pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

क्या ऐसे भी भुखमरी दूर होगी ?

खबर कुछ पुरानी है फिर भी ध्यान देने लायक है कि भुखमरी से निजात पाने का रास्ता बिहार सरकार ने ढ़ूंढ़ निकाला है। अब लोगों को चूहे का मांस खाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। जल्दी ही सड़क छाप ढाबों पर चूहे के मांस से बनने वाले उत्पाद, जैसे रैट टेल पास्ता, रैट कीमा, रैट बर्गर इत्यादी मिलना शुरु हो जायेंगे।

बिहार में मुसहर नाम की जाति है, जो चूहों का भक्षण करती है। यह शायद दुनिया की सबसे पिछडी जातियों मे से एक है। बिहार सरकार के अनुसार चूहे के मांस को खाद्य रूप में बढ़ावा देने से मुसहरों के उत्थान का रास्ता खुल जाएगा {पता नहीं कैसे}। बिहार के समाज कल्याण विभाग ने दावा किया है कि सरकार के इस कदम से मुसहर समुदाय आगे बढ़ेगा और अमीर हो जायेगा {लगता है चुनाव नजदीक हैं}। चूहे जो देश का पचास प्रतिशत अनाज चट कर जाते हैं उसकी बचत होगी। सभी को भरपूर प्रोटीन मिल पाएगा। उनके अनुसार यदी इसे सही तरीके से प्रचारित किया जाए तो देश की खाद्य समस्या का हल निकल जायेगा। इसके लिए फ़ूड फ़ेस्टिवल का आयोजन करने की योजना बनाई जा रही है। विदेशों के चूहामार होटलों से संपर्क किया जा रहा है इस जीव के मांस को स्वादिष्ट बनाने के तरीकों को जानने के लिए। रसूख वाले लोगों ने अपने लगे-बंदों द्वारा संचालित एन जी ओ से करोड़ों रुपये खर्च कर चूहा गणना करवाई जिससे पता चला कि देश में आठ अरब चूहे हैं और उनकी प्रजनन क्षमता अद्भुत है {लो भाई ऐश हो गयी। हां पैसे का हिसाब मत मांगियेगा} सो सप्लाई की कोई कमी नहीं रहेगी।

तो अब गाय, बकरी, भेड, कुत्ता, बिल्ली, चिडीयां, तोते, मछली, केंकडे और ना जाने क्या-क्या के साथ चूहों का नाम जुडने जा रहा है।इसके बाद शायद तिलचट्टों का नंबर होना चाहिए, क्योंकी वे तो खरबों की सख्या में मौजूद हैं।

क्या ख्याल है आप का?

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

विश्वास करें तो पूरा करें :-)

विश्वास करें तो पूरा करें, नहीं तो न करें :-)

दो दोस्त जंगल में ट्रैकिंग के लिये गये। अचानक एक बेहोश हो कर गिर पड़ा और मर गया, दूसरे ने घबड़ा कर मोबाईल से हेल्प लाईन पर फोन कर मदद मांगी कि मेरा दोस्त घने जंगल में मर गया है मुझे सहायता की जरूरत है। उधर से पूछा गया कि क्या तुम्हे विश्वास है कि वह मर गया है। फोन पर एक पल की चुप्पी के बाद गोली चलने की आवाज आई,
फिर जवाब आया, हां।

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तीन दोस्तों को जंगल में घूमते-घूमते रात हो गयी और वे रास्ता भूल गये। पहले ने प्रार्थना की कि हे प्रभू किसी भी तरह मुझे घर पहुंचा दो, घर पर सब चिंता कर रहे होंगे। प्रभू ने उसकी बात सुनी और वह वहां से गायब हो घर पहुंच गया। दूसरे ने भी अपने भगवान को याद कर इस मुसीबत से छुटकारा मांगा, वह भी गायब हो अपने घर पहुंच गया। अब तीसरा डर के मारे रोने लगा। उसको रोता देख आकाशवाणी हुई कि बच्चे क्यों रो रहा है, बोल मैं तेरी क्या सहायता करूं। ये बोला प्रभू बहुत डर लग रहा है मेरे दोस्तों को मेरे पास भेज दो। अगले पल ही उसकी इच्छा पूरी हो गयी।

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एक भला आदमी रात में दुर्घटना ग्रस्त हो खाई में गिर पडा। गिरते हुए किसी तरह उसके हाथ में एक पेड़ की डाल आ गयी जिसे पकड़ कर वह लटक गया और चिल्लाने लगा कि कोई है मुझे बचाओ। उसे इस हालत में देख भगवान को दया आ गयी और आकाशवाणी हुई कि बच्चे जिस डाल को पकड रक्खा है उसे छोड दे तेरे नीचे जगह है बचने की। उस भले आदमी ने आवाज सुनी, फिर दूसरी तरफ़ मुंह कर चिल्लाया,
अरे कोई है, मुझे बचाओ!!!

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

कुत्तों ने "शोले" देखी. पर क्या देखी !!!

तकरीबन 35 साल पहले फिल्म “शोले" ने जो तहलका मचाया था उसकी तपिश, उसका सरूर अभी तक लोग भुले नहीं हैं। इंसान तो इंसान जानवरों पर भी उसका जादू सर चढ कर बोला था।
कलकत्ता के सामने हुगली नदी के पार “बांधाघाट” का इलाका। उस कस्बाई इलाके के एक साधारण से सिनेमाघर “अशोक” में कई दिनों से शोले बदस्तूर चल रही थी। सिनेमाघर बहुत साधारण सा था। सड़क के किनारे बने उस हाल की एक छोटी सी लाबी थी। उसी में टिकट घर, उसी में प्रतिक्षालय, उसी में उपर जाने की सीढियां। वहीं अंदर जाने के लिये दो दरवाजे थे। जिसमें एक हाल के अंदर की पिछली कतारों के लिये था तथा दूसरा पर्दे के स्टेज के पास ले जाता था। उन पर मोटे काले रंग के पर्दे टंगे रहते थे। गर्मी से बचने के लिये अंदर सिर्फ पंखों का ही सहारा था। शाम को अंधेरा घिरने पर हाल के दरवाजे खुले छोड़ दिये जाते थे जिससे दिन भर बंद हाल में शाम को बाहर की ठंड़ी हवा से कुछ राहत मिल सके।

दोपहर में गर्मी से बचने के लिये दो-चार “रोड़ेशियन" कुत्ते लाबी में आ कर सीढियों के निचे दुबके रहते थे। लोगों के आने-जाने से, शाम को दरवाजे खुले होने से वे भी गानों इत्यादि को सुनने के आदी हो गये थे। पर दैवयोग से उन्होंने अपने से सम्बंधित संवाद नहीं सुना था।

उस इलाके में कोई भी फिल्म एक दो हफ्ते से ज्यादा नहीं चलती थी क्योंकि अधिकांश लोग शहर जा सुविधायुक्त हाल की ठंड़क में फिल्म का मजा लेते थे। पर जब महीने भर यहां से शोले नहीं उतरी तो हमारे इन “रोड़ेशियन” को भी आश्चर्य हुआ क्योंकि वे भी कुछ दिनों बाद नये पोस्टर देखने के आदी हो गये थे। फिर दूसरी बात यह कि उन्हें अंदर से आती फिल्म की आवाजों को कई लोगों को दोहराते सुना तो उन्होंने भी एक एतिहासिक फैसला लिया कि हम भी अंदर जा यह फिल्म देखेंगे कि इसमें ऐसा क्या है जो लोग इसे बार-बार देख रहे हैं। पर अंदर जाना और उतनी देर छिप कर बैठे रहना बहुत मुश्किल काम था। किसी ने देख लिया तो लाबी की दोपहर की नींद से भी हाथ धोना पड़ सकता था। सो यह फैसला किया गया कि सब जने नहीं जायेंगें एक जना टुकड़े-टुकड़े मे पिक्चर देखेगा और रात को सब को उसके बारे में बताएगा।

तो एक दिन हमारा शेरदिल कालू रात के शो में छिपता-छिपाता अंदर चला ही गया। पर आधे घंटे के बाद ही बाहर आ खड़ा हुआ। सबने आश्चर्य से पूछा कि क्या हो गया? उसने कहा कि बस मार खाने से बच कर आ रहा हूं। सब फिर बोले अरे हुआ क्या था बताओ तो सही। तब कालू ने जवाब दिया कि मैं अंदर मुंह उठाए देख रहा था, तभी वहां एक गंदा सा आदमी आया, उसके हाथ में लंबा मोटा सा कुछ हंटर जैसा कुछ था। उसके सामने खंबे से एक आदमी बंधा हुआ था। वहीं एक सुंदर सी लड़की भी खडी थी। गंदे से आदमी ने उस लड़की से कहा, छमिया नाच के दिखा। तो खंबे से बंधा हट्टा-कट्टा आदमी बोला, नहीं बासंती, इस कुत्ते के सामने मत नाचना। अब बोलो अंदर हाल में इतने लोग नाच देखने को इकट्ठे हुए थे। उधर वह गंदा सा आदमी और बहुत से लोग बंदुके लिये खड़े थे अब मेरे कारण नाच नहीं हो पाता तो सबने मिल कर मुझे मारना ही था सो मैं भाग आया।

सब चुप हो गये समय की नजाकत को देख। पर वह जादू ही क्या जो सर पर ना चढ जाए। कुछ दिनों बाद फिर एक श्वान पुत्र के खून ने जोश मारा। उसने एलान किया कि जो भी हो वह आज रात फिल्म देख कर ही रहेगा। रात का शो शुरु होने के कुछ देर बाद वह अगले दरवाजे से अंदर दाखिल हो गया। पर दस मिनट बाद ही ड़र से कांपता हुआ अपनी पूंछ को पिछले पैरों में दबाये बाहर निकला और भागता ही चला गया। उसके साथी हैरान-परेशान उसके पीछे-पीछे भागे और एक सुनसान गली में उसे जा घेरा। वह अभी भी ड़र से कांप रहा था। सबने उससे कारण पूछा पर उसके मुंह से बोल ही नहीं फूट रहे थे। कुछ देर बाद उसने कहना शुरू किया कि मैं छिप कर ही अंदर गया था पर पता नहीं कैसे उस हट्टे-कट्टे आदमी ने मुझे देख लिया और मेरी तरफ ऊंगली उठा कर बोला, कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा। वह शायद समझा होगा कि मैं ही हूं जिसके कारण पिछली बार नाच ना हो पा रहा था सो इस बार तो वह मुझे मार देने पर ही उतारू हो गया था। वह तो मुझे मार ही देता यदि मैं भाग ना आया होता।

इसके बाद उन शेरदिल श्वान पुत्रों की "अशोक हाल" तक जाने की तब तक हिम्मत नहीं पड़ी जब तक कि शोले वहां से उतर ना गयी।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

इंसान तो इंसान जानवर भी "शोले" देखने के लिए आतुर थे

उन दिनों तो अपने ताऊ जी भी कलकत्ते में ही थे। उन्हें भी तो याद होगा वह नजारा, क्यों बड़े भाई?

बात बहुत पुरानी है। पर दिमाग के कोल्ड स्टोर में होने की वजह से आज भी ताजा और बामजा है। करीब 35 साल पहले फिल्म “शोले” ने रीलीज हो कर कैसे बाक्स आफिस मे आग लगाई थी, यह तो उस समय उसकी तपिश का मजा लेने वालों को आज भी याद होगा। उस समय उसका जादू सर चढ कर बोलता था। लोग पगलाये रहते थे उसको देखने के लिये। एक बार, बार-बार। सिनेमा घरों के सामने इतनी लंम्बी लाईने लगती थीं कि अंतिम छोर पर खड़े लोगों को तीन-तीन, चार-चार घंटे लग जाते थे खिड़की तक पहुंचने में, फिर भी टिकट मिल ही जाएगी इसका विश्वास नहीं होता था। लोग किसी खास शो के लिये लाईन नहीं लगाते थे वे तो जिस दिन का भी हो, जिस किसी शो का भी हो, बस मिल जाए इसलिये खड़े होते थे। आप सोच रहे होंगे कि क्या लोगों के पास काम-धाम नहीं था, तो यह बतला दूं कि यह उस महानगर की बात है जहां क्रिकेट के किसी भी फार्मेट के मैच के लिए लोग रात में ही लाईन मे आ खड़े होते थे। देर से आने वालों के लिये जगह भी बिकती थी। यहां तक कि टेस्ट मैच के पहले दिन भी 60-70 हजार की भीड़ जुट जाना मामुली बात थी। जी हां आज के कोलकाता और तब के कलकत्ता की बात कर रहा हूं।

बात हो रही थी “शोले” की। यह शायद पहली फिल्म थी जिसके संवादों तक की कैसटें भी बनाई गयी थीं और उनकी बिक्री भी बेहिसाब हुए थी। इतनी कैसटें बिकी थीं कि आधी से ज्यादा आबादी गब्बर सिंह बन गयी थी। हर गली मोहल्ले में ,”तेरा क्या होगा कालीया”, “कितने आदमी थे”, “अब गोली खा” जैसे संवादों का लोग पारायण करने लग गये थे। अपने ताऊजी भी तो शायद उन दिनों कलकत्ते मे ही थे , उन्हें तो याद ही होगा उस समय का माहौल, क्यों बड़े भाई सच कह रहा हूं ना?

कलकत्ता अजब शहर है। वहां आईन (कानून) और लाईन का बड़ा महत्व है। वहां का हर वाशिंदा दूसरे से आईन मुताबिक चलने की अपेक्षा करता है और लाईन तो वहां के रोजमर्रा के कामों का एक हिस्सा हैं। दुर्गा पूजा के दिनों में जूते के साथ चप्पल मुफ्त, 500 बंदे खड़े हैं लाईन में, आसाम की चाय का नया ब्रांड आया है 378 भद्रपुरुष घर जाने के पहले लाईन में लगे हैं, मोहनबागान का ईस्टबंगाल से फुटबाल का मैच है 7000 की भीड़ लाईन में लगी है, किसी भी मशहूर हीरो की नयी रीलीज है घंटों लोग लाईन लगाये हैं। आलू सस्ता लाईन लगी है, बरसात आनेवाली है छाता लेने के लिये लाईन में खड़े रहो, भले ही पानी बरस कर भिगो जाय। टिकट लेना है तो लाईन, राशन लेना है तो लाईन, चढना है तो लाईन ,उतरना है तो लाईन। यहां तो मर कर भी लाईन से पीछा नहीं छूटता, विश्वास ना हो तो नीमतल्ला घाट का नजारा देख लें।

इसी लाईनदार शहर मेंएक दिन “वेलिंगटन” की तरफ जाते हुए मुझे, उस व्यस्ततम सड़क के किनारे से लगी एक लाईन का सिरा नजर आया। वहां ऐसा कुछ नहीं था जो लाईन लगानी पड़े सो मैने पूछा कि किस बात की लाईन है तो पता चला कि “ज्योति”सिनेमा में लगी शोले के टिकट के लिये बंदे खड़े हैं। मैं चकित ज्योति हाल तो वहां से कम से कम एक नहीं तो पौन की मी तो दूर था ही। चकित सा मैं आगे बढ कर हाल के पास पहुंचा तो वहां तो कुंभ का मेला लगा हुआ था। गेट के सामने से गुजरने की जगह ही नहीं थी। मेरे देखते-देखते कैइयों के एक्स्ट्रा टिकट जेब से बाहर आते-आते ही चिंदियों मे बदल गये। टिकट दिखते ही लोग उस हाथ पर गिद्धों की तरह लपकते और टिकट “था” हो जाता। मैं किनारे खड़ा तमाशा देख ही रहा था कि एक लड़का मेरे पास आ धीरे से मेरे कान में बंगला में फुसफुसाया, “भाई पिक्चर देखोगे? मैंने कहा नहीं मैं देख चुका हूं। पर वह फिर बोला, दोबारा देख लो। मेरे पास समय था, मैंने कहा , चलो, ठीक है, टिकट दो, वह महौल से इतना ड़रा हुआ था कि टिकट निकालने में डर रहा था और टिकट के पैसे भी जाया नहीं होने देना चाहता था, बोला टिकट नहीं निकालूंगा, आप मेरे साथ भीतर चलो। उस दिन पिक्चर देख पता चला कि शोले 35मी मी के साथ साथ 75मी मी में भी बनाई गयी थी तथा इसके दो अंत थे।

यह सारी भूमिका मैने इस लिये बयान की है क्योंकि यह दुनिया की पहली फिल्म थी जिसे देखने के लिये इंसान तो इंसान जानवर भी आतुर थे।
मजाक थोड़े ही कर रहा हूँ, अगले अंक में बताऊँगा कि दो कुत्तों ने भी शोले देखी थी।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

न कोई सार न ही तत्व, सिर्फ सनसनाहट

बच्ची अपने पूरे प्रवास में "फेंटा" ही पीती रही। तरस आता है ऐसे माँ-बाप की सोच पर !!!

गर्मी दरवाजे पर दस्तक देने लग गयी है। कहीं-कहीं तो दरवाजे खुल भी गये हैं। अब जब सर पर आ पड़ी है तो उससे निपटने के तरह-तरह के इंतजामात भी किये जा रहे हैं। टी।वी. ने तो अपको इस मौसम मे तरोताजा रखने के लिये जैसे कमर ही कस ली है। लगता है यह ना होता तो शायद सब गर्मी की भेंट चढ जाता। तन को, मन को दिमाग को ठंड़ा रखने के उपाय हर पांच मिनट बाद आप को समझाए जा रहे हैं। वहीं साथ ही साथ प्यास बुझाने के लिये तरह-तरह के शीतल पेय आपकी सेवा में हाजिर किए जाते जा रहे हैं। हैं। अब कोई बार-बार इसरार करेगा तो आप मना भी तो नहीं कर सकते। खास कर बच्चे तो इनके आकर्षण में फंस ही जाते हैं। फिर माँ-बाप भी पीछे नहीं रहते अपने लाड़लों की इच्छओं को पूरा करने में। शौक पूरा करना अलग बात है पर उसकी आदत पड़ जाना तो खतरे की घंटी है।

अभी कुछ दिनों पहले देश के बाहर से मेरी एक रिश्तेदार आईं थीं। साथ में उनकी 10-12 साल की बिटिया भी थी। बच्ची जितने दिन भी यहां रही वह "फैंटा" नामक शीतल पेय ही पीती रही। उसकी 'मम्मी' को बहुतेरी बार समझाने की कोशीश की कि यह ठीक नहीं है, पर खुद यहां पली, बढी वर्षों यहां का टनों पानी पीने के बाद भी भली, चंगी तंदरुस्त रहने वाली उस महिला को यहां के पानी पर एतबार नहीं था।

यह बताने का मतलब यही था कि हम ही बच्चों में उल्टी-सीधी आदतें ड़ालने के लिए जिम्मेदार हैं। यहां भी मेरी छोटी भाभी के बच्चों के हाथ में कोई भी नया विज्ञापित खाद्य का पैकेट उसका दूसरी बार विज्ञापन आने के पहले आ जाता है। नतीजा भी सामने है, बच्चों की भूख कम हो गयी है, घर का खाना अच्छा नहीं लगता, आए दिन तबियत ढीली रहती है, पर मां का प्यार पैकटों में भर-भर कर आना जारी है। कहीं भी बाहर आना जाना हो तो बच्चों के लिये शीतल पेय की बड़ी बोतल सफर का एक अभिन्न अंग होती है।

सब पढे-लिखे हैं। अच्छा-बुरा समझने की ताकत भगवान ने दी है तो ऐसे किसी भी पेय को हाथ लगाने से पहले सोच तो सकते हैं कि क्या पानी, प्यास बुझाने का इससे बेहतर विकल्प नहीं है? पानी जिसमें ना कोई कैलोरी होती है ना कोई गैस ना मिलावटी रंग। इसके विपरीत कोला में कार्बन डाई आक्साइड, इथीलीन आक्साइड पालीमर चीनी या सैक्रीन के साथ साथ कैफीन भी होती है। सेहत चिंतकों के लिये चिंता बढाने वाली कैलोरी की मात्रा भी 95-100 के लगभग रहती है। ऐसे पेय पीने से कुछ देर के लिये प्यास बुझती सी लगती है क्योंकि इसमें स्थित गैसें पेट पर दवाब ड़ाल ऐसा एहसास दिला देती हैं। कोला में कैफीन की मात्रा भी काफी होती है जो किसी की सेहत के लिये भी ठीक नहीं होती। ऐसे पेय पदार्थों में कोई “Food Value" नहीं होती, उल्टे बच्चों के द्वारा इनका ज्यादा उपयोग करने से उनका हाजमा तो बिगड़ता ही है उनकी भूख भी मर जाती है।कोला के अलावा जो दूसरे पेय पदार्थ टी वी पर आ-आ कर लुभाने की कोशिश करते हैं वे भी पूरी तरह दोष मुक्त नहीं होते। उनमें भी साईट्रिक एसिड़ के साथ-साथ रंगों, गंधों और जायकों का मिश्रण पीने वाले की सेहत से खिलवाड़ करने का पूरा ताम-झाम समेटे रहता है।


सो इन गर्मियों में अपने घरेलू, हानिरहित, पारंपरिक सचमुच ठंडक प्रदान करने वाले पेय का ही इस्तेमाल करें और बच्चों को भी समझा कर असलियत बता कर उसकी आदत ड़लवाएं।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

नदी ने कहा जब तक तुझमें मिठास न आ जाए !!!

जिन्दगी जीने के सबके अपने-अपने फलसफे हैं :-

* जीवन में कामयाब होने के लिए तीन कारखाने लगाने की जरूरत है :-

1) दिमाग में बर्फ का कारखाना।

2) जुबान पर चीनी का कारखाना।

3) दिल में प्यार का कारखाना।



* एक दिन सागर ने नदी से पूछा, "कब तक मिलती रहोगी मुझ खारे पानी वाले से?"
नदी ने जवाब दिया, "जब तक तुझ में मिठास न आ जाये तब तक" !!!



* एक पेड़ से एक लाख माचिस की तीलियां बन सकती हैं। पर सिर्फ एक माचिस की तीली एक लाख पेड़ों को जला कर राख कर सकती है। उसी तरह एक नकारात्मक सोच सैकड़ों सपनों का नाश कर देती है।

इसलिये सदा सकारात्मक सोच को दिमाग में जगह दें।


* एक दोस्त ने मुझसे पूछा ,तुम सबको ई-मेल भेजते हो ? तुम्हे क्या मिलता है? मैंने हंस कर कहा, देना लेना तो व्यापार है, जो देकर कुछ न मांगे, वो ही तो प्यार है।

* अपने गम को अपने चेहरे की मुस्कान के पीछे छुपाओ,

बातें करो पर अपना दुख ना बताओ,

खुद ना रूठो कभी पर सब को मनाओ,

यही राज है जिंदगी का बस ऐसे ही जीते जाओ।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

जो सब को मारे वह भगवान

GOD
G :- Generator
O :- Operator
D :- destroyer

कुछ अलग सा :-

१, जो किसी एक को मारे - खूनी

सारा समाज, क़ानून, सारे लोग उसके विरुद्ध खड़े होते हैं।

२, जो किन्हीं दस को मारे - पुलिस

उनके काम पर भी ऊंगलियाँ उठती हैं। उन्हें अपने कृत्य की सफाई में कई पापड बेलने पड़ते हैं।

३, जो सौ को मारे - फौजी या सैनिक

सारे संसार की नजरें रहती है। भले-बुरे का जवाब देना और भुगतना पड़ता है।

४, जो सब को मारे - भगवान

कुछ भी हो जाए, दुनिया तहस-नहस हो जाए। फिर भी पूजा-अर्चना में कमी न आ कर और बढोत्तरी ही होती है।

विशिष्ट पोस्ट

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...