होली फिर आ गयी। चलिए एक छोटा सा निश्चय करें, खुश रहने और खुश रखने का...
सभी अनदेखे अपनों को होली की ढेरों शुभकामनाएं।
1, होली का दिन। जो सुबह से हुडदंग शुरु हुआ तो दोपहर ढलने पे आ गयी। कालोनी के सभी पुरुष भंग पी काले पीले पुते हुए हर घर पर जा आवाज लगाने लगे," ब ह ह न जी, दरवाजा खोल अपने पति को पहचान अंदर ले लिजिए......
2, एक मरीज का आप्रेशन होने वाला था। शल्य चिकित्सक ने अपने छात्रों को भी बुलवा लिया। आप्रेशन के पहले उसने सबसे पूछा कि आपकी राय में इस स्थिति में आप्रेशन जरूरी है कि नहीं। सबने असहमति जताई। इस पर चिकित्सक ने बताया कि नहीं ऐसी स्थिति में आप्रेशन हो जाना चाहिये। और जैसे ही उसने अपना काम करना चाहा वैसे ही मरीज जो इन सब की बातें सुन रहा था, उठ कर बैठ गया और बोला, मुझे नहीं करवाना आप्रेशन, अरे जब इतने लोग मना कर रहे हैं तो मैं तुम्हारी बात ही क्यूं मानूं?
3, गाइड पर्यटक को दिल्ली के एतिहासिक भवन के बारे में बता रहा था। तभी पर्यटक ने पूछ लिया कि इसे बने कितना समय हुआ है?तीन सौ दो साल चार महीने। गाइड ने जवाब दिया।पर तुम इतना सही-सही समय कैसे बता रहे हो?ऐसा है कि जब मैंने यहां काम करना शुरु किया तो मुछे बताया गया था कि इसे बने तीन सौ साल हुए हैं और मुझे यहां काम करते दो साल चार महीने हो गये हैं। गाइड ने जवाब दिया।
4, छगन जी अपने दोस्त को अपने बच्चों के बारे में बता रहे थे। बड़ा तो एम।ए। कर लेखक बन गया है। मंझला भी पढाई पूरी कर कविताएं लिखने लगा है। बड़े-बड़े समारोहों में जाता है, खूब नाम कमाया है। पर छोटा सब्जी का ठेला लगाता है।
"अरे! उसे नहीं पढवाया"?
"नहीं, उसी की कमाई से ही तो घर चलता है, शुरु से"। छगन जी ने जवाब दिया।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
क्या धोनी के मन में कुछ और था ?
जिन्हें भी क्रिकेट से लगाव होगा वह सचिन की पारी देख निहाल हो गये होंगे। विश्व किर्तीमान पर सीना चौड़ा हो गया होगा। पर इस उतेजना मे धोनी के खेल की तरफ ध्यान नहीं गया होगा ।
48वें ओवर तक सचिन 199 रन बना चुके थे। पर अगला पूरा ओवर धोनी ने खेला। पचासवें ओवर की भी शुरुआत धोनी ने करनी थी। उसने पहली बाल सीमा रेखा के पार भेजी. दूसरी का भी वही हश्र होता यदि सीमा रेखा पर पकड़ ना ली जाती। धोनी ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यदि ऐसा होता और तीसरी बाल पर रन ना बन पाता तो? या एक-दो बाल की हड़-बड़ी में सचिन से एक रन ना बन पाता तो? पूरी आठ बाल धोनी ने अपने पास रखीं, क्या यह ठीक नहीं होता कि पहले दूसरा शतक पूरा करवा लिया जाता?
कुछ भी हो सकता था। जो किर्तीमान बनने वाला था वह अकेले सचिन का नहीं था, उसमें देश का भी नाम जुड़ा हुआ था। तो धोनी महाशय को नहीं चाहिये था कि पहले सचिन को मौका दे किर्तीमान पूरा कर लिया जाए। ऐसा भी नहीं था कि रनों का अकाल पड़ा हुआ था तो उसे प्रमुखता दी जाती।
चलिए अंत भला तो सब भला, पर धोनी के मन में शायद कुछ और ही था।
48वें ओवर तक सचिन 199 रन बना चुके थे। पर अगला पूरा ओवर धोनी ने खेला। पचासवें ओवर की भी शुरुआत धोनी ने करनी थी। उसने पहली बाल सीमा रेखा के पार भेजी. दूसरी का भी वही हश्र होता यदि सीमा रेखा पर पकड़ ना ली जाती। धोनी ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यदि ऐसा होता और तीसरी बाल पर रन ना बन पाता तो? या एक-दो बाल की हड़-बड़ी में सचिन से एक रन ना बन पाता तो? पूरी आठ बाल धोनी ने अपने पास रखीं, क्या यह ठीक नहीं होता कि पहले दूसरा शतक पूरा करवा लिया जाता?
कुछ भी हो सकता था। जो किर्तीमान बनने वाला था वह अकेले सचिन का नहीं था, उसमें देश का भी नाम जुड़ा हुआ था। तो धोनी महाशय को नहीं चाहिये था कि पहले सचिन को मौका दे किर्तीमान पूरा कर लिया जाए। ऐसा भी नहीं था कि रनों का अकाल पड़ा हुआ था तो उसे प्रमुखता दी जाती।
चलिए अंत भला तो सब भला, पर धोनी के मन में शायद कुछ और ही था।
गर्व करें कि सचिन भारतीय है.
आज एक और कीर्तिमान बना सचिन ने देश का मान बढाया।
पचास ओवरों के खेल में दो सौ का जादुई आंकड़ा छूने वाला पहला खिलाड़ी
चाहे आपको क्रिकेट अच्छा लगता हो या नहीं, चाहे आप इस खेल के धूर विरोधी हों, चाहे आप इसे कुछ देशों का खेल बता हेय दृष्टि से देखते हों, चाहे आपको लगे कि इस बरगद की छाया में बाकि खेल नहीं पनप पा रहे। चाहे आप सोचते हों कि इतना पैसा किसी और खेल को क्यों नहीं दिया जाता, चाहे किसी भी बात से आप इस खेल से दूर रहते हों, पर आप एक बात तो मानेंगे ही कि इस खेल के बेताज बादशाह "सचिन" ने सदा देश के लिए खेल कर उसका सर ऊंचा किया है। इस समर्पित इंसान ने अपने दम-खम पर हम भारतियों को भी गर्व करने के अवसर प्रदान किए हैं। चाहे दुनिया भर से व्यंग बाणों की बौछार होती रहे पर इसने सदा अडिग रह बिना एक शब्द भी प्रतिरोध में बोले, अपने खेल से अपने आलोचकों का मुंह बंद किया है।
आज पचास ओवर के मैच में संसार में पहली बार दो सौ का जादुई आंकड़ा पार कर फिर उसने बिना कुछ कहे अपने धैर्य, अपनी कला, अपने समर्पण, अपनी लगन का एक और नमूना दुनिया के सामने पेश कर यह बता दिया कि उसे भारत ही नहीं दुनिया में क्यूं क्रिकेट के खेल का भगवान कहा जाता है।
गर्व करें कि सचिन भारतीय है।
पचास ओवरों के खेल में दो सौ का जादुई आंकड़ा छूने वाला पहला खिलाड़ी
चाहे आपको क्रिकेट अच्छा लगता हो या नहीं, चाहे आप इस खेल के धूर विरोधी हों, चाहे आप इसे कुछ देशों का खेल बता हेय दृष्टि से देखते हों, चाहे आपको लगे कि इस बरगद की छाया में बाकि खेल नहीं पनप पा रहे। चाहे आप सोचते हों कि इतना पैसा किसी और खेल को क्यों नहीं दिया जाता, चाहे किसी भी बात से आप इस खेल से दूर रहते हों, पर आप एक बात तो मानेंगे ही कि इस खेल के बेताज बादशाह "सचिन" ने सदा देश के लिए खेल कर उसका सर ऊंचा किया है। इस समर्पित इंसान ने अपने दम-खम पर हम भारतियों को भी गर्व करने के अवसर प्रदान किए हैं। चाहे दुनिया भर से व्यंग बाणों की बौछार होती रहे पर इसने सदा अडिग रह बिना एक शब्द भी प्रतिरोध में बोले, अपने खेल से अपने आलोचकों का मुंह बंद किया है।
आज पचास ओवर के मैच में संसार में पहली बार दो सौ का जादुई आंकड़ा पार कर फिर उसने बिना कुछ कहे अपने धैर्य, अपनी कला, अपने समर्पण, अपनी लगन का एक और नमूना दुनिया के सामने पेश कर यह बता दिया कि उसे भारत ही नहीं दुनिया में क्यूं क्रिकेट के खेल का भगवान कहा जाता है।
गर्व करें कि सचिन भारतीय है।
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
क्या होलिका किसी षडयंत्र का शिकार थी. होली पर विशेष.
वर्षों से यह धारणा चली आ रही है कि, होलिका ने अपने भतीजे प्रह्लाद को मारने की नाकाम चेष्टा की थी। ऐसा उसने क्यूं किया? क्या मजबूरी थी जो एक निर्दोष बालक के अहित में उसने अन्याय का साथ दिया? क्या वह किसी षड़यंत्र की शिकार थी ?
असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पडोसी राज्य के राजकुमार इलोजी एक दूसरे को दिलोजान से चाहते थे। इलोजी के रूप-रंग के सामने देवता भी शर्माते थे। सुंदर, स्वस्थ, सर्वगुण संपन्न साक्षात कामदेव का प्रतिरूप थे वे। इधर होलिका भी अत्यंत सुंदर रूपवती युवती थी। लोग इनकी जोडी की बलाएं लिया करते थे। । उभय पक्ष की सहमति से दोनों का विवाह होना भी तय हो चुका था। परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र के प्रभू प्रेम से व्यथित रहा करता था। उसके लाख समझाने-मनाने पर भी प्रह्लाद की भक्ती मे कोई कमी नहीं आ पा रही थी। धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप की नाराजगी क्रोध मे बदलती चली गयी और फिर एक समय ऐसा भी आ गया कि उसने अपने पुत्र को सदा के लिये अपने रास्ते से हटाने का दृढसंकल्प कर लिया। परन्तु लाख कोशिशों के बावजूद वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नही कर पा रहा था। राजकुमार का प्रभाव जनमानस पर बहुत गहरा था। राज्य की जनता हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से तंग आ चुकी थी। प्रह्लाद के साधू स्वभाव के कारण सारे लोगों की आशाएं उससे जुडी हुई थीं। हिरणयकश्यप ये बात जानता था। इसीलिये वह प्रह्लाद के वध को एक दुर्घटना का रूप देना चाहता था और यही हो नहीं पा रहा था। इसी बीच उसे अपनी बहन होलिका को मिले वरदान की याद हो आई। जिसके अनुसार होलिका पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पडता था। उसने होलिका को अपनी योजना बताई कि उसे प्रह्लाद को अपनी गोद मे लेकर अग्नि प्रवेश करना होगा। यह सुन होलिका पर तो मानो वज्रपात हो गया। वह अपने भतीजे को अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहती थी। बचपन से ही प्रह्लाद अपनी बुआ के करीब रहा था। बुआ ने ही उसे पाल-पोस कर बडा किया था। जिसकी जरा सी चोट से होलिका परेशान हो जाती थी, उसीकी हत्या की तो वह कल्पना भी नही कर सकती थी। उसने भाई के षडयन्त्र मे भागीदार होने से साफ़ मना कर दिया। पर हिरण्यकश्यप भी होलिका की कमजोरी जानता था। उसने भी होलिका को धमकी दी कि यदि उसने उसका कहा नही माना तो वह भी उसका विवाह इलोजी से नहीं होने देगा। होलिका गंभीर धर्मसंकट मे पड गयी थी वह अपना खाना-पीना-सोना सब भूल गयी। एक तरफ़ दिल का टुकडा, मासूम भतीजा था तो दूसरी तरफ प्यार, जिसके बिना जिंदा रहने की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। आखिरकार उसने एक अत्यन्त कठिन फ़ैसला कर लिया और भाई की बात मान ली, क्योंकि उसे डर था कि कहीं हिरण्यकश्यप इलोजी को कोई नुक्सान ना पहुंचा दे। निश्चित दिन, उसने अपने वरदान का सहारा प्रह्लाद को दे, उसे अपनी गोद मे लेकर, अग्नि प्रवेश कर अपना बलिदान दे दिया, पर उसके इस त्याग का किसी को भी पता नहीं चल पाया।
यही दिन होलिका और इलोजी के विवाह के लिए भी तय किया गया था।
इलोजी इन सब बातों से अंजान अपनी बारात ले नियत समय पर राजमहल आ पहुंचे। वहां आने पर जब उन्हें सारी बातें पता चलीं तो उन पर तो मानो पहाड टूट पडा, दिमाग कुछ सोचने समझने के काबिल न रहा। पागलपन का एक तूफ़ान उठ खडा हुआ और इसी झंझावात मे उन्होंने अपने कपडे फाड डाले और होलिका-होलिका की मर्म भेदी पुकार से धरती-आकाश को गुंजायमान करते हुए होलिका की चिता पर लोटने लगे। गर्म चिता पर निढाल पडे अपने आंसुओं से ही जैसे चिता को ठंडा कर अपनी प्रेयसी को ढूंढ रहे हों। उसके बाद उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। वन-प्रातों मे भटकते-भटकते सारी जिंदगी गुजार दी।
पर इतिहास ने दोनों को भुला दिया। इलोजी की बात करें तो उनका नाम सिर्फ राजस्थान तक सिमट कर रह गया और रही होलिका, तो उसके साथ तो घोर अन्याय हुआ, उसके बलिदान को भुला कर उसे प्रह्लाद की हत्या के षड़यंत्र में शामिल एक अपराधी मान कर बदनाम कर दिया गया।
पर सोचने की बात है कि यदि होलिका अपराधिनी थी तो इस मंगलमय त्यौहार का नाम उसके नाम पर क्यूं रखा गया?
असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पडोसी राज्य के राजकुमार इलोजी एक दूसरे को दिलोजान से चाहते थे। इलोजी के रूप-रंग के सामने देवता भी शर्माते थे। सुंदर, स्वस्थ, सर्वगुण संपन्न साक्षात कामदेव का प्रतिरूप थे वे। इधर होलिका भी अत्यंत सुंदर रूपवती युवती थी। लोग इनकी जोडी की बलाएं लिया करते थे। । उभय पक्ष की सहमति से दोनों का विवाह होना भी तय हो चुका था। परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र के प्रभू प्रेम से व्यथित रहा करता था। उसके लाख समझाने-मनाने पर भी प्रह्लाद की भक्ती मे कोई कमी नहीं आ पा रही थी। धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप की नाराजगी क्रोध मे बदलती चली गयी और फिर एक समय ऐसा भी आ गया कि उसने अपने पुत्र को सदा के लिये अपने रास्ते से हटाने का दृढसंकल्प कर लिया। परन्तु लाख कोशिशों के बावजूद वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नही कर पा रहा था। राजकुमार का प्रभाव जनमानस पर बहुत गहरा था। राज्य की जनता हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से तंग आ चुकी थी। प्रह्लाद के साधू स्वभाव के कारण सारे लोगों की आशाएं उससे जुडी हुई थीं। हिरणयकश्यप ये बात जानता था। इसीलिये वह प्रह्लाद के वध को एक दुर्घटना का रूप देना चाहता था और यही हो नहीं पा रहा था। इसी बीच उसे अपनी बहन होलिका को मिले वरदान की याद हो आई। जिसके अनुसार होलिका पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पडता था। उसने होलिका को अपनी योजना बताई कि उसे प्रह्लाद को अपनी गोद मे लेकर अग्नि प्रवेश करना होगा। यह सुन होलिका पर तो मानो वज्रपात हो गया। वह अपने भतीजे को अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहती थी। बचपन से ही प्रह्लाद अपनी बुआ के करीब रहा था। बुआ ने ही उसे पाल-पोस कर बडा किया था। जिसकी जरा सी चोट से होलिका परेशान हो जाती थी, उसीकी हत्या की तो वह कल्पना भी नही कर सकती थी। उसने भाई के षडयन्त्र मे भागीदार होने से साफ़ मना कर दिया। पर हिरण्यकश्यप भी होलिका की कमजोरी जानता था। उसने भी होलिका को धमकी दी कि यदि उसने उसका कहा नही माना तो वह भी उसका विवाह इलोजी से नहीं होने देगा। होलिका गंभीर धर्मसंकट मे पड गयी थी वह अपना खाना-पीना-सोना सब भूल गयी। एक तरफ़ दिल का टुकडा, मासूम भतीजा था तो दूसरी तरफ प्यार, जिसके बिना जिंदा रहने की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। आखिरकार उसने एक अत्यन्त कठिन फ़ैसला कर लिया और भाई की बात मान ली, क्योंकि उसे डर था कि कहीं हिरण्यकश्यप इलोजी को कोई नुक्सान ना पहुंचा दे। निश्चित दिन, उसने अपने वरदान का सहारा प्रह्लाद को दे, उसे अपनी गोद मे लेकर, अग्नि प्रवेश कर अपना बलिदान दे दिया, पर उसके इस त्याग का किसी को भी पता नहीं चल पाया।
यही दिन होलिका और इलोजी के विवाह के लिए भी तय किया गया था।
इलोजी इन सब बातों से अंजान अपनी बारात ले नियत समय पर राजमहल आ पहुंचे। वहां आने पर जब उन्हें सारी बातें पता चलीं तो उन पर तो मानो पहाड टूट पडा, दिमाग कुछ सोचने समझने के काबिल न रहा। पागलपन का एक तूफ़ान उठ खडा हुआ और इसी झंझावात मे उन्होंने अपने कपडे फाड डाले और होलिका-होलिका की मर्म भेदी पुकार से धरती-आकाश को गुंजायमान करते हुए होलिका की चिता पर लोटने लगे। गर्म चिता पर निढाल पडे अपने आंसुओं से ही जैसे चिता को ठंडा कर अपनी प्रेयसी को ढूंढ रहे हों। उसके बाद उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। वन-प्रातों मे भटकते-भटकते सारी जिंदगी गुजार दी।
पर इतिहास ने दोनों को भुला दिया। इलोजी की बात करें तो उनका नाम सिर्फ राजस्थान तक सिमट कर रह गया और रही होलिका, तो उसके साथ तो घोर अन्याय हुआ, उसके बलिदान को भुला कर उसे प्रह्लाद की हत्या के षड़यंत्र में शामिल एक अपराधी मान कर बदनाम कर दिया गया।
पर सोचने की बात है कि यदि होलिका अपराधिनी थी तो इस मंगलमय त्यौहार का नाम उसके नाम पर क्यूं रखा गया?
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
"होली" होले उसके पहले.
होली का त्यौहार कबसे शुरू हुआ यह कहना बहुत ही मुश्किल है। वेदों-पुराणों में इससे सम्बंधित अनेक कथाएं मिलती हैं।
महाभारत मं उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।
दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।
इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।
इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।
पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।
क्या सच में होलिका अपने प्रिय भतीजे, प्रह्लाद, मारना चाहती थी या वह खुद किसी षडयंत्र का शिकार बन गयी थी?
होली पर विशेष। कल
महाभारत मं उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।
दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।
इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।
इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।
पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।
क्या सच में होलिका अपने प्रिय भतीजे, प्रह्लाद, मारना चाहती थी या वह खुद किसी षडयंत्र का शिकार बन गयी थी?
होली पर विशेष। कल
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
छत्तीसगढ़ की अनोखी और अनूठी पहल
इस दशक की शुरुआत के साथ जब तीन नये राज्यों का गठन हुआ तो इनमें से एक छत्तीसगढ को भी हर जगह पिछड़े और अविकसित राज्य के रूप में ही ज्यादा प्रचारित किया गया था। यहां के वाशिंदों की शांतिप्रियता, सादगी और भोलेपन पर किसी ने भी दो शब्द नहीं लिखे पर पिछड़ेपन, असाक्षरता, टोने-टोटके और बस्तर को लेकर उल्टी-सीधी बातों पर कालम पे कालम रंग डाले थे।
उन दिनों मैं हिमाचल में था। जिस दिन यहां "हरेली" होती है, उस दिन वहां के एक प्रतिष्ठित पत्र ने लिखा था - "छत्तीसगढ में आज भी जादू-टोने पर लोगों में अटूट विश्वास है। आज के दिन वहां हरेली नामक त्यौहार वहां के बैगा लोगों, जो टोना-टोटका करते हैं, द्वारा मनाया जाता है। छत्तीसगढ के रायपुर में भी, जो कि वहां का सबसे बड़ा शहर है, कोई भी व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकलता है ना ही अपने बच्चों को बाहर जाने देता है। स्कूल दुकानें सब बंद रहती हैं। लोग जादू-टोने के ड़र से दरवाजे बंद कर घरों में दुबके रहते हैं। अघोषित कर्फ्यू लग जाता है।"
यह पढ कर मैने एक पत्र उस अखबार के संपादक महोदय को वस्तुस्थिति बताते हुए लिखा था। पर उसका कोई जवाब नहीं पा सका हूं अभी तक। बिना किसी प्रमाण के, बिना सच्चाई जाने, बिना पूरी तहकीकात कर सिर्फ चटकारेदार खबरें 'बना' कर यह तथाकथित पत्रकार क्या सिद्ध करना चाहते हैं, समझ के बाहर की बात है। स्कूल-कालेज के समय में रोज अखबार पढने पर जोर दिया जाता था, जिससे भाषा और सामान्य ज्ञान पर पकड़ बन सके। आज अखबारों में ना ही शुद्ध भाषा मिलती है नाहीं सही जानकारी, फिल्म जगत के फूहड़ किस्सों वगैरह की तफसील को छोड़।
दिल्ली में भी ऊंचे-ऊंचे सरकारी ओहदों पर बैठे लोगों को भी यहां के भूगोल को बताने के लिये भिलाई का वास्ता देना पड़ता था। पर बस्तर के बारे में मिर्च-मसाला लगी बातों का उनके पास भंडार होता था। इसीलिये मेरा जब भी बाहर जाना होता है तो यहां की छोटी-छोटी "अच्छाईयां" मैं जरूर अपने साथ ले जाता हूं।
आज भी अखबार में एक खबर पढी तो इसे यहां से बाहर रहने वालों के लिये पोस्ट करने से अपने को रोक नहीं पाया।
वर्षों पहले व्ही. शांतारामजी की अमर क्लासिक फिल्म "दो आंखें बारह हाथ" की कल्पना को कुछ-कुछ साकार किया है, रायपुर सेंट्रल जेल प्रशासन ने। यहां आजीवन कारावास की सजा पाए चार कैदियों को आम जनता के लिये हल्का -फुल्का नाश्ता बनाने के लिये जेल परिसर में ही बाहर की ओर एक दुकान खोल कर दी गयी है। बावजूद इस जोखिम के कि सजायाफ्ता मुजरिमों को बाहर भेजना पड़ रहा था। पर इन चारों के अब तक के व्यवहार को देखते हुए यह जोखिम उठाया गया। आज इनके हुनर का यह कमाल है कि उस दुकान से रोज की बिक्री दस हजार रुपये का आंकड़ा छू रही है। यहां की बनी चीजों की गुणवता, सफाई और स्वाद का जादू लोगों के सर चढ कर बोल रहा है। अब तो बड़े-बड़े होटलों और रेस्त्रां से भी इन्हें आर्ड़र मिलने लग गये हैं। इन चारों के हुनर और मेहनत करने के जज्बे ने इनकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया है।
तथाकथित विकसित राज्य क्या इस पिछड़े प्रदेश से सबक लेंगे?
उन दिनों मैं हिमाचल में था। जिस दिन यहां "हरेली" होती है, उस दिन वहां के एक प्रतिष्ठित पत्र ने लिखा था - "छत्तीसगढ में आज भी जादू-टोने पर लोगों में अटूट विश्वास है। आज के दिन वहां हरेली नामक त्यौहार वहां के बैगा लोगों, जो टोना-टोटका करते हैं, द्वारा मनाया जाता है। छत्तीसगढ के रायपुर में भी, जो कि वहां का सबसे बड़ा शहर है, कोई भी व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकलता है ना ही अपने बच्चों को बाहर जाने देता है। स्कूल दुकानें सब बंद रहती हैं। लोग जादू-टोने के ड़र से दरवाजे बंद कर घरों में दुबके रहते हैं। अघोषित कर्फ्यू लग जाता है।"
यह पढ कर मैने एक पत्र उस अखबार के संपादक महोदय को वस्तुस्थिति बताते हुए लिखा था। पर उसका कोई जवाब नहीं पा सका हूं अभी तक। बिना किसी प्रमाण के, बिना सच्चाई जाने, बिना पूरी तहकीकात कर सिर्फ चटकारेदार खबरें 'बना' कर यह तथाकथित पत्रकार क्या सिद्ध करना चाहते हैं, समझ के बाहर की बात है। स्कूल-कालेज के समय में रोज अखबार पढने पर जोर दिया जाता था, जिससे भाषा और सामान्य ज्ञान पर पकड़ बन सके। आज अखबारों में ना ही शुद्ध भाषा मिलती है नाहीं सही जानकारी, फिल्म जगत के फूहड़ किस्सों वगैरह की तफसील को छोड़।
दिल्ली में भी ऊंचे-ऊंचे सरकारी ओहदों पर बैठे लोगों को भी यहां के भूगोल को बताने के लिये भिलाई का वास्ता देना पड़ता था। पर बस्तर के बारे में मिर्च-मसाला लगी बातों का उनके पास भंडार होता था। इसीलिये मेरा जब भी बाहर जाना होता है तो यहां की छोटी-छोटी "अच्छाईयां" मैं जरूर अपने साथ ले जाता हूं।
आज भी अखबार में एक खबर पढी तो इसे यहां से बाहर रहने वालों के लिये पोस्ट करने से अपने को रोक नहीं पाया।
वर्षों पहले व्ही. शांतारामजी की अमर क्लासिक फिल्म "दो आंखें बारह हाथ" की कल्पना को कुछ-कुछ साकार किया है, रायपुर सेंट्रल जेल प्रशासन ने। यहां आजीवन कारावास की सजा पाए चार कैदियों को आम जनता के लिये हल्का -फुल्का नाश्ता बनाने के लिये जेल परिसर में ही बाहर की ओर एक दुकान खोल कर दी गयी है। बावजूद इस जोखिम के कि सजायाफ्ता मुजरिमों को बाहर भेजना पड़ रहा था। पर इन चारों के अब तक के व्यवहार को देखते हुए यह जोखिम उठाया गया। आज इनके हुनर का यह कमाल है कि उस दुकान से रोज की बिक्री दस हजार रुपये का आंकड़ा छू रही है। यहां की बनी चीजों की गुणवता, सफाई और स्वाद का जादू लोगों के सर चढ कर बोल रहा है। अब तो बड़े-बड़े होटलों और रेस्त्रां से भी इन्हें आर्ड़र मिलने लग गये हैं। इन चारों के हुनर और मेहनत करने के जज्बे ने इनकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया है।
तथाकथित विकसित राज्य क्या इस पिछड़े प्रदेश से सबक लेंगे?
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