pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

जिसे भी हम पूजते हैं, उसकी ऐसी की तैसी कर डालते हैं

हम एक धार्मिक देश के वाशिंदे हैं। हम बहुत भीरू हैं। इसी भीरुता के कारण हम अपने बचाव के लिए तरह-तरह के टोने-टोटके करते रहते हैं। हमें जिससे डर लगता है हम उसकी पूजा करना शुरु कर देते हैं। हमने अपनी रक्षा के लिए पत्थर से लेकर वृक्ष, जानवर और काल्पनिक शक्तियों को अपना संबल बना रखा है। पर जैसे-जैसे हमारी सुरक्षात्मक भावना पुख्ता होती जाती है, हम अपने आराध्यों की ऐसी की तैसी करने से बाज नहीं आते।

घर से ही शुरु करें जब तक मतलब निकलना होता है मां-बाप से और ज्यादा प्यारा और कोई नहीं होता पर जैसे ही उन्हीं कि बदौलत अपने पैरों पर खड़े होने की कुव्वत आ जाती है तो उनके लिए वृद्धाश्रम की खोज शुरु हो जाती है।

हमारे यहां यह बात काफी ज्यादा प्रचलित है कि जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता वास करते हैं। देख लीजिए जहां देवता वास करते हैं वहां नारी का क्या हाल है। अरे देवता ही जब उसकी कद्र नहीं कर पाए तो हम तो गल्तियों के पुतले, इंसान हैं। कभी सुना है कि देवताओं ने अपना मतलब सिद्ध हो जाने पर किसी देवी को इंद्र का सिंहासन सौंपा हो?

हम नदियों को देवी या मां का दर्जा देते हैं पर किसी एक भी नदी के पानी को पीने लायक नहीं छोड़ा है। पीते हैं कहीं, तो वह मजबूरी है।

गाय को सदा मां के समकक्ष माना गया है। पर कभी उनके जिस्म को निचोड़ने के अलावा उनकी सेहत का ख्याल रखा है? अपने शहरों में जगह-जगह घूमती कूड़ा खाती मरियल सी गायें शायद ही दुनिया में और कहीं हों।

पानी को ही ले लीजिए, जल देवता कहते-कहते हमारा मुंह नहीं थकता पर आज जैसी इस देवता की दुर्दशा कर दी गयी है लगता है कि इसके भी देवता कूच कर चुके हैं।

पेड़ों की तो बात ही ना की जाए तो बेहतर है। जीवन देने वाली इस प्रकृति की नेमत की कैसी पूजा आज कल हो रही है जग जाहिर है। कभी ध्यान गया है किसी मंदिर में लगे किसी अभागे वृक्ष की तरफ? उसके तने या जड़ के पास अपनी मन्नत पूरी करने के लिए दीया जला-जला कर उसकी लकड़ी को कोयला कर कर हमें लगता है कि वृक्ष महाराज हमारी मनोकामनाएं जरूर पूरी करेंगें। कोई कसर नहीं छोड़ते अपनी आयू बढाने के लिए उसकी जड़ों में अखाद्य पदार्थ ड़ाल-ड़ाल कर उसको असमय मृत्यु की ओर ढकेलने में। यही हाल वायु का है।

यानि कि हमने किसी भी पूज्य की ऐसी की तैसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

B.S.N.L. मेहरबान तो ब्लागिंग पहलवान।

पिछले तीन तारीख से यह मायाजाल रूठा हुआ था। अपनी सीमित कोशिशों से जब समस्या से पार नहीं पाया जा सका तो इसके मठ के तांत्रिकों से गुहार लगाई। पर सेवा कर देने के बावजूद सुनवाई जल्द नहीं हो पाई। कभी इधर की बेमौसम बरसात का दोष, कभी किसी की गैर हाजिरी, कभी समय का दुखड़ा करते-करते जब हफ्ता निकल गया तो फिर याद करवाते समय आवाज में तुर्षी आना स्वाभाविक हो गया था। अब पता नहीं किसकी मेहरबानी से संत पधारे, माथा पच्ची कर इसका उद्धार किया। चलो देर आयद दुरुस्त आयद, मेरी जान में तो जान आई।
दूसरी कंपनियों वाले कैसे गज की गुहार पर दौड़े चले आते हैं। अब यह पता नहीं कि दूसरे की थाली में घी ज्यादा दिख रहा है या वे भी इसी थैली के......हैं।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

एक बैंक जहां पैसे या कीमती वस्तुएं नहीं, कपडे रखे जाते हैं.

ज्यादातर यही समझा जाता है कि बैंकों में पैसा या कीमती सामान ही रखा जाता है। पर झारखंड के जमशेदपुर मे एक बैंक ऐसा है जिसका पैसों से कोई लेना-देना नहीं है। इस अनोखे बैंक में इंसान की मूलभूत जरूरत कपड़े रखे जाते हैं तथा इसे "कपड़ों का बैंक" के नाम से जाना जाता है।

करीब एक दशक पुराने इस बैंक "गूंज" का मुख्य उद्देश्य देश के उन लाखों गरीब तथा जरूरतमंद लोगों को कपड़े उपलब्ध करवाना है, जो उचित वस्त्रों के अभाव मे अपमान और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम का सामना करते हैं। पूरी दुनिया में अनगिनत लोगों को कपड़ों के अभाव में शारिरिक व मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। भारत के ही कुछ भागों में महिलाओं को उचित वस्त्रों के अभाव में अनेकों बार अप्रिय परिस्थियों से गुजरना पड़ता है।

इसी तरह की परेशानियों से लोगों को रोज दो-चार होता देख, कुछ संवेदनशील लोगों ने मिल कर इस शर्मनाक परिस्थिति से त्रस्त उन अभावग्रस्त लोगों को बचाने के लिए जो हल निकाला, उसी का रूप है "गूंज"।

इसी तरह यदि छोटी-छोटी धाराएं अस्तित्व में आती रहें तो गरीबी के रेगिस्तान में कहीं-कहीं तो नखलिस्तान उभर कर कुछ तो राहत प्रदान कर ही सकता है।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले कुछ शब्द

कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग-अलग करीब २५० शब्दों का प्रयोग होता है। मित्र के पिताजी ने कुछ पर्याय बताए, वही पेश कर रहा हूँ :-

पति : अलबलियो, आलीजो, उमराव, कामणगारो, केसरियो बालम, गायड़मल, ईसर, गढपतियो, चतर, जलाल, ढोला, गुमानीड़ो, छैलभंवर, पिव, भरतार, मूंछालो, राईवर, रावतियो, पांवड़ां, ललबलिया, नवलबनो, भंवर, मारूजी, रसियो, राजकवंर, रायजादो, लसकरियो, सास सपूती रा पूत, साहिबां, सुगणो, नणद रो वीर, सायबो, सरदार, इत्यादि।

पत्नी : - अरधंगी, कामणगारी, गौरी, चितहरणी, चुड़ाहाली, अलबेली, कांमणी, नखराली, चंदाबदनी, फूलवंती, मरवण, मिरगानैणी, रमणी, लाडी, सुगणीनार, पद्मणी, नार, मारू, सुवागण, स्याणी, जोड़ायत, इत्यादि।

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

ब्लॉग जगत अब एक परिवार न हो ऐसा मोहल्ला बन गया है जहां अधिकाँश दूसरे को फूटी आँख देख नहीं सुहाते

चाहे हम लाख कहें पर सच्चाई यही है कि ब्लाग जगत एक परिवार ना हो कर एक मध्यम वर्गीय मोहल्ला है। जो तरह-तरह के स्वयंभू उस्तादों, गुरुओं, आलोचकों, छिद्रान्वेषियों का जमावड़ा होता जा रहा है। जहां एक दूसरे की टांग खीचने या नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता। मुस्कान की नकाब तो सबके चेहरे पर है पर बहुतों का अधिकांश समय अपने नाखूनों को तीक्ष्ण करने में जाया जाता है।

एक मोहल्ले में रहने वाले, जैसे एक दूसरे की तरक्की, खुशहाली, उन्नति पर अपने दिल को कबाब बनाते रहते हैं वैसे ही इस ब्लागी मोहल्ले में होना शुरु हो गया है। शुरु तो खैर शुरु से ही था पर जरा संकोच, आंखों की शर्म जैसा कुछ बचा हुआ था जो 'बेनामी' जैसा बुर्का ओढवा देता था। अब तो खुले आम 'खुला खेल फर्रुखाबादी' की शुरुआत हो चुकी है। जिसमें दूसरे का दूध भी छाछ और अपना पानी भी शर्बत नजर आने लगा है। अपनी कैसी भी रचना से उतना ही लगाव है जितना एक काले भुजंग, आड़ी-टेड़ी, नालायक संतान से उसकी माँ को होता है। ठीक है आपका 'उत्पादन' अच्छा है आपकी नजर में पर दूसरे के को तो कमतर ना आंकें।

ज्यादातर कुढन यहां दी जाने वाली टिप्पणियों के कारण हैं। किसी के खाते में रोजाना 25-50 दर्ज हो जाती हैं तो किसी के यहां 2-3 आकर नमक छिड़क जाती हैं। यह नहीं समझ आता कि इससे पहले के चारों ओर कौन से चार चांद घूमने लग जाते हैं या उसके यहां 1000-1000 के लाट्टू 'चसने' लगते हैं और दूसरे के यहां मोमबत्ती जलती रह जाती है। अरे भाई आई, आई नहीं तो ना सही। पर उस मुए अहम का कोई क्या करे जो सीधा दिमाग में घुस उसे उस टिप्पणिधिराज को अपना दुश्मन मानने को मजबूर करने लगता है? उसकी हर अच्छी बुरी पोस्ट या बात सीधे कलेजे पर वार करने लगती है।

एक "बोन आफ कंटेंशन" और है। चिट्ठाजगत का सक्रियता क्रमांक। जिसमें उपस्थित चालिस नाम हजारों 'होनहारों' के दिल पर सांप लोटवाते रहते हैं। वे अपना काम धाम छोड़ उसी क्रमांक पर नजर गड़ा अपना रक्त-चाप बढवाते रहते हैं। उस चालिसे में नाम आ जाने से पता नहीं कौन सा साहित्य अकादमी या बुकर का ईनाम मिल जाता है जो कुछ लोगों की हवा बंद कर देता है।

अभी कुछ दिनों पहले हम सब एक और शर्मनाक दौर से गुजरे हैं जब कुछ लोगों के मिल बैठने पर ही लोगों की ऊंगलियां उठने लग गयीं थीं। क्या अपराध कर दिया गया था जो अभद्र भाषा के प्रयोग का भी खुल कर प्रदर्शन किया गया। जब अनदेखे अंजाने एक साथ मिल बैठेंगे तभी तो अपनत्व की भावना जोर पकड़ेगी। इसमें बुराई क्या थी? यह कोई राजनीतिक पार्टी का माहौल अपने पक्ष में करने की दावत तो थी नहीं कि उसकी भर्त्सना की गयी। पता नहीं क्यूं सही को भी गलत ठहराने की हमारी आदत खत्म नहीं होती।

मोहल्ले में सभी ऐसे हैं यह बात भी नहीं है। सैंकड़ों ऐसे शख्स हैं जो बिना किसी राग-द्वेष, तेरी-मेरी या अच्छे-बुरे के पचड़े में पड़े बगैर 'स्वांत सुखाय' के लिए अपना काम करे जा रहे हैं और सराहना भी पा रहे हैं। क्यों ना उनसे ही हम कुछ सीखें क्योंकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और ना ही उससे बड़प्पन कम होता है।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

कौन बेचारा है पति या पत्नी :-)

पत्नी खर्च पूरा ना पड़ने और पति की अल्प कमाई से परेशान थी।एक दिन रहा नहीं गया बोली, "मैं शर्म के मारे अपना सर नहीं उठा पाती हूं। मेरी मां हमारे घर का किराया देती है। मेरी मौसी के यहां से कपड़े आते हैं। मेरी बहन हमारा राशन भरती है। कब हमारी हालत सुधरेगी?
" पति बोला, "शर्म तो आनी ही चाहिए। तुम्हारे दो-दो चाचा हैं जो एक पैसा भी नहीं भेजते।"

संता तथा बंता अपना दर्द बांट रहे थे।संता, "अरे यार पिछले हफ्ते मेरी बीवी की आंख में एक बालू का कण समा गया था। डाक्टर को पूरे पांच सौ देने पड़ गये।
"बंता, "यार तू तो भाग्यशाली रहा। परसों मेरी पत्नी की आंख में एक सोने का हार समा गया था पूरे दस हजार देने पड़े।"

पति गुस्से से, "तुम हर दरवाजे पर आ खड़े हुए भिखारी को खाना देती रहती हो। इससे तुम्हें कुछ मिलने वाला नहीं है।"
"जानती हूं। पर यह देख मुझे बड़ी शांति मिलती है कि कोई तो है जो मेरे हाथ का बना खाना बिना उसकी बुराई किए खा लेता है।"

विशिष्ट पोस्ट

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...