डर तो सबके अन्दर कुण्डली मारे बैठा होता है। कोई उस जाहिर कर देता है, कोई...................
अंधेरी, सुनसान रात। आकाश मेघाच्छन। किसी भी समय बरसात शुरू हो सकती थी। बियाबान पड़ा हाई-वे। दूर-दूर तक रोशनी का नामो निशान नहीं। ऐसे में विशाल अपनी बाइक दौड़ाते हुए घर की तरफ चला जा रहा था। बाइक की रोशनी जितनी दूर जाती थी, बस वहीं तक दिखाई पड़ता था, बाकी सब अंधेरे की जादूई चादर में गुम था।
इतने में बूंदा-बांदी शुरु हो गयी। कुछ दूर आगे एक मोड़ पर एक टपरे जैसी दुकान पर गाड़ी रोक कर विशाल ने अपना रेन कोट निकाल कर पहना और दुकान से एक पैकट सिगरेट ले जैसे ही गाड़ी स्टार्ट कर चलने को हुआ, पता नहीं कहां से एक मानवाकृति निकल कर आई और विनम्र स्वर में लिफ़्ट देने की याचना करने लगी। विकास ने नजरें उठा कर देखा, सामने एक उंचे-पूरे कद का, काला रेन कोट पहने, जिसका आधा चेहरा हैट के नीचे छिपा हुआ था, एक आदमी खड़ा था। उसको हां कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पर बिना कारण और इंसानियत के नाते ना भी नहीं कह पा रहा था। मन मार कर उसने उस को पीछे बैठा लिया। पर अब गाड़ी से भी तेज विशाल का मन दौड़ रहा था। उसने लिफ़्ट तो दे दी थी पर चित्रपट की तरह अनेकों ख्याल उसके दिमाग में कौंध रहे थे। अखबारों की कतरने आंखों के सामने घूम रहीं थीं। अभी पिछले हफ्ते ही इसी सड़क पर एक कार को रोक नव दम्पत्ति की हत्या कर गाड़ी वगैरह लूट ली गयी थी। तीन दिन पहले की ही बात थी एक मोटर साईकिल सवार घायल अवस्था में सड़क पर पाया गया था। वह तो अच्छा हुआ एक बस वाले की नज़र उस पर पड़ गयी तो उसकी जान बच गयी।
इसी तरह आए दिन लूट-पाट की खबरें आती रहती थीं। प्रशासन चौकसी बरतने का सिर्फ आश्वासन ही देता लगता था, क्योंकी विशाल को अभी तक सिर्फ आठ-दस वाहन ही आते जाते दिखे थे। पुलिस गस्त नदारद थी। शहर अभी भी पांच-सात किलो मीटर दूर था।
अचानक विशाल को अपने पीछे कुछ हरकत महसूस हुई। इसके तो देवता कूच कर गये। तभी पीछे वाले ने गाड़ी रोकने को कहा। विशाल समझ गया कि अंत समय आ गया है। बीवी, बच्चों, रिश्तेदारों के रोते कल्पते उदास चेहरे उसकी आंखों के सामने घूम गये। पर मरता क्या ना करता। उसने एक किनारे गाड़ी खड़ी कर दी। बाईक के रुकते ही पीछे वाला विशाल के पास आया और अपने रेन कोट का बटन खोल अंदर हाथ डाल कुछ निकालने लगा। विशाल किसी चाकू या पिस्तौल को निकलते देखने की आशंका से कांपने लगा। तभी पीछेवाले आदमी ने एक सिगरेट का पैकट विशाल के आगे कर दिया और बोला, सर क्षमा किजिएगा, बहुत देर से तलब लगी हुई थी। बैठे-बैठे निकाल नहीं पा रहा था। सच कहूं तो मैंने लिफ़्ट तो ले ली थी पर इस सुनसान रास्ते में मैं बहुत डरा हुआ था कि पता नहीं चलाने वला कौन है, कैसा है, तरह तरह की बातें दिमाग में आ रहीं थीं। पर मेरा जाना भी बहुत जरूरी था। बड़ी देर बाद अपने को संयत कर पाया हूं। यह सब सुन विशाल की भी जान में जान आयी।
दोनो ने सिगरेट सुलगायीं, अब दोनों काफी हल्कापन महसूस कर रहे थे।बरसात भी थम चुकी थी। दूर शहर की बत्तियां भी नज़र आने लग गयीं थीं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
बुधवार, 10 मार्च 2010
मंगलवार, 9 मार्च 2010
सिगरेट, पियो तो मुश्किल ना पियो तो मुश्किल :-)
* सिगरेट तुम्हारी बिमारी का कारण है, तुम दिन भर में कितनी सिगरेट पीते हो? डाक्टर ने मरीज से पूछा।
यही कोई दस-बारह। मरीज ने जवाब दिया।
यह तो बहुत ज्यादा है। एक काम करो तुम खाना खाने के बाद ही सिगरेट पिया करो और एक महीने बाद मुझसे मिलना।
महीने भर बाद उसे देख डाक्टर बोला, देखा अब तुम पहले से कितने ठीक लग रहे हो। शरीर भी भर गया है।
अब डाक्टर साहब दस-बारह बार खाना खाने से शरीर तो भरेगा ही ना। मरीज ने जवाब दिया।
* तुम्हें सारे नशे धीरे-धीरे कम करने होंगे, तभी ठीक हो पाओगे। आज से शराब एक पेग से ज्यादा नहीं। सिगरेट दिन भर में चार बस। रात को खाना खा कर थोड़ी देर टहला करो, रात दस बजे के पहले सो जाना और सबेरे जल्दी उठोगे तो एकदम ठीक हो जाओगे।
महीने भर बाद जब फिर मरीज चेक करवाने आया तो डाक्टर ने पूछा , कैसा लग रहा है?
मरीज बोला बाकि तो सब ठीक है पर सिगरेट की आदत ड़ालने में कुछ तकलीफ हुई थी। पहले कभी पी नहीं थी ना।
यही कोई दस-बारह। मरीज ने जवाब दिया।
यह तो बहुत ज्यादा है। एक काम करो तुम खाना खाने के बाद ही सिगरेट पिया करो और एक महीने बाद मुझसे मिलना।
महीने भर बाद उसे देख डाक्टर बोला, देखा अब तुम पहले से कितने ठीक लग रहे हो। शरीर भी भर गया है।
अब डाक्टर साहब दस-बारह बार खाना खाने से शरीर तो भरेगा ही ना। मरीज ने जवाब दिया।
* तुम्हें सारे नशे धीरे-धीरे कम करने होंगे, तभी ठीक हो पाओगे। आज से शराब एक पेग से ज्यादा नहीं। सिगरेट दिन भर में चार बस। रात को खाना खा कर थोड़ी देर टहला करो, रात दस बजे के पहले सो जाना और सबेरे जल्दी उठोगे तो एकदम ठीक हो जाओगे।
महीने भर बाद जब फिर मरीज चेक करवाने आया तो डाक्टर ने पूछा , कैसा लग रहा है?
मरीज बोला बाकि तो सब ठीक है पर सिगरेट की आदत ड़ालने में कुछ तकलीफ हुई थी। पहले कभी पी नहीं थी ना।
सोमवार, 8 मार्च 2010
राष्ट्रपति, जो मुख्य मंत्री के चरण स्पर्श किया करता था.
हमारे पहले राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद हालांकि काफी धीर, गंभीर, गुणी इंसान थे। पर मन से बहुत कोमल और परम्पराओं को निभाने में विश्वास रखते थे।
उन्हें सांस की तकलीफ रहा करती थी इसलिये गर्मी के दिनों में मध्य प्रदेश के प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पहाड़ी
स्थान पचमढी जाया करते थे। उस समय मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल हुआ करते थे। उनके निवास पर रोज शाम को रामचरित मानस का पाठ हुआ करता था। राजेंद्र बाबू अक्सर वहां जाया करते थे और जाते ही रविशंकर जी के चरण स्पर्श करते थे। शुक्ल जी जब भी उन्हें रोकते कि आप राष्ट्रपति हैं और मैं तो एक छोटा सा मुख्य मंत्री हूं आप मेरे पांव ना छूआ करें। तब ही राजेंद्र बाबू मुस्कुरा कर जवाब देते कि मैं एक ब्राह्मण के चरण स्पर्श करता हूं किसी मुख्य मंत्री के नहीं। जब भी मैं शाम को यहां आता हूं तो राष्ट्रपति के रूप में नहीं आता बल्कि, राम कथा का रस पान कर अपने को धन्य करने आता हूं। उनको समझाने का सभी ने बहुत प्रयास किया पर उन्होंने अपनी सरलता नहीं त्यागी। ऐसी विनम्रता की आशा क्या हम आज के राजनितिज्ञों से कर सकते हैं? जो अपने को महान बताने दिखाने के लिए पता नहीं कैसी-कैसी नौटंकिया करते रहते हैं।
राजेंद्र बाबू इतने बड़े पद पर रहने के बावजूद बहुत सादगी और मितव्ययी थे। एक बार उनके सचिव द्वारा लाया गया जूता उन्हें ठीक नहीं बैठ रहा था। इसे देख सचिव ने कहा कि अभी बदलवा लाता हूं। इस पर राजेंद्र बाबू ने पूछा कि कैसे जाओगे? सचिव ने कहा, कार से जाऊंगा। राजेंद्र बाबू बोले, अभी रहने दो, जब उधर कोई काम हो तब ही जाना। मेरा काम पुराने जूते से चल जाएगा। जानते हैं कि उन के जूते की कीमत क्या थी? सिर्फ आठ या दस रुपये।
सोचिए आज के मंत्रियों के बारे में जो लिखने के लिये हजारों रुपये की कलमों का इस्तेमाल करते हैं। वह भी कभी खुद के पैसे से ना खरीद कर। रही गाहियों की बात तो इन के वाहन चालक भी अपनी जरूरतों के लिए सरकारी गाड़ी को ही उपयुक्त मानते हैं।
रविवार, 7 मार्च 2010
मधुशाला और झाडूवाला
यह कोई व्यंग नहीं है, जीवन की सच्चाई है, ऐसे बहुतेरे लोग होंगे जो बिना किसी गिले-शिकवे के अपने परिवार के प्रति समर्पित होंगे ....
मेरे इलाके में एक फेरी वाला वर्षों से अपनी सायकिल पर झाड़ू बेचने आता रहता है। दूसरे फेरीवालों की अपेक्षा इसकी आवज शांत, बुलंद और साफ है। दो गलियों की दूरी से भी इसकी आवाज "झाड़ू वाला" साफ-साफ सुनी और समझी जा सकती है। बहुतेरी बार आमने-सामने पड़ने पर मुझे सदा उसका चेहरा शांत और संतुष्ट ही लगा। धीरे-धीरे जवानी से बुढापे में प्रवेश करता यह शक्स अभी भी उसी बुलंद आवाज के साथ अपना व्यापार चलाए जा रहा है।
पिछले रविवार को घर की जरूरत की वजह से उसे बुलवाया गया तो मैं उसके बारे में कुछ जानने की इच्छा ना रोक सका। बातों ही बातों में उसने बताया कि उसकी बड़ी बेटी रेल्वे की परिक्षा दे नौकरी पा चुकी है और उसकी शादी भी हो गयी है। छोटा बेटा भी बैंक में काम कर रहा है। मेरे यह पूछने पर कि उसके बच्चों को लगता नहीं कि यह फेरीवाला काम कुछ…………
मेरी बात पूरी होते ना होते वह तुरंत बोला, नहीं साहब, मेरे बच्चे बहुत समझदार हैं। वे तो सगर्व लोगों को बताते हैं कि उनके पिता ने कितनी मेहनत कर उन्हें ऐसी जगह पहुंचाया है। शुरु-शुरु में बहुत तंगी और मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, पर धीरे-धीरे सब ठीक होता चला गया और जिस काम ने मुझे और मेरे परिवार को खुशहाली देने में मदद की है उसे मैं कैसे छोड़ सकता हूं। जब तक शरीर साथ देता है तब तक यही काम करता रहूंगा। इतना कह वह नमस्ते कर आगे बढ गया अपने से ज्यादा अपने बच्चों के बारे में मुझे सोचता छोड़।
मैं सोच रहा था कि जब एक लायक बेटा यदि अपने पिता की शराब के वितरण स्थल को महिमा मंड़ित करने वाले भावों को सग्रव दुनिया के सामने पेश करता रह सकता है तो इस झाड़ू और उसके बेचने वाले की संस्तुति क्यों नहीं की जा सकती जो सदा सर्वदा घर, बाहर, दुनिया-जहान से गंदगी साफ करने को कटिबद्ध रहता है।
यह लेख सिर्फ एक इंसान के अपने परिवार के प्रति समर्पण और अपने कर्तव्य को पूरा करने के जज्बे को सामने रखने के लिए लिखा गया है। किसी दुर्भावना या पूर्वाग्रह से दूर रह कर।
मेरे इलाके में एक फेरी वाला वर्षों से अपनी सायकिल पर झाड़ू बेचने आता रहता है। दूसरे फेरीवालों की अपेक्षा इसकी आवज शांत, बुलंद और साफ है। दो गलियों की दूरी से भी इसकी आवाज "झाड़ू वाला" साफ-साफ सुनी और समझी जा सकती है। बहुतेरी बार आमने-सामने पड़ने पर मुझे सदा उसका चेहरा शांत और संतुष्ट ही लगा। धीरे-धीरे जवानी से बुढापे में प्रवेश करता यह शक्स अभी भी उसी बुलंद आवाज के साथ अपना व्यापार चलाए जा रहा है।
पिछले रविवार को घर की जरूरत की वजह से उसे बुलवाया गया तो मैं उसके बारे में कुछ जानने की इच्छा ना रोक सका। बातों ही बातों में उसने बताया कि उसकी बड़ी बेटी रेल्वे की परिक्षा दे नौकरी पा चुकी है और उसकी शादी भी हो गयी है। छोटा बेटा भी बैंक में काम कर रहा है। मेरे यह पूछने पर कि उसके बच्चों को लगता नहीं कि यह फेरीवाला काम कुछ…………
मेरी बात पूरी होते ना होते वह तुरंत बोला, नहीं साहब, मेरे बच्चे बहुत समझदार हैं। वे तो सगर्व लोगों को बताते हैं कि उनके पिता ने कितनी मेहनत कर उन्हें ऐसी जगह पहुंचाया है। शुरु-शुरु में बहुत तंगी और मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, पर धीरे-धीरे सब ठीक होता चला गया और जिस काम ने मुझे और मेरे परिवार को खुशहाली देने में मदद की है उसे मैं कैसे छोड़ सकता हूं। जब तक शरीर साथ देता है तब तक यही काम करता रहूंगा। इतना कह वह नमस्ते कर आगे बढ गया अपने से ज्यादा अपने बच्चों के बारे में मुझे सोचता छोड़।
मैं सोच रहा था कि जब एक लायक बेटा यदि अपने पिता की शराब के वितरण स्थल को महिमा मंड़ित करने वाले भावों को सग्रव दुनिया के सामने पेश करता रह सकता है तो इस झाड़ू और उसके बेचने वाले की संस्तुति क्यों नहीं की जा सकती जो सदा सर्वदा घर, बाहर, दुनिया-जहान से गंदगी साफ करने को कटिबद्ध रहता है।
यह लेख सिर्फ एक इंसान के अपने परिवार के प्रति समर्पण और अपने कर्तव्य को पूरा करने के जज्बे को सामने रखने के लिए लिखा गया है। किसी दुर्भावना या पूर्वाग्रह से दूर रह कर।
शनिवार, 6 मार्च 2010
अपने "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत कब उठाएंगे?
रोज कहीं न कहीं किसी न किसी बाबा की असलियत पर लानत मलानत करनेवाले अपने "भगवानों" की खोज-खबर कब लेंगे?
रोज मीडिया पर नामी-गिरामी तथाकथित संतों, बाबाओं तथा स्वघोषित भगवानों की पोल खुलते देख कुछ साल पहले की एक बात याद आ रही है।
पंजाब की भी परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा की व्यवस्था होती रही है, धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया है। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा यहां भी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए हैं।
कुछ वर्षों पहले पंजाब के कपूरथला जिले के एक "गांव" में जाने का मौका मिला था। वहां कुछ देखने सुनने को तो था नहीं सो गांव के किनारे स्थित मठ को देखने का फैसला किया गया। शाम का समय था। मठ में काफी चहल-पहल थी। मैं वहां पहली बार गया था तो मेरे साथ भी कौतुहल वश कुछ लोग थे। मंदिर का अहाता पार कर जैसे ही वहां के संतजी के कमरे के पास पहुंचा तो ठगा सा रह गया। उस ठेठ गांव के मठ के वातानुकूलित कमरे की धज ही निराली थी। सुख-सुविधा की हर चीज वहां मौजूद थी। उस बड़े से कमरे के एक तरफ तख्त पर मोटे से गद्दे पर मसनद के सहारे एक 35-40 साल के बीच का नाटे कद का इंसान गेरुए वस्त्र और कबीर नूमा टोपी लगाए अधलेटा पड़ा था। नीचे चटाईयों पर उसके भक्त हाथ जोड़े बैठे थे। मुझे बताया गया कि बहुत पहुंचे हुए संत हैं। बंगाल से हमारी भलाई के लिए यहां उजाड़ में पड़े हैं। बंगाल का नाम सुन मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पूछा कि कौन सी भलाई के काम यहां किए गये हैं, क्योंकि मुझे गांव तक आने वाली आधी पक्की आधी कच्ची धूल भरी सडक की याद आ गयी थी। मुझे बताया गया कि मठ में स्थित मंदिर में चार कमरे बनाए गये हैं, मंदिर का रंग-रोगन किया गया है, मंदिर के फर्श और दिवार पर टाईल्स लगाई गयीं हैं, मंदिर के हैंड पम्प पर मोटर लगाई गयी है। मुझे उनके कमरे और "भलाई के कामों" को देख उनके महान होने में कोई शक नहीं रहा। इधर साथ वाले लोग मुझे बार-बार संतजी के चरण स्पर्श करने को प्रेरित कर रहे थे पर मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैंने आगे बढ कर बंगला में संत महाशय से पूछा कि बंगाल से इतनी दूर इस अनजाने गांव में कैसे आए? मुझे बंगाली बोलते देख जहां आसपास के लोग मेरा मुंह देखने लगे वहीं दो क्षण के लिए संत महाशय सकपका से गये, पर तुरंत सम्भल कर धीरे से बोले कि बस ऐसे ही घूमते-घूमते।
मैं पूछना तो बहुत कुछ चाहता था पर वहां के माहौल और उनके प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा को देख कुछ हो ना पाया और मन में बहुत सारे प्रश्नों को ले बाहर निकल आया। बाहर आते ही पिछवाड़े की ओर कुछ युवकों को "सुट्टा" मारते देख मैंने साथ के लोगों से पूछा कि ये "चिलमिये" कौन हैं तो जवाब मिला यहां के सेवादार हैं।
मन कुछ अजीब सा हो गया। रोज टी. वी. पर बाबाओं की पोल खुलते देख उनकी लानत-मलानत करने वाले अपने "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत कब उठाएंगे, भगवान ही जाने।
रोज मीडिया पर नामी-गिरामी तथाकथित संतों, बाबाओं तथा स्वघोषित भगवानों की पोल खुलते देख कुछ साल पहले की एक बात याद आ रही है।
पंजाब की भी परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा की व्यवस्था होती रही है, धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया है। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा यहां भी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए हैं।
कुछ वर्षों पहले पंजाब के कपूरथला जिले के एक "गांव" में जाने का मौका मिला था। वहां कुछ देखने सुनने को तो था नहीं सो गांव के किनारे स्थित मठ को देखने का फैसला किया गया। शाम का समय था। मठ में काफी चहल-पहल थी। मैं वहां पहली बार गया था तो मेरे साथ भी कौतुहल वश कुछ लोग थे। मंदिर का अहाता पार कर जैसे ही वहां के संतजी के कमरे के पास पहुंचा तो ठगा सा रह गया। उस ठेठ गांव के मठ के वातानुकूलित कमरे की धज ही निराली थी। सुख-सुविधा की हर चीज वहां मौजूद थी। उस बड़े से कमरे के एक तरफ तख्त पर मोटे से गद्दे पर मसनद के सहारे एक 35-40 साल के बीच का नाटे कद का इंसान गेरुए वस्त्र और कबीर नूमा टोपी लगाए अधलेटा पड़ा था। नीचे चटाईयों पर उसके भक्त हाथ जोड़े बैठे थे। मुझे बताया गया कि बहुत पहुंचे हुए संत हैं। बंगाल से हमारी भलाई के लिए यहां उजाड़ में पड़े हैं। बंगाल का नाम सुन मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पूछा कि कौन सी भलाई के काम यहां किए गये हैं, क्योंकि मुझे गांव तक आने वाली आधी पक्की आधी कच्ची धूल भरी सडक की याद आ गयी थी। मुझे बताया गया कि मठ में स्थित मंदिर में चार कमरे बनाए गये हैं, मंदिर का रंग-रोगन किया गया है, मंदिर के फर्श और दिवार पर टाईल्स लगाई गयीं हैं, मंदिर के हैंड पम्प पर मोटर लगाई गयी है। मुझे उनके कमरे और "भलाई के कामों" को देख उनके महान होने में कोई शक नहीं रहा। इधर साथ वाले लोग मुझे बार-बार संतजी के चरण स्पर्श करने को प्रेरित कर रहे थे पर मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैंने आगे बढ कर बंगला में संत महाशय से पूछा कि बंगाल से इतनी दूर इस अनजाने गांव में कैसे आए? मुझे बंगाली बोलते देख जहां आसपास के लोग मेरा मुंह देखने लगे वहीं दो क्षण के लिए संत महाशय सकपका से गये, पर तुरंत सम्भल कर धीरे से बोले कि बस ऐसे ही घूमते-घूमते।
मैं पूछना तो बहुत कुछ चाहता था पर वहां के माहौल और उनके प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा को देख कुछ हो ना पाया और मन में बहुत सारे प्रश्नों को ले बाहर निकल आया। बाहर आते ही पिछवाड़े की ओर कुछ युवकों को "सुट्टा" मारते देख मैंने साथ के लोगों से पूछा कि ये "चिलमिये" कौन हैं तो जवाब मिला यहां के सेवादार हैं।
मन कुछ अजीब सा हो गया। रोज टी. वी. पर बाबाओं की पोल खुलते देख उनकी लानत-मलानत करने वाले अपने "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत कब उठाएंगे, भगवान ही जाने।
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
कामदेव से कोई भी नहीं जीत सकता
एक गांव में एक पंडितजी अपनी पत्नि और बेटी के साथ रहते थे। आसपास के गांवों में पूजा-पाठ तथा कथा वाचन कर किसी तरह अपने इस छोटे से परिवार का निर्वाह करते थे। जब भी कभी वह अपनी कथा समाप्त करते तो अंत में यह जरूर कहते थे कि कामदेव बहुत शक्तिशाली हैं उनसे कोई भी नहीं जीत सकता, फिर भी इंसान को संयमित होना चाहिए।
एक दिन जब वह कथा समाप्त कर प्रवचन देकर हटे तो वहीं से गुजरते एक साधू ने, जो अपने आप को बड़ा तपस्वी समझता था, उन्हें चुन्नौती दी कि जो कहते हो उसे सिद्ध करो नहीं तो कथा कहना बंद कर दो। पंडितजी सीधे-साधे इंसान थे वे सुनी-सुनाई कथाएं बांचा करते थे। अब उनकी प्रतिष्ठा दांव पर थी। वे चुप-चाप उदास हो घर जा कर लेट रहे। उनकी कन्या ने उनकी यह हालत देख कारण पूछा तो पंडितजी ने सारी बात बता दी। सारी बात सुन वह बोली आप चिंता ना करें, मैं आपकी बात सिद्ध कर दिखाउंगी।
दुसरे दिन शाम को उसने स्वादिष्ट भोजन बनाया और खूब सज-धज कर साधू के ठिकाने की ओर भोजन की थाली ले चल पड़ी। दैवयोग से उसी समय बुंदाबांदी भी शुरु हो गयी। उसने साधू के पास जा कर कहा, मैने आपकी बहुत ख्याति सुन रखी है। मुझे आप दिक्षा दीजिए। मैं आपकी शरण में हूं और आप के लिए प्रसाद लाई हूं। कृपया ग्रहण करें।
स्वादिष्ट भोजन, सुंदर कन्या, सुहानी शाम, साधू महाराज का मन ड़ोल उठा। वह कुछ आगे बढते कि कन्या ने कहा कि मुझे ड़र लग रहा है कि कोई आ ना जाए। कृपया बाहर देख लें कोई है तो नहीं। साधू जैसे ही कोठरी से बाहर निकला, कन्या ने दरवाजा बंद कर लिया। यह देख पहले तो साधू ने दरवाजा खोलने का अनुरोध किया फिर धमकाने लगा। पर जब इस पर भी दरवाजा नहीं खुला तो वह कुटिया की छत पर चढ गया और उपर सुराख करने लगा। एक छोटा सा छेद होते ही वह अंदर आने की कोशिश में उसी में फंस कर रह गया। उसे उसी अवस्था में छोड़ कन्या दौड़ते हुए गयी और अपने पिता और गांव वालों को बोली कि अब जा कर साधू से पूछिए कि कामदेव में कितनी ताकत होती है? सबने वैसा ही किया। अपने सामने सब लोगों को देख साधु बुरी तरह शर्मिंदा हुआ और बोला मुझे क्षमा करें। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी। मैं हार मानता हूं। कामदेव बहुत शक्तिशाली हैं, उनसे कोई भी नहीं जीत सकता।
एक दिन जब वह कथा समाप्त कर प्रवचन देकर हटे तो वहीं से गुजरते एक साधू ने, जो अपने आप को बड़ा तपस्वी समझता था, उन्हें चुन्नौती दी कि जो कहते हो उसे सिद्ध करो नहीं तो कथा कहना बंद कर दो। पंडितजी सीधे-साधे इंसान थे वे सुनी-सुनाई कथाएं बांचा करते थे। अब उनकी प्रतिष्ठा दांव पर थी। वे चुप-चाप उदास हो घर जा कर लेट रहे। उनकी कन्या ने उनकी यह हालत देख कारण पूछा तो पंडितजी ने सारी बात बता दी। सारी बात सुन वह बोली आप चिंता ना करें, मैं आपकी बात सिद्ध कर दिखाउंगी।
दुसरे दिन शाम को उसने स्वादिष्ट भोजन बनाया और खूब सज-धज कर साधू के ठिकाने की ओर भोजन की थाली ले चल पड़ी। दैवयोग से उसी समय बुंदाबांदी भी शुरु हो गयी। उसने साधू के पास जा कर कहा, मैने आपकी बहुत ख्याति सुन रखी है। मुझे आप दिक्षा दीजिए। मैं आपकी शरण में हूं और आप के लिए प्रसाद लाई हूं। कृपया ग्रहण करें।
स्वादिष्ट भोजन, सुंदर कन्या, सुहानी शाम, साधू महाराज का मन ड़ोल उठा। वह कुछ आगे बढते कि कन्या ने कहा कि मुझे ड़र लग रहा है कि कोई आ ना जाए। कृपया बाहर देख लें कोई है तो नहीं। साधू जैसे ही कोठरी से बाहर निकला, कन्या ने दरवाजा बंद कर लिया। यह देख पहले तो साधू ने दरवाजा खोलने का अनुरोध किया फिर धमकाने लगा। पर जब इस पर भी दरवाजा नहीं खुला तो वह कुटिया की छत पर चढ गया और उपर सुराख करने लगा। एक छोटा सा छेद होते ही वह अंदर आने की कोशिश में उसी में फंस कर रह गया। उसे उसी अवस्था में छोड़ कन्या दौड़ते हुए गयी और अपने पिता और गांव वालों को बोली कि अब जा कर साधू से पूछिए कि कामदेव में कितनी ताकत होती है? सबने वैसा ही किया। अपने सामने सब लोगों को देख साधु बुरी तरह शर्मिंदा हुआ और बोला मुझे क्षमा करें। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी। मैं हार मानता हूं। कामदेव बहुत शक्तिशाली हैं, उनसे कोई भी नहीं जीत सकता।
गुरुवार, 4 मार्च 2010
एक ई-मेलीय उपदेश
हे, पार्थ (कर्मचारी),
इस बार इंक्रिमेंट अच्छा नहीं हुआ, बुरा हुआ।
इंसेंटिव नहीं मिला, यह भी बुरा हुआ।
वेतन में कटौती हो रही है, बुरा हो रहा है।
तुम पिछले इंसेंटिव ना मिलने का पश्चाताप ना करो।
तुम अगले इंसेंटिव की भी चिंता मत करो।
बस जो मिल रहा है उस वेतन में संतुष्ट रहो....
तुम्हारी जेब से क्या गया जो रोते हो?
जो आया था सब यहीं का था।
तुम जब नहीं थे, तब भी यह कंपनी चल रही थी।
तुम जब नहीं रहोगे तब भी यह कंपनी चलती रहेगी।
तुम कुछ भी ले कर यहां नहीं आए थे।
जो अनुभव मिला यहीं मिला।
जो भी काम किया कंपनी के लिए किया।
डिग्री ले कर आए थे, अनुभव ले कर जाओगे।
जो कम्प्यूटर आज तुम्हारा है, वह कल किसी और का था.
कल किसी और का होगा और परसों किसी और का।
तुम इसे अपना समझ कर क्यों खुश हो रहे हो।
यही खुशी तुम्हारी समस्त परेशानियों का मूल कारण है।
इस बार इंक्रिमेंट अच्छा नहीं हुआ, बुरा हुआ।
इंसेंटिव नहीं मिला, यह भी बुरा हुआ।
वेतन में कटौती हो रही है, बुरा हो रहा है।
तुम पिछले इंसेंटिव ना मिलने का पश्चाताप ना करो।
तुम अगले इंसेंटिव की भी चिंता मत करो।
बस जो मिल रहा है उस वेतन में संतुष्ट रहो....
तुम्हारी जेब से क्या गया जो रोते हो?
जो आया था सब यहीं का था।
तुम जब नहीं थे, तब भी यह कंपनी चल रही थी।
तुम जब नहीं रहोगे तब भी यह कंपनी चलती रहेगी।
तुम कुछ भी ले कर यहां नहीं आए थे।
जो अनुभव मिला यहीं मिला।
जो भी काम किया कंपनी के लिए किया।
डिग्री ले कर आए थे, अनुभव ले कर जाओगे।
जो कम्प्यूटर आज तुम्हारा है, वह कल किसी और का था.
कल किसी और का होगा और परसों किसी और का।
तुम इसे अपना समझ कर क्यों खुश हो रहे हो।
यही खुशी तुम्हारी समस्त परेशानियों का मूल कारण है।
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चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...
