फिर शर्मसार हुई इंसानियत, फिर धज्जियां उड़ीं विश्वास की, फिर आस्था पर से आस्था उठने लगी लोगों की। अभी कुछ ही दिन पहले एक ढोंगी बाबा ने अपने पहचान वालों की इज्जत सरे राह नीलाम कर दी थी। फिर एक पाखंडी गुरु ने ऐसे ही एक परिवार का सदस्य बन कर उस परिवार की अपनी बेटी के समान कन्या को भी नहीं बख्शा।
बार-बार अपनी आड़ में ऐसे कुकर्मो का साक्षी बन भगवा रंग खुद कलंकित होता जा रहा है। इस रंग की शुद्धता, पवित्रता सब शंका के दायरे में आ चुकी है। पाखंडियों ने लोगों की आस्था, विश्वास तथा धार्मिक भावनाओं को अपनी हवस को पूरा करने का जरिया बना ड़ाला है। धीरे-धीरे 'नेता' की तरह ही 'भगवाधारी' भी एक गाली का रूप अख्तियार करने लगा है। उसके प्रति भी लोगों के मन में शंका घर बनाने लगी है। लोग सच्चे महात्माओं पर भी विश्वास खोने लगे हैं। फिर भी आज आम इंसान अपने जीवन की विड़ंबनाओं से इतना त्रस्त है कि उसे अच्छे बुरे की पहचान ही नहीं रह गयी है। रोजमर्रा के कष्ट, अनिश्चित भविष्य, पूरी ना होती जरुरतों से परेशान वह किसी चमत्कार की आशा में इन पाखंडियों की चमक-दमक से भरी दुकानों पर जा खड़ा होता है। जहां शुरु हो जाता है उसका भावनात्मक शोषण। वहां ढोंगी, जालसाज, पाखंडी बाबा के वाग्जाल, सड़क छाप टोटकों, वहां के चेले-चमाटियों द्वारा गढी झूठी छवि, रहस्यात्मक वातावरण का मकड़जाल उस भोले-भाले इंसान को अपनी गिरफ्त में ऐसा फंसा लेता है कि उसे तभी होश आता है जब वह पूरी तरह से लुट-पिट चुका होता है।
आज सख्त जरूरत है शिक्षा की, जागरुकता की, लोगों को ऐसे धोखेबाजों के जाल में फसने से पहले चेताने की। उन्हें समझाने की कि भगवान से बड़ा कोई नहीं है और यदि ऐसा कोई भी कहता है तो वह विश्वास के लायक नहीं है। जब प्रभू की ईच्छा के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता तो यह आबा-बाबा क्या कर लेगा। कोशिश शुरु हो चुकी है भले ही छोटे पैमाने मे है। जरूरत है सभी को आगे आने की उसके पहले कि यह घाव नासूर बन जाए।








