pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 18 अगस्त 2010

भगवान् से भी बड़ा बनने की कामना

कुछ दिनों पहले ऐसे ही बातों-बातों मे एक सज्जन ने एक घटना का जिक्र किया जो हमारे धार्मिकता और ज्ञान पर प्रश्नचिन्ह लगा पूछती है कि कब तक तुम ढोंगियों और पाखड़िंयों के हाथ की कठपुतली बन खुद को बेवकूफ बनवाते रहोगे? सत्संग, विद्वान साधू-संतों के उपदेश, ज्ञानी जनों की वाणियां तो सदा से ही आमजनों का मार्गदर्शन करती आई हैं, पर सर्वसाधारण को भी कम से कम इतना विवेक तो होना ही चाहिए कि वह सच्चे और ढोंगी की पहचान कर सके। हमारी मानसिकता में भगवे वस्त्रों की शुचिता की ऐसी धारणा पैठ गयी है कि इसे धारण करने वाले पर आंख बंद कर विश्वास कर लिया जाता है और इसी का फायदा धूर्त मनस्थिति वाले आसानी से उठा ले जाते हैं।

उन सज्जन ने बताया कि एक शाम उनके शहर से जुड़े गांव में प्रवचन चल रहा था। उत्सुकतावश काम से घर लौटते वह भी दो मिनट के लिए वहां रुक गये। प्रवचन कर्ता महाशय अशोक वाटिका का वर्णन कर रहे थे। पहले उन्होंने यह पंक्ति पढी "स्फटिक शिला बैठी इक नारी ........" अब उस अनपढ, गेरुए वस्त्र धारी को किसने क्या सिखा या समझा कर इस धंधे मे ढकेला यह तो ऊपर वाला ही जानता होगा पर उसने जो व्याख्या की उससे अपना सिर पीट लेने की ईच्छा होती है, पूरी तन्मयता से उसने अर्थ बताया कि "फटी पुरानी साड़ी धारण किए एक औरत बैठी हुई थी........ अब यह असाक्षरता थी या धार्मिक ड़र कि एक भी भला आदमी कुछ नहीं बोला सब हाथ जोड़े जहरास्वादन लेते रहे। यह तो एक दो पंक्ति की बात है। तीन दिनी उस संत समागम में और क्या-क्या कैसे-कैसे कहा गया होगा इसका तो सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है। यह तो एक जगह की बात थी।

आज के अखबार में एक अति व्यस्त तथा स्वंय को जगत गुरु कहलवाने वाले एक "महाराज" की प्रचारक ने संत? को भगवान से भी बड़ा निरुपित कर दिया। उनके अनुसार भगवान ने खुद कहा है कि वह संत समदर्शी हैं मैं उनके पीछे-पीछे चलता हूं मैं उनका गुलाम हूं। प्रवचन करते समय भावार्थ को पीछे ढकेल दिया गया। शब्दों का अर्थ साफ अपनी मंशा जता रहा है।

कुछ समय पहले अपनी लच्छेदार भाषा और हाव-भाव से अपार ख्याति पा जाने वाले कुछ लोगों ने अपने पिच्छलगुओं से अपने को भगवान प्रचारित करवाना शुरू कर दिया था। "स्टेज" पर उनकी मुद्राएं, भाव-भंगिमाएं भी पूरी तरह से ऐसे नियोजित होती थीं कि ड़री, सहमी, तरह-तरह के माया जालों में फंसी, तुरंत किसी करामात के जरिए अपने दुखों से छुटकारा पा जाने को लालायित भूखी नंगी जनता उनकी वाक पटुता और कभी कभी हाथ की सफाई से अचंभित हो उन्हें सचमुच अवतार मानने लग गयी। पर इच्छाएं कहां खत्म होती हैं कामनाएं कहां मरती हैं और फिर इस क्षेत्र में बहुतेरे भगवान हो गये। प्रतिस्पर्द्धा बढ गयी तो फिर "शब्दार्थों" का अस्त्र संभाला गया और अपने आप को भगवान से भी बड़ा साबित करने का मैदान तैयार करना शुरु कर दिया गया। बड़ी चतुराई से अपने मतलब के हिस्से का प्रचार खुद ना कर अपने शिष्यों से शुरु करवा दिया गया जिससे पीछे लौटने की गुंजाईश भी बनी रहे। पर गीता के उस भाग को सफाई से अनदेखा कर दिया गया जिसमें उसी प्रभू ने कहा है कि "मैं इस सम्पूर्ण जगत का धारण-पोषण करने वाला हूं। पिता, माता, पितामह मैं ही हूं। देवताओं का गुरू भी मैं ही हूं। सबका स्वामी भी मैं ही हूं।"

पर भगवान के कहे पर कोई विश्वास नहीं करता। उन तथाकथित स्वयंभू भगवानों पर ज्यादा श्रद्धा है जिन्हें पता चल जाए कि अब भोजन और शीतनियंत्रित अष्टतारा सुविधाओं पर कल से नवग्रहों की साढेसाती पड़ने वाली है तो उनके अपने देवता कूच कर जाएं।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

पूरे २१ दिन और कुछ घंटे लग गए यहाँ वापस आने में

आखिर पूरे 21 दिन और कुछ घंटों के पश्चात सरकारी फोन में जान आ ही गयी। बड़ी गरीब सी चीज हो गया है यह बेचारा। हो क्या गया है बना दिया गया है इसे। नहीं तो सारी कंपनियों को मिलाने के बाद भी जिसके, चाहे मजबूरी मे ही सही, ग्राहकों की संख्या ज्यादा हो उसका यह हाल है कि उसका नाम सुनते ही या तो लोग मुंह बना लेते हैं या फिर उनके चेहरे पर एक अजीब सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ जाती है। फिर रही-सही कसर चलित फोन ने पूरी कर दी है। ऐसे मे यदि बेचारा एक बार जो बिमार पड़ता है तो पहले तो कोई ध्यान ही नहीं देता। कोशिश दर कोशिश के बाद पांच सात बार याद दिलाने पर एक-दो दिनों का आश्वासन का झुनझुना ठेका दिया जाता है।

पता नहीं संचार व्यवस्था में इतनी तरक्की होने के बाद भी फाल्ट खोजने में ही दसियों दिन क्यों लग जाते हैं। चलिए ठीक है आपकी रफ्तार ऐसी ही है तो "उपभोक्ता" को अंधेरे में ना रख कितने दिन लगेंगे ठीक होने में यह बताने की हिम्मत तो रखिए। जिससे वह रोज सबेरे भगवान का नाम लेने के पहले चोंगा उठा-उठा कर इसके ठीक होने की आशा को निराशा मे ना बदलता रहे।

एक बार चारेक महिने पहले भी ऐसा हुआ था और फोन महीने से कुछ दिन कम के लिए कोमा में चला गया था। इस बार भी 24 जुलाई को जो खटिया पकड़ी तो 14 अगस्त को जाकर बिमारी से आजादी पा सका। सोचता हूं कि किसी प्रायवेट सेक्टर वाले की इतनी "हिम्मत" हो सकती है ऐसी जुर्रत करने की। अरे भाई जब बिल जमा करने मे जरा सी देर-सबेर होने पर कनेक्शन काटने की धौंस देते हो तो महीने भर सर्विस ना देने पर उसका भी हरजाना दो। यदि कोई अड़ ही जाए तो अहसान करते हुए इतनी कम रकम की छूट मिलती है कि लेने वाले को भी शर्म आ जाती है। फिर जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह कि रोज ही झिंझोड़-झिंझोड़ कर कहा जाता है "जागो ग्राहक जागो" अरे भैया पहले देख तो लो कि किस खाट पर कोई सोया है ऐसा ना हो कि जागते ही पहले वह खाट ही खड़ी कर दे।

शनिवार, 24 जुलाई 2010

सोने की चिड़िया होने में इसका भी हाथ था.

मेगास्थनिज ने उस काल में यहां विदेशियों की सुरक्षा और उनकी देखभाल के लिये राजा और राज्य के निवासियों की भी बहुत तारीफ की है



भारत यूं ही सोने की चिड़िया नहीं कहलाता था। उस समय राज्य की तरफ से कामगारों को पूरी सुरक्षा तथा उनकी मेहनत का पूरा मुआवजा दिया जाता था। खासकर किसानों को हारी-बिमारी या प्राकृतिक आपदा में भी राजा से पूरा संरक्षण प्राप्त होता था। आखिरकार भूख से लड़ने में वही तो अहम भुमिका अदा करते थे। पेट भरा हो तभी हर काम सुचारू रूप से हो पाता है।

मेगास्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी नरेश सिल्यूकस का राज दूत था। उसने भारत भ्रमण कर यहां के बारे में बहुत सारी जानकारी को लिपिबद्ध किया था। उसने पाया था कि चंद्रगुप्त के समय में चोरियां ना के बराबर होती थीं। किसानों और पूरे खतिहर वर्ग को बहुत सम्मान प्राप्त था। एक तरह से इस काम को पवित्र और पूजनीय माना जाता था। उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा है कि जहां दूसरे देशों में युद्ध के समय खड़ी फसलों को बर्बाद कर दिया जाता था, खलिहानों में आग लगा दी जाती थी जिससे सेना को रसद ना मिल पाए, वहीं भारत में किसानों को युद्ध से जैसे कोई मतलब ही नहीं होता था। युद्धभूमि से कुछ दूरी पर भी किसान अपना कार्य यथावत करते रहते थे। इसीसे रसद की अबाध उपलब्धि सेना और नागरिकों को प्राप्त होती रहती थी। जिससे आपात काल में भी कोई काम ठप नहीं हो पाता था।

मेगास्थनिज ने उस काल में यहां विदेशियों की सुरक्षा और उनकी देखभाल के लिये राजा और राज्य के निवासियों की भी बहुत तारीफ की है।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

आप विराम चिन्ह भेज दें, उनमें शब्द हम खुद डाल दिया करेंगें !!!

विराम चिन्ह, पूर्ण, अर्द्ध या लघु जैसे भी हों यदि सही जगह ना लगे हों तो अर्थ का अनर्थ होना तय है। इनका भाषा को सुधारने या बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ होता है। इसलिए बहुत सोच-समझ कर ही इनका उपयोग करना चाहिए।  इधर का उधर या उधर का इधर लग जाने पर विषय तो विष बन ही सकता है, प्रूफ पढने वालों के दांतों तले भी पसीना आ जाता है, कुछ का कुछ पढ कर, और उसे सही करने में !

एक बार क्या हुआ कि मेरे जैसे एक बंदे ने एक लंबा सा लेख एक पत्रिका को भेज दिया, साथ में एक पत्र भी था जिसमें लिखा था, संपादक महोदय रचना भेज रहा हूं। समयाभाव के कारण विराम चिन्हों का उपयोग नहीं कर पाया हूं, कृपया खुद लगा लें। तुरंत ई-मेल से उन्हें जवाब आया, आइंदा आप विराम चिन्ह ही भेज दिया करें उनके बीच शब्द हम खुद डाल दिया करेंगे।

मुझे लगता है कि कुछ ऐसी ही रचना रही होगी :-
एक गांव में पति पत्नी अपने परिवाए के साथ रहते थे। गांव में काम ना होने के कारण पति को दूसरे शहर जाना पड़ रहा था। जाने के पहले पति ने अपनी पत्नी को आजकल के साक्षर बनाने वाले स्कूल में दाखिल करवा दिया जिससे वह पत्र द्वारा घर की खबर वगैरह उसे भेज सके। एक दिन उसने अपने पति को चिट्ठी लिखी, जो कुछ यूं थी - "मेरे चरण दास मेरा प्रणाम आपके पैरों में। आपने अभी तक चिट्ठी नहीं लिखी मेरी सहेली को। नौकरी मिल गई है हमारी गाय ने। बछड़ा दिया है दादा जी ने। शराब शुरू कर दी है मैंने। तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आए कुत्ते के बच्चे। भेडि़या खा गया दो महीने का राशन। छुट्टी पर आते हुए ले आना एक खूबसूरत औरत। इस वक्त वही गाना गा रही है हमारी बकरी। बेच दी गई है तुम्हारी मां। तुमको याद कर रही है एक पड़ोसन। हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन। सिरदर्द से लेटी है तुम्हारी प्राणों की प्यासी पत्नी।"

पत्र पा कर पति का क्या हाल हुआ होगा, जो समझा कर गया था कि पत्र लिखते समय ऊपर प्रिय प्राण नाथ लिख कर शुरू करते हैं तथा पत्र खत्म करते समय आपके चरणों की दासी लिखते हैं। अब बेचारी घर के काम के टंटों में सब गड़्ड़मड़्ड़ कर गयी तो उसका क्या कुसूर :-)

बुधवार, 21 जुलाई 2010

हाइड पार्क, अपनी तरह का एक ही

हाइड़ पार्क लंदन का प्राचीन और ऐतिहासिक पार्क है। यहां पहले घना जंगल हुआ करता था। जिसमें जंगली जानवरों का बसेरा था। कालांतर में यह शाही परिवार का शिकारगाह बन गया। हेनरी अष्टम के समय से ही इसका रख-रखाव होने लग गया था। फिर चार्ल्स प्रथम ने यहां साफ-सफाई करवा कर इसका उपयोग राजपरिवार के सदस्यों को घुड़सवारी सिखाने मे करना आरम्भ करवा दिया। धीरे-धीरे जंगल को एक सुंदर उद्यान में बदल दिया गया। जहां उच्च कुल के लोग अपनी शामें बिताने आने लगे।



सन 1730 में इस पार्क मे एक झील बनायी गयी जिसका नाम अपने आकार के अनुसार सर्पेंटाइन रखा गया। जो आज भी अपनी सुंदरता से लोगों को खिंचे चले आने पर मजबूर कर देती है।
पर हर चीज बदलायमान है। 18वीं सदी में एक समय ऐसा भी आया जब यह पार्क आतंक का पर्याय बन गया। अंधेरा होते ही यहां डकैतों तथा अपराधियों का जमावड़ा होने लगा। शाम होने के बाद कोई भी व्यक्ति इधर आने की हिम्मत नहीं करता था। धीरे-धीरे कानून व्यवस्था मे सुधार आया और महारानी विक्टोरिया के समय में यह वक्ताओं को अपने भावों को प्रगट करने का भाषण स्थल बन गया जो आज तक चला आ रहा है।


इस पार्क के एक कोने को इस काम के लिए निश्चित कर दिया गया तथा इसे "स्पीकर्स कार्नर" के नाम से जाना जाने लगा। इसकी विशेषता यह है कि यहां होने वाले भाषणों को सूचित या प्रसारित नहीं किया जाता। वक्ता अपने आप आता है और श्रोता भी। मजेदार बात यह है कि एक ही समय पर भिन्न-भिन्न विषयों पर सभाएं होती हैं, जिस की जैसी रुचि होती है वह वैसी ही सभा का सदस्य बन जाता है। जैसा कि आज के मल्टिपलेक्सों में विभिन्न स्क्रिनों पर दिखायी जाने वाली विभिन्न फिल्मों के साथ है। हां यहां पैसे खर्चने पड़ते हैं, हाइड पार्क में सब कुछ मुफ्त होता है।

करीब छह सौ एकड़ के इस पार्क में आज हर तरह के मनोरंजन का सामान मौजूद है। नौका विहार, घुड़सवारी, फूलों का उद्यान, तैरने तथा नौका विहार की सुविधा, रात में युवाओं की विलासिता का अड्डा और भी ना जाने क्या-क्या समेटे यह पार्क मशहूर है पूरी दुनिया में।
अपनी तरह का अकेला और अनोखा पार्क है यह दुनिया का ।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

पापी मरता नहीं, खँडहर ढहता नहीं. आम इंसान चुप है भगवान कि माया मान

अरसा पहले समय ही कुछ और था। कैसे-कैसे नेता थे। अपने कर्म के प्रति समर्पित, देश के प्रति न्योछावर, आम आदमी से अपनत्व की हद तक जुड़े हुए।

समय बदला। नेता की परिभाषा बदली। मैं ही मैं हूं। बाकि सब कीड़े-मकौड़े। घर भर लो जैसे भी हो। देश, जनता यह सब ढकोसला हम से नहीं होता। जो करेंगें अपनी मर्जी से। हमसे देश है देश से हम नहीं।

फिर ढेर सा पानी बह गया गंगा में। नेताई दृष्टिकोण भी फैशन की तरह बदल गया। खुद कुछ भी करो। तुक्के से सही हो गया तो चमचों से पीठ थपकवालो, बिना शर्म मुंह मियां मिट्ठू बनते रहो। गलत हो जाए तो बिना देर किए दुसरों पर इल्जाम थोपते रहो। खुद पाक-साफ।

एक उदाहरण :
वर्षों पहले एक ट्रेन दुर्घटना हुई थी। तत्कालीन रेल मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने इस्तीफा दे दिया था। सारी जिम्मेदारी खुद लेते हुए। क्या पड़ी थी? ना कोई विरोध हुआ था ना कोई शिकायत। पर अगले की अंतरात्मा ने पद पर बने रहना स्वीकार नहीं किया था।

फिर दुर्घटना घटी। इस बार श्रीमान लालू प्रसाद यादव विराजमान थे रेल मंत्री के पद पर। उन्होंने तो जो कहा सो कहा उनकी धर्मपत्नी उनके आड़े वक्त सामने आ बोलीं, इतना बड़ा देश में इतना ठो गाड़ी चलता है, साहब हर गाड़ी मे थोड़े ही बैठ कर सब कुछ देखेंगे।

समय चलता गया। मौका मिला बंगाल की बहन को जिसने इस पद पर कब्जा जमा इसे अपनी महत्वकांक्षा का जरिया बना ड़ाला। रेल हमारे यहां अभिशप्त है। फिर दुर्घटनाएं घटीं और हर बार सीधी सरल दीदी ने साफ साफ कह दिया कि यह सब विपक्ष करवा रहा है। यानि तुम्हारी आपस की लड़ाई में इंसान की कोई कीमत ही नहीं है। उन्हीं बेवकूफों की जिनके मतों को लेकर तुम इस झगड़े के लायक बने हो।

पता नहीं क्यूं हमारे इतने आस्थावान देश में पापी मरता नहीं खंड़हर ढहता नहीं। आम इंसान रो-धो कर सब भगवान की माया मान क्यों चुप हो जाता है?

सोमवार, 19 जुलाई 2010

एक छत्तीसगढ़ी लोक कथा, मार के आगे भूत भागा.

प्राचीन काल से ही हमारे पूरे देश में लोक कथाओं, गीतों, पहेलियों तथा लोकोक्तियों इत्यादि द्वारा गूढ से गूढ बातों को सरलता से समझाने की परंपरा रही है। खासकर कथा-कहानियां सदा से रोचक, भावप्रद तथा शिक्षापूर्ण होती हैं। ऐसी ही एक छत्तीसगढी लोक कथा हिंदी में प्रस्तुत है, जिसमें हास्यरस, आस्था, साहस, सूझबूझ और शिक्षा का समावेश है।

एक गांव के बाहर एक वट वृक्ष पर एक भूत रहा करता था। एक दिन कुछ गांव वालों ने पेड़ के आसपास गंदगी फैला दी। भूत इससे नाराज हो गया और उसने सारे गांव वालों को मार ड़ाला। इसी बीच गांव का एक लड़का जो अपने ननिहाल गया हुआ था, लौट कर आया तो उसने सारे गांव को सुनसान पाया। उसे कुछ समझ नहीं आया पर रात हो रही थी सो वह अपने घर के अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद भूत घूमता-फिरता वहां आया और लड़के को देख बोला, तू कौन है जो यहां घुस आया है? मैने सारे गांव वालों को मार दिया है। तुम्हें भी मार ड़ालूंगा। मुसीबत सामने देख कर भी लड़का घबराया नहीं अपनी बुद्धी से काम लेते हुए उसने भूत से कहा, मामा मैं बहुत दिनों बाद घर लौटा हूं। थक भी बहुत गया हूं, अपने घर में मुझे थोड़ी सी जगह दे दो। मेरी मां कहा करती थी कि मामा का दिल बहुत बड़ा होता है। मुझ पर दया करो। भूत को लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे घर में रहने की अनुमति दे दी।

इधर भूत को रोज ब्रह्माजी के यहां हाजिरी देने जाना पड़ता था। एक दिन लड़के ने उससे पूछा, मामा तुम रोज-रोज कहां जाते हो ?
मुझे रोज हाजिरी देने ब्रह्माजी के दरबार में जाना पड़ता है। भूत ने जवाब दिया।
अच्छा इस बार जाओ तो ब्रह्माजी से कह कर मेरी उम्र बढवा देना। भूत मान गया। पर दूसरे दिन उसने बताया कि वहां कहा गया है कि जिसकी जितनी उम्र होती है वह ना तो कम की जा सकती है नाहीं बढाई जा सकती है। लड़के ने सोचा कि जब दुनिया को बनाने वाले ब्रह्माजी भी किसी की उम्र कम ज्यादा नहीं कर सकते तो यह भूत मुझे कैसे मार सकता है। यह सोच एक दिन जब भूत ऊपर गया हुआ था तो लड़के ने एक मजबूत लाठी ली और भूत का इंतजार करने लगा। भूत के आते ही उसने लाठी से उसको मारना शुरु कर दिया। भूत इस अचानक आक्रमण से ड़र कर जो भागा तो फिर कभी लौट कर नहीं आया।

जैसे उस लड़के के दिन फिरे, सबके फिरैं।

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