pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

श्रीरामजी को भी श्राप का सामना करना पडा था.

देवताओं ने सदा अपना हित साधा है। श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री में सुग्रीव का सूर्य पुत्र होना एक बड़ा कारण था

किस कारण या किस परिस्थितिवश प्रभू श्रीराम को किष्किंधा नरेश बाली का वध कर सुग्रीव को साथी बनाना पड़ा इसका न्यायोचित उत्तर नहीं मिलता।  

बाली भी राम भक्त था पर उससे मिलने से पहले ही एक तरफा पक्ष रख, सुग्रीव के प्रति सहानुभुति का माहौल बना, उसे दीन-हीन दिखा श्री राम की उदारता का फायदा उठा लिया गया। जबकी सुग्रीव का निष्काषन उसके भीरूपन और समय पर उचित निर्णय ना ले सकने की क्षमता के कारण किया गया था। वह हर हाल में, चाहे युद्ध कला हो, चाहे चारित्रिक विशेषता, बाली से कमतर था।

तो ऐसा तो नहीं कि यह सब सोची समझी योजना के तहत किया गया हो। कुछ पहले की कथाओं को याद करें। हनुमानजी के बाल्यावस्था की घटना जब उन्होंने सूर्य देव से शिक्षा ग्रहण की थी। तब "सूर्यदेव ने गुरुदक्षिणा के रूप में अपने पुत्र सुग्रीव की रक्षा का वचन" उनसे लिया था। देवताओं ने सदा अपना स्वार्थ साधा है। यहां भी वही स्वार्थ श्रीराम और बाली के बैर का कारण बना लगता है।

स्वंय श्रीराम भी बाली के वध से व्यथित थे तभी तो उन्होंने उसे फिर जीवन दान की बात कही थी। जिसे बाली ने विनय पूर्वक अस्वीकार कर सिर्फ अपने पुत्र अंगद के भविष्य को सुरक्षित करने के लिये प्रभू से वचन लिया था।
सुग्रीव से मैत्री तथा बाली के वध का खमियाजा श्री राम को बाली की पत्नी के श्राप के रूप में उठाना पड़ा था। अपने पति की असमय और अकारण मृत्यु पर रोती-बिलखती तारा ने प्रभू से अपने जीवन का भी अंत मांगा था। पराए पुरुष के साथ रहने के बजाय उसने मर जाना बेहतर समझ कर बार-बार प्रभू से अपना भी वध कर देने की प्रार्थना की थी। पर श्रीराम के ऐसा ना करने पर उस साध्वी पतिव्रता नारी ने दुखित और कुपित हो श्रीराम को भी भीषण श्राप दे डाला कि मैं तुम्हें भी पत्नी वियोग का शाप देती हूं।
श्री राम की लीला तो श्री राम ही जाने, पर यह तो उनकी महानता ही थी कि इस जहर को भी उन्होंने सहज स्वभाव से स्वीकार कर लिया था। यदि बाली और श्रीराम का साथ हो गया होता तो महाकाव्य रामायण का अंत किसी और तरह से लिखा जाता।

इतना ही नहीं श्रीराम की दया से राज मिल जाने के बाद सुग्रीव की भोग लोलुपता भी सामने आ जाती है। जब वह रास-रंग में लिप्त हो सीताजी को खोजने के अभियान को ही भुला बैठता है। बाली वध का दुख तब और उग्र हो सामने आता है जब प्रभू उसके लिये कठोर शब्दों का प्रयोग कर उसको भी दंड़ित करने का संकल्प करते हैं। तब उसे अपने कर्तव्य की याद आती है।

युद्ध के समय समरांगण में भी उसका रण कौशल किसी अन्य वानर योद्धा के समान ही नजर आता है, बढ कर नहीं। ऐसा लगता है कि यदि हनुमानजी की कृपा और अनुराग उस पर ना होता तो वह कभी भी राजा बनने की योग्यता ना पा सकता था।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

एक सैम्नार ऐसा भी

रायपुर के मोतीबाग से आयकर भवन जाने वाली सड़क पर कुछ आगे जा कर घने इमली के पेड़ हैं। जिनकी शाखाओं पर ढेरों तरह-तरह के परिंदे वास करते हैं। शाम होते ही जब पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं तो अक्सर शरारती लडके उन्हें अपनी गुलेलों का निशाना बनाते रहते हैं। इसी को देख यह ख्याल आया था :-

पर्यावरणविदों और पशू-पक्षी संरक्षण करने वाली संस्थाओं ने मेरे सोते हुए कस्बाई शहर को ही क्यूं चुना अपने वार्षिक सैम्नार के लिए, पता नहीं। इससे शहरवासियों को कोई फ़ायदा हुआ हो या ना हुआ हो पर शहर जरूर धुल पुछ गया। सड़कें साफ़-सुथरी हो गयीं। रोशनी वगैरह की थोड़ी ठीक-ठाक व्यवस्था कर दी गयी। गहमागहमी काफ़ी बढ़ गयी। बड़े-बड़े प्राणीशास्त्री, पर्यावरणविद, डाक्टर, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता और भी ना जाने कौन-कौन बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे धूल उड़ाते आने लगे। नियत दिन, नियत समय पर, नियत विषयों पर बहस शुरू हुई। नष्ट होते पर्यावरण और खास कर लुप्त होते प्राणियों को बचाने-सम्भालने की अब तक की नाकामियों और अपने-अपने प्रस्तावों की अहमियत को साबित करने के लिए घमासान मच गया। लम्बी-लम्बी तकरीरें की गयीं। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए। यानि कि काफी सफल आयोजन रहा।

दिन भर की बहस बाजी, उठापटक, मेहनत-मसर्रत के बाद जाहिर है, जठराग्नि तो भड़कनी ही थी। सो खानसामे को हुक्म हुआ, लज़िज़, बढिया, उम्दा किस्म के व्यंजन बनाने का। खानसामा अपना झोला उठा बाजार की तरफ चल पड़ा। शाम का समय था। पेड़ों की झुरमुट मे अपने घोंसलों की ओर लौट रहे परिंदों पर कुछ शरारती बच्चे अपनी गुलेलों से निशाना साध रहे थे। पास आने पर खानसामे ने तीन-चार घायल बटेरों को बच्चों के कब्जे में देखा। अचानक उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। उसने बच्चों को डरा धमका कर भगा दिया। फिर बटेरों को अपने झोले में ड़ाला और गुनगुनाता हुआ वापस गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया।

खाना खाने के बाद, आयोजक से ले कर खानसामे तक, सारे लोग बेहद खुश थे। अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने तरीके से, सैम्नार की अपार सफलता पर।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

ताश के बादशाह, बेगम तथा गुलाम सब का अपना-अपना चरित्र होता है.

ताश, अच्छी है या बुरी यह बहस का विषय हो सकता है। पर सैंकड़ों वर्षों से यह आदमी का मनोरंजन करती आ रही है इसमें दो राय नहीं है। इसके आज के स्वरुप के चार वर्गों के बावन पत्तों में से भी सिर्फ फोटो वाले बारह पत्तों के तीन पात्रों, बादशाह, बेगम और गुलाम को तो सभी जानते हैं पर अपने-अपने वर्ग के अनुसार उनकी खासियत और उनके अलग-अलग स्वभाव तथा चरित्र के बारे में कम ही जानकारी प्रचलित है। अच्छी ताशों की गड्डी बनाते समय इनके स्वरूप का पूरा ध्यान रखा जाता है।
"हुकुम"
बादशाह :- यह क़ानून का पालक, सख्त मिजाज, काले रंग को पसंद करने वाला और तलवार से न्याय करने वाला राजा है, जो इसकी तनी हुई तलवार बताती है। इसकी मूंछें इसके स्वभाव को प्रगट करती हैं।

बेगम :- अपने राजा के कृत्यों से यह दुखी रहती है, जो इसके चेहरे और काले कपड़ों से साफ झलकता है। इसके साथ जलती हुई शमा होती है जो बताती है कि यह रानी भी उसी की तरह घुल-घुल कर मिट जाएगी। इसके साथ एक फूल जरूर है पर वह भी मुर्झाया हुआ और पीछे की तरफ जो इसके दुख को ही प्रगट करता है।

गुलाम :- हुकुम का गुलाम। जैसा मालिक वैसा गुलाम। अपने मालिक के हुक्म का ताबेदार काले कपड़े और हाथ में हंटर धारण करने वाला। सख्त चेहरे वाला, किसी के बहकावे में ना आने वाला और सारे काम अक्ल से नहीं हंटर से करने वाला होता है। इसे कोई फुसला नहीं सकता।

"पान"
बादशाह :- पान यानि दिल यानि कोमल ह्रदय का स्वामी। इसीलिये यह मूंछे भी नहीं रखता। यह मानवता का पूजारी, अहिंसक, धार्मिक और शांतिप्रिय स्वभाव का होता है। ऐसा होने पर भी बहुत सतर्क और कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाला है। यह तलवार से नहीं बुद्धि से काम करता है। इसीलिये इसकी तलवार पीछे की ओर रहती है।

बेगम :- यह बहुत सुंदर, संतोषी स्वभाव, विद्वान पर कोमल ह्रदय तथा शांत स्वभाव वाली रानी है। इसके चेहरे से इसकी गंभीरता साफ झलकती है। हाथ का फूल भी इस बात की गवाही देता है। कोमल स्वभाव के बावजूद यह विदुषि है।
गुलाम :- पान का गुलाम भी अपने मालिकों की तरह शांत और नम्र स्वभाव वाला होता है। सादा जीवन बिताने वाला और प्रकृति प्रेमी है जो इसके हाथ में पकड़ी गयी पत्ती से स्पष्ट है। अनुशासन बनाए रखने के लिये छोटी-छोटी मूंछें रखता है।

"चिडी"
बादशाह :- यह तीन पत्तियों वाला, समझदार और अपने अधिकारों की रक्षा करने वाला राजा है। यह अपने को राजा नहीं सेवक मानता है। रौबदार मूंछों वाले इस राजा का भेद कोई नहीं जान पाता है।

बेगम :- यह एक चतुर, चालाक तथा तीव्र बुद्धिवाली रानी है। तड़क-भड़क से दूर फूलों की शौकीन यह समस्याओं को साम, दाम, दंड़, भेद किसी भी तरह सुलझाने में विश्वास रखती है।

गुलाम :- चिड़ी का गुलाम यह सबसे चर्चित गुलाम है। गंवारों सा दिखने वाला, पगड़ी में पत्ती लटकाए सदा अपने बादशाह की चापलूसी करने में लगा रहता है। साधारण से कपड़े और गोलमटोल मूंछों को धारण करने वाला एक घटिया इंसान है।

"ईंट"
बादशाह :- यह राजा के साथ-साथ हीरों का व्यापारी भी है। हर समय धन कमाने की फिराक में रहता है। जिसके लिये कुछ भी कर सकता है। हाथ जोड़ कर ईमानदारी का दिखावा करता है, पर मन से साफ नहीं है। इसे हिंसा पसंद नहीं है पर एशो-आराम से रहना पसंद करता है।

बेगम :- यह भी अपने राजा की तरह धन-दौलत से प्रेम करने वाली, किसी के बहकावे में ना आनेवाली, कीमती कपड़े और गहनों से लगाव रखने वाली सदा पैसा कमाने की धुन में रहने वाली बेगम है।

गुलाम :- रोनी सूरतवाला तथा बिना मूछों वाला यह गुलाम सदा इसी गम में घुलता रहता है कि कहीं राजा से कोई और पुरस्कार या दान ना ले जाए। अमीर राजा का गुलाम है सो इसके कपड़े भी कीमती होते हैं। यह अपना काम बड़ी चतुराई से करता है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

:) हंसिकाएं (:

# बाहर से आए पर्यटक को गाइड ने बताया कि जब अकबर सिर्फ चौदह साल का था तभी उसने बादशाह बन देश पर राज करना शुरु कर दिया था। पर्यटक बोला तुम्हारा देश भी अजीब है, यहां चौदह साल में देश संम्भालने दिया जाता है पर शादी अठ्ठारह साल के पहले नहीं करने दी जाती।
अब तुम्हें क्या बताएं साहब कि घर चलाना देश चलाने से कितना मुश्किल है। गाइड ने जवाब दिया।

# आज सरे आम भरी ट्रेन में एक आदमी एक युवती को चाकू दिखाने लगा।
अरे किसी ने विरोध नहीं किया? इतनी भीड़ में कोई कुछ भी नहीं बोला?
नहीं, सब तमाशा देखते रहे।
तब तो बेचारी ने मजबूरी में अपना पर्स उसके हवाले कर दिया होगा?
नहीं, उसमे से कुछ पैसे निकाल कर चाकू खरीद लिया।

# हां तो बेटा, तुम्हारा खर्च कैसे चलता है?
जी, मेरा तो ऊपर की आमदनी से गुजर-बसर होता है।
क्या कहते हो तुम्हें पता नहीं ऊपर की कमाई कानूनन जुर्म है?
अरे वैसी नहीं, मेरा काम तो पोल पर चढ कर बिजली ठीक करना है।

# अरे! यह क्या कर रहा है?
बटन टांकना सीख रहा हूं।
इसकी क्या जरूरत पड़ गयी, तेरी तो शादी हो गयी है ना?
तभी तो............

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

महाकवि कालिदास की समाधि श्रीलंका में है.

महाकवि कालिदास। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के राजकवि।
अभिज्ञान शकुंतलम, मेघदूत, मालविकाग्निमित्र, ज्ञतुसंहार, कुमारसंभव आदि महान ग्रन्थों के रचयिता। इतना प्रसिद्ध व्यक्ति पर जिसका जन्मकाल, जन्मभूमि के साथ-साथ मृत्युकाल सब विवादित। पर जो भी जानकारी उपलब्ध होती है, उसके अनुसार उनकी जीवन यात्रा श्रीलंका में जा कर समाप्त हुई थी।

लंका में प्राप्त जानकारी के अनुसार, कालिदास वहां के राजकुमार कुमारदास द्वारा रचित "जानकी हर राम" नामक काव्य को पढ इतने अभिभूत हो गये कि पता लगा कर उसके प्रतिभाशाली रचनाकार से मिलने लंका पहुंच गये। वहां उनका भव्य स्वागत किया गया। कुमारदास पहले से ही कालिदास का भक्त था। दोनों जल्दि ही एक दूसरे के अभिन्न मित्र बन गये। फिर कुमारदास के अतिशय अनुरोध पर कालिदास ने वहीं स्थायी रूप से रह कर अपनी काव्य साधना करने का आग्रह स्वीकार कर लिया।

समय बीतता गया, राजा के निधन के पश्चात कुमारदास राजा बना और यहीं से उसका पतन शुरु हो गया। उसका अधिकांश समय विभिन्न वेश्यालयों में बीतने लगा। इन सब समाचारों का पता कालिदास को भी लगता रहता था। अंत में उन्होंने भी इस सब की पुष्टि के लिये वेश्यालयों में जा कर सच्चाई का पता लगाना शुरु कर दिया। कुमारदास को भी खबर मिली कि कोई रोज उसके बारे में पता करने के लिये वेश्यालयों का चक्कर लगा रहा है। उसे लगा कि कहीं यह मेरा मित्र कालिदास ही तो नहीं। इस सच्चाई को जानने के लिये उसने एक दिन एक वेश्यालय से निकलते वक्त उसके द्वार पर एक अधुरा श्लोक लिख दिया, साथ ही यह सूचना भी लगा दी कि इस श्लोक को पूरा करने वाले को मुंहमाँगी स्वर्ण मुद्राएं दी जाएंगी। कुछ देर बाद वहां कालिदास आए और सूचना पढ श्लोक पूरा कर दिया। यह सारा मंजर वहां की वेश्या देख रही थी। उसके मन में पाप आ गया। उसने पुरस्कार की राशि प्राप्त करने के लिये कालिदास की हत्या कर उनकी लाश को अपने घर में गड़वा दिया और श्लोक को अपना
बता इनाम लेने राजदरबार जा पहुंची। पर वह मूढ संस्कृत भाषा से पूर्णतया अंजान थी। उसके अशुद्ध उच्चारण से भेद तुरंत खुल गया। कुमारदास ने सच्चाई उगलवा ली।अपने प्रिय मित्र का ऐसा हश्र देख उसका कलेजा मुंह को आ गया। उसने पूरे विधि विधान से अपने मित्र के पार्थिव शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया। पर इस सारी घटना के लिये वह अपने को माफ नहीं कर पा रहा था। जैसे ही चिता धू-धू कर जलने लगी कुमारदास अपने को रोक नहीं पाया और उसी चिता में कूद अपनी जान दे दी। उसे ऐसा करते देख उसकी पाचों रानियों ने भी उसी चिता में कूद अपने प्राण त्याग दिये।

यह समाधि श्रीलंका की नील बालका नदी के किनारे मातर नामक स्थान पर अवस्थित है। इसे सप्त बोधि के
नाम से जाना जाता है। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में यहां हर साल महाकवि कालिदास का पुण्य पर्व मनाया जाता है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

अरे, मेरी आय बढ गयी और मुझे ही पता नहीं चला !!!!

वातानुकूलित कमरे में एक बोर्ड पर एक लकीर होती है, जिसके आगे एक तीर बना होता है। उसी को ऊपर नीचे कर प्रतिशत और आंकड़ों में सब पता चल जाता है कि कितनी मंहगाई कम हुई या किसी की आमदनी कितनी बढी। समझे?

आज ठंड़ कुछ ज्यादा ही थी। चाय की दुकान पर गुरु शिष्य मिल गये। सुविधा के लिये उनका नाम ज्ञानी और अज्ञानी रख लेते हैं। आदत के अनुसार जन्मजात अज्ञानी शिष्य फिर शुरु हो गया।

अज्ञानी : गुरु, ये सरकार समिति, कमेटी वगैरह क्यूं बनाती है? सरकार में तो ऐसे ही काम करने वालों की भरमार होती है।

ज्ञानी : अरे पगले, कभी किसी मामले को वर्षों लटकाने के लिये, कभी विवादास्पद मुद्दे से अपना सर बचाने के लिये और कभी जनता का ध्यान बंटाने के लिये यह सब करना पड़ता है।

अज्ञानी : गुरु पर इसके लिये ज्यादातर लोग अवकाश प्राप्त ही क्यों चुने जाते हैं?

ज्ञानी : मुर्खता की बातें ही करेगा जब करेगा। सब नहीं पर बहुतों को सरकार को भी उपकृत करना पड़ता है। जिंदगी भर वफादार रह कर भी जो ढंग का कुछ नही पा सका उसे ऐसे काम दे दिये जाते हैं। लोगों की भी धारणा रहती है कि सारी उम्र सरकारी काम में रहने से तजुर्बेदार तो होगा ही। अब यह मत कहना कि सरकारी काम तो..............

अज्ञानी : पर गुरु अबकी तो पेट्रोल, गैस दाम बढाऊ समिति के अध्यक्ष महोदय ने कहा है कि देशवासियों की आय बढ गयी है, तो मेरी तो वहीं की वहीं है। यह कैसी बात हुई कि मेरी आय बढी और मुझे ही पता नहीं चला।

ज्ञानी : अरे मुर्ख, यह समझना इतना आसान नहीं है। देख एक वातानुकुलित कमरा होता है। उसमें एक बोर्ड़ लगा रहता है। उस पर एक लकीर बनाते हैं, जिसके आगे एक तीर बना होता है। उसे ही ऊपर-नीचे कर यह लोग पता लगा लेते हैं कि, कितनी आमदनी बढी, कितनी मंहगाई कम हो गयी, स्वास्थ्य सेवाओं में कितनी बढोत्तरी हुई, मृत्यु दर में कितनी कमी आयी, बेरोजगारी कम हो गयी, शिक्षित लोगों का ईजाफा हो गया, भ्रष्टाचार कम हो गया, ईमानदारी बढ गयी, अपराध कम हो गये, सुख-शांति बढ गयी, आदि-आदि। यह सब बैठे-बैठे यह लकीर प्रतिशत और आंकड़ों में बता देती है।

अज्ञानी : पर गुरु उनकी मान भी लें। मेरी ना भी सही औरों की तो आमदनी बढी होगी, पर उसके साथ-साथ मंहगाई भी तो पिछले वर्षों की तुलना में आसमान छू रही है। अब 100 रुपये गैस और करीब 300-400 रुपये पेट्रोल के मासिक खर्च के अलावा जो ट्रकों की ढूलाई से कीमतें बढेंगी उसकी तुलना में कितनी आय बढी होगी आम आदमी की। कोई दुगनी या तिगुनी तो बढ नही गयी होगी?

ज्ञानी : नहीं!! यानि कि!!! अब!!!! अरे तुम्हारा भी तो कोई फर्ज बनता है देश के प्रति। यह मत सोचो कि देश ने तुम्हें क्या दिया, यह देखो कि तुम देश को क्या दे रहे हो।

अज्ञानी : गुरु मुंह मत खुलवाओ। पुरानी बातें मैं नहीं जानता, पर अब तो यह हाल है कि लोगों की जान जा रही है और बदले में जो मिल रहा है उसे मैं भी जानता हूं, तुम भी जानते हो और देश का हर भुग्तभोगी जानता है।
चलता हूं, नहीं तो एक दिन की पगार कट जायेगी, मंदी के नाम पर।
राम, राम।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

मणिकर्ण शिवजी की रमण भूमि है.

मणिकर्ण में मंदिर और गुरुद्वारे के लंगर में बनने वाले चावल गर्म पानी के सोतों में पकाए जाते हैं।

"मणिकर्ण", हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र धर्म-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ। जो कुल्लू से 35किमी दूर समुंद्र तट से 1650 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है।

पौराणिक कथा है कि विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा पार्वतीजी घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे। उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी कि वे यहां ग्यारह हजार वर्ष तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही उन्होंने जब काशी की स्थापना की तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट रक्खा। इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं,तथा यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है। इस जगह का" मणिकर्ण" नाम पड़ने की भी एक पौराणिक कथा है।

यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव्र धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। इससे शिवजी क्रोधित हो गये जिससे ड़र कर शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन कान की मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।

यही वह जगह है जहां महाभारत काल मे शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात के रूप मे उससे युद्ध किया था। यहीं पर सिक्ख समुदाय का भव्य गुरुद्वारा भी है जहां देश विदेश से लोग आ पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इसकी स्थापना कैमलपुर, अब पाकिस्तान मे, के निवासी श्री नारायण हरी द्वारा 1940 के आसपास की गयी थी।

थोडी सी हिम्मत, जरा सा जज्बा, नयी जगह देखने-जानने की ललक हो तो एक बार यहां जरूर जाएं।

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...