pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 20 जुलाई 2011

किसी लेखक ने अपनी कलम को कभी कोई नाम नहीं दिया, ऐसा क्यों?

सृष्टि के आरंभ में आदि-मानव को अपनी सुरक्षा और जानवरों को मारने के लिए अपने बाहुबल के अलावा भी किसी अन्य साधन की जरूरत महसूस हुई होगी। क्योंकि प्रकृति ने अन्य जीव-जंतुओं की तरह उसे आत्मरक्षा हेतु कोई अतिरिक्त प्राकृतिक सुविधा नहीं दे रखी थी। उल्टा वह ताकत में उनसे कमजोर ही साबित होता था। शुरु में अपने बचाव और भोजन प्राप्ति के लिए उसने अनघड़ पत्थरों या किसी पेड़ की ड़ाली का उपयोग हथियार के रूप में किया होगा। धीरे-धीरे उन्हीं चीजों को तीक्ष्ण आकार दे और घातक बनाया होगा और जब उसे समझ में आया होगा कि दूर से फेंक कर मारने में खुद की ज्यादा सुरक्षा है तो तीर और धनुष का आविष्कार हुआ होगा। शास्त्रों में भी तीर-धनुष का विशेष उल्लेख मिलता है। यहां तक कि देवताओं द्वारा धारण किए गये इस अस्त्र के बाकायदा नाम भी हैं। जैसे शंकरजी का "पिनाक", विष्णुजी का "श्रृंग", इंद्र का "विजय", अर्जुन का "गांडिव" जो अत्यधिक प्रसिद्ध रहा है। धनुषों का निर्माण बांस या किसी लचीली धातु से किया जाता था। धनुर्धर इसे तरह-तरह से सजा कर रखते थे। इसकी मार करीब 300 फुट तक होती थी।
ऐसा माना जाता है कि तीर-धनुष के बाद तलवार अस्तित्व में आई। जिसका आविष्कार ब्रह्माजी ने असुरों के संहार के लिए देवताओं के लिए किया था। भारत में भी इसके होने के प्रमाण 2000 ईसा पूर्व से मिलते हैं। इसके कयी रूप-रंग होते थे तथा इसका निर्माण लोहे से किया जाता था। तलवार योद्धाओं का प्रिय शस्त्र रहा है। इसे वे अपने शरीर का ही एक अंग मानते थे। यह कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि युद्ध में रत योद्धा अपनी तलवार पर अपना नाम लिख अपने विवाह मंडप में भेज देता था और उसी के साथ फेरे ले विवाह सम्पन्न मान लिया जाता था। कुछ इतिहास प्रसिद्ध तलवारें हैं, रावण की "चंद्हास", शिवाजी महारज की "भवानी", शाहजहां की "पारादल", अकबर की "लक्खी"। मुगल काल में शमशीर का बोलबाला रहा।
इसी तलवार या शमशीर से बहुत बार किसी राजकुमारी का हाथ पाने के लिए प्रतियोगिताएं जीती गयीं। यूरोप में तो इस तरह के आयोजन होते ही रहते थे।
ये तो हुई प्राण लेने वाले हथियारों की बात जो योद्धाओं में इतने प्रिय थे कि उन्होंने बाकायदा इन्हें नाम दे रखा था।
यह सब देख-सुन एक सवाल उठता है मन में कि योद्धाओं की तरह लेखक का प्रिय हथियार तो कलम ही होती है। उस से किसी का खून तो नहीं बहता पर उसकी ताकत से बहुत बार साम्राज्यों की चूलें हिल गयीं, समाज का रवैय्या बदल गया, लोगों की सोच में आमूल-चूल परिवर्तन आ गये, पर आज तक किसी लेखक ने अपनी लेखनी को कोई नाम दिया हो यह बात सुनने में नहीं आई। जब कि कहावत है कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है।
ऐसा क्यूं ?

रविवार, 17 जुलाई 2011

क्या देवी-देवताओं को वाहनों की जरूरत पड़ती है?

वर्षों से यह धारणा चली आ रही है कि हमारे देवी-देवताओं के पशु या पक्षी के रूप में अपने-अपने वाहन होते हैं। जैसे माँ दुर्गा का सिंह, शिवजी का नंदी बैल, विष्णुजी का गरुड़, गणेशजी का चूहा, कार्तिकेयजी का मोर, लक्ष्मीजी का उल्लू इत्यादि-इत्यादि !
शायद इसीलिए इन देवी-देवतओं के साथ यह पशु-पक्षी चित्रित किए जाते रहे हैं। पर सोचने की बात यह है कि जैसी मान्यता है, हमारे देवी-देवता तो कहीं भी कभी भी क्षणांश में आने-जाने में सक्षम हैं। फिर यह भी धारणा है कि देव जाति दया, वात्सल्य तथा ममता से सराबोर है तो वे क्यों निरीह प्राणियों को ऐसे काम में ला उन्हें कष्ट देंगे।

हाँ, ऐसा हो सकता कि इन मूक, निरीह, प्रकृति की सुंदर रचनाओं को मनुष्य के हाथों बचाने के लिए उनके प्राणों की रक्षा हेतु उनका सम्बंध देवी देवताओं से इस रूप में जोड़ दिया गया हो। क्योंकि हो सकता है कि प्राचीन समय में किसी कारणवश भूमि से शाकाहार उतना प्राप्त ना किया जा सक रहा हो या मनुष्य उतनी मेहनत ना कर आसानी से उपलब्ध मांसाहार पर ज्यादा निर्भर रहने लगा हो और यही सब देख कर हमारे भविष्यदृष्टा ऋषि-मुनियों ने, आगत को ध्यान में रख, निर्दोष जीव-जंतुओं का जितना भी संभव हो बचाव हो सके, इसलिए यह बात आम जन के मन में वैसे ही बैठाने की कोशिश की हो जैसे पेड़-पौधों में देवताओं का वास बता उनके अंधाधुंध विनाश पर रोक लगाने के लिए की गयी थी।

कभी ध्यान से श्री कृष्णजी के पास खड़ी उनकी पांव की तरफ मुग्ध भाव से झुकी गाय को देखा है। कितने कोमल भाव हैं कितनी ममता है। भगवान दत्तात्रेयजी के साथ सदा मुग्धा गाय, काले कुत्ते या कबूतर को देख किसके मन में हिंसा उपज सकती है। ईसा की बाहों में मेमना, घायल हंस को अश्रुपूरित आंखों से तकते सिद्धार्थ, माँ सरस्वतीजी का हंस, शिवजी के पूरे परिवार का विभिन्न पशु-पक्षियों के साथ सानिध्य, गुरु गोविंद सिंहजी का बाज यह सभी तो एक ही संदेश दे रहे हैं। दया का, ममता का, धरा के सारे प्राणियों के साथ प्रेम-भाव का।

शनिवार, 16 जुलाई 2011

आक्रोश

देश की दुर्दशा और उसके तथाकथित कर्णधारों की हरकतों से यहां की जनता ही नहीं विदेशों में रह रहे भारतीय भी विक्षुब्ध हैं। ऐसे ही एक भाई ने अपना आक्रोश शब्दों में ढाल कर इ-मेल से भेजा है।

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं
झांकी घपलिस्तान की
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है बेईमान की

बंदों में है दम,
राडिया-विनायकम्
बंदों में है दम, राडिया-विनायकम्

उत्तर में घोटाले करती
मायावती महान है
दक्षिण में राजा-कनिमोझी
करुणा की संतान हैं
जमुना जी के तट को देखो
कलमाडी की शान है
घाट-घाट का पानी पीते
चावला की मुस्कान है.

देखो ये जागीर बनी है
बरखा-वीर महान की
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है बेईमान की

बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.

ये है अपना जयचंदाना
नाज़ इसे गद्दारी पे
इसने केवल मूंग दला है
मजलूमों की छाती पे
ये समाज का कोढ़ पल रहा
साम्यवाद के नारों पे
बदल गए हैं सभी
अधर्मी भाडे के हत्यारे में
हिंसा-मक्कारी ही अब
पहचान है हिन्दुस्तान की

इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है हैवान की
बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.

देखो मुल्क दलालों का,
ईमान जहां पे डोला था.
सत्ता की ताकत को
चांदी के जूतों से तोला था.
हर विभाग बाज़ार बना था,
हर वजीर इक प्यादा था.
बोली लगी यहाँ
सारे मंत्री और अफसरान की.
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है शैतान की.
बन्दों में है दम... नंगे-बेशरम....!

बुधवार, 13 जुलाई 2011

फिर एक बार मौत का तांड़व

मुंबाई में फिर तीन जगह सीरियल धमाके हुए। झवेरी बाजार, मुंबादेवी मंदिर और दादर स्टेशन का इलाका चपेट में आया।
समय भी ऐसा चुना गया था जब लोग दफ्तर के बाद घर जाने को निकल रहे थे या शाम के समय बाजारों में खरीददारी के लिए। तीनों धमाकों के लिए रेलवे स्टेशन या बस अड़्ड़े को ही चुना गया था।

अभी सैंकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। मृतकों की भी एक बड़ी संख्या की आशंका है। इस तरह के हमले की आशंका काफी दिनों से अखबारों में आरही थी। अभी दो दिन पहले ही असम के पास रेल दुर्घटना में आतंकवादियों का हाथ नज़र आने के बावजूद पूरे सुरक्षा इंतजाम नहीं हो पाए थे। हर बार की तरह आम निरीह जनता ही दरिंदों का शिकार बनी है।

पता नहीं कब दुनिया से यह खून-खराबा खत्म होगा और लोग निश्चिंत हो कर जी सकेंगे।

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

क्या बच्चों को शिष्टाचार सिखाने के लिए घर में किसी पुरुष का होना जरूरी है?

इस बारे में दो राय जरूर होंगी। बहुत से लोग असहमत भी होंगे, क्योंकि हजारों ऐसे उदाहरण हैं जब एक अकेली महिला ने अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठा उसे उज्जवल भविष्य दिया हो। पर मेरा हाल का ही एक अनुभव कहता है कि घर-परिवार में एक उम्रदराज पुरुष के होने से कुछ तो फर्क पड़ता ही है।

मेरा एक परिचित परिवार है। सक्सेनाजी का। सक्सेनाजी, उनकी पत्नी, दो लड़कियां जया और विजया तथा एक लड़का जय, जो मेरा जिगरी दोस्त है, बिल्कुल भाइयों जैसा। सक्सेनाजी ने नौकरी में रहते हुए ही सारी जिम्मेदारियां पूरी कर ली थीं। घर बन गया था। बड़ी लड़की का अच्छे परिवार में विवाह हो गया था और वह कनाडा जा बसी थी। छोटे जय की भी शादी हो गयी थी, प्रभू की कृपा से बिल्कुल सहज स्वभाव की घरेलू लड़की मिली थी जिसने सदा सास को माँ और ननद को बहन ही माना। जय भी अच्छे भविष्य की चाहत में सपत्निक विदेश चला गया। रही विजया जिसने कुछ पढने की ललक, कुछ परिस्थितियों, कुछ मनोदशा और शायद कुछ कुंठा की वजह से जो एक बार शादी से मना किया तो फिर उसे कोई मना नहीं पाया। पर अपनी मेहनत, लगन और काबिलियत के चलते वह सरकारी मुहकमें में आला अफसर के पद तक जा पहुंची।

सक्सेनाजी का घर में काफी दबदबा था। खुले दिलो-दिमाग के होने के बावजूद उन्हें अपनी संस्कृति, सभ्यता तथा संस्कारों से बहुत लगाव था। बेहद अनुशासन प्रिय भी थे। पर इधर बिमार रहने लग गये थे। पहले तो विजया किसी तरह घर, दफ्तर, अस्पताल में तारतम्य बनाए रखती थी पर बिमारी ज्यादा बढने पर जय ने बहन की कठिनाइयों को समझते हुए अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों को भारत भेज दिया, खुद की और पत्नी की भावनओं, सुख-सुविधा की बली दे कर। जिससे विजया को कुछ राहत मिल जाए। इससे घर में थोड़ी रौनक लौट आई। बच्चियां सब को साथ बांधने का जरिया बन गयीं। घर भर की प्यारी। पर विजया को उनसे कुछ ज्यादा ही लगाव था। जान छिड़कती थी उन दोनों पर। उनके मुंह से शब्द निकलते बाद में थे उनकी मांग पहले पूरी हो जाती थी। विजया की जिंदगी की धुरी बन कर रह गयीं थी दोनों।

पर सब सदा एक जैसा नहीं रहता, चाहे बाकि कुछ थम भी जाए पर समय अपनी मंथर पर निश्चित गति से सदा चलायमान रहता है। लम्बी बिमारी और काफी कष्ट सहने के बाद सक्सेनाजी का स्वर्गवास हो गया। बच्चियां भी बड़ी हो कालेज जाने लग गयीं। यहीं से आधुनिक सभ्यता ने टीवी और मोबाइल का रूप ले उनकी मासूमियत छीननी शुरु कर दी। कुछ अधिक आजादी लेने में अब कोई बाधा भी नहीं थी। दादी तो पहले भी कुछ नहीं कहती थी। अब तो मां और बुआ भी पुराने ख्यालातों की लगने लगीं। वही बुआ जो अपनी हथेली में दोनों को किसी नन्हें शावक सा संरक्षण देती रहती थी, अब उसी की बातें रास नहीं आने लगीं। बात-बात में तेज आवाज में विरोध करना, हर बात को काटने की कोशिश करना, हर हिदायत को हवा में उड़ाने को तत्पर रहना, आदतों में शुमार हो गया था। मां-बुआ के समझाने का असर ज्यादा देर टिकता नहीं था। आने-जाने, मिलने-जुलने वालों, दोस्त-रिश्तेदारों को इस बदलाव के साथ-साथ अपनी उपेक्षा साफ नजर आने लगी थी। सामने तो कोई कुछ नहीं कहता था पर पीठ पीछे बातें उठने लग गयीं थीं। लोगों का आना-जाना कम होने लगा था।

मेरे कानों में भी ऐसी बातें पड़ती रहती थीं। पर मुझे विश्वास नहीं होता था क्योंकि लोगों की आदत ही ऐसी होती है, बातें बनाने की। मेरा उनसे लगाव कुछ ज्यादा ही था, यह भी कारण था बातों पर विश्वास ना करने का। गोद में खेलते-खेलते बड़ी जो हूईं थीं। जब भी जाना होता तो पीठ से उतारना मुश्किल हो जाता था।

बड़े दिनों बाद इस बार जाना हुआ था। पर जाते ही धक्का लगा। उनका आचरण ऐसा था जैसे पेपर वाला या केबल वाला बिल ले कर आया हो। फिर भी मैंने बुलाने की कोशिश की, विजया ने भी कहा तब बिना टीवी से मुंह घुमाए एक नमस्ते उछाल दी। ऐसा नहीं था कि मैं उसी शहर में रहता हूं या अक्सर जाता रहता हूं। मन और भी खट्टा तब हो गया जब उनकी बिमार मां और थकी-हारी विजया ही मना करने के बावजूद पानी-वानी की व्यवस्था करती रहीं। पर दोनों टीवी छोड़ अपनी जगह से हिलीं तक नहीं। कुछ देर बैठ कर मैं चलने लगा तब भी कोई खास प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी, यह जानते हुए कि दूसरे दिन मैं वापस लौट रहा हूं। पता नहीं फिर कब आना हो पाता है।

सोचता हूं ऐसा क्यों? क्या यह विजया के अति प्यार-दुलार का नतीजा है? क्या सक्सेनाजी या जय का यहां ना होना इस धृष्टता की वजह है? या फिर तथाकथित आधुनिकता सारे रिश्तों को खा जाने पर तुल गयी है?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

भगवान के साथ ये सब आजकल खबरों में हैं।

एक हैं दया के सागर। बहुत बड़े नेता हैं। जैसा नाम वैसा ही गुण। आपादमस्तक दया भावना से लिथड़े हुए। सदा अपने आस-पास के लोगों की गरीबी हटा उन्हें सम्पन्न बनाने के लिए कृतसंकल्प। जो भी उनके पास रहा, बेटा-बेटी, भाई-बहन, बहू-जवांई याने "जहां तक उनकी दृष्टि काम करती है" वहां तक सबका भला करने में ही उम्र गुजार दी। सुना है जिंदगी भर भगवान को नकारने वाले अब मंदिरों में गुहार लगा रहे हैं। भगवान भली करे।

एक हैं सफल आयोजक। आजकल जेल में हैं। पर वहां की दिवारें भी उनके ख्यालों या मनसूबों को रोकने में सफल नहीं हो पा रही हैं। उनकी मंशा है देश को खेलों में, माफ करिएगा खेलों के आयोजन में देश का नाम सर्वोपरि करना। इसमें वे तन-मन से लगे रहते थे। धन तो खैर 'आनी-आनी' चीज है। इस बारे में इतने समर्पित हैं कि जेल में रह कर भी ध्यान खेलों के आयोजन पर ही है। सुनने में आया है कि माहौल के अनुसार अभी-अभी उन्हें तिहाड़ ओलिम्पिक करवाने का सपना बार-बार आ रहा है।
भगवान तिहाड़ की रक्षा करें।

एक हैं अपनी तरह के आप, फिल्म निर्माता। जो अपने पासंग किसी को नहीं समझते। पिछले वर्षों तक महानायक का गुणगान करते ही सोते-जागते, खाते-पीते थे। उनके बिना अपनी किसी फिल्म की कल्पना भी नहीं कर पाते थे। पर समय बदला, मान्यताएं बदलीं। इन दिनों आमिर की विवादास्पद नयी फिल्म और आमिर के कसीदे काढने से ही फुरसत नहीं मिल पा रही है। आमिर में उन्हें फिल्मों का भगवान नजर आने लगा है जबकि उनके खुद के अनुसार वे किसी भगवान को नहीं मानते। ये भी क्या करें बाजार की छत पर फिल्म टांगने के लिए एक खंबा तो चाहिए ही ना। स्तुति गान शुरु हो ही चुका है। आमिर की शायद निकृष्टतम कृति रूपी शिट् को भी प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा रहा है। मेरा विश्वास है कि आने वाले दिनों में वे आमिर को लेकर कुछ जरूर "बोएंगे"। जमीन तैयार की जा रही है। भगवान सहायक हों।

इसी संदर्भ मे याद आ रहे हैं, जयप्रकाश चौकसे। दैनिक भास्कर की सफलता में उनका फिल्मों से सम्बंधित कालम "परदे के पीछे" का भी हाथ है। एक बहुत बड़ा वर्ग है उनके प्रशंसकों का जो उनके निष्पक्ष तथा फिल्मों से सम्बंधित ज्ञान का कायल है। पर पिछले दिनों उन्होंने भी 'डेली बेल्ही' में हर चीज को जायज ठहरा कर पाठकों को बहुत ही निराश किया।
हो सकता है भूतकाल में जीवन के किसी मोड़ पर किसी प्रकार का सहयोग, सहायता की याद अब संकोचवश सच्चाई बयान करने से रोक रही हो। हे भगवान! ऐसी कैसी मजबूरी?

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कहां हमारे गुरुघंटाल, कहां उनके नमकहराम

"ग्लोबल फाइनैंशल इंटीग्रिटी" की सूचना के अनुसार हमारे देश का करीब 210 अरब रुपया स्विस बैंकों में जमा है। यह रिपोर्ट 2008 की है। यह बेकार पड़ा जमा धन हमारी जीड़ीपी के पचास प्रतिशत के बराबर है। ये बैंक ही वहां की अर्थ व्यवस्था को संभालते हैं हमारे पेट को काट कर। चूंकी वहां के लोगों की रोजी-रोटी ही ऐसा धन जुगाड़ करवाता है सो वहां खाता खोलने में भी आपको ढेरों सहूलियतें मुहय्या करवाई जाती हैं। बस आपके पास "माया" होनी चाहिए। बिना ज्यादा झंझटों और दस्तावेजों के सिर्फ पासपोर्ट से ही 15-20 मिनट में आपका खाता खोल आपके हाथ में डेबिट कार्ड़ थमा दिया जाता है। भविष्य में भी एक ई-मेल से आप अपना धन उनके सदा खुले मुख में उडेल सकते हैं।

हम-आप अंदाज भी नहीं लगा पाएंगे कि स्विस बैंकों में पड़ी सडती रकम यदि वापस अपने देश आ जाए तो क्या कुछ हो सकता है। इससे पैंतालिस करोड़ गरीब करोड़पति बन सकते हैं। हमारे सर पर लदा अरबों का विदेशी कर्ज चुकता कर देने के बावजूद बहुतेरे आधे-अधूरे प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। इतनी रकम को किसी ढंग की जगह लगा दिया जाए तो उसके ब्याज से ही सालाना बजट पूरा हो सकता है।

ऐसे धन का ढेर बनाने में वे लेन-देन सहायक होते हैं जो हवाला के जरिए किए जाते हैं। बड़े रक्षा और बहुतेरे सौदों का कमीशन ले बाहर ही छुपा दिया जाता है। आयात-निर्यात के उल्टे-सीधे बिल बना, उससे प्राप्त पैसे को बाहर बैंकों के अंधेरे लाकरों में गर्त कर दिया जाता है। बिना किसी रिकार्ड़ के देश से पैसा बाहर भेज दिया जाता है। ये सारा काम क्या आम इंसान के वश का है? सब जानते हैं कि कैसे लोग ऐसे तरीके से वैसा धन इकट्ठा कर सकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ हमारे यहां से ही वहां धन पहुंच रहा हो। दुनिया के दूसरे देशों में भी नमकहराम बैठे हुए हैं। कम्यूनिज्म के पैरोकार रूस का इस मामले में दूसरा स्थान है, पर वह क्या खा कर हमारे चंटों का मुकाबला करेगा, दूसरा स्थान होने के बावजूद उसके धन की मात्रा हमारे से एक चौथाई भी नहीं है। जबकि हर जगह अपने को सर्वोच्च मानने वाला, धन कुबेर अमेरिका पहले के पांच स्थानों में भी जगह नहीं बना पाया है। हम उसकी ऐसी नकल क्यों नहीं करते?

विशिष्ट पोस्ट

नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...