pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक. रक्षा-बंधन



 इस पर्व ने जात-पात, धर्म-अधर्म, ऊंच-नीच से सदा अपने को अलग रखा। इसीलिए आज भी यह उतने ही उत्साह, प्रेम, स्नेह से याद रखा जाता है और  अनेकानेक झंझावतों के बावजूद मनता चला आ रहा है। 

रक्षा-बंधन यानि राखी का त्योहार। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक। एक दूसरे की सुरक्षा तथा मंगलकामना की अदीन इच्छा का गवाह। हमारे ग्रंथों में भी इससे संबंधित ढेरों कथाएं मिलती हैं।

देवासुर संग्राम वर्षों से चल रहा था। कोई भी पक्ष हार मानने को तैयार नहीं था। पर धीरे-धीरे देवताओं की  शक्ति क्षीण होती चली जा रही थी। देवराज इंद्र चिंतातुर रहने लगे थे। ऐसा देख इंद्राणी ने यज्ञ-पूजन कर मंत्र-पूरित रक्षा-सूत्र  उनकी कलाई में बांधा था। देवताओं की विजय हुई थी। वही शायद पहला रक्षा-बंधन  था।

कहते हैं मृत्यु के देवता यम और उनकी बहन यमुना में अगाध स्नेह था। पर कार्य की अधिकता के कारण यम को बहन से मिलने का समय नहीं मिल पाता था। तब यमुना ने उनसे वचन लिया था कि साल में एक बार चाहे वे कहीं भी हों उससे मिलने जरूर आएंगे। यम उस वचन को निभाते चले आ रहे हैं। और वह दिन है सावन की पूर्णिमा  का यानि आज का।

महाभारत के दौरान श्री कृष्ण जी की ऊंगली में चोट लगने से द्रौपदी ने अपने वसन से कपडा फाड उनकी चोट पर बांधा था। तभी श्री कृष्ण ने उन्हें अभय का वरदान दिया था। 

यह सिर्फ भाई का बहन को रक्षा का आश्वासन देने का प्रतीक ही नहीं है। इसका अर्थ और भी व्यापक रूप में है। समय गवाह रहा है कि पेडों को बचाने के लिए लोगों ने उन्हें भी रक्षा-सूत्र  बांधा है। पुरोहित अपने यजमान को राखी बांध उसकी कुशलता की कामना करता है। सभासद और मंत्री दल अपने राजा को राखी बांधते रहे हैं।  

ऐसी ही अनेक घटनाएं एवं कथाएं इस पवित्र और स्नेहिल त्योहार से जुडी हुई हैं, चाहे वह सिकंदर की बात हो या फिर हुमायूं की। इस पर्व ने जात-पात, धर्म-अधर्म, ऊंच-नीच से सदा अपने को अलग रखा है । इसीलिए आज भी यह उतने ही उत्साह, प्रेम, स्नेह से याद रखा जाता है और ऐसी ही अनेकों कहानियों, विश्वासों, श्रद्धाओं के साथ, अनेकानेक झंझावतों के बावजूद मनता चला आ रहा है। 

सभी भाई-बहनों को रक्षा-बंधन की ढेरों शुभकामनाएं।

शनिवार, 28 जुलाई 2012

गंगा घर से बह रही हो तो कोई कैसे ना नहाए ?



पर कोई करे भी तो क्या, इन इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से बचा भी तो नहीं जा सकता। अब हर कोई महात्मा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री तो  हो नहीं  सकता  !!!


महत्वाकांक्षा हर इंसान में होती है। होनी भी चाहिए। इसी से जीवन में आगे बढने का, सफल होने का जज्बा बना रहता है। यह प्रकृति प्रदत्त इच्छा कुछ लोगों में जीवन भर बनी रहती है। वैसे भी हर इंसान की चाहत होती है कि समाज उसे भी कुछ महत्व दें, लोग उसे जानें, आदर-सम्मान का हकदार समझें। 
पहले इस महता को अपनी योग्यता, विद्वता, लियाकत और कठोर परिश्रम से अर्जित किया जाता था। समय बदला, हर चीज की मान्यताएं बदल गयीं। अब अपने को खास बनाने के लिए पारिवारिक संबंधों, आर्थिक हैसियत और "डानियत" का सहारा लिया जाने लगा है क्योंकि इससे बेकार की मेहनत नहीं करनी पडती। खासकर राजनैतिक मैदान में कूदने में यह बैसाखियां काफी सहायक होती हैं खासकर पारिवारिक।

कांग्रेस का गांधी परिवार तो मुफ्त में बदनाम है। यदि चारों ओर नज़र दौडाई जाए तो पाएंगे की  हर प्रदेश, हर पार्टी, हर मुकाम पर जरा सा रसूख पाते ही लोग अपनों को आम से खास बनाने में जुट जाते  हैं। इसमें देश के कुछ हिस्से तो आदर्श हैं बाकियों के लिए। वहां तो खून के रिश्तों के अलावा अडोसी-पडोसी, गांव-शहर के लोगों को भी लाभान्वित करने में कोई कसर नहीं छोडी जाती। आज किसी भी रसूखदार को देख लें, भाई-भतीजा वाद से अछूता नहीं मिलेगा। हर वह शख्स जिसका माँ-बाप, भाई-बहन, चाचा-ताऊ खासम-खास हो, वह बचपन से ही सत्ता के झूले में झूलने के सपने देखने लगता है। जिसको हवा मिलती रहती है अपने अग्रजों की शह से। अभी कुछ दिनों पहले "बच्चों" के लिए केंद्र और प्रदेशों के बीच की तनातनी का तमाशा देखा ही जा चुका है।  

इधर मीडिया के रवैये के कारण भी कभी-कभी अजीबोगरीब परिस्थितियां सामने आ जाती हैं। कुछ सीरियलों के दिशानिर्देशों से अब एक चलन सा बन चुका है कि समाज के किसी भी वर्ग से आया इंसान यदि कोई उपलब्धि हासिल करता है तो दृष्य मीडिया कैमरा उठाए उसके घर के अंदर तक पहुंच उनकी प्रतिक्रियाओं को कैद करने की आपसी होड में जुट जाता है, बिना यह जाने-सोचे कि क्या सामने वाला इस लायक है भी कि नहीं। उधर घर वाले अचानक अपनी इस बढी हुई हैसियत को संभाल नहीं पाते और कुछ भी ऊल-जलूल बोल एक विवादास्पद स्थिति पैदा कर रख देते हैं। इसका ताज़ा उदाहरण है हमारे महामहिम के सुपुत्र जिन्होंने अपने पिता के राष्ट्पति बनते ही दौडे चले आए खबरचियों के सामने पहले तो कसाब और सरबजीत के बारे में एक अजीब सी टिप्पणी कर दी फिर पिता की खाली हुई 'सीट' को ले कर अपनी दबी-ढकी हार्दिक इच्छा के तहत अपना दावा पेश कर दिया। बाद में जिसका जवाब देना दादा को भारी पड गया था। 

पर कोई करे भी तो क्या इन इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से बचा भी तो नहीं जा सकता। अब हर कोई महात्मा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री तो हो  नहीं सकता !!!       


गुरुवार, 26 जुलाई 2012

मुंह बाए खडी है कांग्रेस की जटिल परीक्षा


प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित होते ही राहुल गांधी को सरकार में बडी जिम्मेदारी मिलने की संभावना पर बहस का तेज होना पार्टी के अंदर की कशमकश को उजागर करता है। अब शिद्दत से यह महसूस किया जा रहा है कि युवा पीढ़ी को, जिसका सीधा अर्थ राहुल गांधी ही है, आगे बढ़कर जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। राहुल गांधी ने भी इस बार कुछ दिनों पहले इस बात पर सकारात्मक रुख दिखाया था। यदि पार्टी 2014 में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है, तो यही उपयुक्त समय है कि उन्हें मंत्रिमंडल में लाया जाए। फिर प्रणब मुखर्जी के जाने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में वरिष्ठता क्रम का जो विवाद चल रहा है, वह भी खासकर कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं दे रहा। उनके आने से यह विवाद भी स्वत: समाप्त हो जाएगा। 

पर इस राह में जो सबसे बडी अडचन है वह है कि अब तक राहुल अपनी नेतृत्व क्षमता का कोई उचित उदाहरण पेश नहीं कर पाए हैं। पिछले चुनावों में भी उनका प्रदर्शन नकारात्मक ही रहा था। ऐसे में अगले लोकसभा चुनाव में वह कोई चमत्कार कर पाएंगे, इसकी गारंटी भी नहीं दी जा सकती। लेकिन इससे राहुल गांधी की राजनीतिक संभावनाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पर सोचने की बात यह भी है कि देश की सबसे पुरानी, रसूखदार और बडी पार्टी अभी भी अपने अस्तित्व के लिए पारिवारिक करिश्मे पर ही भरोसा किए हुए है।

पर सच यह भी है कि कोई बड़ी जिम्मेदारी न संभालते हुए भी राहुल पार्टी और सरकार में बड़ी हैसियत रखते हैं। जहां एक तरफ सोनिया गांधी संगठन की सर्वेसर्वा हैं तो दूसरी ओर सरकार के मुखिया पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें जब भी कहा जाएगा, तभी वह राहुल गांधी के लिए प्रधानमंत्री की कुरसी खाली कर देंगे। इसलिए राहुल को सत्ता में आने और उसे संभालने में कोई दिक्कत या अडचन नहीं आने वाली। पर पद संभालने के बाद आने वाली जिम्मेदारी को संभालना, पार्टी एकता को बनाए रखना दूसरी तमाम मुश्किलातों का हल निकालने के साथ सहायक दलों के घाघ नेताओं को मिलाए रखना एक बडी चुन्नौती होगी। इसके साथ ही अपने ही दल के मतलब और मौकापरस्तों, चापलूसों, चाटुकारों और अति महत्वाकांक्षी लोगों की पहचान कर उन्हें भी काबू में रखना पडेगा।   

इन्हीं सब पर पार पाते हुए उन्हें अपनी पिछली विफलताओं को भी  भुलाते हुए अपने-आप को सिद्ध करना होगा। तभी उनका और देश का मार्ग प्रशस्त हो पाएगा। 


मंगलवार, 24 जुलाई 2012

रायसीना के नये महामहिम


'रायसीना पहाडी' पर बने महल की दरो-दिवारों को भी पता था कि इस बार प्रणव मुखर्जी का आना तय है। राजनीति की काजल की कोठरी से कोई बिरला ही अपना दामन पाक-साफ रख सकता है क्योंकि विपक्ष की तो छोडें अपने ही कोई कसर नहीं छोडते दाग लगाने में, फिर वह चाहे टीके के रूप में ही क्यों ना हो।

अभी बहुत अरसा नहीं हुआ और नाहीं प. बंगाल इसे कभी भुला पाएगा जब ज्योति बसु के प्रधान मंत्री बनने के रास्ते में उन्हीं की पार्टी ने रोडे अटका दिए थे। प्रणव मुखर्जी की इस उपलब्धी से बंगवासियों के दर्दे दिल को जरूर राहत मिलेगी। हालांकि यहां भी पहले राह उतनी आसान नहीं थी पर कहीं ना कहीं दिलों में फांस होने के बावजूद पार्टी ने अपना पूरा जोर लगा दिया था। साथ ही इक्के-दुक्के आरोपों के बावजूद प्रणव जी की छवि, राजनीतिक कद तथा मौके-बेमौके सामने आता रहा तारनहार का रूप भी इस राह में काफी सहायक रहा।  

देश के इस सर्वोच्च पद के लिए ऐसा व्यक्तित्व चाहिए होता है, जिसकी छवि बेदाग हो, सभी दलों में जिसकी समान स्वीकार्यता हो जो सबको साथ लेकर चल सके। जिसे अच्छा-खासा राजनीतिक अनुभव हो, जिसमें मुश्किलात के समय सबसे आगे खड़े होने का साहस हो, जो कठिन परिस्थियों में भी त्वरित निर्णय ले सके, जिसे संसदीय प्रक्रियाओं की गहरी जानकारी हो, जिसकी विलक्षण स्मृति और शालीन व्यक्तित्व हो। ये सारे गुण कलाम साहब और कुछ कमोबेश दादा में उपलब्ध हैं जो उन्हें समकालीन राजनीति में औरों से अलग करते हैं।

इतना तो निर्विवाद सत्य है कि प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक और आर्थिक समझ पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।  क्लर्क से प्रोफेसर, पत्रकार, और फिर बांग्ला कांग्रेस से राजनीति की यात्रा शुरू करने वाले मुखर्जी इंदिरा गांधी की गैरमौजूदगी में भी कैबिनेट की बैठकों को बखूबी संभालते रहे थे।

हालांकि इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद कुछ कारणों से उन्होंने कांग्रेस पार्टी से खुद को अलग कर लिया था पर उनकी प्रतिभा, क्षमता और लियाकत के कारण पार्टी उन्हें ज्यादा दिन अपने से अलग ना रख सकी। इस वापसी के बाद तो उन्होंने तमाम महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सफलतापुर्वक संभाली। पिछले करीब आठ वर्षों से वह यूपीए सरकार के संकटमोचक की भूमिका बार-बार निभाते  रहे हैं।

अब देश को उनकी इस नई भूमिका में उनसे सार्थक दिशा-निर्देश की उम्मीद रहेगी।

सोमवार, 23 जुलाई 2012

मौन रहना भी स्वास्थ्य वर्द्धक होता है।



'एक चुपहजार सुख'। जब तक आदमी मुंह बंद रखता है उसकी औकात पता नहीं चलती पर उसके मुंह के खुलते ही उसके स्वभावज्ञानचरित्र सब की पहचान हो जाती है। 

प्रकृति ने मनुष्य को शरीर के साथ-साथ अनेकों सुविधाएं और सामर्थ्य प्रदान किया है। पर बहुसंख्यक को जीवन भर अपनी इस क्षमता की पहचान नहीं हो पाती। उदाहरण स्वरूप मानव मस्तिष्क को लिया जा सकता है जिसका एक तिहाई प्रयोग भी कोई बिरला ही कर पाता है। हमारे सारे अंग-प्रत्यंग अपने-आप में एक अजूबा हैं और हम उनकी सारी उपयोगिताओं से अंजान ही रहते हैं। ऐसी ही एक खूबी है हमारी वाकशक्ति जो प्राय: सभी मनुष्यों में जन्म से ही होती है और समय के साथ ही विकसित होती चली जाती है। इसका उपयोग भी एक कला है। हजारों में से कोई एक ही इसका सही ढंग से उपयोग करना जानता है। पर जो भी अपनी वाणी पर नियंत्रण पा लेता है वह जनसमुह पर अपना प्रभाव डालने में समर्थ हो जाता है। इतिहास में ऐसे अनेकों लोग हुए हैं जिन्होंने अपनी वाणी से समाज की धारा को बदल कर रख दिया है। पर जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही इस शक्ति का दूसरा पहलू है "मौन"। जितने भी ओजस्वी वाणी के स्वामी हुए हैं वे सभी इसके प्रभाव और दुष्प्रभाव को जानते थे। वे बोलते थे तो मौन रहने में भी उन्हें महारत हासिल थी। पर मौन साधना भी कोई आसान काम नहीं है। सिर्फ चुप रहने से इसके फल प्राप्त नहीं होते। चुप्पी के साथ-साथ मन और मस्तिष्क को भी संयत करने से मौन की अजश्र ऊर्जा प्राप्त होती है। 

मौन यानि चुप्पी। जिसका सीधा अर्थ है अपनी ऊर्जा का संरक्षण। आयुर्वेद में इसका विशद वर्णन है। उसके अनुसार "उदान वायु" बोलने में सहायक होती है और वही शरीर को बल और सामर्थ्य भी प्रदान करती है। इसीलिए ज्यादा बोलने का अर्थ है इसका अधिक क्षरण होता है जिसके फलस्वरूप शरीर में दुर्बलता और कमजोरी घर करने लगती हैं। इसीलिए वाचाल व्यक्ति की अपेक्षा शांत और धीर मनुष्य की आयु लम्बी होती है। यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनि समय-समय पर मौन साधना के लिए समाधि और ध्यान लगाते रहते थे जिससे उन्हें आत्मबल और आत्मिक शांति की भी प्राप्ति होती थी। अपने समय में विनोबा भावे और गांधी जी इसके प्रबल उदाहरण हैं। गांधी जी तो प्रत्येक सोमवार को मौन रखा करते थे। उनके अनुसार यह उनकी प्रकृति नहीं बल्कि आवश्यकता थी। जिससे उन्हें आत्मिक खुराक की प्राप्ति होती थी। इसी मौन की शक्ति से डर, चिंता, घबडाहट तथा कठिन समस्याओं का हल पाया जा सकता है। 

एक कहावत भी है कि 'एक चुप, हजार सुख'। जब तक आदमी मुंह बंद रखता है उसकी औकात पता नहीं चलती पर उसके मुंह के खुलते ही उसके स्वभाव, ज्ञान, चरित्र सब की पहचान हो जाती है। इसका उदाहरण हमें कालीदास से लेकर अपने मनमोहन सिंह तक मिलता रहा है।   

बुधवार, 18 जुलाई 2012

मणिकर्ण, एक पवित्र तीर्थ-स्थल


मणिकर्ण, हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र तीर्थ-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ, जो कुल्लू से 35 कीमी  दूर समुंद्र तट से 1650 मीटर  की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है। पौराणिक कथा है कि अपने विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा माता पार्वती  घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे।   उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी  कि  वे यहां  ग्यारह हजार वर्ष  तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही जब शिवजी ने काशी नगरी  की स्थापना की, तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट ही  रक्खा। 

इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं  यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है, ऐसी मान्यता है यहां के लोगों मे। कहते हैं कि यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव् धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। उसके मणि ना लौटाने के दुस्साहस से शिवजी क्रोधित हो गये. तब उनके क्रोध से भयभीत हो शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग-अलग  तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।  


थोडी सी हिम्मत,  जरा सा जज्बा,  नयी जगह देखने-जानने की  ललक हो तो एक बार यहां जरूर जाएं।





मंगलवार, 17 जुलाई 2012

नोटों की फोटो पर राजनीति


यदि ऐसा हुआ तो नोटों की फोटो पर भी  राजनीति शुरु हो जाएगी।  हर कोई किसी ना किसी  की फोटो उठाए   बैंक के  सामने  धरना-उपवास  करता नज़र आएगा।   देश भक्तों,  शहीदों,   अमर नायकों,  वीर सैंनानियों की फोटो छपे ना छपे  तथाकथित नेताओं  को अपनी  फोटो अखबार  में छपवाने  का मौका जरूर मिल जाएगा। 

कभी-कभी नेक इरादे से उठाया गया कदम भी गड्ढे में पड अच्छी खासी मुसीबत को न्योता दे देता है। जैसे बच्चों को फल का स्वाद चखाने के लिए कोई वृक्ष पर निशाना साधे पर खुदा की मार वह मधुमक्खियों के छते पर जा लगे तो अंजाम का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। आपने अभी हवन करना शुरु भी नहीं किया होता कि कयी ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे आपके आस-पास मंडराने लगते हैं और उनकी धमाचौकडी में आप अपना हाथ जला बैठते हैं।


ऐसा ही कुछ पिछले दिनों हुआ जब आर.बी.आई. (रिजर्व बैंक आफ इंडिया) ने करेंसी नोटों पर गांधी जी के अलावा भी अन्य भारतीय हस्तियों की फोटो छापने की अपनी मंशा प्रगट की। इरादा नेक था पर उसका फायदा उठाने के लिए हाशिए पर उंकडुं बैठे नेताओं और छुटभैयों को जैसे फिर एक मौका मिल गया अपनी डूबती लुटिया को थामने-चमकाने का।


अब वे दिन तो कब के हवा हो गये जब देश और उसके लिए मर मिटने वालों के लिए लोगों के मन में श्रद्धा हुआ करती थी, अब तो सिर्फ उनके नाम को भुनाने का मौका खोजा जाता है।      उधर मौका मिला और इधर अपनी किस्मत के पौ-बारह। उन नायकों के आदर्शों  उनके त्याग से किसी को कोई मतलब नहीं रहा बस अपना उल्लू सीधा करने सब जुटे हुए हैं।

वैसा ही फिर हुआ अभी आर.बी.आई. ने अपने विचार रखे ही थे कि मौका-परस्तों ने अपने नेताओं की लिस्ट धोनी-पौंछनी भी शुरु कर दी। कुछ ने तो शायद भिजवा भी दी हो। जाहिर है कि यदि ऐसा हुआ तो नोटों की फोटो पर भी राजनीति शुरु हो जाएगी। हर कोई किसी ना किसी की फोटो उठाए बैंक के सामने धरना-उपवास करता नज़र आएगा। देश भक्तों, शहीदों, अमर नायकों, वीर सैंनानियों की फोटो छपे ना छपे तथाकथित नेताओं को अपनी फोटो अखबार में छपवाने का मौका जरूर मिल जाएगा। साथ ही शुरु हो जाएगी एक अनंत बहस, तेरे नेता से मेरा नेता कमतर कैसे? 

फिलहाल अभी तो चुप्पी है, पर अब देखना यह है कि आगत की आफत का आभास पा कर बैंक क्या रुख अपनाता है यथास्थिति बरकरार रखता है या कोई खास कदम उठाता है।

विशिष्ट पोस्ट

गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...