pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 1 जून 2010

तंग आ कर नूरे ने लड़का किडनैप किया, पर :-)

हमारा नूरा जब से दिल्ली घूम कर अपने पिंड़ लौटा है तब से उसे शहर में कुछ करने का कीड़ा काट गया है। गांव के अपने तीनों लंगोटियों के साथ माथा पच्ची करने के बाद वे चारों इस नतीजे पर पहुंचे कि मां-बाप पर बोझ बनने से अच्छा है कि एक बार चल कर किस्मत आजमाई जाए।
हिम्मत है, लगन है, पैसा है, मेहनती हैं, भगवान जरूर सफल करेगा। पर सामने सवाल था कि करेंगे क्या?
अपने नूरा ने बताया कि दिल्ली में इतनी गाड़ियां हैं कि आदमी तो दिखता ही नहीं। गाड़ी पर गाड़ी चढी बैठी है। समझ लो जैसे अपने खेतों में धान की बालियां। अब जैसे इतने बड़े खेत में एक ही पानी का पंप होता है वैसे ही वहां गाड़ियों के लिए दूर-दूर पेट्रोल पंप होते हैं। अरे लाईनें लग जाती हैं, नम्बर नहीं आता। हम पेट्रोल पंप खोलेंगे।
पर लायसेंस कैसे मिलेगा? एक सवाल उछला।
घबड़ाने की बात नहीं है। वहां सिन्धिया हाऊस में मेरे मामाजी रहते हैं। बहुत पहुंच है उनकी, क्या वे इतना सा काम नहीं करवा पायेंगे। जवाब भी साथ-साथ आया।
बात तय हो गयी। चारों चौलंगे पहुंच गये दिल्ली। दौड़ भाग शुरु हुई, पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी कोटे में एक पंप का आवंटन बचा है। सारे खुश। पहुंचे इंटरव्यू देने। पूछा गया कि आपके परिवार में किसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था?
नूरे ने जवाब दिया "जनाब, और परिवारों में तो कोई एक ऐसा बंदा होता है जिसने देश के लिए जान कुर्बान की हो। मेरे परिवार में तो ऐसा बंदा खोजा जाता है, जिसने अपनी मातृभूमि के लिए खून ना बहाया हो.......................

फटाफट सारी औपचारिकताएं निपटा दी गयीं और इन चारों भोले बंदों ने जनता के हित को ध्यान में रख ऐसा इंतजाम किया कि इनके काम से रास्ता वगैरह जाम ना हो और पंप खोल दिया गया।
आश्चर्य हफ्ता भर बीत गया पर एक भी ग्राहक नहीं आया।
क्यूं ? क्योंकि भोले बंदों ने पंप पहली मंजिल पर खोला था।

पर जो हिम्मत हार जाए वह नूरा कैसे कहलाए।
उद्यमी बंदों ने सोच विचार कर उसी जगह एक रेस्त्रां का उद्घाटन कर दिया। पर भगवान की मर्जी यह भी ना चला।
अब क्या हुआ था, कि ये पेट्रोल पंप का बोर्ड़ हटाना भूल गये थे। हां बोर्ड़ बदल कर काम किया जा सकता था। पर जिद। जिस काम ने शुरु में ही साथ नहीं दिया वह काम करना ही नहीं। यह जगह ही ठीक नहीं है। ऐसा सोच सब बेच-बाच कर इस बार चारों ने एक सुंदर सी मंहगी गाड़ी खरीदी जिसे टैक्सी के रूप में चला कर पैसा कमाया जा सके। गाड़ी आ गयी पूजा-पाठ कर सड़क पर उतार दी गयी। पर फिर दिन पर दिन बीत गये एक भी सवारी इन्हें नहीं मिली। कारण ? चारों भोले बंदे, दो आगे, दो पीछे बैठ कर ग्राहक ढूंढने निकलते रहे थे।

हद हो गयी। यह शहर शरीफों का साथ ही नहीं देता। ईमानदारी से इतने काम करने चाहे, किसी में भी कामयाबी नहीं मिली। ठीक है हमें भी टेढी ऊंगली से घी निकालना आता है।
अब चारों मित्रों ने गुनाह का रास्ता अख्तियार करने की ठान ली। दूसरे दिन रात को सारा प्लान बना एक लड़के को अगवा किया गया। एकांत में ले जा उससे कहा कि घर जाए और अपने बाप से चार लाख रुपये देने को कहे ऐसा ना करने पर तेरी जान ले ली जाएगी यह भी बता देना।
लड़का घर गया, अपने बाप को सारी बात बता दी। लड़के के बाप ने पैसे भी भिजवा दिए।
अरे!!!! ऐसा कैसे भाई?
ऐसा इसलिए क्योंकि लडके का बाप भी तो भोला बंदा ही था ना। :-) :-) :-)

सोमवार, 31 मई 2010

मेरी खिचडी और अटलबिहारी बाजपेयी जी के गुलाबजामुन

ललित जी तो निकल लिए चुपचाप दिल्ली क लिए । अपन रह गये वहीं के वहीं वह भी महज एक जिद के कारण। अच्छी भली 6x2 की चलायमान सरकारी जगह भी आरक्षित थी, दिन भी निश्चित था, कार्यक्रम भी बना पड़ा था बस जबान धोखा दे गयी। खुद तो कह कर भीतर घुस गयी मुसीबत झेलनी पड़ी सारे शरीर को।

क्या है कि किसी ग्रह चक्कर के झांसे में आ मुंह से निकल गया कि आफिस में बहुत काम है मेरा जाना नहीं हो सकेगा। बस! फिर लाख मनुहारें हुईं, समझाइशें दी गयीं, पर इधर जो कह दिया सो कह दिया की तर्ज पर अपनी बीन बजाते रहे। बाद में जाने के समय "ईनो" के विज्ञापन की तरह हमने लाख हाथ हिलाए पर उधर यही समझा जाता रहा कि "बाय-बाय" हो रही है, और सब जने 1 2 3 ।

अब किस्सा कोताह यह कि एक जिद के कारण नहीं गये तो संसार की हर शह पिल पड़ी हमारे ऊपर। शरीर का कोई पुर्जा टेढा हुआ और पूरा का पूरा सिस्टम ऐंड़-बैंड़ हो कर रह गया।

अब शुरू होता है "खुदा का सेंस आफ ह्युमर।"
घर पर पदार्पण होता है मेरे मित्र त्यागराजन जी का।
"अरे!! शर्मा जी, क्या हाल बना रखा है? क्या हो गया? शुक्रवार तक तो ठीक थे।" जब उन्हें सारी बात बताई तो बोले " चिंता की कोई बात नहीं है। इधर-उधर का खाना बंद करें। दोनो समय मेरे यहां से खाना पहुंच जाएगा। वैसे क्या खायेंगे" फिर खुद ही बोले "तबियत ठीक नहीं है तो एक समय तो खिचड़ी ठीक रहेगी। सब्जी कौन सी खाते हैं?" मैंने कहा ऐसी कोई बात नहीं है मैं हर सब्जी खा लेता हूं। वे बोले नहीं नहीं फिर भी? क्या बोलूं ना बोलूं, मुंह से लौकी निकल गया। सारा मामला फिट।

अब जो मंगलवार से खिचड़ी और लौकी शुरु हुई तो रवीवार आ गया। मैं संकोच के मारे कुछ बोल नहीं पा रहा था। आप सब मेरी हालत का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। आखिर भगवान को ही मेरे हाल पर दया आई। रवीवार मेरे पास आते ही उन्होंने कहा कि गीता (उनकी श्रीमती जी) कह रही थीं कि भाई साहब एक ही चीज रोज-रोज कैसे खाते हैं, उनको बदलने को पूछो। यह सुन मैंने कहा भाई मेरे आप जो प्रेम से ला रहे हो, खिला रहे हो, मैं खा रहा हूं। आप बदल देंगे तो मेहरबानी।
वे बोले, चलिए कल से आयटम बदलेंगे।

मैंने भी राहत की सांस ली और संकल्प किया कि धोनी जैसे कल के लड़के चाहे विज्ञापनों में कितना भी चिल्लायें, जिद करो, जिद करो। अपन ने फिर कभी जिद नहीं करनी।

इसी संदर्भ में श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के साथ घटी एक घटना याद आ गयी, जो उन्होंने ही कभी अपने अनुभव बांटते समय बताई थी।
एक बार वे महाराष्ट्र के दौरे पर थे। पहले दिन उन्हें नाश्ते में, दोपहर के भोजन में तथा रात्रि के समय भी खाने के साथ गुलाबजामुन परोसे गये। उन्हें कुछ अजीब तो लगा पर सौजन्यवश कुछ बोले नहीं। दूसरे दिन दूसरी जगह भी बार-बार वही गुलाबजामुन की मिठाई मिली फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन जब तीसरे दिन भी वही गुलाबजामुनी हादसा पेश आने लगा तो उनसे नहीं रहा गया। यथासंभव प्रेम से उन्होंने पूछा कि क्या महाराष्ट्र में गुलाबजामुन ही अत्यधिक प्रिय मिठाई है? तो जो जवाब उन्होंने पाया उसे सुन वह हंसते-हंसते लोट-पोट हो गये। उन्हें बताया गया कि केंद्रीय कार्यालय से आपकी पसंद के बारे में एक पत्रक आया था जिसमें लिखा था कि आपको गुलाबजामुन बहुत प्रिय हैं, सो.............
बाजपेयी जी ने हंसते हुए बताया कि मैंने लौट कर पहला काम यही किया कि मेरी पसंद नापसंद को कार्यालय से भेजने की मनाही कर दी।

रविवार, 30 मई 2010

यकीन नहीं होता कि नूरा जैसे लोग होते हैं ?

आज रवीवार है। आज आपको एक प्यारे से भोले से बंदे के बारे में बताता हूं। इनका नाम है नूरा। ये बड़े पिंड के रहने वाले हैं। इनकी खासीयत है कि ये जो भी काम हाथ में लेते हैं उसे पूरा करते हैं। चाहे कुछ भी हो जाए। चाहे लोग मजाक बनाएं या हसीं उड़ाएं ये मस्त रहते हैं।

आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि इनके भोलेपन से एक ऐसा चुटकुला बन गया जिसको भाई लोगों ने जगह और किरदार बदल-बदल कर सैंकड़ों बार सैंकड़ों जगह फिट कर दिया है। पर असल में हुआ यह था कि ये जहां रहते हैं वहां अभी भी यात्री बस दिन में चार बार ही गुजरती है तो लोग उनके नंबर वगैरह से नहीं उनके क्रम से ही उन्हें अपनी सुविधानुसार काम में लेते हैं। पहली, दूसरी, तीसरी ईत्यादि के रूप में।

तो जनाब एक बार नूराजी के कोई संबंधी दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में भर्ती थे। इन्हें आना पड़ा था। ये नई दिल्ली स्टेशन से पूछते पूछाते क्नाट प्लेस आए और वहां से एक आफिस जाते इंसान ने इन्हें बताया कि 342 नं की बस मूलचंद अस्पताल जाएगी। शाम को उसी आदमी ने अपने दफ्तर से लौटते हुए इनकी खास भेषभूषा की वजह से इन्हें पहचान और वहीं खड़े देख पूछा कि आप अभी तक यहीं खड़े हो तो तो इन्होंने खुश हो कहा कि बस 340 बसें निकल गयी हैं मेरी वाली भी आती होगी।

और यह पहली बार नहीं हुआ था। युवावस्था का सूर्य उदय होते-होते इन्हें एक कन्या अच्छी लगने लगी थी। पर वह इन्हें टरकाती रहती थी। इनके भोलेपन का फायदा उठा अपनी जरूरतें पूरी करती रहती थी। पर जब इनके प्रस्ताव बढने लगे तो उसने एक फरमाइश रख दी कि मुझे "क्रोकोडाइल बूट" ला कर दो तब मैं तुम्हारी बात सुनुंगी। अब क्या था नूराजी चल दिए जंगल के दलदल की ओर। एक दिन, दो दिन हफ्ता बीत गया। घर में हड़कंप मच गया कि लड़का गया तो कहां गया। खोज खबर हुई तो बात का पता चला। सब लोग जंगल पहुंचे तो देखते क्या हैं कि आठ-दस मगरमच्छ मरे पड़े हैं और नूरा एक और पर निशाना साधे बैठा है। लोगों ने कहा अरे तू कर क्या रहा है ? तो पता है इन्होंने क्या जवाब दिया, अरे मुझे इनके बूट चाहिये थे और ये सारे के सारे नंगे पैर ही घूम रहे हैं।
अब बताइये इतना भोला इतना लगन का पक्का इंसान आपने देखा है कभी। क्या ! देखा नहीं सिर्फ सुना है। ऐसा, तो चलिए इस बार चलते हैं बड़े पिंड।

शनिवार, 29 मई 2010

संवेदना ख़त्म हो चुकी है हमारे में !!!

कभी बेंगलूर, कभी दिल्ली, कभी हवाई जहाज, कभी बस, कभी रेल !
वही वहशत, वही दरिंदगी, वही हैवानियत, वही बेगुनाहों की लाशें, वही मौत का नंगा नाच। वही आंकड़ों का जमा -खर्च । वही नेताओं के रटे-रटाए जुमले। वही दी जाने वाली धन राशि का ऐलान।
जो मरे और जो सैकडों की तादाद मे घायल हुये, क्या कसूर था उनका। कभी पलट कर कोई उनकी सुध नहीं लेता। कोई नहीं पूछता कि किस खता की सजा उन्हें दी गयी। हां अपनी दुकान चमकाने बरसाती मेढकों की तरह कुछ जाने कुछ अनजाने चेहरे जरूर इर्द-गिर् मंड़राने लग जाते हैं कैमरों के सामने। जिन्होने यह सब किया वे तो जो हैं वो तो दुनिया जानती है। पर दुनिया जो शायद नहीं जानती वो यह है कि हम संवेदनहीन हो गये हैं। कोई व्याधि हमें नहीं व्याप्ति। हमारा विरोध सिर्फ़ चैनल बदल-बदल कर और ज्यादा रोमांचक दृश्य देखने तथा मुंह से अफ़सोसजनक शब्द निकालने तक ही रह गया है। हम सब दो मिनट देख अफसोस के दो शब्द बोल, सरकार के सिर जिम्मेदारी मढ किसी और चैनल की तरफ बढ जाते हैं।
क्योंकि संवेदना खत्म हो चुकी है हमारे दिलों में !!

शुक्रवार, 28 मई 2010

आप के यहाँ भी बी.एस. एन. एल. है, भाई आप भी हिम्मती हैं.

कुछ दिनों पहले सरकारी फोन 45 दिन तक कोमा में रहा था। डेस्क-डेस्क, केबिन-केबिन के यंत्रं पर पुकार लगायी पर वे भी तो अपने आकाओं से कम कहां है, सब मशीनी आवाज लिए बैठे होते हैं। सब को हिलाया, डुलाया, झिंझोड़ा पर सरकारी कछुआ अपनी चाल चलता रहा। हां इतना बदलाव जरूर आया है कि भाषा बदल गयी है। काम अपने समय पर ही करना है पर सांत्वना उड़ेल के रख दी जाने लगी है।

किसी और कंपनी का होता तो वहां हड़कंप मच गया होता। पर यहां किसे परवाह ग्राहक जाता है तो जाए ना जाए तो अपनी बला से।पर एक बात है फोन काम करे ना करे बिल जरूर दो दिन पहले टपका दिया जाता है। अब बिल की भी सुन लीजिए। हम जिसे सुविधा समझ सरकार के अहसानमंद होते हैं कि उसने जगह-जगह पैसे जमा कराने की सहूलियत दे रखी है, वह भी बार-बार चलावा ही नजर आता है। ऐसी ही एक जगह है पोस्ट आफिस जहां आप फोन का बिल जमा करवा सकते हैं। पर इस आफिस और उस आफिस का 36 का आंकड़ा है। दोनों का तालमेल ही नहीं बैठ पाता। पहले भी ऐसा तीन-चार बार हो चुका है कि पोस्ट आफिस में निर्धारित समय के पहले पैसे जमा कराने के बावजूद पता चलता है कि आपका बिल जमा नहीं हुआ है। पोस्ट आफिस वाले कहते हैं कि हम अंतिम तारीख के दो दिन पहले ही पैसा भेज देते हैं। उधर वाले इल्जाम लगाते हैं कि पैसा पहुंचा ही नहीं। आप दौड़ते रहिए इस से उस तक। भले ही आपने समय पर अपना काम कर दिया हो पर सरकार की नजर में आप अपराधी हैं और उसका फल होता है फोन की आक्सीजन बंद हो जाना। इस महीने फिर वही लंका कांड़ दोहराया गया। पैसे जमा होने के बावजूद दोषी ठहराना उनका फर्ज बनता था, उन्होंने अपना काम किया। अब अपने को सिद्ध करना अप्प का काम था तो करते रहिये। उसके लिए आप बिमार हों, काम-काज का बोझ हो या कोई भी कारण हो उससे किसी को कोई मतलब नहीं। और ऐसा भी नहीं है कि जहां आपने पैसा जमा करवाया है वहीं आपका काम हो जाएगा नहीं अपने को दोष मुक्त कराने एक स्पेशल आफिस में एक स्पेशल आफिसर के सामने अपने स्पेशल समय पर हाजिर हो विनम् स्वर में प्रार्थना करनी होगी कि गलती मेरी नहीं है।

अरे भाई जब आप लोगों में ताल-मेल नहीं है तो क्यों जगह-जगह पैसे बटोरने की दुकान लगाए बैठे हो एक ही जगह रखो ताकि आदमी एक ही बार सूली चढे। और या फिर अपनी भूल, गलती, लापरवाही जो भी है उसका हरजाना दो। ऐसे ही कोई सिरफिरे पहाड़ के नीचे ऊंट आगया तो फिर जै राम जी की हो जाएगी।

पर ऐसे एक दो किस्सों से किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है?

गुरुवार, 27 मई 2010

मेरे नीचे शेरों का शाह सोया हुआ है.

मैं शेरशाह सूरी का मकबरा हूं।

वही शेरशाह जिसके बचपन का नाम फरीद था पर जिसने युवावस्था में ही एक आदम खोर शेर को मार यह नाम हासिल किया था। वैसे भी वह शेरों का शेर था।   यह वही   शेरशाह था जिसने मुगल सल्तनत को झकझोर
कर रख दिया था। यह वही शेरशाह था जिसके ड़र के मारे हुमायूं को फारस भागना पड़ा था। सिर्फ पांच साल के शासन काल में ही उसने ऐसा कुछ कर दिया कि चाह कर भी इतिहासकार उसे नजरंदाज नहीं कर पाते हैं। पर मेरा यह मानना है कि उसे इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिली जिसका वह हकदार था।

अपने छोटे से शासन काल में उसने हिंदू-मुस्लिमों में कभी भेदभाव नहीं बरता। उसकी नजर में सच्चे मुसलमान का अर्थ था जिसमें ईमान कूट-कूट कर भरा हो। यही कारण था कि हुमायूं को हराने वाला कट्टर शत्रु होते हुए भी अकबर ने उसके सुझाए मार्ग पर  चल  कर  ही   भारत  में  मुगल साम्राज्य की नींव 
पुख्ता की. शेरशाह सदा अपने प्रजा जनों के हित में सोचा करता था।         तभी तो संभवत दुनिया में पहली बार करीब ढाई हजार मील लंबी सड़क का निर्माण उसके शासन काल में हुआ। सिर्फ सड़क ही नहीं बनाई उसके रख-रखाव का भी पुख्ता इंतजाम करवाया। सड़क के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाए, प्याऊ बनवाए तथा विश्राम के लिए सरायों का भी इंतजाम किया।

अब मैं अपने बारे में बताता हूं। मैं बिहार के सासाराम शहर के पश्चिमी भाग में एक झील के मध्य में स्थित हूं। मेरा निर्माण शेरशाह की मृत्यु के तीन महीने बाद उसके पुत्र इस्लाम शाह ने करवाया था। पर कहते हैं कि मेरा नक्शा खुद अपने जीवनकाल में शेरशाह ने तैयार कर लिया था। उसका प्रमाण भी है इस झील का निर्माण जो हिंदुओं के मंदिरों की परिकल्पना है और भवन मुस्लिम स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। शेरशाह वीर तो था ही कलाप्रेमी भी था। इसकी गवाह हैं मेरी बड़ी-बड़ी खिड़कियों में बनी नक्काशीदार जालियां जो विबिन्न आकारों और रूपों में बनाई गयी हैं। कभी पधार कर देखें कि उन्होंने मेरी शोभा में कैसे चार चांद लगा रखे हैं। मेरे अंदर शेरशाह की कब्र के अलावा चौबीस और कब्रें भी हैं जो उसके मित्रों और अधिकारियों की हैं। सभी पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं।

मेरा गोलाकार स्तूप, जो पांच सौ सालों से प्रकृति की मार झेलते हुए भी सर उठाए खड़ा है, ढाई सौ फुट चौड़ा और डेढ़ सौ फुट ऊंचा है। झील से मकबरे तक आने के लिए एक पुल बना हुआ है जिस पर पैर रखते ही आपके और मेरे बीच की दूरी खत्म हो जाती है। मकबरे में ऊपर जाने के लिए सीढियां बनी हुई हैं। मेरे आसपास का दृष्य भी बहुत मनमोहक है, हरियाली की भरमार है। मेरी देखरेख करने के लिए जो रक्षक है वही यहां सदा एक शमा जलाए रखता है और समय-समय पर नमाज अता करता है। वैसे आजकल मेरी पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार ने संभाल रखी है।

कभी भी बिहार आने का मौका मिले तो शेरों के शाह को याद करने और उसकी निशानी के तौर पर मुझे देखने जरूर आईयेगा।

खुदा हाफिज।

सोमवार, 24 मई 2010

उनके जीते-जी मरने की खबर छप गयी

बात उन सांध्य पर्चों की नहीं हो रही है, जो बिक्री बढाने के लिए दो पन्नों के पर्चे में हेड़िंग दे देते थे "हेमा मर गयी" और नीचे छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा रहता था कि फलाने सर्कस की हथिनी हेमा का इंतकाल हो गया। बात हो रही है बड़े अखबारों की, जिनमें पता नहीं कैसे कभी-कभी बड़े नामवर लोगों के मरने की खबरें छप जाती हैं जिससे अजिबोगरीब स्थितियां बन जाती रही हैं।

ऐसे ही एक दिन जब जार्ज बनार्ड़ शा ने सबेरे वेस्ट अफ्रीकन पाइलोट अखबार उठाया तो उसमें अपने मरने की खबर पढी। उन्होंने उसी समय संपादक को फोन किया कि महाशय आपके पत्र में मेरे मरने की खबर है पर मैं आपको यह बता दूं कि मैं अभी मरा नहीं अधमरा हूं।

एक बार रूड़यार्ड़ किपलिंग की मृत्यु का शोक समाचार एक अखबार में छप गया। पहले तो किपलिंग आश्चर्चकित रह गये, फिर उन्होंने अखबार के संपादक को एक पत्र लिखा कि आपका पत्र सदा सच का पक्षपाती रहा है तो जो मेरे मरने की खबर छपी है वह सत्य ही होगी। अब जब मैं रहा ही नहीं तो अपने अखबार से मेरी सदस्यता खत्म कर दें। संपादक की हालत का अंदाज लगाया जा सकता है।

आस्कर वाइल्ड़ को भी ऐसी खबर से दो-चार होना पड़ा था। खबर पढते ही उन्होंने संबंधित अखबार के संपादक को फोन किया कि यार कैसी-कैसी खबरें छाप देते हो?सपादक जो उनका मित्र था उसने मजाक में तुरंत पूछा, वाइल्ड़ पहले यह बताओ तुम बोल कहां से रहे हो, स्वर्ग से या जमीन से ?

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