pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

होना छत्तीसगढ़ के रायपुर के गैस-कार्डों का सत्यापन, जैसे दिखा हो बुरा सपना

सभी जानते हैं कि रसोई गैस का गलत तरीकों से इस्तेमाल किया जाता रहा है। जिससे त्योहारों जैसे मौकों पर इसकी किल्लत हो जाती है। वैसे यह भी हो सकता है कि यह किल्लत कालाबाजारी के कारण कृत्रिम रूप से बनाई जाती रही हो। इसमें भी कोई बड़ी बात नहीं है। इसी बीमारी को खत्म करने के लिए एक अच्छी मंशा के साथ छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में रसोई गैस धारकों के कार्ड़ों के सत्यापन के लिए एक अभियान चलाया गया। जिससे असली उपभोक्ताओं की तस्वीर सामने आ सके और नकली कार्ड़ निरस्त किए जा सकें। पर पता नहीं क्यों इसके लिए जो तरीका अख्तियार किया गया वह पूरी तरह अव्यवहारिक था। इसके तहत उपभोक्ता को तरह-तरह के कागजों के साथ एक निश्चित जगह पर आ कर अपनी सत्यता को स्थापित करना था। उस पर तुक्का यह कि उसे ड़रा भी दिया गया था कि सत्यापन ना करवाने पर कार्ड़ निरस्त कर दिया जाएगा। बस शहर में हड़कंप मच गया। सीधा साधा 'मैंगोमैन' भिड़ गया कागजों को इक्कठा करने, बनवाने के चक्करों में, अपना काम-काज छोड़, दिन की तन्ख्वाह को दांव पर लगा अपनी सच्चाई पर मोहर लगवाने। विडंबना थी कि ये वही लोग थे जिन्होंने इस मुए कार्ड़ को बनवाने के लिए भी ना जाने कैसे-कैसे धक्के खाए थे। इन सब को यह भी पता था कि यह उनके साथ गलत हो रहा है क्योंकि कालाबाजारी वे नहीं करते। इसका सारा खेल शुरु तथा खत्म गैस एजेंसियों से ही होता है। पर करें क्या मजबूर जो ठहरे। क्या प्रशासन को पता नहीं है कि शहर के किसी भी कोने से 150-200 रुपये देकर बिना कार्ड़ के गैस टंकी आसानी से मिल जाती है। शहर के अंदर या बाहर के ढाबों पर घरेलू गैस की टंकियों से ही भोज्य पदार्थ बनाए जाते हैं। वह भी असली उपभोक्ता की जेब काट कर। वहां गैस टंकियों से भरा ट्रक पहले दिन गैस टंकी देता जाता है दूसरे दिन वही टंकी वापस ले नयी छोड़ जाता है। कुछ हल्की हुई पहले वाली को कार्ड़ धारी के मत्थे मढ दिया जाता है, जो जागरूकता के अभाव में जो मिल गया उसे ही मुकद्दर समझ, अंजाने में ही सही, अन्याय का शिकार बनता रहता है। पेट्रोल की बढती कीमतों के कारण यही गैस बहुतों की रसोई नहीं उनकी गाड़ियां चलाती है। शादी-ब्याहों में कितने जने पूछ-परख करते हैं कि यह गैस कहां से आई? कहानियों में वर्णित है कि पुराने समय में आश्रमों में पढने वाले धनाढ्य परिवार के बच्चों को मारा-पीटा या धमकाया नहीं जाता था। उसे डराने के लिए उसके पास बैठे गरीब परिवार के बच्चे को बिना उसकी गलती के दंड़ित किया जाता था जिससे डर के मारे वह धनीपुत्र डर जाए और आगे गलती ना करे। वैसा ही कुछ इस बार गैस कार्डों के सत्यापन को ले कर किया गया। होना तो यह चाहिए था कि काला बाजारी करने वाली गैस एजेंसियों पर कार्रवाही की जाती। एजेंसियों और अफसरों की मिली-भगत पर नजर रखी जाती, पर हुआ उल्टा। उसी मध्यम वर्ग पर गाज गिरी जो इस मुए कार्ड़ को बनवाते समय भी दसियों तरह की परेशानियों से दो-चार हो चुका था। उसी को फिर बली का बकरा बनाया गया, लंबी-लंबी लाइनों में लगने क बाद भी सत्यापन होगा कि नहीं की उहापोह में अपना रक्त-चाप बढवाने के साथ-साथ। यह सब ठीक वैसा ही था जैसे चोरी होने के बाद चोर को ढूंढने-पकड़ने की बजाए जिसके घर चोरी हुई हो उसी को हड़काया जाना शुरु कर दिया जाए। बताओ, तुम्हारा दरवाजा बंद था या खुला, आल्मारी में ताला लगा था कि नहीं, यदि नहीं तो क्यों नहीं लगाया था, घर किसका है, सामान खरीद कर लाए थे या कैसे मिला था, इतना सामान रखते ही क्यों थे इत्यादि-इत्यादि। उधर चोर की ना तो तलाश हो रही है नाहीं उसकी फिक्र है । ऐसी सोच है कि इतना सब करने पर वह अपने-आप सुधर जाएगा। फिलहाल तो सब स्थगित है। आने वाले दिनों में अब ऊंट पर नजर रहेगी। पर यह स्थगन किसी और दिशा की तरफ तो इशारा नहीं कर रहा ?

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

युद्ध से जरूर हटे थे पर ना वे भगोड़े थे नाहीं कायर

युद्ध से भागना या पीठ दिखाना कायरता की निशानी मानी जाती है। पर यदि उस दिन पराजय सामने नजर आ रही हो, हार ना टाली जा सकने वाली हो तो क्या उस समय मैदान छोड़ देना कायरता या बेवकूफी कहलाएगी या अक्लमंदी? निश्चित रूप से यह अक्लमंदी कहलाएगी। परिस्थितियों को पूरी तौर से अपने खिलाफ होता देख, युद्ध भूमि से और तैयारी करने के लिए कुछ समय के लिए हट जाने में कोई लज्जा या संकोच की बात नहीं होती बल्कि यह चतुराई है। इस बात के पूर्ण पक्षधर थे वीर शिवाजी। जब-जब उन्हें अपना पक्ष कमजोर होता दिखा उन्होंने मोर्चे से खुद को अलग कर लिया और फिर पूरी तैयारी से वापस आकर जीत हासिल की। चाहे वह पन्हालगढ की लड़ाई हो चाहे औरंगजेब की जेल हो चाहे महावत खां के साथ युद्ध हो। वैसे उसी औरंगजेब को भी बीजापुर के युद्ध में मैदान छोड़ना पड़ा था। हुमायूं को बार-बार शेरशाह से लड़ाई के दौरान बचना पड़ा था। भागने में अंग्रेज भी पीछे नहीं रहे पर उन्होंने तैयारी कर फिर-फिर वापसी की। स्वतंत्रता की लड़ाई में वीर सावरकर अंग्रजों के चंगुल से पानी के जहाज के संड़ास के 'पोर्ट-होल' से निकल भागे थे। सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों को धोखा दे देश से बाहर चले गये थे। माओत्से तुंग च्यांगकाई शेक की सेना से लड़ने में असफल रहने पर लगातार महिनों लुकते-छिपते रहे थे। चीन के आक्रमण करने पर दलाई लामा भारत चले आए थे। इंसानों की तो क्या कहें खुद भगवान श्री कृष्ण को भी इस चतुराई का सहारा लेना पड़ा था जब मथुरा पर जरासंध के बार-बार आक्रमण करने के कारण वे मथुरा छोड़ द्वारका चले गये थे। इसी से उनका एक नाम 'रणछोड़' भी है। मुहम्मद पैगंबर भी मक्का छोड़ मदीना चले गये थे। पर वह दिन भी गर्व से हिजरी संवत मान कर याद किया जाता है। लड़ाई में हार-जीत तो चलती ही रहती है। लड़ते-लड़ते वीर गति को प्राप्त होना निश्चित रूप से बहादूरी होती है पर यदि उससे विजय प्राप्त ना हो तो देश को लाभ नहीं पहुंचता। समय विपरीत जान मैदान छोड़ देना कायरता कि श्रेणी में नहीं आता। समय को अपने पक्ष में करने के लिए उठाया गया ऐसा कदम बुद्धिमत्ता पूर्ण होता है। कायरता युद्ध से भाग कर फिर युद्ध ना करने में है। ये सारे महापुरुष भले ही एक समय युद्ध से निकल गये हों पर मौका मिलते ही इन्होंने अपने दुश्मनों को हरा कर ही चैन की सांस ली थी।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

माँ दुर्गा के नौ रूप

नवरात्र के दिनों में माँ दुर्गा की आराधना तथा पूजन नौ दिनों तक किया जाता है। पंडितों और विद्वानों को तो ज्ञात ही होगा, पर ज्यादातर भक्तजनों को शायद यह न मालुम हो कि इन नौ दिनों में माँ के नौ रूपों की पूजा की जाती है। जिनके नाम निम्नानुसार है - पहला दिन - माँ शैलपुत्री, दूसरा दिन - माँ ब्रह्मचारिणी, तीसरा दिन - माँ चंद्रघंटा, चौथा दिन - माँ कुष्मांडा, पांचवां दिन - माँ स्कंदमाता, छठा दिन - माँ कात्यायनी, सातवां दिन - माँ कालरात्री, आठवां दिन - माँ महागौरां तथा नौवां दिन - माँ सिद्धीदात्री के नाम समर्पित होता है।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

रहस्य का आवरण लपेटे "बिल्ली"

दुनिया के सैकड़ों-हजारों जीव- जंतुओं मे दो ऐसे प्राणी हैं जो अपने इर्द-गिर्द सदा रहस्य और ड़र का कोहरा लपेटे रहते हैं। पहला है बिल्ली और दूसरा सांप। वैसे इस मामले में बिल्ली सांप से कहीं आगे है। इसी की जाति के शेर, बाघ, तेंदुए आदि जानवर ड़र जरूर पैदा करते हैं पर रहस्यात्मक वातावरण नहीं बनाते। पर अफ्रीकी मूल के इस प्राणी, "बिल्ली" को लेकर विश्व भर के देशों में अनेकों किस्से, कहानियां और अंधविश्वास प्रचलित हैं। जहां जापान मे इसे सम्मान दिया जाता है क्योंकि किसी समय इसने वहां चूहों के आतंक को खत्म कर खाद्यान संकट का निवारण किया था। वहीं दूसरी ओर इसाई धर्म में इसे बुरी आत्माओं का साथी समझ नफ़रत की जाती रही है। फ्रांस मे तो इसे कभी जादूगरनी तक मान लिया गया था। हमारे यहां भी इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। एक ओर तो इसके रोने की आवाज को अशुभ माना जाता है। आज के युग मे भी यदि यह रास्ता काट जाए तो अच्छे-अच्छे पढे-लिखे लोगों को ठिठकते देखा जा सकता है। रात के अंधेरे में आग के शोलों कि तरह दिप-दिप करती आंखों के साथ यदि काली बिल्ली मिल जाए तो देवता भी कूच करने मे देर नहीं लगाते। संयोग वश यदि किसी के हाथों इसकी मौत हो जाए तो सोने की बिल्ली बना दान करने से ही पाप मुक्ति मानी जाती है। दूसरी ओर दिवाली के दिन इसका घर में दिखाई देना शुभ माना जाता है।दुनिया भर की ड़रावनी फिल्मों मे रहस्य और ड़र के कोहरे को घना करने मे सदा इसकी सहायता ली जाती रही है। यह हर तरह के खाद्य को खाने वाली है पर इसका चूहे और दूध के प्रति लगाव अप्रतिम है। इसे पालतू तो बनाया जा सकता है पर वफादारी की गारंटी शायद नहीं ली जा सकती।सांपों को लेकर भी तरह-तरह की भ्रान्तियां मौकापरस्तों द्वारा फैलाई जाती रही हैं। जैसे इच्छाधारी नाग-नागिन की विचित्र कथाएं। जिन पर फिल्में बना-बना कर निर्माता अपनी इच्छायें पूरी कर चुके हैं। एक और विश्वास बहुत प्रचलित है, नाग की आंखों मे कैमरा होना, जिससे वह अपना अहित करने वाले को खोज कर बदला लेता है। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने मे हो। सपेरों और तांत्रिकों द्वारा एक और बात फैलाई हुई है कि सांप आवश्यक अनुष्ठान करने पर अपने द्वारा काटे गये इंसान के पास आ अपना विष वापस चूस लेता है।पर सच्चाई तो यह है कि दूध ना पीने वाला यह जीव दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी, इंसान, से ड़रता है। चोट करने या गलती से छेड़-छाड़ हो जाने पर ही यह पलट कर वार करता है। उल्टे यह चूहे जैसे जीव-जंतुओं को खा कर खेती की रक्षा ही करता है। जिससे इसे किसान मित्र भी कहा जाता है। दुनिया के दूसरे प्रणियों की तरह ये भी प्रकृति की देन हैं। जरूरत है उल्टी सीधी अफवाहों से लोगों को अवगत करा अंधविश्वासों की दुनिया से बाहर लाने की।

गुरुवार, 24 मार्च 2011

सोमनाथ के दरवाजे स्वर्ण मंदिर में

भारत की समृद्धि और वैभव के चर्चे सुन कर बाहर से बार-बार आतंकियों के हमले हुए हैं। खण्ड़-खण्ड़ में बिखरे राज्यों और उनके, एक-दो को छोड़, शासकों को बहुतेरी बार जलील होना पड़ता रहा है। पर उनके गरूर और अहम के कारण कभी भी पूरे देश में एका नहीं हो पाया और इसी का फायदा बार-बार लुटेरे उठाते रहे। कैसे-कैसे नहीं लूटा उन्होंने, यहीं के मवेशियों पर यहीं के लोगों के सहारे जितना भी जैसा भी जो भी बन पाया उठा कर ले गये। और हम आशा करते रहे कि भगवान खुद आ कर हमारी रक्षा करेगा।

अठारहवीं शताब्दी में अहमद शाह अब्दाली यहां आ घुसा और मनमर्जी से लूट-पाट की। उसका सारा ध्यान उस समय के सबसे समृद्ध सोमनाथ के मंदिर पर था। उसके हमले की खबर पा आस-पड़ोस के राजाओं ने सैन्य सहायता की पेशकश की थी। पर कहा जाता है कि मंदिर के कर्ता-धर्ताओं ने उनकी पेशकश यह कह कर नामंजूर कर दी थी कि भगवान खुद अपनी रक्षा में सक्षम हैं।

हुआ वही जो होना था। अब्दाली ने पूरे मंदिर को खाली कर दिया, यहां तक कि उसके सुंदर और खूबसूरत दरवाजों को भी नहीं छोड़ा। यह बात जब पंजाब के शूरवीरों को पता चली तो वे आगबबूला हो गये। उन्होंने अब्दाली को ललकारा और युद्ध कर उससे वे दरवाजे वापस प्राप्त कर लिए। पर जब वे उन दरवाजों को सोमनाथ मंदिर के पुजारियों को लौटाने गये तो उन्होंने यह कह कर दरवाजे वापस लेने से इंकार कर दिया कि मलेच्छों के हाथ लगने से ये द्वार अपवित्र हो गये हैं, इसलिए इन्हें मंदिर में पुन: स्थापित नहीं किया जा सकता। तब उन दरवाजों को पंजाब ले आया गया तथा उनमें और मीनाकारी करवा, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की दर्शनी ड़्योढी में प्रतिस्थापित कर दिया गया।

तब से लेकर आज तक वे सोने और हाथी दांत से जड़े विशाल दरवाजे मंदिर की शोभा बढाने में अपना योगदान दे रहे हैं।

मंगलवार, 22 मार्च 2011

इस सीख के लिए बंदरों को ही क्यों चुना गया ?

बहुत दिनों से बहुत बार यह बात मन में आती रही थी कि जब छोटे से छोटे "कार्टून कैरेक्टर" का भी कोई नाम होता है तो गांधी जी के तीन बंदरों का भी कोई नाम तो जरूर होगा। पर ख्याल आ कर ऐसे ही चला जाता था।आज अचानक उनसे परिचय हो गया तो सोचा उन प्रसिद्ध हस्तियों का आपसे भी परिचय करवा दूं।
चीन में हजारों सालों से प्रचलित उपदेशों को करीब पांच सौ साल पहले जापान में मूर्त रूप दिया गया तीन बंदरों के द्वारा। जो अपना आंख, कान तथा मुंह ढक कर यह संदेश देते हैं कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो। इनके नाम क्रमश: इस तरह हैं :-
# मिज़ारू (बुरा मत देखो)
# कीकाजारु (बुरा मत सुनो)
# इवाज़ारु (बुरा मत कहो)

पर एक बात जो समझ में नहीं आई वह यह है कि इस उपदेश के लिए बंदरों को ही क्यों चुना गया ? आप को ज्ञात हो तो !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

इसके पहले कि "होली" हो ले

होली का त्यौहार कबसे शुरू हुआ यह कहना बहुत ही मुश्किल है। पुराणों व पुराने कथानकों में इससे संबंधित अनेकों कथाएं मिलती हैं।

महाभारत मं उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।

दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।

एक और उल्लेख भी मिलता है। जिसके अनुसार वैदिक काल में एक अनुष्ठान किया जाता था, जिसे सोमयज्ञ कहते थे। यह अपने आप में अनूठा तथा विशेष प्रकार का यज्ञ होता था। इसे संपन्न करवाने के लिए कर्मकांडी वेद पाठी दूर-दूर से बुलाए जाते थे। जो करीब साल भर कठोर नियमों से बंधे रह कर इसे पूरा करते थे। इसे पूरा करने के नियम बहुत कठोर हुआ करते थे जिनमें भूल और छूट की कोई गुंजाइश नहीं होती थी। इसीलिए इस यज्ञ के सफलता पूर्वक पूर्ण होने पर खूशी का माहौल बनता था और इतने दिनों तक नियम-कायदे से बंधे लोग अपनी शारीरिक और मानसिक थकान मिटाने के लिए सारे वातावरण को उल्लास और आनंद से भर देते थे।

इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।

इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।

पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।

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किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...