पिछले दस महीनों से कामनवेल्थ खेलों के "मास्कट" शेरा का रूप धरे सतीश बिदला खेलों के समापन के साथ ही बेरोजगार हो गए हैं।
दुबले पतले, शर्मीले स्वभाव वाले बिदला कहते हैं कि शुरू में उन्हें कम्युनिकेशन प्रभाग में काम मिला था। पर बाद में उनके स्वभाव को देख कर उन्हें "शेरा" बनने का मौका प्रदान कर दिया गया। १२वी पास सतीश बताते हैं कि जैसे-जैसे खेलों का समय नजदीक आता गया और शेरा की ख्याति बढ़ती गयी वैसे-वैसे उनके काम करने का समय भी अधाता गया। उनके अनुसार शेरा का सारा 'गेट-अप', जिसका वजन करीब ८ किलो था उस सबेरे९. बजे से शाम ६ बजे तक पहने रहना पड़ता था। उसी को पहने-पहने उन्हें स्कूल, कालेज, बाजार आदि का भ्रमण करना होता था तथा उसी को पहने-पहने विदेशी मेहमानों से भी मिलना होता था। मेरे जीवन के यादगार क्षण वे ठ जब मैं २६ जनवरी की परेड में शेरा बन कर शामिल हुआ था। राष्ट्राध्यक्ष प्रतिभा पाटिल और राहुल गांधी से मुलाक़ात भी नहीं भुला पाऊँगा। शेरा तो मेरा रूप ही हो गया है इसी ने मुझे प्रसिद्धी दिलवाई है। खेलों में भाग लेनेवाले इतने सारे खिलाड़ियों से मिलना, उनका स्नेह पाना सब शेरा की बदौलत ही हो पाया है। यह समय मेरी जिन्दगी का सबसे अहम् हिस्सा है। अब देखें आगे क्या होता है। फिलहाल तो मुझे काम की तलाश है।
ये तो रही शेरा के जीते जागते स्वरूप की बात। जब इन्हीं का यह हाल है तो उन हजारों "माडलों" का क्या हश्र होगा जिन पर लाखों रूपए लगा कर उन्हें जगह-जगह स्थापित किया गया था, सजावट के लिए। वे सारे के सारे अब बेकार की चीज हो गए हैं। उन्हें कहाँ रखा जाए या उनका क्या किया जाए इसे समझ नहीं पा रहे हैं कुर्सियों पर बैठे समझदार लोग। फिलहाल ये सारे "माडल" बेचारे किसी पार्क के कोने में या ऐसी ही किसी निर्जन जगहों पर पड़े धूल खा रहे हैं।
सही भी है न मतलब निकल गया है तो पहचानने की क्या जरूरत है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
prawas par hoon,
kisii ke rahane yaa naa rahane se koi phark kahaan padataa haj. phir bhii sochaa ki bataa hii diyaa jae. prawas par hoon. 20-22 din lag jayenge. ab aap sab to jante hii hain ki blogeria se piidit par kyaa gujaratii hai. aaj kaise bhii jugad bhidaayaa hai. hindi me ho nahii paa raha, par na maamaa se kanaa maamaa hi sahii.
sabko raam raam.
sabko raam raam.
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
"माँ सिद्धिदात्री" जिनकी अनुकंपा से शिवजी अर्धनारीश्वर कहलाए.
नवरात्र-पूजन के नवें दिन "मां सिद्धिदात्री" की पूजा का विधान है।
मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व , ये आठ प्रकार की सिद्धियां होती हैं। मां इन सभी प्रकार की सिद्धियों को देनेवाली हैं। इनकी उपासना पूर्ण कर लेने पर भक्तों और साधकों की लौकिक-परलौकिक कोई भी कामना अधूरी नहीं रह जाती। परन्तु मां सिद्धिदात्री के कृपापात्रों के मन में किसी तरह की इच्छा बची भी नही रह जाती है। वह विषय-भोग-शून्य हो जाता है। मां का सानिध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। संसार में व्याप्त समस्त दुखों से छुटकारा पाकर इस जीवन में सुख भोग कर मोक्ष को भी प्राप्त करने की क्षमता आराधक को प्राप्त हो जाती है। इस अवस्था को पाने के लिए निरंतर नियमबद्ध रह कर मां की उपासना करनी चाहिए।
मां सिद्धिदात्री कमलासन पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपरवाले दाहिने हाथ में गदा तथा नीचेवाले दाहिने हाथ में चक्र है। ऊपरवाले बायें हाथ में कमल पुष्प तथा नीचेवाले हाथ में शंख है। इनका वाहन सिंह है। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव को भी इन्हीं की कृपा से ही सारी सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। इनकी ही अनुकंपा से शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था और वे "अर्धनारीश्वर" कहलाये थे।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
"लो हम सब फिर भूल गये.! ! ! सबको याद दिलाना $$$ उसका क्या नाम है ! ! !"
जैसा कि अंदेशा था, खेलों के नशे ने, भव्यता की चकाचौंध ने, पदकों की बौछार ने सिर्फ और सिर्फ 15-20 दिन पहले के आक्रोश को, गुस्से को, तिलमिलाहट को भुलवा कर रख दिया। पहले इस तरह के भूलने को कुछ महीनों का समय लगा करता था पर इस बार यह आश्चर्यजनक रूप से इतनी जल्दि हो गया। प्रभू की मेहर है।
कहावत है कि नेता की पहली खासियत उसका 'चिकना घड़ा होना' जरूरी है, जिस पर कोई 'बाधा' नहीं व्यापति हो।
पता तो सबको है फिर भी एक बार और दुनिया ने देखा एक आम इंसान और "उसके सेवकों" में के फर्क का सच। यदि किसी साधारण आदमी पर कोई झूठा ही आरोप लग जाए तो उसका घर से निकलना दूभर हो जाता है। ग्लानी के मारे वह किसी से आंख नहीं मिला पाता। पर खेलों के उद्घाटन और समापन पर सबने देखा कि दुनिया भर में अपनी "करनी" के कारण नाम "कमाने" के बावजूद अगला कैसे मुर्गे की तरह गर्दन अकड़ा कर बिना किसी शर्मो-हया के हजारों लोगों के हुजूम के सामने आया, लगातार हूटींग के बावजूद आत्म प्रशंसा की और तो और खिलाड़ियों को पदक भी प्रदान किए। बेचारे खिलाड़ियों की मजबूरी थी कि वे ऐसे आदमी के हाथों पदक लेने से इंकार नहीं कर सकते थे पर मन ही मन सोच तो रहे ही होंगे कि यही बचा था हमारा सम्मान करने के लिए।
उधर उसके आकाओं के चेहरे पर व्याप्त संतोष भी इंगित कर रहा था कि तूफान गुजर चुका है। जैसे दुष्ट बच्चे की भूल पर उसके अभिभावक उसके कान मरोड़ कर एक चपत लगा अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं वैसा ही शायद कुछ हो गया हो। क्योंकि उद्घाटन और समापन के उद्बोधन में फर्क दिख रहा था। पहले भाषण में जहां चेहरे पर एक 'नर्वसनेस' छाई हुई थी, वहीं समापन दिवस पर उसी चेहरे पर आत्म विश्वास लौटता नजर आ रहा था।
बात वही है, कोई कितना चिल्लाता चीखता रहे, गैंड़े जैसी खालों पर क्या असर होने वाला है।
जय हिंद ।
कहावत है कि नेता की पहली खासियत उसका 'चिकना घड़ा होना' जरूरी है, जिस पर कोई 'बाधा' नहीं व्यापति हो।
पता तो सबको है फिर भी एक बार और दुनिया ने देखा एक आम इंसान और "उसके सेवकों" में के फर्क का सच। यदि किसी साधारण आदमी पर कोई झूठा ही आरोप लग जाए तो उसका घर से निकलना दूभर हो जाता है। ग्लानी के मारे वह किसी से आंख नहीं मिला पाता। पर खेलों के उद्घाटन और समापन पर सबने देखा कि दुनिया भर में अपनी "करनी" के कारण नाम "कमाने" के बावजूद अगला कैसे मुर्गे की तरह गर्दन अकड़ा कर बिना किसी शर्मो-हया के हजारों लोगों के हुजूम के सामने आया, लगातार हूटींग के बावजूद आत्म प्रशंसा की और तो और खिलाड़ियों को पदक भी प्रदान किए। बेचारे खिलाड़ियों की मजबूरी थी कि वे ऐसे आदमी के हाथों पदक लेने से इंकार नहीं कर सकते थे पर मन ही मन सोच तो रहे ही होंगे कि यही बचा था हमारा सम्मान करने के लिए।
उधर उसके आकाओं के चेहरे पर व्याप्त संतोष भी इंगित कर रहा था कि तूफान गुजर चुका है। जैसे दुष्ट बच्चे की भूल पर उसके अभिभावक उसके कान मरोड़ कर एक चपत लगा अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं वैसा ही शायद कुछ हो गया हो। क्योंकि उद्घाटन और समापन के उद्बोधन में फर्क दिख रहा था। पहले भाषण में जहां चेहरे पर एक 'नर्वसनेस' छाई हुई थी, वहीं समापन दिवस पर उसी चेहरे पर आत्म विश्वास लौटता नजर आ रहा था।
बात वही है, कोई कितना चिल्लाता चीखता रहे, गैंड़े जैसी खालों पर क्या असर होने वाला है।
जय हिंद ।
जगत जननी माँ महागौरी
आज नवरात्रों का आठवां दिन है। आज के दिन दुर्गा माता के "महागौरी" स्वरूप की पूजा होती है।पुराणों के अनुसार मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी जिसके कारण इनके शरीर का रंग एकदम काला पड़ गया था। शिवजी ने इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर खुद इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से धोया जिससे इनका वर्ण विद्युत-प्रभा की तरह कांतिमान, उज्जवल व गौर हो गया। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा।
इनकी आयु आठ वर्ष की मानी जाती है। इनके समस्त वस्त्र, आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपर का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और नीचेवाले दाहिने हाथ में त्रिशुल है। ऊपरवाले बायें हाथ में डमरू और नीचे का बायां हाथ वर मुद्रा में है। मां शांत मुद्रा में हैं। ये अमोघ शक्तिदायक एवं शीघ्र फल देनेवालीं हैं। इनका वाहन वृषभ है।
भक्तजनों द्वारा मां गौरी की पूजा, आराधना तथा ध्यान सर्वत्र किया जाता है। इस कल्याणकारी पूजन से मनुष्य के आचरण से सयंम व दुराचरण दूर हो परिवार तथा समाज का उत्थान होता है। कुवांरी कन्याओं को सुशील वर तथा विवाहित महिलाओं के दाम्पत्य सुख में वृद्धि होती है। इनकी उपासना से पूर्व संचित पाप तो नष्ट होते ही हैं भविष्य के संताप, कष्ट, दैन्य, दुख भी पास नहीं फटकते हैं। इनका सदा ध्यान करना सर्वाधिक कल्याणकारी है।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।।
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
अतिश्योक्ति ही सही, पर यदि आपको अपने देश से प्यार है तो यह आपको अच्छा लगेगा.
एक पर्यटक पूरी दुनिया घूमने निकला। घूमते-घूमते वह रोम के गिरजा घर जा पहुंचा। वहां उसने एक स्वर्ण जड़ित फोन देखा जिसके पास लिखा हुआ था, एक काल के एक हजार डालर। वह बड़ा अचंभित हुआ कि सिर्फ एक काल के इतने पैसे। उसने वहां पता किया तो उसे बताया गया कि यहां से स्वर्ग में सीधे बात हो सकती है इसीलिए इतनी मंहगी काल है। वहां से वह जर्मनी गया। वहां भी उसे वैसा ही फोन और कीमत दिखी। अमेरिका में भी वही हाल था। योरोप वगैरह घूम वह खाड़ी के देशों में गया तो वहां भी उसे ऐसी व्यवस्था दिखी। अब तो वह जगहों को छोड़ हर देश के धार्मिक स्थलों में ऐसे फोन खोजता फिरा और उसे आश्चर्य हुआ कि चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, चीन हो या जापान, अफगानिस्तान हो या पाकिस्तान, चाहे रूस हो या अमेरिका, विज्ञान की तरक्की के कारण अब सब जगह यह सहूलियत मिलने लग गयी थी।
ऐसे ही घूमते-घूमते वह पर्यटक भारत भी आ तिरुपति जा पहुंचा। उसे जिज्ञासा हुई कि यह तो सब धर्मों को मानने वाला, ईश्वर में गहरी आस्था रखने वाला देश है देखें यहां सीधे स्वर्ग से बात करने की सहूलियत है कि नहीं।
मंदिर में जरा सी कोशिश में ही उसे फोन भी दिख गया। पर वह यह देख आश्चर्यचकित हो खड़ा रह गया क्योंकि वहां एक काल का सिर्फ एक रुपया लिखा हुआ था। ऐसा कैसे हो सकता है ? यही सोचता हुआ वह मंदिर के पुजारीजी के पास गया और बोला, सर दुनिया भर में स्वर्ग में सीधे बात करने के हजारों रुपये लगते मैनें देखे हैं, पर यहां सिर्फ एक रुपया लिखा हुआ है, क्या गल्ति से ऐसा हुआ है?
पुजारी मुस्कुराए और बोले, बेटा तुम भारत में हो, जो अपने आप में स्वर्ग है। सो यहां यह लोकल काल है इसीलिए एक रुपया लिखा हुआ है।
सच है प्रकृति की नियामतों से भरपूर ऐसी जगह और कहाँ है।
ऐसे ही घूमते-घूमते वह पर्यटक भारत भी आ तिरुपति जा पहुंचा। उसे जिज्ञासा हुई कि यह तो सब धर्मों को मानने वाला, ईश्वर में गहरी आस्था रखने वाला देश है देखें यहां सीधे स्वर्ग से बात करने की सहूलियत है कि नहीं।
मंदिर में जरा सी कोशिश में ही उसे फोन भी दिख गया। पर वह यह देख आश्चर्यचकित हो खड़ा रह गया क्योंकि वहां एक काल का सिर्फ एक रुपया लिखा हुआ था। ऐसा कैसे हो सकता है ? यही सोचता हुआ वह मंदिर के पुजारीजी के पास गया और बोला, सर दुनिया भर में स्वर्ग में सीधे बात करने के हजारों रुपये लगते मैनें देखे हैं, पर यहां सिर्फ एक रुपया लिखा हुआ है, क्या गल्ति से ऐसा हुआ है?
पुजारी मुस्कुराए और बोले, बेटा तुम भारत में हो, जो अपने आप में स्वर्ग है। सो यहां यह लोकल काल है इसीलिए एक रुपया लिखा हुआ है।
सच है प्रकृति की नियामतों से भरपूर ऐसी जगह और कहाँ है।
"माँ कालरात्रि", स्वरूप चाहे कितना भी भयंकर हो, पर सदा शुभ फल देती हैं.
माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति "कालरात्रि" के नाम से जानी जाती हैं। इनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। सर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। नासिका से अग्नी की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनके चार हाथ हैं। उपरवाला दाहिना हाथ वरमुद्रा के रूप में उठा हुआ है तथा नीचेवाला अभयमुद्रा में है। उपरवाले बांयें हाथ में कांटा तथा नीचेवाले हाथ में खड़्ग धारण की हुई हैं। यद्यपि इनका स्वरूप अत्यंत भयानक है। परन्तु ये सदा शुभ फल देनेवाली हैं। इसी के कारण इनका एक नाम "शुभंकरी" भी है। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है।
मां कालरात्रि दुष्टों का दमन करनेवाली हैं। इनके स्मर्ण मात्र से ही दैत्य, दानव, भूत-प्रेत आदि बलायें भाग जाती हैं। इनकी आराधना से अग्निभय, जलभय, जंतुभय, शत्रुभय यानि किसी तरह का डर नही रह जाता है।
इस दिन साधक को अपना मन 'सहस्त्रार चक्र में अवस्थित कर आराधना करने का विधान है। इससे उसके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों के द्वार खुल जाते हैं। उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है और अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रीर्भयंकारी।।
मां कालरात्रि दुष्टों का दमन करनेवाली हैं। इनके स्मर्ण मात्र से ही दैत्य, दानव, भूत-प्रेत आदि बलायें भाग जाती हैं। इनकी आराधना से अग्निभय, जलभय, जंतुभय, शत्रुभय यानि किसी तरह का डर नही रह जाता है।
इस दिन साधक को अपना मन 'सहस्त्रार चक्र में अवस्थित कर आराधना करने का विधान है। इससे उसके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों के द्वार खुल जाते हैं। उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है और अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रीर्भयंकारी।।
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