pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

जार्ज बर्नार्ड शा के चेक


एक बार जार्ज बर्नार्ड शा ने एक चित्रकार को अपना चित्र बनाने को कहा और वायदा किया कि पसंद आने पर पारिश्रमिक के रूप में एक सौ पौंड देंगे। चित्रकार ने बडी मेहनत और लगन से उनका बहुत ही सुंदर चित्र बनाया। शा को वह चित्र बहुत पसंद आया और उन्होंने वायदे के अनुसार चित्रकार को बीस-बीस पौंड के पांच चेक एक प्रशंसा पत्र के साथ भेज दिए। चेक तथा पत्र पाने पर चित्रकार को समझ नहीं आया कि शा ने एक चेक की जगह पांच-पांच चेक क्यों भेजे। अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए वह शा से मिला और पूछा, "सर पांच-पांच चेक काटने की क्या जरूरत थी, सौ पौंड का एक ही चेक काफी होता।"
शा ने पूछा, ''क्या तुमने चेक भुना लिए हैं?''
''नहीं,'' चित्रकार ने जवाब दिया।
शा बोले, "अच्छा किया। तुम चेक भुनाना भी मत। इससे तुम्हें भी फायदा होगा और मुझे भी।" चित्रकार बोला,  "मैं कुछ समझा नहीं सर"
शा मुस्कुराए और बोले,  "मैं अपने प्रशंसकों से अपने एक हस्ताक्षर के तीस पौंड लेता हूं। तुम पांचों चेक मेरे प्रशंसकों को बेच दो। इससे तुम्हें एक सौ के बदले डेढ सौ पौंड मिल जाएंगे। इस तरह तुम पचास पौंड ज्यादा कमा लोगे।"
"मेरा फायदा तो समझ में आया पर इससे आप को कैसे फायदा होगा?"  चित्रकार ने पूछा।
"ऐसा है कि मेरे प्रशंसक मेरे हस्ताक्षरों को बेचते नहीं हैं। वे उन्हें फ्रेम में  मढवा कर अपने पास संजोए रखते हैं। इस तरह मेरे भी एक सौ पौंड बच जाएंगे।''   शा ने हंसते हुए जवाब दिया।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

एक प्राकृतिक और चमत्कारिक औषधि इसबगोल


आज के भाग-दौड के जमाने में खुद को चुस्त-दुरुस्त रखना टेढी खीर है। ना ढंग से खाना हो पाता है ना सोना। हर समय अफरा-तफरी, पीछे छूट जाने का भय, काम का तनाव, भागते-भागते ही दिन-दोपहर-शाम निकलते जाते हैं। पर शरीर को चलाए रखने के लिए भोजन की भी जरूरत पडती है। ऐसे में जो मिला खा कर काम चलाते हैं, अधिकांश लोग। नतीजा खराब पाचन, पेट की गडबड, अपच और कब्ज जैसी तकलीफें। फिर उनके लिए तरह-तरह की दवाएं या फिर डाक्टर के चक्कर।

आदमी की आधी से ज्यादा बिमारियों का कारण पेट है। यदि यह सुचारु रुप से काम करता रहे तो अधिकांश रोग पास ही ना फटकें। तुरंत राहत पाने के लिए बाजार में सैंकडों दवाएं उपलब्ध हैं, पर उनका कुछ न कुछ गलत प्रभाव भी होता ही है। प्रचार की धुंध में बहुत सारी प्राकृतिक औषधियों को लोग भुला बैठे थे पर उनकी उपयोगिता उन्हें फिर लोकप्रिय बनाने में सफल रही है।
 गलत खान-पान से उपजी व्याधियों को दूर करने की एक ऐसी ही अचूक, प्राकृतिक और चमत्कारिक औषधि है "इसबगोल की भूसी"।

यह एक महीन पत्तों वाला झाडीनुमा पौधा है। इसकी शाखाओं पर फूल आते हैं जिनमें एक सफेद पतली झिल्ली में पौधे के बीज लिपटे होते हैं। यह झिल्ली ही इसबगोल की भूसी है। इसके औषधिय महत्व को हर चिकित्सा प्रणाली में स्वीकार किया गया है। इन्हें शीतल, मलावरोध को दूर करने वालाकब्जअतिसारपेचिश और आंत के रोगों के लिए बहुत उपयोगी पाया गया है। इसमें म्यूसिलेज नामक तत्व पाया जाता है जो पानी के साथ मिल कर स्वादरहित लसीली तथा चिकनी जेली में बदल जाता है जो पेट में पानी सोख कर अपने आकार से तिगुनी हो जाती है जिससे आंतें और सक्रिय हो पचे पदार्थों को आगे बढाने लगती हैं। यह भूसी शरीर से 'टाक्सिंस और बैक्टीरिया' को भी शरीर से बाहर कर देती है। इसके लसीलेपन के कारण मरोड और पेचिश में भी आराम मिलता है। इस पौधे के बीज भी काफी उपयोगी होते हैं। जो बवासीर में काफी
लाभदायक होते हैं। इसकी भूसी को दूध या पानी के साथ लिया जा सकता है। सामान्यत: भूसी का प्रयोग रात सोने के पहले किया जाता है। सामान्यत: एक से दो चम्मच की मात्रा  प्रयाप्त होती है।

मैं खुद वर्षों से जरूरत पड़ने पर इसका उपयोग करता आ रहा हूं और आज तक ना इसकी आदत पडी है और ना ही किसी तरह का विपरीत असर महसूस हुआ है। तो जब कभी भी पाचन संबंधी कोइ परेशानी महसूस हो तो बेझिझक इसबगोल की भूसी का इस्तेमाल कर देखें, फायदा ही होगा। 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

अग्रोहा के महाराजा अग्रसेन

 महाराज अग्रसेन के वंशज आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं। 



अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये      प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्रजी, जो खुद भी वैश्य समुदाय से थे, ने 1871 में "अग्रवालों की उत्पत्ति" नामक प्रमाणिक ग्रंथ लिखा है जिसमें विस्तार से इनके बारे में  बताया गया है। इसी में 'अग्रवाल का अर्थ भी समझाया गया है कि अग्रवाल यानी "महाराज अग्रसेन के वंशधर या बच्चे"।

वर्तमान के अनुसार उनका जन्म आज से करीब 5185 साल पहले हुआ था। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे।

समयानुसार युवावस्था में उन्हें राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेकों राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। यह दो अलग-अलग संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का मेल था। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं। पर इस विवाह से इंद्र जलन और गुस्से से आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराज अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।

कुछ समय बाद महाराज अग्रसेन ने अपने प्रजा-जनों की खुशहाली के लिए काशी नगरी जा शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे शिवजी ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गयी तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होगी।
  
अपने नये राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास थी। उसका नाम अग्रोहा रखा गया। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और माँ वैष्णव देवी का भव्य मंदिर है।

महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरु कर लेता था।   

महाराज ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। राज्य के उन्हीं 18 गणों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर उन्होंने लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की, जिसका स्वरूप आज भी हमें भारतीय लोकतंत्र के रूप में दिखाई पडता है।

उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया।   


उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एक बार यज्ञ में बली के लिए लाए गये घोडे को बहुत बेचैन और डरा हुआ पा उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने अपने मंत्रियों के ना चाहने पर भी पशू बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवाल समाज हिंसा से दूर ही रहता है। अपनी जिंदगी के अंतिम समय में महाराज ने अपने ज्येष्ट पुत्र विभू को सारी जिम्मेदारी सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम अपना लिया।     
महाराज अग्रसेन के राज की वैभवता से उनके पडोसी राजा बहुत जलते थे। इसलिए वे बार-बार अग्रोहा पर आक्रमण करते रहते थे। बार-बार मुंहकी खाने के बावजूद उनके कारण राज्य में तनाव बना ही रहता था। इन युद्धों के कारण अग्रसेनजी के प्रजा की भलाई के कामों में विघ्न पडता रहता था। लोग भी भयभीत और रोज-रोज की लडाई से त्रस्त हो गये थे।  इसी के साथ-साथ एक बार अग्रोहा में बडी भीषण आग लगी। उस पर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघरबार हो गये और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे।  पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोडी।  वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

परदेश में किसी अपने को फूल भेजने हैं?


  अब इतना तो मालुम ही था कि इंटरनेट से कहीं भी कुछ भी मंगा या या भेजा जा सकता है। पर अभी तक ऐसा मौका या सुयोग नहीं मिल पाया था या यूं कह लें कि हासिल करने की कोशिश ही नहीं की थी। तो जब पिछली शादी की सालगिरह पर दिल्ली से बच्चों द्वारा भेजा या सही अर्थों में, इंतजाम किया हुआ 'बुके' हमें मिला तो आश्चर्य मिश्रित हर्ष होना लाजिमी था।

उसके बाद फूलों की ऐसी सेवाओं के लिए 'जाल' छानने पर जो सार हासिल हुआ वह यह है कि वर्षों से कुछ पुष्प प्रेमी फूलों को उनके चाहने वालों के पास भेजा करते थे। तब यह काम तार या फोन के जरिए किया जाता था। एकाधिक ऐसी संस्थाओं में 'टेलेफ़्लोरिस्ट' का नाम प्रमुख था जिनके करीब 1000 के उपर सदस्य थे। इसकी स्थापना 1947 मे की गयी थी। समय बदला इलेक्ट्रोनिक क्रांति के आने पर इन्होंने अपना नाम बदल कर 'इफ़्लोरिस्ट' कर लिया और अब यह "इंटरफ़्लोरा" के सहयोगी के तौर पर काम कर रहे हैं। 'इंटरफ़्लोरा' नाम की यह संस्था एक विश्वव्यापी संस्थान है जो 65-70 साल से इस व्यवसाय मे सफलता पूर्वक काम कर रही है। इसके दो लाख से भी ज्यादा सदस्य दो सौ देशों में फैले हुए हैं। जो करोडों के आर्डर प्रतिवर्ष पूरा करते हैं। संवाद स्थापित करने के हर माध्यम से इन्हें दुनिया भर से आर्डर मिलते हैं और ये दुनिया के किसी भी हिस्से में फूल पहुंचाने का काम हर बाधा को, चाहे वह भौगोलिक हों, चाहे भाषा सम्बंधी, चाहे समय या मुद्रा की दिक्कत, सब को दूर कर पुष्प-प्रेमियों की इच्छा पूरी करते हैं।
अपने यहां भी बहुतेरी संस्थाएं सफलता पूर्वक पुष्प-प्रेमियों की जरूरतों को पूरा कर रही है।  

तो आप को कभी भी किसी भी आयोजन-प्रयोजन के लिए, संसार के किसी भी कोने में, दुनिया के किसी भी हिस्से मे पाए जाने वाले किसी भी फूल को पहुंचाना होवह भी तीन-चार घंटों में, तो....
"इंटरफ्लोरा" है ना।

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

रायपुर से चला पत्र ग्यारह दिनों में भी दिल्ली नहीं पहुंचा

एक बात जानने की इच्छा है कि इस तरह की लापरवाही की शिकायत किसे और कहाँ की जाए, जिसकी सुनवाई हो सकेप्रतीक्षा रहेगी

एक समय था कि सरकारी सेवा होने के बावजूद डाक विभाग सबसे ज्यादा भरोसेमंद विभाग हुआ करता था। उस समय के समर्पित कर्मचारी आधे-अधूरे पते पर भी चिट्ठी-पत्रियों को येन-केन-प्रकारेण पहुंचाना अपना कर्तव्य समझा करते थे। पर समय बदला वह समर्पण भी ख़त्म हो गया।
१४ जनवरी शनिवार को एक पत्र साधारण डाक से दिल्ली के लिए पोस्ट किया था। आज मंगलवार २४ जनवरी तक वह अपने गन्तव्य तक नहीं पहुँच पाया है। एक तरफ तो रोना रोया जाता है कि लोगों ने पत्र लिखना कम कर दिया है। डाक-खानों को अपना खर्च चलाना भारी पड़ रहा है। कर्मचारियों की छंटाई हो रही है। डाक-खानों की संख्या कम की जा रही है। जगह-जगह से डाक पेटियां हटाई जा रही हैं। खर्च चलाने के लिए तरह-तरह के अन्य स्रोत खोजे जा रहे हैं। तरह-तरह के विकल्प सुझाए तथा अमल में लाए जा रहे हैं। दूसरी ओर जो थोड़ा-बहुत काम है उसे भी ढंग से पूरा नहीं किया जा रहा। यह तो साधारण डाक की बात है, कुछ दिनों पहले तो इस विभाग की बहुचर्चित "स्पीड-पोस्ट सेवा" द्वारा भेजा गया पत्र पांचवें दिन दिल्ली पहुंचा था।

ऐसा क्यों है कि सरकारी सेवाएं लोगों पर भारी पड़ती रहती हैं. सरकारी डाक सेवाओं, जिन्हें हर तरह की सुविधा उपलब्ध है, के समानांतर चलने वाली "कूरीयर" सेवाएं ज्यादा सफल हैं। कारण वही है उन्हें चिंता है अपने ग्राहकों की। ग्राहक नहीं काम नहीं। पर सरकारी नौकरी में बैठे लोग निश्चिन्त हैं, काम हो न हो, विभाग चले न चले इनकी पगार पर कोई आंच नहीं आने वाली। नहीं तो क्या कारण है कि छोटे-छोटे टी. वी. चैनल रंगे पड़े हैं और दूरदर्शन पर मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं।

एक बात जानने की इच्छा है कि इस तरह की लापरवाही की शिकायत किसे और कहाँ की जाए, जिसकी सुनवाई हो सके। प्रतीक्षा रहेगी।

शनिवार, 21 जनवरी 2012

तिरंगा कहाँ छूट गया

इस आशा में कि फिर हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति का समुद्र हिलोरें लेगा।
आप सब को २६ जनवरी की ढेरों शुभकामनाएं। जय हिंद

चार-पांच दिनों बाद फिर एक बार तिरंगे की पूछ होगी। एक बंधी-बधाई परम्परा की जैसे खाना-पूर्ती की जाएगी। पुराने देश-भक्ति के रेकार्डों की धूल-गर्द साफ होगी। मजबूरी में लोग इकट्ठा होंगें। झंडोतोलन की रस्म पूरी होते ही सब अपना-अपना रास्ता नाप लेंगे।

पहले वाली बात अब नहीं रही कि अलसुबह लोग बच्चों को साथ ले राजपथ पर जा दरियां बिछा परेड का इन्तजार करते थे। समय बदल गया, माहौल बदल गया, लोग बदल गए, सोच बदल गयी और फिर नेता भी तो वैसे नहीं रहे। अब इस दिन ऐसा होता आया है तो करना पडेगा जैसी बात हो गयी है। सब मशीनीकृत होता लगता है। एक-दो दिन बाद खबरें पढ़ने को मिलती हैं कि कहीं झंडा उलटा टांग दिया गया। कहीं पुराने से ही काम चला लिया गया। कहीं का मानक के अनुरूप नहीं था। कहीं मान्यवर सलामी देना भूल गए इत्यादि-इत्यादि। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि अब देश-प्रेम की भावना का पूर्णतया लोप हो चुका है। ऐसे में बेचारे झंडे की कौन पूछे।

वैसे इसी सन्दर्भ में एक बहुत पुरानी घटना भी याद आ रही है. भारत ने जब 1983 में क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता था तो यहाँ तो यहाँ लन्दन तक का आकाश तिरंगे के रंगों से आच्छादित हो गया था। उसी अप्रत्याशित जीत की रजत जयंती पर फिर समारोहों का आयोजन किया गया. लॉर्ड्स में जा कर फिर यादें ताजा की गयीं। सब कुछ था वहां, 83 की विजेता टीम के सारे खिलाड़ी, बड़ी -बड़ी हस्तियाँ , बैनर , प्रायोजक कंपनियों के लोगो। पर नहीं था तो तिरंगा। ये सही है की लॉर्ड्स के मैदान में झंडा ले जाना मना है पर उसे प्रतीक के रूप में तो रखा ही जा सकता था. सचिन ने भी तो लाख विरोधों के बावजूद अपने हेलमेट में लगा रखा है. पर समय बदल गया है, मान्यताएं बदल गयीं हैं, सोच बदल गई है, लगता है, अब खिलाडी भी खिलाड़ी ना रह बी. सी. सी. आई. के कारिंदे भर बन कर रह गए हैं. अब पता नहीं कि वह चूक थी या फिर अंग्रेजों का दवाब, जो इस तरह भारत को सिरमौर बना देख उपजी कुंठा को कम करने की कोशिश कर रहे हों।
इस आशा में कि फिर हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति का समुद्र हिलोरें लेगा।
आप सब को २६ जनवरी की ढेरों शुभकामनाएं। जय हिंद।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

हम हार पचा नहीं पाते, पर क्यूँ?

इधर खेल की नकेल उसके अफरात आमदनी की गुंजाईश के कारण खेल का '' समझाने वालों के हाथ चली गयी है, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ आमदनी से मतलब है खिलाड़ी बंधुआ मजदूर हो गए हैं और ऐसे मजदूरों से "क्वालिटी" की आशा करना कहाँ की बुद्धिमानी है

भारत की क्रिकेट में हार पर हार। लोग रोजमर्रा की अनगिनत मुसीबतों को भूल इसी का शोक मना रहे हैं।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि हम हार नहीं पचा पा रहे हों। पहले भी हारी हुई टीम की लानत-मलानत होती रही है, जीत की खुशी में बनवाए गए स्मारक तोड़े गए हैं, हार कर लौटते खिलाड़ियों का घर पहुँचना दूभर हुआ है। हमारी क्या मानव जाति की फितरत है कि चढ़ते सूरज को सलाम किया जाता है, जो जीतता है उसे ही सिकंदर समझा जाता है।

वैसे भी हम एक दो जीत मिलते ही इतने मुत्तमुईन हो जाते हैं कि किसी को अपने सामने कुछ नहीं समझते, भूल जाते हैं कि चोट खाया सर्प कितना खतरनाक हो जाता है। भूल जाते हैं कि जिसके घर खेलने जा रहे हैं, उसके अपने दर्शक हैं, अपनी जमीन है, खेल में उसने भी झंडे गाड़े हुए थे। वह थाली में जीत ले हमें सौंप देने के लिए नहीं खडा। फिर बाहर बैठे स्वंयभू आलोचक, जिन्हें पिच की लम्बाई या बाल का वजन मालूम न हो या कभी गलती से टीम में जिन्हें स्थान मिल गया हो वे खिलाड़ियों की ऐसी हवा बांधते हैं कि आम-जन को विश्वास हो जाता है कि दुनिया में इस खेल के सिरमौर हैं तो सिर्फ हम। उधर जब खिलाड़ी स्तरहीन प्रदर्शन कर हार जाते हैं तो वही महानुभाव टी.वी. पर आ कर अपना धर्म समझते हैं खिलाड़ियों और उनके खेल की छीछालेदर कर उन्हें खलनायक सिद्ध करने का। कुछ अति उत्साही लोग चुनाव कर्ताओं को ही निशाना बनाना शुरू कर देते हैं। कुछ अपने पसंदीदा खिलाड़ियों से सजी टीम का सुझाव बिन मांगे देना शुरू कर देते हैं। कुछ अपने पूर्वाग्रहों और शायद, कुछ-कुछ, पुराने खिलाड़ियों की सफलता की जलन के कारण उन्हें टीम से बाहर करने की आवाज बुलंद करने लगते हैं। उस समय शायद वे भूल जाते हैं कि टीम में ग्यारह सदस्य होते हैं और व्यस्क खिलाड़ी मात्र दो-तीन ही हैं। हार के बाद ही सब गुनी-जनों के सुझाव बरसते हैं। जीतती टीम के समय उन्हें कुछ याद नहीं रहता। हमारा शगल भी है परनिंदा इसमें अपार सुख छिपा होता है जो मौका मिलते ही उजागर हो अपने स्वामी के दिल को शान्ति प्रदान करता है।

अभी एक सज्जन शिमला, उटकमंड, पचमढी जैसे स्थानों में खेल करवाने का सुझाव देते मिले। उन्हें श्रीलंका और वेस्ट इंडीज की शानदार पारियों की याद नहीं रही। जहां प्रतिकूल स्थितियों में रहते हुए अभावग्रस्त जीवन जीते हुए भी दुनिया के श्रेष्ठ खिलाड़ी अपना और अपने देश का नाम रौशन कर गए। इन महाशय के अनुसार जड़ पर आक्रमण करना चाहिए, तो सारी खुराफातों की जड़ तो पैसा है जिसके लिए कोल्हू के बैल की तरह हमारे खिलाड़ी जुटे रहते हैं, अपनी थकान, चोट और बीमारी छिपाए। क्योंकि एक डर उन्हें और भी खाए जाता है कि कहीं ज्यादा दिन बाहर रह गए तो फिर टीम में स्थान पाना मुश्किल हो जाएगा। यह सब बातें भी उनके प्रदर्शन पर असर डालती हैं। पर पैसा कमाने का जुनून उन्हें चैन से बैठने भी तो नहीं देता, खेल से जरा सी फुर्सत मिलते ही जुट जाते हैं धन कमाने के अन्य स्रोतों में। अब शरीर तो शरीर है कोई मशीन तो नहीं, मौके पर वह भी जवाब दे जाता है।

इधर खेल की नकेल उसके अफरात आमदनी की गुंजाईश के कारण खेल का 'ख' न समझाने वालों के हाथ चली गयी है, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ आमदनी से मतलब है। खिलाड़ी बंधुआ मजदूर हो गए हैं और ऐसे मजदूरों से "क्वालिटी" की आशा करना कहाँ की बुद्धिमानी है।

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