बुधवार, 12 दिसंबर 2012

अभी दस तो लो, फिर सौ का देखते हैं

सबको लग रहा है की यही वक्त है कर ले  पूरी आरजू। क्या पता बाद में मौका मिले न मिले। 

ससंद ने भारत में खुदरा व्यापार के लिए बड़ी विदेशी कंपनियों के लिए लाल कार्पेट बिछवा दिया है। जिसके झाडने, संवारने और बिछवाने में सरकार को बसपा और सपा ने आदतानुसार  नौंटंकी रूपी छुपा समर्थन दे विपक्षी प्रस्ताव को धाराशाई करवा दिया।

बसपा अध्यक्ष मायावती से मिले समर्थन और मुलायम सिंह की राजनीति के बाद सरकार के लिए मतदान महज संसदीय औपचारिकता रह गया था। भले ही इसे विपक्ष ने सरकार की नैतिक हार करार दिया हो। मत-विभाजन के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि सरकार ने जोड़-तोड़ से मत हासिल किए हैं। जबकि सरकार ने इसे किसान, व्यापारी संघों और राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श के बाद उठाया गया कदम बताया है।

इस बार एक मजेदार वाकया यह रहा कि मतदान से पहले खुद प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी, राजनीतिक खिलाडियों को अपने पक्ष में करने की कवायद करते नजर आए। मनोनीत सदस्यों ने तो सरकार को उपकृत करना ही था पर विपक्षी खेमे में भी कई दरारें नजर आई।
सरकार की जीत में सरकार का एक पहले उठाया गया कदम भी काफी मददगार रहा, जिसमें सरकार ने विदेशी किराना स्टोर को इजाजत देने का फैसला राज्यों पर छोड दिया था। इसी कारण कई क्षेत्रीय दलों ने सरकार का साथ दिया।

यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिस बात को लेकर सरकार ने अपने सबसे बडे हितैषी तृणमूल का साथ खोया, जिसके कारण देश को बंद झेलना पडा, संसद का बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ, उसका असर सिर्फ दस शहरों में ही दिखेगा। वह भी दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहर ही होंगे। जबकी ऐसे शहरों की संख्या तकरीबन 53 है।

विदेशी स्टोर खोलने को अब तक केवल 11 राज्यों व केंद्र शासित प्रांतों ने अनुमति दी है। इनमें आंध्र प्रदेश, असम, दिल्ली, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, राजस्थान, उत्तराखंड, चंडीगढ़, दमन और दियू तथा दादर और नागर हवेली शामिल हैं। जबकी खुद कांग्रेस शासित राज्य केरल ने भी अब तक रिटेल में एफडीआइ को इजाजत नहीं दी है। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार भी अभी पेशोपेश में नज़र आ रही है, क्योंकि राज्य की सत्ता में साझेदार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को इस मुद्दे पर ऐतराज है। इन सब बातों से विदेशी कंपनियां भी अचंभित हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि देश की वित्तीय राजधानी का दर्जा रखने वाली मुंबई में ही वे कारोबार क्यों नहीं कर सकतीं? इसकी भी संभावना कम ही है कि ये विदेशी कंपनियां छोटे शहरों की ओर रुख करेंगीं। ऊपर से उन्हें कुछ क्षेत्रीय सरकारों की वह धमकी भी हिचकिचवाएगी जिसमें ऐसे स्टोरों को आग लगा देने वाली धमकियां दी गयी हैं।    

जानकारों का आकलन है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए विदेशी कंपनियां अगले लोकसभा चुनाव तक इंतजार कर सकती हैं। उन्हें अपने व्यापार से मतलब है,  आखिर वे यहां धंदा  कर पैसे कमाने आईं हैं नाकी अपना नुक्सान करवाने। उधर क्षेत्रीय दल मौके का फ़ायदा उठा सरकार से जितनी सहूलियतें  बटोर सकें बटोरने में लगे हैं। उन्हें सिर्फ अपने गणित से मतलब है। उनका ऊसूल ही है कि  "जैसी बहे बयार, पीठ पुनि तैसी कीजे".  

अब सबको इंतजार है ऊंट की करवट का।

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

जहां भी जाएं वहाँ की व्यवस्था को पूरी तौर से अंगीकार करें।


साल में दूसरी बार नार्वे में एक और  भारतीय दंपति अपनी ही संतान को लेकर वहां की सरकार का कोपभाजन बन गयी है। बच्चों का ठीक से पालन-पोषण नहीं करने के आरोप में पिछली बार एक दंपति को उनके बच्चों से अलग कर दिया गया था, तो इस बार अपने बेटे को डांटने-फटकारने के जुर्म में पिता, चंद्रशेखर को 18 माह और मां अनुपमा को 15 माह के लिए जेल भेज दिया गया है। हांलाकि इस परिवार ने उच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है। वैसे देखें तो ये घटनाएं व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप की तरह लग सकती हैं, पर यह एक सबक है दूसरे देश में जाने वाले हमारे लोगों के लिए। 

आज हर देश के नागरिक बेहतर भविष्य के लिए दूसरे देशों का रुख करते ही हैं इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर कायदा यही कहता है कि हम जहां भी जाएं वहां के नियम-कानून को पूरा सम्मान दें और उसका पालन करें। 

अपने देश में बच्चों का पालन-पोषण करने का तरीका अलग है, सोच अलग है, हम बच्चों को भरपूर प्यार देते हैं तो उनकी गलती या उद्दंडता पर जरा प्रताडित भी करना ठीक समझते हैं। पर बाहर खासकर योरोप के देशों में बच्चे पर किसी भी तरह की जरा सी भी कठोरता जुर्म के रूप में देखी जाती है। वहां पारिवारिक डांट-डपट और पिटाई को अपराध माना जाता है। उनके अनुसार ऐसा करने से बच्चे का सही विकास नहीं हो पाता।  

दोनों जगहों के अपने-अपने तर्क अपनी-अपनी जगह ठीक हो सकते हैं। उस पर बहस अलग विषय है। यहां मुद्दा यह है कि यदि आप अपना कर्म-क्षेत्र किसी दूसरे देश में बनाते हैं तो वहां के कानून, वहां के नियम, वहां की व्यवस्था को पूरे तौर से अंगीकार करें। यह नहीं कि अपनी सहूलियत के अनुसार आधे-अधूरे रुप में अपने मतलब की चीज तो स्वीकारें और जो अच्छा ना लगे या अपने अनुकूल ना हो उसे दबे-छिपे तरीके से नकार दें। ऐसा करना कभी भी भारी पड सकता है। 

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

कूडेघर में बीतती जिन्दगी


आज एक खबर पढी। इंसान की मजबूरी , उसकी विवशता, उसकी परिस्थितियां उसे कैसे-कैसे जीवन-यापन के लिए लाचार कर देती हैं यह उसका एक जुगुप्सा पैदा कर देने वाला उदाहरण है।
बात है नई दिल्ली के मस्जिद मोठ इलाके की। वहां के एक बीस वर्ग फुट के कूडा घर में, जहां की सडांध और गंदगी के कारण उसके पास एक आम आदमी का दस सेकेंड भी खडा रहना नामुमकिन हो जाता है, एक बासठ वर्षीय व्यक्ति अपने छह जनों के परिवार के साथ 38 सालों से रह रहा है। 

मस्जिद मोठ का कूडा घर, इनसेट में शोभराज 
गोरखपुर, यूपी से अपने भविष्य को संवारने के लिए शोभराज ने वर्षों पहले  दिल्ली का रुख किया था। पर किस्मत की मार, कोई काम ना मिलने की हालत में उसे लोगों के घर का कूडा उठा अपना पेट पालना पडा। पहले वह अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ नेहरु प्लेस के स्लम में रहता था। स्लम हटाओ अभियानके दौरान उसे मदनपुर में एक फ्लैट प्रदान भी किया गया था पर वहां से अपने कर्म-क्षेत्र मस्जिद मोठ के दूर होने के कारण उसने इस जगह शरण ले ली। परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों समय के साथ-साथ इंसान का जीवन भी चलता रहता है। इसी बीच शोभराज के दोनों बेटों का विवाह भी हो गया, बच्चे भी हो गये।बडे बेटे ने एक  कमरे का फ्लैट संभाल लिया  और शोभराज अपनी पत्नी, बेटे, उसकी पत्नी और दो साल के पोते के साथ यहां रह रहा है। शीत-ताप नियंत्रित कक्षों में बैठ कर मानव हितों की रक्षा पर लाखों रुपयों की एवज में बडी-बडी बातें बनाने वालों के चेहरे पर तमाचे की तरह है कि इस नारकीय स्थिति में रहने के लिए भी उसे 800 रुपये महीना देना पडता है।

आस-पास के लोगों के इस परिवार के प्रति अलग-अलग विचार हैं। कोई इनकी बेचारगी पर तरस खाता है तो कोई सरकारी जमीन पर रहना इनका अतिक्रमण मानता है। पर जो भी हो अपने मृदु व्यवहार के चलते इस परिवार से किसी को कोई शिकायत नहीं है। शोभराज के अनुसार प्रकृति भी अमीर-गरीब में भेद करती है। जहां अमीर इस कूडेदान के पास आते ही अपने को बीमार समझने लगता है वहीं छोटी-मोटी तकलीफ के अलावा उसका पूरा परिवार स्वस्थ ही रहता है। 

सौजन्य
TOI          

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

उत्तर की तलाश में एक सवाल

आज कल भारतीय क्रिकेट की दुनिया में तूफान मचा हुआ है। जिसे देखो वही लठ्ठ लेकर सचिन तेंदुलकर के पीछे पडा हुआ है। आज आस्ट्रेलियाई  पूर्व कप्तान रिची पोंटिंग के रिटायरमेंट से तो जैसे उन्हें और शह मिल गयी है।  टीवी के चैनल पर कुछ स्वयंभू क्रिकेट विशेषज्ञ, जिन्हें पूरे खेल का ज्ञान तो दूर खेल के दौरान खिलाडियों के खडे होने की विभिन्न जगहों के पूरे नाम भी शायद ही पता हों, वे भी इस महान बल्लेबाज को नसीहत देने से नहीं चूक रहे। बार-बार गावस्कर या अभी-अभी रिटायर हुए तीनों दिग्गजों, गांगुली, लक्ष्मण और द्रविड़  का उदाहरण देते नहीं थकते पर उनके अवकाश ग्रहण करने के कारणों और परिस्थितियों को सिरे से नजरंदाज कर अपने चैनल को ओछी खुराक देने के चक्कर में ये भूल जाते हैं कि इस जीवट वाले इंसान ने बार-बार वापसी की है।  

 यह सच है कि सचिन अब चालीस के होने जा रहे हैं और दो दशकों से अधिक का समय उन्हें मैदान पर उतरे हो चुका है। यह भी सच है कि वे अब ना पैसे के लिए ना नाम के लिए मैदान पर उपस्थित हैं सिर्फ इस खेल के प्रति उनका लगाव और प्रेम ही उन्हें ज्यादा से ज्यादा खेलने की प्रेरणा दिए जा रहा है। यह भी कटु सत्य है कि वे दो-चार पारियां अच्छी खेल भी जाएं पर पूर्णतया वापसी  कुछ मुश्किल है क्योंकि इस भाग-दौड और तनाव भरे खेल के लिए चालीस की उम्र बहुत होती है। संसार में  शायद ही कोई और ऐसा खिलाडी हो जो लगातार इतने लम्बे समय तक शीर्ष के करीब रहते हुए खेल पाया हो। पर सचिन ने अपने खेल कौशल और मेहनत से जो स्थान अर्जित किया है उसके चलते वे भारत के ही नहीं विदेशों में भी खेल प्रेमियों के चहेते बन गये हैं। करोंडों लोगों को उन्होंने अपने खेल और सौम्य व्यवहार से अपना मुरीद बना डाला है। लोगों की भावनाएं उनसे जुडी हुई हैं। इसीलिए उनकी विदाई की बात करना लोगों की भावनाओं को आहत करना है।

 हर देश की हर टीम के साथ ऐसा दौर आता है कि उसके तीन चार दिग्गज खिलाडी एक के बाद एक अवकाश
प्राप्त करने लगते हैं और उनका विकल्प तुरंत मिलना आसान नहीं होता जिसका खामियाजा टीम की अवनति से मिलता है। अपने यहां भी सौरव गांगुली, लक्ष्मण और द्रविड रिटायर हो चुके हैं, उनकी जगह आए नए खिलाडी प्रतिभावान जरूर हैं पर उनकी अभी और कडी परीक्षा होनी बाकी है। वैसे भी हमारे इन तीनों दिग्गजों ने इस खेल को जिस उचाईयों तक पहुंचाया उसे ध्यान में रखते हुए उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। फिर भी इनकी विदाई सही समय पर ही हुई है, चाहे कारण कुछ भी हों। सचिन के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। वे समय की नजाकत और अपने प्रदर्शन को समझते हैं। खेल के प्रति उनका समर्पण किसी भी कीमत पर खेल का अहित होते नहीं देख सकता इसी लिए जैसा कि गावस्कर ने कहा है उनके साथ बीसीसीआई को मंत्रणा कर भविष्य की योजना पर विचार करना चाहिए। इससे खेल प्रबंधन को भी विकल्प चुनने के लिए समय मिल जाएगा। इस तरह इस अप्रतिम खेल-योद्धा की विदाई भी पूरे आदर और सम्मान के साथ हो पाएगी। सचिन सौभाग्यशाली हैं कि पूरा देश तथा खेल प्रबंधन उनके साथ है तथा किसी भी तरह के विवाद या खेल राजनीति से भी वे निर्लिप्त हैं। इसलिए उनके शानदार, गौरवशाली, अनोखे, किंवदंती  बन चुके करियर का समापन भी उतना ही यादगार होना चाहिए।  

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

आंसू तो दिल की जुबान हैं

वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इससे  छह हजार गुना ज्यादा  जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है। एक चम्मच आंसू, सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है।

दुनिया में शायद ही कोइ ऐसा इंसान होगा जिसकी आँखों से कभी आंसू न बहे हों। जीवन के विभिन्न  हालातों, परिस्थितियों, घटनाओं  से इनका अटूट संबंध रहता है। समय कैसा भी हो, दुख का, पीड़ा का, ग्लानी का, परेशानी का, खुशी का, यह नयन जल नयनों का बांध तोड़ खुद को उजागर कर ही देते हैं। 

 मन की विभिन्न अवस्थाओं पर शरीर की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप आंखों से बहने वाला, जब भावनाएं बेकाबू हो जाती हैं तो मन को संभालने वाला, दुःख के समय मन को  हल्का करने वाला, सुख के अतिरेक में भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम, शरीर का साथी है यह  "अश्रु"। इतना ही नहीं सामान्य अवस्था में  यह हमारी आंखों को साफ तथा कीटाणुमुक्त भी  रखता है। 

इसके सामान्यतया तीन रूप होते हैं। पहला आँखों में नमी बनाए रखता है जिससे आँख साफ रहती है और आखों का सूखेपन से होने वाले नुक्सान से बचाव होता है। दूसरा कभी धूल कण या कोइ कीट वगैरह के आँख में पड़ जाने से आँखें जल से भर जाती हैं जिससे अवांछित  वस्तु  बाहर आ जाती है और तीसरा सबसे अहम् है इसका रुदन-समय पर बहने वाला रूप। वैसे  बीमारी तथा भोज्य पदार्थ की तीक्ष्णता  इत्यादि के कारण भी आँखों से पानी निकल आता है।    

आंसू का उद्गम "लैक्रेमेल सैक" नाम की ग्रन्थी से होता है। भावनाओं की तीव्रता आंखों में एक रासायनिक क्रिया को जन्म देती है, जिसके फलस्वरुप आंसू बहने लगते हैं। इसका रासायनिक परीक्षण बताता है कि इसका 94 प्रतिशत पानी तथा बाकी का भाग रासायनिक तत्वों का होता है। जिसमें कुछ क्षार और लाईसोजाइम नाम का एक यौगिक रहता है, जो कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसी के कारण हमारी आंखें जिवाणुमुक्त रह पाती हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इससे  छह हजार गुना ज्यादा  जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है। एक चम्मच आंसू, सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है।
ऐसा समझा जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं। पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं। उनका मन रोगी हो सकता है। ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है। तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं।
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वैधानिक चेतावनी : आंसू की इस परिभाषा का भी ध्यान रखें -
It is a hydrolic force through which Masculine WILL POWER defeated by Feminine WATER POWER.

सोमवार, 19 नवंबर 2012

सत्य रूपी बीज पनपता जरूर है।


  सत्य  रूपी बीज, उसे चाहे कितना भी नीचे क्यों न  दबाया गया हो,  सतह कितनी भी कठोर क्यों ना हो उसे फोड कर पनपता जरूर है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों। समय कितना भी लग जाए।

जीवन को तरह तरह से परिभाषित किया गया है। कोई इसे प्रभू की देन कहता है, कोई सांसों की गिनती का खेल, कोई भूल-भुलैया, कोई समय की बहती धारा तो कोई ऐसी पहेली जिसका कोई ओर-छोर नहीं। कुछ लोग इसे पुण्यों का फल मानते हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसे पापों का दंड समझते हैं। 

कोई चाहे कितना भी इसे समझने और समझाने का दावा कर ले, रहता यह अबूझ ही है। यह एक ऐसे सर्कस की तरह है जो बाहर से सिर्फ एक तंबू नज़र आता है पर जिसके भीतर अनेकों हैरतंगेज कारनामे होते रहते हैं। ऐसा ही एक कारनामा है इंसान का सच से आंख मूंद अपने को सर्वोपरि समझना।

इंसान जब पैदा होता है तो अजब-गजब भविष्य-वाणियों के बावजूद कोई नहीं जानता कि वह बडा होकर क्या बनेगा या क्या करेगा, पर यह निर्विवादित रूप से सबको पता रहता है कि उसकी मौत जरूर होगी। इतने बडे सत्य को जानने के बाद भी इंसान इस छोटी सी जिंदगी में तरह-तरह के हथकंडे अपना कर अपने लिए सपनों के महल और दूसरों के लिए कंटक बीजने में बाज नहीं आता। कभी कभी अपने क्षण-भंगुर सुख के लिए वह किसी भी हद तक गिरने से भी नहीं झिझकता। लोभ, लालच, अहंकार, ईर्ष्या उसके ज्ञान पर पर्दा डाल देते हैं। वह अपने फायदे के लिए किसी का किसी भी प्रकार का अहित करने से नहीं चूकता। वह भूल जाता है कि बंद कमरे में बिल्ली भी अपनी जान बचाने के लिए उग्र हो जाती है। मासूम सी चिडिया भी हाथ से छूटने के लिए चोंच मार देती है। नीबूं से ज्यादा रस निकालने की चाहत उसके रस को कडवा बना डालती है। यहां तक कि उसे भगवान की उस लाठी का डर भी नहीं रह जाता जिसमें आवाज नहीं होती। उस समय उसे सिर्फ और सिर्फ अपना हित नजर आता है। असंख्य ऐसे उदाहरण हैं कि ऐसे लोगों को उनके दुष्कर्म का फल मिलता भी जरूर है पर विडंबना यह है कि उस समय उन्हें अपनी करतूतें याद नहीं आतीं।     

ऐसे लोगों के कारण मानव निर्मित न्याय व्यवस्था भी अब निरपेक्ष नहीं रह गयी है। कोई कितना भी कह ले कि हम मानव न्याय का सम्मान करते हैं तो सम्मान भले ही करते हों मानते नहीं हैं। उसमें इतने छल-छिद्र बना दिए गये हैं कि आदमी कभी-कभी बिल्कुल बेबस, लाचार हो जाता है अन्याय के सामने। न्याय को पाने के लिए समय के साथ-साथ पैसा पानी की तरह बहता तो है पर मिली-भगत से उसका हश्र भी वैसा ही होता है जैसे शुद्ध पीने का पानी गटर में जा गिरे। यूंही किस्से-कहानियों में या फिल्मों में न्याय व्यवस्था का मजाक नहीं बनाया जाता। ज्यादातर झूठ तेज तर्रार वकीलों की सहायता से सच को गलत साबित करने में सक्षम हो जाता है। सच कहीं दुबक जाता है झूठ के विकराल साये में। सामने वाला इसे अपनी जीत समझने लगता है, भूल जाता है समय चक्र को, भूल जाता है इतिहास को, भूल जाता है अपने ओछेपन को। पर सत्य  रूपी बीज, उसे चाहे कितना भी नीचे क्यों न  दबाया गया हो,  सतह कितनी भी कठोर क्यों ना हो उसे फोड कर पनपता जरूर है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों। समय कितना भी लग जाए, असत्य को अपनी करनी का फल भोगना जरूर पडता है। इसमें कोई शको-शुबहा नहीं है।
और फिर कुछ ऐसा होता है कि !!!!!

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

दीपावली फिर आने का वायदा कर गई।


दीपावली आई, खुशियां, उल्लास और फिर आने का वायदा कर चली गई। इस पारंपरिक त्यौहार से हम आदिकाल से जुड़े हैं। यह अपने देश के सारे त्योहारों से एक अलग और अनोखे तरह का उत्सव है। रोशनी के त्योहार के रूप में तो यह अलग है ही, इसे सबसे ज्यादा उल्लास से मनाए जाने वाले त्योहारों में भी गिना जा सकता है। इसे चाहे किसी भी कथा, कहानी या आख्यान से जोड लें पर मुख्य बात असत्य पर सत्य की विजय की ही है। प्रकाश के महत्व की है। तम के नाश की है। उजाले के स्वागत की है।  इसीलिए इसके आते ही सब अपने अपने घरों इत्यादि की साफ-सफाई करने, रौशनी करने मे मशगूल हो जाते हैं। साफ-सफाई के अलावा इस त्योहार मे एक बात और है कि यह अकेला ऐसा त्योहार है, जिसमें हर आदमी, हर परिवार समृद्धि की कामना करता है। यह त्योहार हमें रूखी-सूखी खाकर ठंडा पानी पीने या जितनी चादर है उतने पैर पसारने की सलाह नहीं देता। इन उपदेशों का अपना महत्व जरूर है पर यह त्योहार यह सच्चाई भी बताता है कि भौतिक स्मृद्धि का भी जीवन में एक अहम स्थान है, इसका भी अपना महत्व है। 

धन की, सुख की आकांक्षा हरेक को होती है इसीलिए इस पर्व पर अमीर-गरीब अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार दीए जला, पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। हां यह जरूर है कि अमीरों के ताम-झाम और दिखावे से यह लगने लगता है जैसे यह सिर्फ अमीरों का त्योहार हो।  

हमारे वेद-पुराणों में सर्व-शक्तिमान से यह प्रार्थना की गई है कि वे हमारे अंदर के अंधकार को दूर करें, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाएं जिससे हमें ज्ञान और शांति प्राप्त हो जिसका उपयोग दूसरों की भलाई में किया जा सके। इसी बात को, इसी संकल्प को हमें अपने जेहन में संजोए रखना है पर यह उद्देश्य तब तक पूरा नहीं हो पाएगा जब तक इस पर्व को मनाने की क्षमता, समृद्धि का वास देश के हर वासी, हर गरीब-गुरबे के घर-आंगन में नहीं हो जाता। 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...