pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

बारूद को निष्क्रिय कर देने वाला एक अद्भुत पौधा 'सदाबहार'

जिसमे सबसे चमत्कृत करने वाली बात है कि यह बारूद जैसे पदार्थ को भी निष्क्रिय करने की क्षमता रखता हैइसी के चलते आज विस्फोटक क्षेत्रों और भंडारण वाली हजारों एकड़ भूमि को उपयोग के लायक बनाया जा सक रहा है.

दुनिया में तरह-तरह के पेड़, पौधे, वनस्पतियाँ, लताएं, गुल्म पाए जाते हैं. सबके अपने-अपने गुण-विशेषताएं होती हैं. कईयों के बारे में तो अभी भी पूरी जानकारी नहीं पा सका है इंसान. ऐसी ही प्रकृति की एक अनोखी देन है, सदाबहार नाम का यह पौधा। जिसका वैज्ञानिक नाम "विंका रोजेआ" है।

अपने नाम के अनुसार यह भारत के करीब सभी हिस्सों में सालों-साल पाया जाता है। प्रकृति ने इसे इतनी क्षमता दी है कि यह बिना किसी विशेष सार-संभाल के भी फलता-फूलता रहता है। अपने सफेद-जामुनी रंग के फूलों से लड़ा-फदा यह पौधा बरबस किसी को भी अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। इस पौधे की खासियत है कि इसके फूल तो खाद्य के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं पर इस के बाकी अंग कड़वे और विषाक्त होते हैं।

शोधों से इसके एकाधिक गुणों का पता चला है। जिसमे सबसे चमत्कृत करने वाली बात है कि यह बारूद जैसे पदार्थ को भी निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है। इसी के चलते आज विस्फोटक क्षेत्रों और भंडारण वाली हजारों एकड़ भूमि को यह निरापद बना रहा है। अपने "केंद्रीय औषधीय एवं सुगंध पौधा संस्थान" द्वारा की गयी खोजों से पता चला है कि इसमें पाया जाने वाला क्षार रक्त कैंसर के उपचार में बहुत उपयोगी होता है। इसके साथ ही यह रक्तचाप को कम करने और मधुमेह जैसी बीमारी को काबू में करने में बहुत सहायक होता है। शोधों के कारण जैसे-जैसे इसकी खूबियों का पता चलता जाता है वैसे-वैसे इसकी मांग भी देश-विदेश में बढती जा रही है. इसीलिए अब इसकी खेती भी की जाने लगी है। यह अनोखा पौधा अब संजीवनी बूटी बन गया है।
इसे लगाना या उगाना बहुत आसान है, इसके डंठल को कहीं भी रोप दिया जाए यह अपनी जिन्दगी शुरू कर देता है। जानकारों का कहना है कि सदाबहार और नीम के ७-७ पत्तों का खाली पेट सेवन करना मधुमेह में काफी उपयोगी होता है।





बुधवार, 11 जनवरी 2012

आविष्कार की मां का नाम आवश्यकता है

इस शीर्षक को जापानियों ने सही ठहराया है, अपने मछली प्रेम से।
जापानियों का मछली प्रेम जग जाहिर है। परन्तु वे व्यंजन से ज्यादा उसके ताजेपन को अहमियत देते हैं। परन्तु आज कल प्रदुषण के कारण समुद्री तट के आसपास मछलियों का मिलना लगभग खत्म हो गया है। इसलिए मछुवारों को गहरे समुद्र की ओर जाना पड़ता था। इससे मछलियां तो काफी तादाद में मिल जाती थीं, पर आने-जाने में लगने वाले समय से उनका ताजापन खत्म हो जाता था। मेहनत ज्यादा बिक्री कम, मछुवारे परेशान। फिर इसका एक हल निकाला गया। नौकाओं में फ्रिजरों का इंतजाम किया गया, मछली पकड़ी, फ्रिजर में रख दी, बासी होने का डर खत्म। मछुवारे खुश क्योंकि इससे उन्हें और ज्यादा शिकार करने का समय मिलने लग गया। परन्तु वह समस्या ही क्या जो ना आए। जापानिओं को ज्यादा देर तक फ्रिज की गयी मछलियों का स्वाद नागवार गुजरने लगा। मछुए फिर परेशान। पर मछुवारों ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने नौका में बड़े-बड़े बक्से बनवाए और उनमें पानी भर कर मछलियों को जिन्दा छोड़ दिया। मछलियां ग्राहकों तक फिर ताजा पहुंचने लगीं। पर वाह रे जापानी जिव्हो, उन्हे फिर स्वाद में कमी महसूस होने लगी। क्योंकि ठहरे पानी में कुछ ही देर मेँ मछलियां सुस्त हो जाती थीं और इस कारण उनके स्वाद में फ़र्क जाता था। पर जुझारु जापानी मछुवारों ने हिम्मत नहीं हारी और एक ऐसी तरकीब इजाद की, जिससे अब तक खानेवाले और खिलानेवाले दोनों खुश हैं। इस बार उन्होंने मछलियों की सुस्ती दूर करने के लिए उन बड़े-बड़े बक्सों में एक छोटी सी शार्क मछली डाल दी। अब उस शार्क का भोजन बनने से बचने के लिए मछलियां भागती रहती हैं और ताजी बनी रहती हैं। कुछ जरूर उसका आहार बनती हैं पर यह नुक्सान मछुवारों को भारी नहीं पड़ता।

है ना, तीन इंच की जबान के लिए दुनिया भर की भाग-दौड़।

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

प्रभू श्री राम की एक बहन भी थी

श्रीराम जिनका नाम बच्चा-बच्चा जानता है। उनके भाईयों के साथ-साथ उनकी पत्नियों के बारे में सारी जानकारी उपलब्ध है। उनके परिवार की बात छोड़िये उनके संगी साथियों, यहां तक की उनके दुश्मनों के परिवार वालों के नाम तक लोगों की जुबान पर हैं। उन्हीं श्रीराम की एक सगी बहन भी थी। यह बात शायद बहुत से लोगों की जानकारी में नहीं है।

भागवत के अनुसार राजा दशरथ और कौशल्या की एक पुत्री भी थी। जिसे उन्होंने अपने मित्र रोमपाद को गोद दे दिया था। उग्र स्वभाव के रोमपाद अंग देश के राजा थे। एक बार उनके द्वारा राज्य के ब्राह्मणों का अपमान कर दिये जाने के कारण सारे ब्राह्मण कुपित हो राज्य छोड़ कर अन्यत्र चले गये। इस कारण राज्य में अकाल पड़ गया। राजा को अपनी भूल मालुम पड़ी उन्होंने द्विजगणों से माफी मांगी और दुर्भिक्ष निवारण का उपाय पूछा। उन्हें बताया गया कि यदि ऋषि ऋष्यश्रृंग अंगदेश आ जायें तो वर्षा हो सकती है। राजा रोमपाद के अथक प्रयास से ऋषि ऋष्यश्रृंग अंगदेश आए। उनके आते ही आकाश में मेघ छा गये और भरपूर वर्षा होने लगी। इस पर खुश हो राजा रोमपाद ने अपनी गोद ली हुई कन्या का विवाह ऋषि के साथ कर दिया। बेचारी राजकन्या की नियति में वनवास था वह पति के साथ वन में रहने चली गयी।
शांता का उल्लेख अपने यहां तो जगह-जगह मिलता ही है, लाओस और मलेशिया की कथाओं में भी उसका विवरण मिलता है। पर आश्चर्य इस बात का है कि रामायण या अन्य राम कथाओं में उसका उल्लेख क्यूं नहीं है? क्यूं नहीं असमान उम्र तथा जाति में ब्याह दी गयी कन्या का अपने समाज तथा देश के लिये चुपचाप किये गये त्याग का कहीं उल्लेख किया गया? क्या सिर्फ गोद दे दिये जाने की वजह से ?

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

"अजीब है ना"


यह सन्देश अभी-अभी Internet पर मिला इस आशा के साथ कि इसे और लोग भी देखें-पढ़ेंइसीलिए...........


एक रोटी नहीं दे सका कोई उस मासूम बच्चे को लेकिन उसकी यह तस्वीर लाखों मे बिक गयी, जिसमें रोटी के लिये वह बच्चा उदास बैठा है……………।

वैसे भी हमें बीस रुपये भीख मे देना बहुत ज्यादा लगता है, पर होटल मे इतनी टिप देना बहुत कम लगता है।

सोमवार, 2 जनवरी 2012

तीन पैरों वाला फ़ुटबाल का खिलाड़ी

वह अपने तीनों पैरों से दौडने, कूदने, सायकिल चलाने, स्केटिंग करने के साथ-साथ बाल पर बेहतरीनकिकलगाने में पारांगत हो गया था।

आज जब किसी इंसान के हाथ या पैर में एक छोटी सी छठी उंगली भी हो तो उसे प्रकृति का अजूबा माना जाता है, चाहे वह अंग क्रियाशील ना भी हो। पर कुछ ही सालों पहले एक ऐसे इंसान का जन्म हुआ था जिसके तीन पैर थे और तीनों के तीनों हाड़-मांस के और क्रियाशील। उस इंसान का नाम थाफ्रैंक लैतिनी जिसने अपने तीन पैरों की वजह से दुनिया में नाम और दाम दोनों कमाए।

18 मई 89, सिसली के पास, रोसोलिनि कस्बे के एक अस्पताल मे एक बच्चे के जन्म लेते ही नर्स जोरों से चीख पडी, मां घबडा कर रोने लगी, नर्स की चीख सुन पूरे अस्पताल मे हडकंप मच गया। बात ही कुछ ऐसी थी, उस नवजात शिशु के पूर्ण विकसित तीन पैर थे। बहुत छिपाने की कोशिशों के बावजूद यह बात सारे शहर मे फैल गयी। लोग उसे देखने को आतुर हो उठे। इधर बच्चे के मां-बाप ने डाक्टरों से प्रार्थना की कि वे किसी भी तरह आप्रेशन कर इस तीसरी टांग से बच्चे को मुक्ति दिलवा दें। पर डाक्टर विवश थे, उन्हें लग रहा था कि आप्रेशन से या तो बच्चे की मौत हो जाएगी या फिर वह जीवन भर के लिए लकवाग्रस्त हो जाएगा।
समय बीतता गया। फ्रैंक पूरी तरह स्वस्थ रह कर बडा होता गया। उसे अपने इस तीसरे पैर से कोई दिक्कत नहीं थी, बस उसे इसका कुछ उपयोग समझ में नहीं आता था। वह उस पैर से शरीर को सहारा देने का काम लिया करता था। समय आने पर उसके पिता ने उसे एक स्कूल में दाखिल करवा दिया। पर वहां उसके सहपाठियों द्वारा उसका उपहास उडाने और उससे दूरी बनाए रखने के कारण फ्रैंक उदास रहने लगा। पिता ने कारण जान-समझ उसे वहां से हटवा कर एक विकलांगों के स्कूल में भर्ती करवा दिया। वहां के अन्य विकलांग बच्चों को देख उसे महसूस हुआ कि वह तो दूसरे बच्चों की तुलना में बहुत भाग्यशाली है। उसे लगने लगा कि भगवान का दिया यह जीवन बहुत खूबसूरत है। रही बात शारीरिक विकृति की तो उसको भी अपनी विशेषता बनाया जा सकता है। उसे तो अपने तीसरे पैर से किसी तरह की अड़चन ही नहीं है। सिर्फ कपडे सिलवाते समय विशेष नाप की जरूरत पडती है और रही जूतों की बात तो उसने उसका भी बेहतरीन उपाय खोज लिया। वह दो जोडी जुते खरीदता और चौथे फालतू जूते को किसी ऐसे इंसान को भेंट कर देता जिसका एक ही पैर हो।
यहीं से फ्रैंक का अपनी जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। उसने अपने जीवन को बेहतर बनाने, उसमें कुछ करने की ठान ली। इसी सोच के कारण वह हर परीक्षा को विशेष योग्यता से पास किया। इतना ही नहीं उसने चार-चार भाषाओं का ज्ञान भी अर्जित किया जो उसके भविष्य में बडा काम आया।

समय के साथ उसकी पढाई पूरी होते-होते उसके पास काम के प्रस्ताव भी आने शुरु हो गये थे, ज्यादातर सर्कस के क्षेत्र से। काफी सोच-विचार कर उसने एक नामी सर्कस में काम करना शुरु कर दिया। दैवयोग से वहां उसे काफी नाम और दाम तो मिला ही साथ ही साथ उसके मन से रही-सही हीन भावना भी खत्म हो गयी। वहां रहते हुए उसने अपने तीसरे पैर का भरपूर उपयोग करना भी सीख लिया। अब वह अपने तीनों पैरों से दौडने, कूदने, सायकिल चलाने, स्केटिंग करने के साथ-साथ बाल पर बेहतरीन ‘किक’ लगाने में पारांगत हो गया था। ऐसे ही उसके एक शो को देख एक नामी फुटबाल क्लब से उसे खेलने की पेशकश की गयी। फ्रैंक ने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। देखते-देखते वह सबसे लोकप्रिय खिलाडी बन गया। लोग बडे से बडे खिलाडी को नजरंदाज कर उसी पर निगाहें गडाए रहते। खेल के दौरान जब वह अपने दोनों पैरों को स्थिर कर तीसरे पैर से किक लगा बाल को खिलाडियों के सर के उपर से दूर पहुंचा देता तो दर्शक विस्मित हो खुशी से तालियां और सीटियां बजाने लगते।

फिर एक समय आया जब पैसा और शोहरत पाने के बाद फ्रैंक की इच्छा घर बसाने की हुई। जल्दि ही उसका विवाह हो गया। सुखी, सफल दांपत्य जीवन बिताते हुए वह चार बच्चों का पिता बना। अपनी विकलांगता को अपनी शक्ति बनाने वाला, उत्कट जिजिविषा और प्रबल इच्छा शक्ति वाले उस इंसान का 22 सितंबर 66 में 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सैनिकों का मजाक उडाता एक विज्ञापन

पूरा विज्ञापन सैनिकों के जज्बे का मजाक उडाता प्रतीत होता है। युद्ध के समय तो सैनिक को किसी और चीज का होश ही नहीं रहता और यही बात उसे ‘सिविलियन’ से अलग करती है।

कुछ दिनों से एक विज्ञापन टी वी पर आ रहा है, जिसमे एक सैनिक को सीमा पर हो रही भीषण गोलाबारी के बीच भी बेहद तन्मयता से एक पैकेट से कुछ खाते हुए दिखाया गया है। इतना ही नहीं जब उसके साथी का हाथ गोली खा कर मरते हुए उसके पैकेट पर आ जाता है तो वह निरपेक्ष भाव से उसका हाथ परे कर फिर खाने मे तल्लीन हो जाता है। पर उसी समय जब एक गोली आ उसके पैकेट के चिथड़े उडा देती है तो वह गुस्से से पागल हो चिल्लाते हुए गोलीबारी के बीच खडा हो जाता है और अपनी जान गवां पैकेट के पीछे-पीछे “दफा” हो जाता है।

देख कर ही लगता है कि यह विज्ञापन एक निहायत गैर जिम्मेदाराना, अपरिपक्व, अधकचरे दिमाग की उपज है। जिसे यह नहीं मालुम कि सैनिक, चाहे वह किसी भी देश का हो उसमे यह भावना कूट-कूट कर भरी होती है कि उसके लिए सबसे अहम देश होता है और खास कर देश पर विपत्ति के समय तो उसे अपने वतन की रक्षा के सिवाय और कुछ नहीं सूझता। उसका प्रथम कर्तव्य सिर्फ देश के लिए मर-मिटना होता है।

देश में अपने विचारों को, अपनी सोच को, अपने मनोभावों को उजागर करने की आजादी है। इस पर बहुत बार चिल्लपौं भी मचती रही है। पर इस तरह की संवेदनहीन, दिमागी दिवालिएपन, स्वाभाविकता और असलियत से कोसों दूर ऐसी सोच का क्या, जिसे सिर्फ कमाई और पैसे से मतलब हो?

पूरा विज्ञापन सैनिकों के जज्बे का मजाक उडाता प्रतीत होता है। युद्ध के समय तो सैनिक को किसी और चीज का होश ही नहीं रहता और यही बात उसे ‘सिविलियन’ से अलग करती है।

इस को देख लगता है कि यह किसी ऐसे दिमाग का फितूर है जिसे देश, समाज या नैतिक मुल्यों से कोई मतलब नहीं है। उसका उद्देश्य है घटिया और फूहड़ तरीके से ध्यान आकर्षित कर कमाई करना।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

अधजल गगरियों को छलकने से रोकने की आवश्यकता है.

हद तो तब हो जाती है जब इस आदत के चलते कोई भी कहीं भी जा कर रौब दिखाते हुए अपने भाई, दोस्त या किसी रिश्तेदार का सम्बंध किसी रसूखदार जगह या उसके नुमांयदों से होना बता, रियायत पाना चाहता है। उसे इस बात की जरा भी चिंता नहीं होती कि उसकी इस हरकत से उस संस्था या उससे जुडे लोगों की बदनामी हो रही होती है।

हर क्षेत्र, संस्था या कार्य स्थल की एक मर्यादा होती है। पर कुछ लोग अपने अहम की तुष्टि के लिए या फिर अपने को आम से कुछ खास दिखाने के लिए या फिर यार-दोस्तों पर रौब डालने के लिए अक्सर इस हद को पार करते रहते हैं। वैसे तो ऐसे लोग हर जगह मिल जाते हैं पर मीडिया, पुलिस या राजनीतिज्ञों से जरा सा भी जुडे लोगों में यह प्रवृति कुछ ज्यादा ही दिखाई दे जाती है। बहुतेरी बार ऐसे लोगों से आम इंसान या संस्था को दो-चार होना पड ही जाता है। इनकी खासियत होती है कि कहीं भी अपना काम निकलवाने के लिए पहुंचते समय इनके तेवर कुछ ऐसे होते हैं जैसे किसी बहुत बडे षडयंत्र का भंडाभोड करने आए हों। जबकि इनका उद्देश्य अपना या अपने किसी निहायत गैरजिम्मेदराना साथी का गलत तरीके से कोई काम निकलवाने का होता है। बिना किसी तरह की रोक-टोक की परवाह किए सीधे सम्बंधित अधिकारी के पास जा, अपना नहीं अपने कार्यस्थल का परिचय दे, रौब गालिब कर अपना काम करवाने की मांग रखते हैं। ज्यादातर संस्थाएं, बला टालने या किसी बखेडे मे पडने की बजाए वह छोटा-मोटा काम करने से गुरेज नहीं करतीं और इतने से ही उनके साथी पर उनके रुतबे का रौब पड जाता है।
बात यहीं से बिगडती है। वह साथ आया गैरजिम्मेदराना इंसान हर बार नियमानुसार काम ना कर किसी के सहारे इसी तरह अपना काम इसी तरीके से करवाने का आदी हो जाता है। फिर चाहे समय निकल जाने के बावजूद अपना काम निकलवाने की जिद हो, चाहे नियम-कायदों को ताक पर रख अपने को खास मानने का गुमान।

ऐसे लोगों को यदि ना सुननी पड जाती है तो तुरंत अपने आकाओं को फोन लगा ऐसा अहसास करवाते हैं जैसे बस कमिश्नर या कलेक्टर तुरंत इनकी सहायता को खडे होंगें। पर खुदा ना खास्ता यदि किसी 'पहाड' के नीचे इन्हें ला शीशा दिखा दिया जाता है तो फिर ऐसों को मुंह छुपाने की जगह खोजने मे भी देर नहीं लगती।

हद तो तब हो जाती है जब इस आदत के चलते कोई भी कहीं भी जा कर रौब दिखाते हुए अपने भाई, दोस्त या किसी रिश्तेदार का सम्बंध किसी रसूखदार जगह या उसके नुमांयदों से होना बता, रियायत पाना चाहता है। उसे इस बात की जरा भी चिंता नहीं होती कि उसकी इस हरकत से उस संस्था या उससे जुडे लोगों की बदनामी हो रही होती है।

इसके लिए हर जिम्मेदार संस्था को नये लोगों को जिम्मेदारी सौंपते हुए यह दिशा-निर्देश जरूर देने चाहिए कि उनके द्वारा जाने-अंजाने कोई ऐसा काम ना हो जिससे लोगों में कोई गलत संदेश जाए। यदि कभी ऐसी बात का पता चले तो तुरंत उन अधजल गगरियों को छलकने से रोका भी जाए। तब ही इस तरह की प्रवृति पर कुछ अंकुश लग सकता है।

विशिष्ट पोस्ट

गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...