देवताओं ने सदा अपना हित साधा है। श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री में सुग्रीव का सूर्य पुत्र होना एक बड़ा कारण था
किस कारण या किस परिस्थितिवश प्रभू श्रीराम को किष्किंधा नरेश बाली का वध कर सुग्रीव को साथी बनाना पड़ा इसका न्यायोचित उत्तर नहीं मिलता।
बाली भी राम भक्त था पर उससे मिलने से पहले ही एक तरफा पक्ष रख, सुग्रीव के प्रति सहानुभुति का माहौल बना, उसे दीन-हीन दिखा श्री राम की उदारता का फायदा उठा लिया गया। जबकी सुग्रीव का निष्काषन उसके भीरूपन और समय पर उचित निर्णय ना ले सकने की क्षमता के कारण किया गया था। वह हर हाल में, चाहे युद्ध कला हो, चाहे चारित्रिक विशेषता, बाली से कमतर था।
तो ऐसा तो नहीं कि यह सब सोची समझी योजना के तहत किया गया हो। कुछ पहले की कथाओं को याद करें। हनुमानजी के बाल्यावस्था की घटना जब उन्होंने सूर्य देव से शिक्षा ग्रहण की थी। तब "सूर्यदेव ने गुरुदक्षिणा के रूप में अपने पुत्र सुग्रीव की रक्षा का वचन" उनसे लिया था। देवताओं ने सदा अपना स्वार्थ साधा है। यहां भी वही स्वार्थ श्रीराम और बाली के बैर का कारण बना लगता है।
स्वंय श्रीराम भी बाली के वध से व्यथित थे तभी तो उन्होंने उसे फिर जीवन दान की बात कही थी। जिसे बाली ने विनय पूर्वक अस्वीकार कर सिर्फ अपने पुत्र अंगद के भविष्य को सुरक्षित करने के लिये प्रभू से वचन लिया था।
सुग्रीव से मैत्री तथा बाली के वध का खमियाजा श्री राम को बाली की पत्नी के श्राप के रूप में उठाना पड़ा था। अपने पति की असमय और अकारण मृत्यु पर रोती-बिलखती तारा ने प्रभू से अपने जीवन का भी अंत मांगा था। पराए पुरुष के साथ रहने के बजाय उसने मर जाना बेहतर समझ कर बार-बार प्रभू से अपना भी वध कर देने की प्रार्थना की थी। पर श्रीराम के ऐसा ना करने पर उस साध्वी पतिव्रता नारी ने दुखित और कुपित हो श्रीराम को भी भीषण श्राप दे डाला कि मैं तुम्हें भी पत्नी वियोग का शाप देती हूं।
श्री राम की लीला तो श्री राम ही जाने, पर यह तो उनकी महानता ही थी कि इस जहर को भी उन्होंने सहज स्वभाव से स्वीकार कर लिया था। यदि बाली और श्रीराम का साथ हो गया होता तो महाकाव्य रामायण का अंत किसी और तरह से लिखा जाता।
इतना ही नहीं श्रीराम की दया से राज मिल जाने के बाद सुग्रीव की भोग लोलुपता भी सामने आ जाती है। जब वह रास-रंग में लिप्त हो सीताजी को खोजने के अभियान को ही भुला बैठता है। बाली वध का दुख तब और उग्र हो सामने आता है जब प्रभू उसके लिये कठोर शब्दों का प्रयोग कर उसको भी दंड़ित करने का संकल्प करते हैं। तब उसे अपने कर्तव्य की याद आती है।
युद्ध के समय समरांगण में भी उसका रण कौशल किसी अन्य वानर योद्धा के समान ही नजर आता है, बढ कर नहीं। ऐसा लगता है कि यदि हनुमानजी की कृपा और अनुराग उस पर ना होता तो वह कभी भी राजा बनने की योग्यता ना पा सकता था।

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