pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 4 जून 2012

संत कबीर एक लोकचेता कवि, युगांतकारी संत, दार्शनिक, एवं समाजसुधारक भी थे।


कबीर का युग कटु संघर्ष का युग था। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कटुता छायी हुए थी। हिन्दु-मुस्लिम के आपसी सिद्धातों का टकराव अपने चरम पर था। इस सबसे कबीर दुखी और व्यथित रहते थे। उन्होंने नयी चेतना जागृत करने, समभाव पैदा करने, वैमनस्य मिटाने के लिए यात्राएं की। कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। इसी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपना पंथ चलाया। उनकी भाषा खड़ी बोली, अवधी, पूर्वी, पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं का मिश्रण थी। इसे लोग “सुधक्ड़ी” भाषा कहते हैं।

महाभारत काल में माँ के द्वारा त्यागे जाने और फिर अधिरथ द्वारा पाले जाने वाले कर्ण ने जैसे उस युग में अपनी गौरव गाथा फैलाई थी उसी प्रकार कबीर ने अपनी जननी द्वारा त्यागे जाने और जुलाहा परिवार में परवरिश पाने के बाद भक्ति काव्यधारा में अपने नाम को सूर्य की भांति स्थापित कर दिया। 

संसार में ऐसे अनेक साहित्यकार हुए हैं जो अपने युग से प्रभावित ना हो युग को ही प्रभावित करते रहे हैं। निर्गुण संप्रदाय के प्रतिनिधी संत कबीर ऐसे ही लोकचेता कवि थे। जाति संप्रदाय से उपर उठ कर उन्होंने मनुष्य धर्म को प्रतिष्ठित किया। वे युगांतकारी संत, दार्शनिक, कवि एवं समाजसुधारक थे। उनकी सपूर्ण काव्य रचना “ बीजक” नामक ग्रंथ में संकलित है।

कबीर के जन्म पर विद्वान एकमत नहीं हैं। जनश्रुति के अनुसार इनका जन्म 1453 ई। में बनारस में एक विधवा ब्राह्मणी के यहां हुआ था। लोकलाज के ड़र से जननी के द्वारा नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास छोड़ देने के पश्चात नीरू-नीमा जुलाहा दंपत्ति ने वहां से ला कर अपने घर में उनका पालन-पोषण किया। कबीर की शिक्षा घर की हालत और गरीबी के कारण ठीक से नहीं हो पाई थी। उन्हीं के अनुसार “मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहि नहीं हाथ”। पर बौद्धिक विलक्षणता उनमें कूट-कूट कर भरी हुए थी। उन पर स्वामी रामानंद के विचारों का बहुत प्रभाव था। कबीर उन्हें ही अपना गुरु मान अपने विचार लोकार्पित करते थे।

कबीर का युग कटु संघर्ष का युग था। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कटुता छायी हुए थी। हिन्दु-मुस्लिम के आपसी सिद्धातों का टकराव अपने चरम पर था। इस सबसे कबीर दुखी और व्यथित रहते थे। उन्होंने नयी चेतना जागृत करने, समभाव पैदा करने, वैमनस्य मिटाने के लिए यात्राएं की। कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। इसी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपना पंथ चलाया। उनकी भाषा खड़ी बोली, अवधी, पूर्वी, पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं का मिश्रण थी। इसे लोग “सुधक्ड़ी” भाषा कहते हैं।

कबीर ने धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखंड़ों पर निर्मम प्रहार किए पर साथ ही उनकी समरसता और एकात्म्यता पर भी जोर दिया। उन्होंने भगवान राम को “अनहदनूर” कह कर हिन्दु-मुस्लिम धर्मों की सभ्यता को रेखाकिंत किया। यह विशाल और शाश्वत भाव किसी और के पास नहीं था। इसीलिए सैकड़ों लोग उनके मुरीद बन गये। हिन्दु मुसलमान समान रूप से उनकी जमात में शामिल हो गये। आज कबीर पंथी भारत में ही नहीं विदेशों में भी फैले हुए हैं। कबीर पंथ सुदूर फीजी तथा मारिशस तक अपनी शाखाओं द्वारा लोगों में धर्म समभाव का प्रसार कर रहा है।

कबीर ने कविताएं नहीं लिखीं अपने विचार प्रकट किये हैं। वे मस्त मौला थे, जो दिल में आता था स्पष्ट कह देते थे। तभी तो कहते हैं “चुभ-चुभ कर भीतर चुभे ऐसे कहे कबीर”। उनके लिये सब बराबर थे। सभी खुदा के बंदे थे। उनका चिंतन लोकहित में होता था – “सांई के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोय। का पर दया कीजिए, का पर निर्दय होय।”
उन्हें सभी धर्मों के लोग प्रेम करते थे। वे मुसलमान नहीं थे, हिन्दु हो कर हिन्दु नहीं थे, साधू हो कर गृहस्थ नहीं थे, योगी हो कर भी योगी नहीं थे। पर विड़ंबना यह रही कि कुछ तंगदिल अनुयायियों ने सांप्रदायिक सौहार्द के इस प्रतीक के अवसान के बाद उनके हिन्दु मुस्लिम होने को ले संघर्ष शुरु कर दिया। कहते हैं कि उनका शव फूलों के ढेर में तब्दील हो गया जिसे आधा आधा बांट हिन्दु तथा मुस्लिम रस्मों के अनुसार अंतिम रूप दिया गया। इसके बाद भी आपसी वैमनस्य खत्म नहीं हुआ तो मजार और समाधि के बीच दिवार खड़ी कर दी गयी। ऐसे ही लोगों के लिए कबीर अपने जीवन काल में ही कह गये थे -
“कबीरा तेरी झोपड़ी गलकटियन के पास, करनगे सो भरनगे तू क्यों होत उदास"।

अंधविश्वासों के विरोधी :-  

कबीर के समय में काशी विद्या और धर्म साधना का सबसे बड़ा केन्द्र तो था ही, वस्त्र व्यवसायियों, वस्त्र कर्मियों, जुलाहों का भी सबसे बड़ा कर्म क्षेत्र था। देश के चारों ओर से लोग वहां आते रहते थे और उनके अनुरोध पर कबीर को भी दूर-दूर तक जाना पड़ता था।

“ मगहर” भी ऐसी ही जगह थी। पर उसके लिए एक अंध मान्यता थी कि यह जमीन अभिशप्त है। कुछ आड़ंबरी तथा पाखंड़ी लोगों ने प्रचार कर रखा था कि वहां मरने से मोक्ष नहीं मिलता है। इसे नर्क द्वार के नाम से जाना जाता था।

उन्हीं दिनों वहां भीषण अकाल पड़ा। ऊसर क्षेत्र, अकालग्रस्त सूखी धरती, पानी का नामोनिशान नहीं। सारी जनता त्राहि-त्राहि कर उठी। तब खलीलाबाद के नवाब बिजली खां ने कबीर को मगहर चल दुखियों के कष्ट निवारण हेतु उपाय करने को कहा। वृद्ध तथा कमजोर होने के बावजूद कबीर वहां जाने के लिए तैयार हो गये। शिष्यों और भक्तों के जोर देकर मना करने पर भी वह ना माने। मित्र व्यास के यह कहने पर कि मगहर में मोक्ष नहीं मिलता, उन्होंने कहा - “क्या काशी, क्या ऊसर मगहर, जो पै राम बस मोरा। जो कबीर काशी मरे, रामहीं कौन निहोरा”।

सबकी प्रार्थनाओं को दरकिनार कर उन्होंने वहां जा लोगों की सहायता करने और मगहर के सिर पर लगे कलंक को मिटाने का निश्चय कर लिया। उनका तो जन्म ही हुआ था रूढियों और अंध विश्वासों को तोड़ने के लिए।

मगहर पहुंच कर उन्होंने एक जगह धूनी रमाई। जनश्रुति है कि वहां से चमत्कारी ढंग से एक जलस्रोत निकल आया, जिसने धीरे-धीरे एक तालाब का रूप ले लिया। आज भी इसे गोरख तलैया के नाम से जाना जाता है। तालाब से हट कर उन्होंने आश्रम की स्थापना की। यहीं जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा तो उनकी अंत्येष्टि पर उनके हिन्दु तथा मस्लिम अनुयायियों में विवाद खड़ा हो गया। कहते हैं कि इस कारण उनके चादर ढके पार्थिव शरीर की जगह सिर्फ पुष्प रह गये थे। जिन्हें दोनों समुदायों ने बांट कर अपनी-अपनी धार्मिक विधियों के अनुसार अंतिम संस्कार किया। आश्रम को समाधि स्थल बना दिया गया। आधे पर तत्कालीन काशी नरेश बीरसिंह ने समाधि बनवाई और आधे पर नवाब बिजली खां ने मकबरे का निर्माण करवाया। लखनऊ -गोरखपुर राजमार्ग पर गोरखपुर के नजदीक यह निर्वाण स्थल मौजूद है। पर यहां भी तंगदिली ने पीछ नहीं छोड़ा है। इस अनूठे सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के भी समाधि और मजार के बीच दिवार बना कर दो टुकड़े कर दिये गये हैं। वैसे भी यह समाधि स्थल अब घोर उपेक्षा का शिकार है।

शनिवार, 2 जून 2012

बच्चों की परवरिश में मां-बाप की भूमिका अहम है


 तभी उनमें से एक बच्चे के मोबाइल की घंटी बज उठी उसने हेलो कहा और अपनी मां की ओर यह कहते हुए फोन बढा दिया, लो आपके उनका है, उदास हैं आपके बगैर। मां ने मुस्कुरा कर हम सब को ऐसे देखा जैसे अपने पुत्तर की विद्वत्ता पर मोहर लगा रही हो। 

कभी-कभी ना चाहते हुए भी कुछ ऐसा हो जाता है जो मन को गवारा नहीं होता। खासकर किसी यात्रा के दौरान जहां अजनबियों का साथ होता है। पर सब कुछ जैसे अपने-आप घटित होता चला जाता है। 

अपने बच्चे सभी को प्यारे होते हैं। इसीलिए हर आमो-खास उनकी छोटी-छोटी बातों को, उनकी जरा-जरा सी उपलब्धियों को भी दूसरों के सामने बढा-चढा कर पेश कर गौरव का अनुभव करता है इस तथ्य को भूल कर कि सामने वाले के भी बच्चे हैं वे इससे बढ कर भी लायक हो सकते हैं। फिर चाहे सामने वाला सौजन्यवश ही हां-हूं करता रहे। 

इधर कुछ अजीबोगरीब चलन फिर जोर पकडने लगा है। मां-बाप बच्चों के अज्ञान को भी महिमामंडित करने लगे हैं। खासकर नवधनाढ्य वर्ग। बडे फक्र से ये लोग बताते हैं कि उनके बच्चे को तिरसठ या तिहत्तर जैसे हिंदी शब्दों का अर्थ नहीं मालुम या बच्चे दिनों के नाम हिंदी में नहीं जानते या कि उन्हें देसी कार्न-फ्लेक्स तो बिल्कुल ही पसंद नहीं है इत्यादि-इत्यादि।  ऐसा बता कर शायद अपने आप को आम से अलग कुछ खास जताने की मंशा रहती हो।

अभी पिछले दिनों यात्रा के दौरान ट्रेन में दो ऐसे ही परिवारों से सामना हो गया। एक सिख परिवार था दो बच्चे, करीब सात और नौ के दर्मियान और माँ तथा दूसरा छत्तीसगढ के मिँया-बीवी थे तकरीबन 30-35 साल के।  उनके बच्चे साथ नहीं थे।  लगे हुए थे दोनों परिवार अपने-अपने बच्चों की प्रशंसा में जमीन-आसमान एक करने। बेटों की मां तो ऐसे न्योछावर थी अपने सिंह शावकों पर कि क्या माता यशोदा कृष्ण पर हुई होंगी। बच्चों के ज्ञान का बखान करते नहीं थक रही थीं, उनका मोबाइल ज्ञान, उनका इंटरनेट ज्ञान, उनका गेम्स का ज्ञान, उनका फिल्मों का ज्ञान। गर्वीली  मां के अनुसार उनके पापा खुद तो कहीं गिर-गुर जाने या खोने के डर से पुराना और सस्ता मोबाइल ही प्रयोग करते हैं पर  बाज़ार में आया हर नया “उपकरण” बच्चों को उपलब्ध करवाते हैं। 

दूसरा परिवार भी पीछे नहीं था। जैसे ही पहली मां सांस लेने के लिए छोटा सा ब्रेक लेती ये महाशय शुरु हो जाते। इनका एक प्लस प्वाइंट यह था कि किसी और के कर्मों के योग से यह देश के बाहर का भ्रमण कर आए थे जिसको जाहिर करने के लिए ये बार-बार छतीसगढी उच्चारण के साथ आंग्ल भाषा का प्रयोग जम कर कर रहे थे। उनके अनुसार उनके सपूत किसी छोटे-मोटे देसी रेस्त्रां में जाना ही पसंद नहीं करते। विदेशी फास्ट फुड उनकी पहली पसंद है। घर में भी आपस में हिंदी बोलना उन्हें गवारा नहीं है। अंदाज लगाया जा सकता है कि जब भाई साहब ही 30-35 के हैं तो उनके बरखुरदारों की उम्र क्या होगी। 

काफी देर तक मैं सब सुनता रहा। रोकता रहा किसी तरह अपने-आप को उनके रंग में भंग डालने से। तभी उनमें से एक बच्चे के मोबाइल की घंटी बज उठी उसने हेलो कहा और अपनी मां की ओर यह कहते हुए फोन बढा दिया, लो आपके उनका है, उदास हैं आपके बगैर। मां ने मुस्कुरा कर हम सब को ऐसे देखा जैसे अपने पुत्तर की विद्वत्ता पर मोहर लगा रही हो। अब तो अपुन से भी रहा नहीं गया, मौका भी मिल गया था तो पहले शेर के पुत्तर से दोस्ती गांठी इधर-उधर की बातें की और फिर पूछ लिया, बेटा बताओ अपने दस गुरु कौन –कौन थे? छोटे सरदार ने कुछ सोचा फिर बोला, नानक देवजी, अर्जुनदेवजी, गोविंद सिंह जी और फिर मां का मुंह देखने लगा। मां क्या करती या बोलती खिसियानी सी हंसी से सफाईयां देती रही। मैंने माहौल  भारी नहीं होने दिया कुछ इधर-उधर की बातें करते-करते 'छत्तीसगढिया साहब' से उनकी यात्रा की बातें और बाहर के अनुभवों की बात छेड दी। वह भी सब कुछ विस्तार से बताने लगे। ऐसे ही उनसे बातों-बातों में पूछ लिया कि बाहर इन फास्ट फूड वालों का क्या हाल है? उन्होंने बताया कि वहां तो कम खपत देख-महसूस कर रेस्त्रां वालों ने खाद्यपदार्थों की कीमतें बहुत कम कर दी हैं, पता नहीं वहां जैसी गुणवत्ता ना होने के बावजूद हमारे यहां कीमतें ज्यादा क्यों हैं। मैं ने फिर कुरेदा कि स्वादिष्ट होने के बावजूद वहां ऐसा क्यों है? तो बोले, वहां के लोगों की ज्यादा जागरूकता के कारण अब ऐसे खाद्यों से लोग दूर होने लगे हैं। मैंने कहा आप सब देख-सुन कर आए हैं। आपको इस तरह के खाद्य पदार्थों के दूरगामी नुक्सानों की भी जानकारी है। आपके बच्चे अभी नासमझ हैं। फिर भी आप उन्हें समझा नहीं पा कर जानते-बूझते उन्हें गलत पोषण दे रहे हैं तो इसमें गलती किसकी है। महाशय का जवाब था कि वे मानते ही नहीं हैं, बहुत जिद्दी हैं, घर सर पर उठा लेते हैं। मैंने कहा कि बुरा मत मानिएगा पर कभी गौर से सोच कर देखिएगा कि उनका जिद्दी स्वभाव कहीं आपके गलत मोह-प्यार का नतीजा तो नहीं है। उनके रोने-धोने, जिद करने से आप जानते-बूझते उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड कर रहे हों। 

वातावरण कुछ भारी हो गया था पर शुक्र है गाडी तभी दुर्ग पहुंच गयी जो उन दोनों परिवारों का गंतव्य था। सामान समेट वे उतर गये शायद मुझे कोसते हुए क्योंकि जाहिर है उनका धृतराष्ट्रिय प्रेम भविष्य में भी  बच्चों का “बिलखना” नहीं सह पाएगा।

इधर मैं सोच रहा था कि यह कैसा प्रेम, मोह, वात्सल्य है जो अपने ही बच्चों को ना उचित संस्कार दे पा रहा है ना अच्छे-बुरे का ज्ञान करवा पा रहा है, अपनी सक्षमता को उनकी जायज-नाजायज मांगों की पूर्ति में जाया कर रहा है। आज के युग में बच्चों को समय के साथ चलने में साथ देने में तो कोई बुराई नहीं है पर उम्र के इस नाजुक दौर में उन्हें अच्छे-बुरे, सही-गलत की पहचान करवाना भी बहुत जरूरी है।

मंगलवार, 29 मई 2012

क्या हैं , आठ सिद्धियां और नौ निधियां?


पौराणिक पुस्तकों में या आख्यानों में बहुत बार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का उल्लेख मिलता है, खासकर हनुमान चालीसा में सीताजी द्वारा हनुमान जी को दिए वरदान में इनके दिए जाने का विवरण है। क्या हैं ये आठ सिद्धियां और नौ निधियां?

जैसा कि हमारे धार्मिक ग्रंथ बताते हैं, अष्ट सिद्धियां इस प्रकार हैं –

1,  अणिमा – इसको धारण करने वाला अपनी मर्जी से कभी भी सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप धारण करने की क्षमता पा लेता है।

2, महिमा – अणिमा के विपरीत इस सिद्धि से धारक  विशाल रूप धारण कर सकता है। इतना बडा कि सारे जगत को ढक ले। जैसे प्रभू का विराट स्वरूप।

3, गरिमा - इसकी सहायता से धारक अपने को इच्छानुसार पर्वत जैसा भारी बना सकता है।

4, लघिमा – गरिमा के विपरीत इस सिद्धि से अपने आप को इच्छानुरूप हल्का बना सकता है। इतना हल्का जैसे रूई का फाहा फिर इस रूप में वह गगनचारी बन कहीं भी क्षणांश में आ-जा सकता है।

5, प्राप्ति – यह सिद्धि अपनी इच्छित वस्तु की प्राप्ति में सहायक होती है। वह धरा पर खडे-खदे सूर्य-चांद को छू सकता है। जानवरों, पक्षियों और अनजान भाषा को भी समझा सकता है, भविष्य को देख सकता है तथा किसी भी कष्ट को दूर करने की क्षमता पा लेता है।

6, प्राकाम्य - इसकी उपलब्धि से इसका धारक इच्छानुसार पृथ्वी में समा और आकाश में उड सकता है। चाहे जितनी देर पानी में रह सकता है। इच्छानुरूप देह धारण कर सकता है तथा किसी भी शरीर में प्रविष्ट होने की क्षमता व चिरयुवा रहने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

7, ईशित्व – इसकी प्राप्ति से योगी को दैवीय शक्ति की प्राप्ति हो जाती है। वह सब पर शासन कर सकता है। मरे हुए को फिर जीलाने की क्षमता पा लेता है।

8, वशित्व - इसकी प्राप्ति से योगी को किसी को भी अपने काबू में करने की क्षमता प्राप्त हो जाती है। भयानक जंगली पशू-पक्षियों, इंसानों किसी को भी अपने वश में कर अपनी इच्छानुसार व्यवहार करवाने की शक्ति हासिल हो जाती है।

नौ निधियां :-
कहते हैं कि ये निधियां कुबेर की निगरानी में सुरक्षित रखी जाती हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं –

पद्म,   महापद्म,   शंख,   मकर,   कच्छ्प,   मुकुंद,   कुंद,   नीलम और  खर्व।

इन सब वस्तुओं में अपार शक्ति निहित  है। जिनका आकलन और विवरण करना असंभव है।  इनकी पूजा कर तांत्रिक असीमित शक्तियां प्राप्त कर लेते हैं। पृथ्वी या सागर में समाई इस अगाध संपदा का जो भी थोडा-बहुत ज्ञान  मानव को  मिला है   है वह इनकी शक्ति, क्षमता या मूल्य का कणांश भी नहीं है। 

शनिवार, 26 मई 2012

प्रभू भी लाचार हैं।

 पर  अब तक  यह पता नहीं चल पाया है कि भगवान के रोने की खबर सर्वोच्च न्यायालय तक कैसे और किसने पहुंचाई।   खबरचियों   की  टीमें   इस बात का पता लगाने पूरी तौर से जुटि हुई है। 

खबर विश्वसनीय सूत्रों से ही मिली थी, पर विश्वास नही हो पाया था कि ऐसा भी हो सकता है। खबर आपके सामने है और फ़ैसला आपके हाथ में।

ऐसा होता तो पहले भी था। धरती की खोज-खबरों को, दुख-सुख को ऋषि-मुनि प्रभू तक पहुंचाते रहते थे। तब आवागमन निर्विरोध हुआ करता था। पर फिर कुछ महत्वाकांक्षी लोग मर्यादा का अतिक्रमण करने लगे तो इस व्यवस्था में कटौती कर दी गयी। आम लोगों में इसके बंद हो जाने की खबर फैला दी गयी पर सच तो यह है कि यह पूर्णतया बंद नहीं हुई थी। प्रभू अपने बंदों को कैसे  भूल सकते थे। विज्ञान की तरक्की के कारण इसका पता साईंस दानों को था ही और अब इसका सार्वजनिक तौर पर भी खुलासा कर दिया गया है कि ज्येष्ठ के महीने मे मेघा नक्षत्र के उदय होने के पूर्व एक मुहूर्त बनता है जिसमे प्रभू का दरबार धरती वासियों के लिए कुछ देर के लिये खोल दिया जाता है।  

ऐसा पता चलते ही अफरा-तफरी मच गयी। हर देश का हर व्यक्ति अपना दुखडा सुनाने उपर जाने को लालायित हो उठा। हडकंप को देखते हुए सारे राष्ट्रों की आपात-कालीन बैठक बुलवाई गयी जिसमें घटों बहस के बाद फैसला हुआ कि लाटरी के जरिए एक बार में तीन देशों के तीन ही प्रतिनिधियों को उपर जाने का मौका दिया जाएगा।

सो इस बार भारत, अमेरीका तथा जापान के तीन नुमांईदों को उपर जाने का वीसा मिला था। तीनों को एक जैसा ही सवाल पूछने की इजाजत थी। पहले अमेरीकन ने पूछा कि मेरे देश से भ्रष्टाचार कब खत्म होगा, प्रभू ने जवाब दिया कि सौ साल लगेंगे। अमेरीकन की आंखों मे, अपने देश का हाल सोच, आंसू आ गये। फिर यही सवाल जापानी ने भी किया उसको उत्तर मिला कि अभी कम से कम पचास साल और लग जाएंगें तुम्हारे देश की हालत सुधरते। जापानी भी उदास हो गया कि उसके देश को आदर्श बनने मे अभी समय लगेगा। अंत मे भारतवासी ने जब वही सवाल पूछा तो पहले तो प्रभू चुप रहे फिर फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़े। 

अब आज के जमाने मे कौन ऐसी बात पर विश्वास करता है। पर जब सर्वोच्च  न्यायालय की ओर से कहा गया कि इस देश को भगवान भी नही बचा सकते, तो कुछ लोगों को इस खबर में सच्चाई नज़र आई। पर  अब तक  यह पता नहीं चल पाया है कि भगवान के रोने की खबर सर्वोच्च न्यायालय तक कैसे और किसने पहुंचाई।   खबरचियों   की  टीमें   इस बात का पता लगाने पूरी तौर से जुटि हुई है। 

बुधवार, 23 मई 2012

क्रिकेट का तमाशा या तमाशे का क्रिकेट


एक पुराना गाना है, शोखियों में घोला जाए थोडा सा शबाब , फिर उसमे मिलाई जाए थोडी सी शराब होगा यूं नशा जो तैयार वो प्यार है।  वैसे ही  इस  खेल के रोमांच को बढाने के लिए इसके  नियमों में बदलाव किए गये, पैसों की बरसात कर दी गयी,  ग्लैमर की चाशनी और वैभव की चकाचौंध  मिला एक नशीला वातावरण बना लोगों को आकर्षित किया गया. पर जल्द ही इसका एक और रूप सामने आ गया।    


आखिर एक लम्बे तमाशे का अंत आ ही गया। अगले हफ्ते सबसे विवादास्पद IPL के संस्करण का समापन हो जाएगा। पर यह समापन पिछले चार समापनों से थोडा अलग होगा। जहां पिछले समापन अगले संस्करण का दावा करके जाते थे, इस बार का समापन अपने भविष्य के प्रति सशंकित है। जिसका जिम्मेदार भी यह खुद ही है।

“एक पुराना गाना है, शोखियों में घोला जाए थोडा सा शबाब , फिर उसमे मिलाई जाए थोडी सी शराब होगा यूं नशा जो तैयार वो प्यार है।”
अब वो जैसा प्यार था, था। पर पिछले पांच सालों से भारत के क्रिकेट प्रेमियों के इस खेल के प्रति प्यार का फायदा उठा, IPL के नाम से जो उल्लू सीधा किया जा रहा था उसका शायद चर्मोत्कर्ष आ गया है। वैसे तो इस "फार्मेट" के साथ विवादों का साथ चोली-दामन की तरह इसके जन्म के साथ से ही लगा रहा था। पर अब तो अति हो चुकी है। खेल का कट्टर से कट्टर हिमायती भी अब इस पर उंगली उठाने लगा है क्योंकि अब वह अपने आप को कहीं ना कहीं ठगा जा रहा महसूस करने लगा है।

Indian Premium League, जो अब Indian Prattle League यानि इंडियन बकवास लीग, का रूप ले चुकी है, की शुरुआत इस खेल को और भी लोकप्रिय बनाने के लिए की गयी थी। उसी पुराने गाने की तरह खेल के रोमांच को बढाने के लिए उसके नियमों में कुछ बदलाव किए गये, पैसों की चकाचौंध में ग्लैमर की चाशनी मिला इसे दर्शकों के सामने परोसा गया तो उन्हें भी बहुत आनंद आया। देखते-देखते इसकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी। पर इसके साथ ही साथ इसका दूसरा रूप भी सामने आ गया। जिसने खिलाडियों की आपसी रंजिश, पैसों की अनाप-शनाप बरसात से उनके बिगडते दिलो-दिमागी संतुलन, अचानक मिली प्रसिद्धी को संभाल ना पा कर की गयी मर्यादाहीन कारस्तानियां, पैसों के लालच से गैर कानूनी हरकतों को सबके सामने ला खडा किया।

भद्र-जनों के खेल के नाम से  जाने जाने वाले इस खेल की मर्यादा, नैतिकता सब कुछ व्यापारियों और बाज़ार की दखल से गुजरे जमाने की बातें हो कर रह गयीं। पैसे ने हर चीज का माप-दंड बदल कर रख दिया। डेढ-दो महीनों  में ही करोडों के वारे-न्यारे करने वाले खिलाडी अपने आप को किसी और ही ग्रह का वासी मानने लग गये। इसी कारण वे किसी बेजा हरकत को करने से नहीं डरते। यहां तक की बाहर से आने वाले खिलाडियों, जिनसे शालीन व्यवहार की आशा की जाती है, वे भी अभद्रता की सीमा लांघते नहीं हिचकिचाते।

खेल मनोरंजन के साथ साथ स्वस्थ प्रतिस्प्रद्धा का भी स्वाद देते हैं। पर यह जो हो रहा है वह क्या है?  सिर्फ मनोरंजन, वह भी स्तर हीन। पैसे और ग्लैमर का भौंडा प्रदर्शन मात्र। एक बात जो सबसे ज्यादा अखरने वाली या संदेह पैदा करने वाली है वह है, बी.सी.सी.आई. के सदस्य का ही किसी टीम का मालिक होना। जब की आयोजन भी यही संस्था करवा रही है।

यदि सही, कठोर और सकारात्मक कदम जल्दी ना उठाए गये तो IPL की साख पर तो बट्टा लगना ही है क्रिकेट की लोक-प्रियता पर भी आंच आनी निश्चित है। 

मंगलवार, 15 मई 2012

"बाबू मोशाय" .....यह कैसा विज्ञापन है रे


वर्षों पहले प्रसिद्ध फिल्म-निर्माता ऋषिकेश मुखर्जी ने एक बहुचर्चित क्लासिक फिल्म "आनंद" बनाई थी। इसके मुख्य कलाकार राजेश खन्ना तथा सहायक किरदार में अमिताभ बच्चन थे। फिल्म में राजेश अमिताभ को "बाबू मोशाय" कह कर संबोधित करते हैं। यह संबोधन उस समय काफी लोकप्रिय हुआ था। आज भी लोगों को यह याद है। 

मुखर्जी साहब ने अपनी अगली फिल्म "नमकहराम" में भी इन दोनों कलाकारों को दोहराया। थोडा सा "ग्रे शेड" होने के बावजूद अमिताभ, राजेश खन्ना पर भारी पडे और यहीं से उनका भाग्य भी अपने सहकर्मी पर  हावी  होता चला गया.  यहां तक कि राजेश खन्ना को धीरे-धीरे नेपथ्य में जाने पर  मजबूर होना पडा। 

समय बीतता गया। ना जाने कितना पानी गंगा में बह गया। राजेश खन्ना पूरी तरह से परिदृष्य से गायब हो गये। पर अमिताभ द्वारा अपने सिंहासन को हस्तगत कर अपने को अपदस्त करने का गम कभी भी भुला नहीं पाए। फांस की तरह यह बात उनके दिलो-दिमाग को सालती रही। अमिताभ ने भी काफी उतार-चढाव देखे। तन-मन पर चोटें खाईं। पर वक्त से समझौता कर जैसा भी काम मिला उसे बिना किसी हील-हवाले, बिना किसी हीन प्रवृत्ति का शिकार हुए, बिना किसी हीन ग्रंथी का शिकार हुए पूरे मनोयोग से पूरा किया। जिसका फल सबके सामने है। इसी सफलता को देख बहुत सारे भूतपूर्वों ने वर्तमान में हाजिरी लगाने की कोशिश की पर वैसी सफलता से महरूम ही रहे। 

आज का व्यवसाई बहुत चतुर हो गया है। संबंध, नैतिकता, जीवन मूल्य जैसी बातें उसके लिए कोई मायने नहीं रखतीं। वह हर काम, हर बात को सिर्फ अपने फायदे को ध्यान में रख करता है। ऐसे ही एक विज्ञापन और फिल्म निर्माता ने, जिसने अमिताभ को एक अनोखे किरदार में पेश कर नाम और दाम दोनों कमाए हैं, राजेश खन्ना को लेकर 'पंखों' की एक विज्ञापन फिल्म बनायी है। जिसमें खन्ना साहब अपने पुराने अंदाज में कबूतर की तरह गर्दन मटका कर विज्ञापन का अंतिम डायलाग बोलते हैं, "बाबू मोशाय मेरे 'फैन्स' को कोई मुझसे छीन  नहीं सकता।"  

"बाबू मोशाय", यह शब्द उनके दिल मे सालों से जमे नैराश्य, वैमनस्य, कुंठा, कुढन, ईर्ष्या जैसी भावनाओं को फिर जग के सामने ला खडा करता है। निर्माता द्वारा ऐसा जान-बूझ कर, सोच समझ कर पुराने द्वेष को भुनाने के लिए किया गया प्रयास है। नहीं तो 'अमर प्रेम' का "पुष्पा वाला डायलाग" भी काम में लाया जा सकता था। 

आज की पीढी को ना इन दोनों सुपर-स्टारों के इतिहास में दिलचस्पी है नाहीं उन दिनों की इनकी टकराहट की जानकारी। इसीलिए यह विज्ञापन निर्माता की भूल साबित हो कोई असर पैदा नहीं करता।






सोमवार, 7 मई 2012

अपने-आप में सिमटा एक गाँव, मलाणा.

गर्मियों का मौसम आते ही अधिकाँश लोग पहाड़ों का रुख करते हैं। स्वाभाविक भी है कहाँ मैदानों की चिलचिलाती गरमी और कहाँ बर्फ से ढके  पर्वतों की शीतल वादियाँ। लोग जाते हैं और सैर-गाहों का लुत्फ ले लौट आते हैं। कुछ ही लोग होंगे जो वहाँ के रहन-सहन, रीति-रिवाजों, वहाँ के रहवासियों की कठिन जिन्दगी को जानने की रूचि रखते होंगे। पहाड़ों का एक-एक गाँव तथा उसके वाशिंदे अपने आप में ऐसा  इतिहास समेटे बैठे हैं, जिसकी कल्पना भी देश का आम इंसान नहीं कर सकता।  

ऐसा ही एक गाँव है  मलाणा.  हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसा वह गांव जिसके ऊपर और कोई आबादी नहीं है। यहाँ जाना कोइ आसान काम नहीं है।  कुल्लू-मनीकर्ण के रास्ते पर एक छोटा सा गाँव है, जरी, जहां तक वाहन के द्वारा जाया जा सकता है।  यहाँ से 9 कीमी की दुर्गम चढ़ाई और करीब 12000 फिट की ऊंचाई पर 500-550 परिवारों से  बसा है मलाणा.

आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं।

वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है।भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है, वैसे नाम मात्र को चावल,गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा- क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।

   

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