? क्या भारी-भरकम बिलों की अदायगी से प्राप्त होने वाली रकम का लोभ संवरण कर पाएंगे? सबसे बड़ी बात क्या सरकारी अस्पताल पर अपना विश्वास ला पाएंगे?

पर फिर भी यदि ऎसी कोइ नीति बन जाती है या कुछ लोग स्वप्रेरणा से ही सरकारी अस्पताल को अपनाते हैं तो हर साल खर्च होने वाली भारी-भरकम रकम को देश, समाज के कल्याण में लगाया जा सकेगा। 



           

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

गांधीजी के बंदर भी हैरान हैं


 उन तीनों  बंदरों  की साख, उनके आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

मिजारु, मिकाजारु, मजारु, तीन बंदर, पर कितने बुद्धिमान, बुरा कहने, सुनने  और देखने की मनाही करने वाले। गांधीजी को ये इतने भाए और उन्होंने तीनों को ऐसे अपनाया कि  वे गांधीजी के बंदर ही कहलाने लग गए। ये तीनों भी जापान से ऐसे ही भारत नहीं चले आए थे। वे आए थे यहाँ की संस्कृति, यहाँ का ज्ञान, यहाँ का पांडित्य, यहाँ की मर्यादा, यहाँ के सर्व-धर्म समभाव का गुणगान सुन कर। यहाँ की क्षमा शीलता की, मानवता की, भाई-चारे की,  माता-पिता-गुरु जनों के सम्मान की गाथाएं सुन कर। यहाँ के रहवासियों के  प्रकृति-पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम की कहानियां सुन कर।   यहाँ आकर शरण भी ली तो ऐसे इंसान के यहाँ जो सदा  दूसरों के प्रति समर्पित रहा और फिर तीनो  यहीं के हो कर रह गए।

शीर्ष पर पहुँचने  के बाद हर मार्ग अवनति की ओर  ही जाता है। यह उन तीनों ने भी सुन रखा था पर इतनी जल्दी मूल्यों का ह्रास हो जाएगा वह भी भारत में, यह तो किसी ने भी नहीं सोचा था। समय चलायमान है, उसके साथ हर चीज बदलती जाती है। यहाँ भी वैसा ही हुआ, समय बदला, ज़माना बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, साथ ही साथ नेता भी बदले और उन्होंने  अपने मतलब के तहत हर चीज की परिभाषा भी बदल डाली।

गांधीजी हमारे मार्गदर्शक रहे, झंझावातों के बावजूद उनके दिखाए रास्ते पर चल कर देश आजाद हुआ। पर अब उनके आदर्शों,  उनकी बातों का लोग अपनी सुविधानुसार उपयोग कर अपना मतलब निकालने में जुटे हुए हैं। बेचारे बंदर भी वैसी ही  कुटिल चालों का शिकार हो गए।  बंदर वही हैं उनकी सीखें भी वही हैं पर कुछ मौका-परस्त, चंट  लोगों ने  उनका अलग अर्थ निकाल कर  आम इंसान की मति  भ्रष्ट करनी  शुरू कर दी  है।  

पहले मजारु  के संकेत का अर्थ बुरा न कहने से लिया जाता था। अब उसका अर्थ निकाला जाता है कि कुछ भी होता रहे, देखते रहो, सुनते रहो पर बोलो मत कुछ भी। लाख अन्याय हो अपना मुंह फेर लो। मजलूमों पर जुल्म होता रहे तुम अनदेखा कर अपनी राह चलते रहो।  एक  चुप हजार नियामत। 

पहले मिजारु  के संकेत का अर्थ समझा जाता था कि बुरा मत देखो। अब उसका अर्थ हो गया है कि कुछ देखो ही  मत। बस बिना सोचे-समझे जो मुंह में आए  बोलते रहो। जितना हो सके दूसरों की बुराई करते हुए हदें पार कर दो।  किसी को नेक नामी मिलते ही उसकी बखिया उधेड़ दो। किसी के अच्छे काम को भी मीन-मेख निकाल कर निकृष्ट सिद्ध कर दो। वादे करो, सब्ज बाग़ दिखाओ और भूल जाओ। 

उसी तरह पहले मिकाजारु  के संकेत का अर्थ बुरा ना सुनने में किया  जाता था पर आज उसके अर्थ का भी  अनर्थ कर दिया गया है। अब उससे यह समझाया जाता है कि अपने स्वार्थ के लिए किसी की भी मत सुनो। कोइ लाख चिल्लाता रहे तुम अपनी रेवड़ियां बाँटते रहो, जनता के खून-पसीने की कमाई से अपने घर भरते रहो। कोइ विरोध करे तो उसकी ऐसी की तैसी करवा दो। कोइ कुछ भी बोले, कुछ भी कहे तुम अपने कानों पर जूँ मत रेंगने दो।

तीनों बंदर भी  हैरान हैं कि क्या यह वही देश है जिसकी किसी समय संसार भर में तूती बोला करती थी। जो ज्ञान और शिक्षा में जगत-गुरु कहलाता था। जिसके ऋषि-मुनियों के उपदेश दुनिया को राह दिखाते थे।  क्या  हो गया है यहाँ के गुणी जनों को, वीरों को, देश भक्तों को। क्यों मुट्ठी भर पथ भ्रष्ट लोगों के कारनामों पर पूरा देश चुपपी साधे बैठा है?  क्यों  देश को रसातल की और जाते देख भी आक्रोश नहीं उमड़ता? क्यों महिलाओं की, दलितों की चीखों पर भी कान बंद किए हुए हैं लोग?

औरों की तो क्या कहें उन तीनों की अपनी साख, उनके अपने आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

सोमवार, 14 जनवरी 2013

जीती-जागती "की-चेन"


पैसा कमाने के लिए इंसान क्या-क्या तरीके इजाद करता है और उसके लिए कहां तक नृशंस हो सकता है इसका उदाहरण चीन में शुरु हुए एक नये खब्त से समझा जा सकता है। चाहे "पेटा" वाले लाख कोशिश कर लें पर इंसान का शैतानी दिमाग जीव-जंतुओं पर जुल्म करने से बाज नहीं आता। चीन में भी हमारी तरह वास्तु इत्यादि पर विश्वास करने वाले लाखों लोग हैं। जो मानते हैं कि जल-जीवों को अपने साथ रखने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी धारणा को भुनाने के लिए किसी खब्ती दिमाग के व्यापारी ने वहां आजकल छोटी-छोटी मछलियों और कछुओं को प्लास्टिक की थैलियों में बंद कर "की चेन" की तरह बेचना शुरु कर दिया है। जिससे आशातीत कमाई होने की वजह से अब यह 'सोवेनियर' सडकों पर मिलना आम बात हो गयी है।   

हांलाकि जीव-जंतु की सुरक्षा को ले कर चिंतित रहने वाले लोग इससे काफी नाराज हैं पर बीजींग में इन "जिंदा की चेनों" की बिक्री पर कोई असर नहीं पड रहा है। बेचने वालों का कहना है कि वे इन जंतुओं के लिए खाने और आक्सीजन का पूरा ख्याल रख की-चेन बनाते हैं जिसमें वे महीनों जिंदा रह सकते हैं। पर जानकारों का कहना है कि वैसे वातावरण में ये नन्हें जीव ज्यादा दिन नहीं रह सकते। पर ये लोग चाहे जितना भी विरोध कर लें चीन में यह व्यापार बंद होते नहीं दिखता क्योंकि वहां इन नन्हें जीवों के बचाव के लिए कोई कानून है ही नहीं। सिर्फ जंगली जानवरों की रक्षा के लिए कानून बना हुआ है। 

वैसे वहां भी कुछ दयालू, नरम दिल लोग हैं जो इन सोवेनियर को खरीद कर इन जीवों को मुक्त कर देते हैं पर उससे कोई फायदा होते नहीं दिखता। क्योंकि  सात से.मी. का एक पैक दस यूआन यानि लगभग 1.5 डालर में ले कुछ सिरफिरे इसकी खरीदी में कई फायदे देखते हैं, एक तो किसी जीव को पालतू बनाने का सुख फिर जब तक जीव जिंदा हैं वे उनके लिए सौभाग्य कारक हैं और उनके मरने पर वे उन्हें भून कर खा भी सकते हैं।

तो जब तक इंसानों में ऐसी सोच रहेगी तब तक इन निरीह प्राणियों की जान सांसत में ही बनी रहेगी।                    

बुधवार, 9 जनवरी 2013

भारत बनाम इंडिया

भारत और इंडिया, तुलना अच्छी है, पर दोनों कभी एक दूसरे के विरोधी नहीं रहे। आप क्या कहते हैं?  

सोमवार, 7 जनवरी 2013

दूसरों को दोष देना कितना आसान है.


दूसरों को दोष देना कितना आसान है.  आजकल किसी की  ज़रा सी असयमित बात पर तूफान उठ खडा होता है। यह ठीक है की नेता, अभिनेता या कोइ भी हो उसे समस्या की नजाकत को समझ कर ही बोलना चाहिए। पर दुसरे पर दोषारोपण करते हुए हम अपनी भूलों को नजरंदाज कर जाते हैं।   

पिछले दिनों एक गोष्ठी में जाना हुआ था। दिल्ली दुष्कर्म पर चर्चा होनी थी। विचार विमर्श के बाद आहार की भी व्यवस्था थी। अच्छी खासी उपस्थिति थी। वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे। सभी इस दर्दनाक और वहशियाना हरकत पर क्षोभ व  दुख प्रगट कर रहे थे। ज्यादातर का यही ख्याल था कि लोगों ने बच्चों को सहायता नहीं पहुंचाई। हम संवेदनाशुन्य होते जा रहे हैं।  

अभी दो-तीन वक्ता ही अपने उद्गार सामने रख  पाए थे कि धीरे-धीरे आधे सभागार ने अपनी उपस्थिति भोजन कक्ष में दर्ज करा दी। कुछ लोग  मजबूरी वश,  कुछ संस्था के सक्रीय सदस्य और कुछ वक्ताओं से संबधित लोग ही वहाँ बैठे दिखे बाकी सब उदर-पूर्ती  के लिए संवेदना को किनारे कर गए थे।  

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

जब सारे जने कह रहे हैं कि कल नया साल है तो जरूर होगा !


 जो सक्षम हैं उन्हें एक और मौका मिल जाता है, अपने वैभव के प्रदर्शन का, अपनी जिंदगी की खुशियां बांटने, दिखाने का, पैसे को खर्च करने का। जो अक्षम हैं उनके लिये क्या नया और क्या पुराना। 

दुनिया के साथ ही हम सब हैं। जब सारे जने कह रहे हैं कि कल नया साल है तो जरूर होगा। सब एक दूजे को बधाईयां दे ले रहे हैं, अच्छी बात है। जिस किसी भी कारण से आपसी वैमनस्य दूर हो वह ठीक होता है। चाहे उसके लिये विदेशी अंकों का ही सहारा लेना पड़े। अब इस युग में अपनी ढपली अलग बजाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। वे कहते हैं कि दूसरा दिन आधी रात को शुरु होता है तो चलो मान लेते हैं क्या जाता है। सदियों से सूर्य को साक्षात भगवान मान कर दिन की शुरुआत करते रहे तो भी कौन सा जग में सब से ज्यादा निरोग, शक्तिमान, ओजस्वी आदि-आदि रह पाये। कौन सी गरीबी घट गयी कौन सी दरिद्रता दूर हो गयी।


हर बार की तरह ही कल फिर एक नयी सुबह आयेगी अपने साथ कुछ नये अंक धारण किये हुए। साल भर पहले भी ऐसा ही हुआ था। होता रहा है साल दर साल। आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। जो सक्षम हैं उन्हें एक और मौका मिल जाता है, अपने वैभव के प्रदर्शन का, अपनी जिंदगी की खुशियां बांटने, दिखाने का, पैसे को खर्च करने का। जो अक्षम हैं उनके लिये क्या नया और क्या पुराना। उन्हें तो रोज सुरज उगते ही फिर वही वही चिंता रहेती है, काम मिलेगा कि नहीं, चुल्हा जल भी पायेगा कि नहीं, बच्चों का तन इस ठंड में ढक भी पायेगा कि नहीं। ऐसे लोगों को तो यह भी नहीं पता कि जश्न होता क्या है।

कुछेक की चिंता है कि इतने सारे पैसे को खर्च कैसे करें और कुछ की, कि इतने से पैसे को कैसे खर्च करें? इन दिनों जो खाई दोनों वर्गों में फैली है उसका ओर-छोर नहीं है। वैसे देखें तो क्या बदला है या क्या बदल जायेगा। कुछ लोग कैसे भी जोड़-तोड़ लगा, साम, दाम ,दंड़, भेद की नीति अपना, किसी को भी कैसी भी जगह बैठा अपनी पीढी को तारने का जुगाड़ बैठाते रहेंगे। कुछ लोग मानव रूपी भेड़ों की गिनती करवा खुद को खुदा बनवाते रहेंगे। कुछ सदा की तरह न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाते-उठवाते रहेंगे, और कुछ सदा की तरह कुछ ना कर पा कर कुढते-कुढते खर्च हो जायेंगे।

वैसे इस लिखे को अन्यथा ना लें। किसी दुर्भावना या पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है यह लेख। अपनी तो यही कामना है कि साल का हर दिन अपने देश और देशवासियों के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर प्राणी के लिये खुशहाली, सुख, स्मृद्धी के साथ-साथ सुरक्षा की भावना भी अपने साथ लाए।  

सभी भाई-बहनों के साथ-साथ "अनदेखे अपने" मित्रों के लिए आने वाला हर दिन खुशी समृद्धी तथा स्वास्थ्य लेकर आये। यही कामना है।  

नव-वर्ष सभी के लिए मंगलमय हो, मुबारक हो, सुखमय हो। सभी सुखी, स्वस्थ, प्रसन्न और सुरक्षित रहें।


गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

जागो ! कि तुम आधा विश्व हो


पिछले कई दिनों से दिल्ली में दरींदों के वहशीपन का शिकार बनी बेकसूर लडकी को न्याय दिलाने के लिए सरकार और जनता के बीच ठनी हुई है। सरकारी पाले के लोग इस गलतफहमी में हैं कि हर बार की तरह यह मुसीबत भी वे मौन साध कर टाल देंगें। पर इस बार उनका यह काम बिल्ली और कबूतर का हश्र करने वाला होगा। जिम्मेदार लोग जब अपने घर में भी लडकियां होने की बात करते हैं तो वे यह भूल जाते हैं कि उनकी लडकियों और आम जनता की बेटियों की सुरक्षा में जमीन-आसमान का फर्क है। उनकी बच्चियां जहां सुरक्षा के अभेद्य किले में रहती हैं तो आम लडकियों की सुरक्षा के लिए एक मिट्टी की दिवार भी मुयस्सर नहीं होती। 

ठीक है कि दोषियों को कडी से कडी सजा मिलनी चाहिए पर सिर्फ ऐसे कुछ लोगों को सजा देने से यह कोढ खत्म नहीं हो जाएगा। आज किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लें इतनी अफरा-तफरी के बावजूद देश के किसी ना किसी कोने में होने वाली ऐसी हरकतों की खबर छपी ही रहती है। जो इस कडवी सच्चाई को इंगित करती है कि देश की राजधानी में उठे तूफान का असर देश के दूसरे भागों में रह रहे राक्षसों पर बेअसर ही है। डर, भय, इंसानियत जैसी बातें इनके दिलों से कोसों दूर जा चुकी हैं। इसकी कुछ ना कुछ वजह तो हमारी सडी-गली व्यवस्था भी है। जो एक्के-दुक्के दुष्कर्मी को दंडित करने से सुधरने वाली नहीं है।  आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। महिलाओं को दिल से बराबरी का दर्जा देने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। यह इतना आसान नहीं है, हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन पुरुष उन्हें परोस कर अपना मतलब साधते रहते हैं। यह क्या पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन, आठ मार्च, महिला दिवस जैसा नामकरण कर उनको समर्पित कर दिया है। कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है? यदि ऐसा नहीं है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता? पर सभी खुश हैं। विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।  
आश्चर्य होता है, दुनिया के आधे हिस्से के हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए, उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन निश्चित किया गया है। इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए, जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर समाज ने, समाज में  उन्हें इतना चौंधिया दिया होता है कि वे अपने कर्मों के अंधेरे को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की। अपने सोए हुए जमीर को जगाने की। 

ऐसा भी नहीं है कि महिलाएं उद्यमी नहीं हैं, लायक नहीं हैं, मेहनती नहीं हैं। उन्होंने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। पर पुरुष वर्ग ने बार-बार, हर बार उन्हें दोयम होने का एहसास करवाया है। आज सिर्फ माडलिंग को छोड दें, हालांकि वहां और बहुत से तरीके हैं शोषण के, तो हर जगह, हर क्षेत्र में महिलाओं का वेतन पुरुषों से कम है। हो सकता है इक्की दुक्की जगह इसका अपवाद हो।

इतिहास और पौराणिक ग्रंथ तक इसके गवाह हैं कि जब-जब पुरुष को महिला की सहायता की जरूरत पड़ी है उसने उसे सिर-आंखों पर बैठाया है, मतलब निकलते ही तू कौन तो मैं कौन? हमारे ग्रन्थों में वर्णित किस्से-कहानियां चाहे कल्पना हो चाहे हकीकत, उसमें भी नारी से पक्षपात सामने नजर आता है। देव जाति जो अपने आप को बहुत दयालू, न्यायप्रिय, सबका हित करने वालों की तरह पेश करती आई है, उस पर भी जब-जब मुसीबतें पड़ीं तो उसने भी एकजुट हो कर शक्ति रूपी नारी का आवाहन किया पर मुसीबत टलते ही उसे पूज्य बना कर एक कोने में स्थापित कर दिया। कभी सुना है कि स्वर्ग में किसी महिला का राज रहा हो। इस धरा पर माँ जैसा जन्मदाता, पालनहार, ममतायुक्त, गुरू जैसा कोई नहीं है फिर भी अधिकांश माताओं की हालत किसी से छिपी नहीं है।  

जब भी कभी इस आधी आबादी के भले की कोई बात होती है तो वहां भी पुरुषों की ही प्रधानता रहती है। वहां इकठ्ठा हुए बहूरूपिए कभी खोज-खबर लेते हैं, सिर पर ईंटों का बोझा उठा मंजिल दर मंजिल चढती रामकली की। अपने घरों में काम करतीं, सुमित्रा, रानी, कौशल्या, सुखिया की। कभी सोचते हैं तपती दुपहरी में खेतों में काम करती रामरखिया के बारे में। कभी ध्यान देते हैं दिन भर सर पर सब्जी का बोझा उठाए घर-घर घूमती आसमती पर। नहीं ! क्योंकि उससे अखबारों में सुर्खियां नहीं बनतीं, टी.वी. पर चेहरा नज़र नहीं आता। ऐसा यदि करना पड़ जाता है तो पहले कैमरे और माईक का इंतजाम होना जरूरी होता है। ऐसे दिखावे जब तक खत्म नहीं होंगें, महिला जब तक महिला का आदर करना नहीं शुरु करेगी तब तक चाहे एक दिन इनके नाम करें चाहे पूरा साल। चाहे किसी शहर के दरिंदों को सजा मिल भी जाए कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

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