# बाहर से आए पर्यटक को गाइड ने बताया कि जब अकबर सिर्फ चौदह साल का था तभी उसने बादशाह बन देश पर राज करना शुरु कर दिया था। पर्यटक बोला तुम्हारा देश भी अजीब है, यहां चौदह साल में देश संम्भालने दिया जाता है पर शादी अठ्ठारह साल के पहले नहीं करने दी जाती।
अब तुम्हें क्या बताएं साहब कि घर चलाना देश चलाने से कितना मुश्किल है। गाइड ने जवाब दिया।
# आज सरे आम भरी ट्रेन में एक आदमी एक युवती को चाकू दिखाने लगा।
अरे किसी ने विरोध नहीं किया? इतनी भीड़ में कोई कुछ भी नहीं बोला?
नहीं, सब तमाशा देखते रहे।
तब तो बेचारी ने मजबूरी में अपना पर्स उसके हवाले कर दिया होगा?
नहीं, उसमे से कुछ पैसे निकाल कर चाकू खरीद लिया।
# हां तो बेटा, तुम्हारा खर्च कैसे चलता है?
जी, मेरा तो ऊपर की आमदनी से गुजर-बसर होता है।
क्या कहते हो तुम्हें पता नहीं ऊपर की कमाई कानूनन जुर्म है?
अरे वैसी नहीं, मेरा काम तो पोल पर चढ कर बिजली ठीक करना है।
# अरे! यह क्या कर रहा है?
बटन टांकना सीख रहा हूं।
इसकी क्या जरूरत पड़ गयी, तेरी तो शादी हो गयी है ना?
तभी तो............
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 7 फ़रवरी 2010
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
महाकवि कालिदास की समाधि श्रीलंका में है.
महाकवि कालिदास। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के राजकवि।
अभिज्ञान शकुंतलम, मेघदूत, मालविकाग्निमित्र, ज्ञतुसंहार, कुमारसंभव आदि महान ग्रन्थों के रचयिता। इतना प्रसिद्ध व्यक्ति पर जिसका जन्मकाल, जन्मभूमि के साथ-साथ मृत्युकाल सब विवादित। पर जो भी जानकारी उपलब्ध होती है, उसके अनुसार उनकी जीवन यात्रा श्रीलंका में जा कर समाप्त हुई थी।
लंका में प्राप्त जानकारी के अनुसार, कालिदास वहां के राजकुमार कुमारदास द्वारा रचित "जानकी हर राम" नामक काव्य को पढ इतने अभिभूत हो गये कि पता लगा कर उसके प्रतिभाशाली रचनाकार से मिलने लंका पहुंच गये। वहां उनका भव्य स्वागत किया गया। कुमारदास पहले से ही कालिदास का भक्त था। दोनों जल्दि ही एक दूसरे के अभिन्न मित्र बन गये। फिर कुमारदास के अतिशय अनुरोध पर कालिदास ने वहीं स्थायी रूप से रह कर अपनी काव्य साधना करने का आग्रह स्वीकार कर लिया।
समय बीतता गया, राजा के निधन के पश्चात कुमारदास राजा बना और यहीं से उसका पतन शुरु हो गया। उसका अधिकांश समय विभिन्न वेश्यालयों में बीतने लगा। इन सब समाचारों का पता कालिदास को भी लगता रहता था। अंत में उन्होंने भी इस सब की पुष्टि के लिये वेश्यालयों में जा कर सच्चाई का पता लगाना शुरु कर दिया। कुमारदास को भी खबर मिली कि कोई रोज उसके बारे में पता करने के लिये वेश्यालयों का चक्कर लगा रहा है। उसे लगा कि कहीं यह मेरा मित्र कालिदास ही तो नहीं। इस सच्चाई को जानने के लिये उसने एक दिन एक वेश्यालय से निकलते वक्त उसके द्वार पर एक अधुरा श्लोक लिख दिया, साथ ही यह सूचना भी लगा दी कि इस श्लोक को पूरा करने वाले को मुंहमाँगी स्वर्ण मुद्राएं दी जाएंगी। कुछ देर बाद वहां कालिदास आए और सूचना पढ श्लोक पूरा कर दिया। यह सारा मंजर वहां की वेश्या देख रही थी। उसके मन में पाप आ गया। उसने पुरस्कार की राशि प्राप्त करने के लिये कालिदास की हत्या कर उनकी लाश को अपने घर में गड़वा दिया और श्लोक को अपना
बता इनाम लेने राजदरबार जा पहुंची। पर वह मूढ संस्कृत भाषा से पूर्णतया अंजान थी। उसके अशुद्ध उच्चारण से भेद तुरंत खुल गया। कुमारदास ने सच्चाई उगलवा ली।अपने प्रिय मित्र का ऐसा हश्र देख उसका कलेजा मुंह को आ गया। उसने पूरे विधि विधान से अपने मित्र के पार्थिव शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया। पर इस सारी घटना के लिये वह अपने को माफ नहीं कर पा रहा था। जैसे ही चिता धू-धू कर जलने लगी कुमारदास अपने को रोक नहीं पाया और उसी चिता में कूद अपनी जान दे दी। उसे ऐसा करते देख उसकी पाचों रानियों ने भी उसी चिता में कूद अपने प्राण त्याग दिये।
यह समाधि श्रीलंका की नील बालका नदी के किनारे मातर नामक स्थान पर अवस्थित है। इसे सप्त बोधि के
नाम से जाना जाता है। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में यहां हर साल महाकवि कालिदास का पुण्य पर्व मनाया जाता है।गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
अरे, मेरी आय बढ गयी और मुझे ही पता नहीं चला !!!!
वातानुकूलित कमरे में एक बोर्ड पर एक लकीर होती है, जिसके आगे एक तीर बना होता है। उसी को ऊपर नीचे कर प्रतिशत और आंकड़ों में सब पता चल जाता है कि कितनी मंहगाई कम हुई या किसी की आमदनी कितनी बढी। समझे?
आज ठंड़ कुछ ज्यादा ही थी। चाय की दुकान पर गुरु शिष्य मिल गये। सुविधा के लिये उनका नाम ज्ञानी और अज्ञानी रख लेते हैं। आदत के अनुसार जन्मजात अज्ञानी शिष्य फिर शुरु हो गया।
अज्ञानी : गुरु, ये सरकार समिति, कमेटी वगैरह क्यूं बनाती है? सरकार में तो ऐसे ही काम करने वालों की भरमार होती है।
ज्ञानी : अरे पगले, कभी किसी मामले को वर्षों लटकाने के लिये, कभी विवादास्पद मुद्दे से अपना सर बचाने के लिये और कभी जनता का ध्यान बंटाने के लिये यह सब करना पड़ता है।
अज्ञानी : गुरु पर इसके लिये ज्यादातर लोग अवकाश प्राप्त ही क्यों चुने जाते हैं?
ज्ञानी : मुर्खता की बातें ही करेगा जब करेगा। सब नहीं पर बहुतों को सरकार को भी उपकृत करना पड़ता है। जिंदगी भर वफादार रह कर भी जो ढंग का कुछ नही पा सका उसे ऐसे काम दे दिये जाते हैं। लोगों की भी धारणा रहती है कि सारी उम्र सरकारी काम में रहने से तजुर्बेदार तो होगा ही। अब यह मत कहना कि सरकारी काम तो..............
अज्ञानी : पर गुरु अबकी तो पेट्रोल, गैस दाम बढाऊ समिति के अध्यक्ष महोदय ने कहा है कि देशवासियों की आय बढ गयी है, तो मेरी तो वहीं की वहीं है। यह कैसी बात हुई कि मेरी आय बढी और मुझे ही पता नहीं चला।
ज्ञानी : अरे मुर्ख, यह समझना इतना आसान नहीं है। देख एक वातानुकुलित कमरा होता है। उसमें एक बोर्ड़ लगा रहता है। उस पर एक लकीर बनाते हैं, जिसके आगे एक तीर बना होता है। उसे ही ऊपर-नीचे कर यह लोग पता लगा लेते हैं कि, कितनी आमदनी बढी, कितनी मंहगाई कम हो गयी, स्वास्थ्य सेवाओं में कितनी बढोत्तरी हुई, मृत्यु दर में कितनी कमी आयी, बेरोजगारी कम हो गयी, शिक्षित लोगों का ईजाफा हो गया, भ्रष्टाचार कम हो गया, ईमानदारी बढ गयी, अपराध कम हो गये, सुख-शांति बढ गयी, आदि-आदि। यह सब बैठे-बैठे यह लकीर प्रतिशत और आंकड़ों में बता देती है।
अज्ञानी : पर गुरु उनकी मान भी लें। मेरी ना भी सही औरों की तो आमदनी बढी होगी, पर उसके साथ-साथ मंहगाई भी तो पिछले वर्षों की तुलना में आसमान छू रही है। अब 100 रुपये गैस और करीब 300-400 रुपये पेट्रोल के मासिक खर्च के अलावा जो ट्रकों की ढूलाई से कीमतें बढेंगी उसकी तुलना में कितनी आय बढी होगी आम आदमी की। कोई दुगनी या तिगुनी तो बढ नही गयी होगी?
ज्ञानी : नहीं!! यानि कि!!! अब!!!! अरे तुम्हारा भी तो कोई फर्ज बनता है देश के प्रति। यह मत सोचो कि देश ने तुम्हें क्या दिया, यह देखो कि तुम देश को क्या दे रहे हो।
अज्ञानी : गुरु मुंह मत खुलवाओ। पुरानी बातें मैं नहीं जानता, पर अब तो यह हाल है कि लोगों की जान जा रही है और बदले में जो मिल रहा है उसे मैं भी जानता हूं, तुम भी जानते हो और देश का हर भुग्तभोगी जानता है।
चलता हूं, नहीं तो एक दिन की पगार कट जायेगी, मंदी के नाम पर।
राम, राम।
आज ठंड़ कुछ ज्यादा ही थी। चाय की दुकान पर गुरु शिष्य मिल गये। सुविधा के लिये उनका नाम ज्ञानी और अज्ञानी रख लेते हैं। आदत के अनुसार जन्मजात अज्ञानी शिष्य फिर शुरु हो गया।
अज्ञानी : गुरु, ये सरकार समिति, कमेटी वगैरह क्यूं बनाती है? सरकार में तो ऐसे ही काम करने वालों की भरमार होती है।
ज्ञानी : अरे पगले, कभी किसी मामले को वर्षों लटकाने के लिये, कभी विवादास्पद मुद्दे से अपना सर बचाने के लिये और कभी जनता का ध्यान बंटाने के लिये यह सब करना पड़ता है।
अज्ञानी : गुरु पर इसके लिये ज्यादातर लोग अवकाश प्राप्त ही क्यों चुने जाते हैं?
ज्ञानी : मुर्खता की बातें ही करेगा जब करेगा। सब नहीं पर बहुतों को सरकार को भी उपकृत करना पड़ता है। जिंदगी भर वफादार रह कर भी जो ढंग का कुछ नही पा सका उसे ऐसे काम दे दिये जाते हैं। लोगों की भी धारणा रहती है कि सारी उम्र सरकारी काम में रहने से तजुर्बेदार तो होगा ही। अब यह मत कहना कि सरकारी काम तो..............
अज्ञानी : पर गुरु अबकी तो पेट्रोल, गैस दाम बढाऊ समिति के अध्यक्ष महोदय ने कहा है कि देशवासियों की आय बढ गयी है, तो मेरी तो वहीं की वहीं है। यह कैसी बात हुई कि मेरी आय बढी और मुझे ही पता नहीं चला।
ज्ञानी : अरे मुर्ख, यह समझना इतना आसान नहीं है। देख एक वातानुकुलित कमरा होता है। उसमें एक बोर्ड़ लगा रहता है। उस पर एक लकीर बनाते हैं, जिसके आगे एक तीर बना होता है। उसे ही ऊपर-नीचे कर यह लोग पता लगा लेते हैं कि, कितनी आमदनी बढी, कितनी मंहगाई कम हो गयी, स्वास्थ्य सेवाओं में कितनी बढोत्तरी हुई, मृत्यु दर में कितनी कमी आयी, बेरोजगारी कम हो गयी, शिक्षित लोगों का ईजाफा हो गया, भ्रष्टाचार कम हो गया, ईमानदारी बढ गयी, अपराध कम हो गये, सुख-शांति बढ गयी, आदि-आदि। यह सब बैठे-बैठे यह लकीर प्रतिशत और आंकड़ों में बता देती है।
अज्ञानी : पर गुरु उनकी मान भी लें। मेरी ना भी सही औरों की तो आमदनी बढी होगी, पर उसके साथ-साथ मंहगाई भी तो पिछले वर्षों की तुलना में आसमान छू रही है। अब 100 रुपये गैस और करीब 300-400 रुपये पेट्रोल के मासिक खर्च के अलावा जो ट्रकों की ढूलाई से कीमतें बढेंगी उसकी तुलना में कितनी आय बढी होगी आम आदमी की। कोई दुगनी या तिगुनी तो बढ नही गयी होगी?
ज्ञानी : नहीं!! यानि कि!!! अब!!!! अरे तुम्हारा भी तो कोई फर्ज बनता है देश के प्रति। यह मत सोचो कि देश ने तुम्हें क्या दिया, यह देखो कि तुम देश को क्या दे रहे हो।
अज्ञानी : गुरु मुंह मत खुलवाओ। पुरानी बातें मैं नहीं जानता, पर अब तो यह हाल है कि लोगों की जान जा रही है और बदले में जो मिल रहा है उसे मैं भी जानता हूं, तुम भी जानते हो और देश का हर भुग्तभोगी जानता है।
चलता हूं, नहीं तो एक दिन की पगार कट जायेगी, मंदी के नाम पर।
राम, राम।
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
मणिकर्ण शिवजी की रमण भूमि है.
मणिकर्ण में मंदिर और गुरुद्वारे के लंगर में बनने वाले चावल गर्म पानी के सोतों में पकाए जाते हैं।
"मणिकर्ण", हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र धर्म-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ। जो कुल्लू से 35किमी दूर समुंद्र तट से 1650 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है।
पौराणिक कथा है कि विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा पार्वतीजी घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे। उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी कि वे यहां ग्यारह हजार वर्ष तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही उन्होंने जब काशी की स्थापना की तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट रक्खा। इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं,तथा यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है। इस जगह का" मणिकर्ण" नाम पड़ने की भी एक पौराणिक कथा है।
यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव्र धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। इससे शिवजी क्रोधित हो गये जिससे ड़र कर शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन कान की मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।
यही वह जगह है जहां महाभारत काल मे शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात के रूप मे उससे युद्ध किया था। यहीं पर सिक्ख समुदाय का भव्य गुरुद्वारा भी है जहां देश विदेश से लोग आ पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इसकी स्थापना कैमलपुर, अब पाकिस्तान मे, के निवासी श्री नारायण हरी द्वारा 1940 के आसपास की गयी थी।
थोडी सी हिम्मत, जरा सा जज्बा, नयी जगह देखने-जानने की ललक हो तो एक बार यहां जरूर जाएं।
"मणिकर्ण", हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र धर्म-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ। जो कुल्लू से 35किमी दूर समुंद्र तट से 1650 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है।
पौराणिक कथा है कि विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा पार्वतीजी घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे। उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी कि वे यहां ग्यारह हजार वर्ष तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही उन्होंने जब काशी की स्थापना की तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट रक्खा। इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं,तथा यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है। इस जगह का" मणिकर्ण" नाम पड़ने की भी एक पौराणिक कथा है।
यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव्र धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। इससे शिवजी क्रोधित हो गये जिससे ड़र कर शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन कान की मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।
यही वह जगह है जहां महाभारत काल मे शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात के रूप मे उससे युद्ध किया था। यहीं पर सिक्ख समुदाय का भव्य गुरुद्वारा भी है जहां देश विदेश से लोग आ पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इसकी स्थापना कैमलपुर, अब पाकिस्तान मे, के निवासी श्री नारायण हरी द्वारा 1940 के आसपास की गयी थी।
थोडी सी हिम्मत, जरा सा जज्बा, नयी जगह देखने-जानने की ललक हो तो एक बार यहां जरूर जाएं।
मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010
हिमाचल के मणिकर्ण का श्रीराम मंदिर
हिमाचल का मणिकर्ण वह दिव्य स्थान है जो भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय है। पुराणों के अनुसार शिवजी तथा माता पार्वती ने अपने विवाह के पश्चात 11000 वर्षों तक यहां रमण किया था। भोले भंडारी को तो यह अलौकिक स्थान इतना प्रिय रहा कि उन्होंने काशी में भी अपने स्थान का नाम "मणिकर्णिका" घाट रखा।
इसी मणिकर्ण में श्रीरामजी का एक प्राचीन और अद्भुत मंदिर है। जहां दूर-दूर से लोग आ अपनी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। इस मंदिर के निर्माण की भी एक रोचक कथा है।
सोलहवीं शताब्दी की बात है। हिमाचल के मणिकर्ण इलाके में एक गरीब ब्राह्मण रहा करता था। उस समय कुल्लू प्रदेश के राजा जगत सिंह के कान किसी ने उस ब्राह्मण के खिलाफ यह कह कर भर दिये कि उसके पास अनमोल मोती हैं, जो कि राजकोष में होने चाहिये। ब्राह्मण ने राजा को समझाने की लाख कोशिश की कि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं है, पर राजा ने उसकी एक ना सुनी और तीन दिन के अंदर मोती पेश करने का हुक्म सुना दिया।
लाचार ब्राह्मण ने राजकोप से ड़र कर परिवार समेत आत्महत्या कर ली। तब राजा की आंख खुली। ब्रह्महत्या के कारण उसकी रातों की नींद हराम हो गयी। उसे अपने भोजन में कीड़े नजर आने लगे। यहां तक की वह असाध्य रोग का शिका हो गया। जब कोई हल नहीं निकला तब राजा एक महत्माजी की शरण में गया। उन्होंने उसे अयोध्या से श्रीरामजी की मुर्ती ला वहां स्थापित कर अपना सारा राज-पाट रघुनाथजी को अर्पण कर खुद उनका प्रतिनिधि बन राज करने को कहा। राजा ने वैसा ही किया और अपने जीवन के शेष दिन श्रीरामजी के चरणों में काट वहीं अपने प्राण त्यागे।
वह मंदिर आज भी मणिकर्ण में है। जहां दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। राजा जगत सिंह के वशंज अब भी अपनी परंपरा निभाते हुए रघुनाथजी की चाकर बन सेवा करते हैं। 1981 में एक मंदिर कमेटी का गठन किया गया जो दुनिया भर के श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का रख-रखाव तथा यहां आने वाले भक्तों के रहने, खाने की पूरी सुविधा प्रदान करती है।
कभी भी मणिकर्ण जाने का सौभाग्य मिले तो वहां श्रीराम मंदिर और वहीं स्थित गुरुद्वारे का लंगर खाना ना भूलें।
इसी मणिकर्ण में श्रीरामजी का एक प्राचीन और अद्भुत मंदिर है। जहां दूर-दूर से लोग आ अपनी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। इस मंदिर के निर्माण की भी एक रोचक कथा है।
सोलहवीं शताब्दी की बात है। हिमाचल के मणिकर्ण इलाके में एक गरीब ब्राह्मण रहा करता था। उस समय कुल्लू प्रदेश के राजा जगत सिंह के कान किसी ने उस ब्राह्मण के खिलाफ यह कह कर भर दिये कि उसके पास अनमोल मोती हैं, जो कि राजकोष में होने चाहिये। ब्राह्मण ने राजा को समझाने की लाख कोशिश की कि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं है, पर राजा ने उसकी एक ना सुनी और तीन दिन के अंदर मोती पेश करने का हुक्म सुना दिया।
लाचार ब्राह्मण ने राजकोप से ड़र कर परिवार समेत आत्महत्या कर ली। तब राजा की आंख खुली। ब्रह्महत्या के कारण उसकी रातों की नींद हराम हो गयी। उसे अपने भोजन में कीड़े नजर आने लगे। यहां तक की वह असाध्य रोग का शिका हो गया। जब कोई हल नहीं निकला तब राजा एक महत्माजी की शरण में गया। उन्होंने उसे अयोध्या से श्रीरामजी की मुर्ती ला वहां स्थापित कर अपना सारा राज-पाट रघुनाथजी को अर्पण कर खुद उनका प्रतिनिधि बन राज करने को कहा। राजा ने वैसा ही किया और अपने जीवन के शेष दिन श्रीरामजी के चरणों में काट वहीं अपने प्राण त्यागे।
वह मंदिर आज भी मणिकर्ण में है। जहां दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। राजा जगत सिंह के वशंज अब भी अपनी परंपरा निभाते हुए रघुनाथजी की चाकर बन सेवा करते हैं। 1981 में एक मंदिर कमेटी का गठन किया गया जो दुनिया भर के श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का रख-रखाव तथा यहां आने वाले भक्तों के रहने, खाने की पूरी सुविधा प्रदान करती है।
कभी भी मणिकर्ण जाने का सौभाग्य मिले तो वहां श्रीराम मंदिर और वहीं स्थित गुरुद्वारे का लंगर खाना ना भूलें।
रविवार, 31 जनवरी 2010
इंसानियत की कोई जाति नहीं होती. एक सत्य घटना.
चाहे कोई बंगाली हो, पंजाबी हो, गुजराती हो। उसका प्रदेश चाहे छत्तीसगढ़ हो, उड़ीसा हो या आसाम हो। मानवता या इंसानियत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपसी प्रेम के लिए यह कोई बंधन नहीं है।
शर्मा परिवार पर प्रभू की कृपा थी। दोनों बच्चे बड़े हो गये थे। घर की जिम्मेदारियां कुछ कम हुईं तो श्रीमति कदम शर्मा ने बचे समय के सदुपयोग के लिये घर के पास के ही एक स्कूल में शिक्षिका का पद ग्रहण कर लिया। छोटा सा स्कूल था। छोटी-छोटी तनख्वाह थी। पर घर के नजदीक था और कोई मजबूरी नहीं थी। अच्छा था लोगों से मिलना जुलना हो जाता था और प्रकृति प्रदत्त लियाकत का उपयोग भी हो जाता था। तब कहां किसी को पता था कि आने वाले समय के लिये भगवान ने एक द्वार खोल दिया है।
समय अपनी रफ्तार से चलता जा रहा था। बड़ा बेटा कर्मक्षेत्र में उतर चुका था। छोटे ने एम।बी.ए. की तैयारी कर ली थी। तभी परिवार को जबरदस्त आर्थिक नुक्सान ने आ घेरा। सारी जमा-पूंजी पूरक के रूप में निकल गयी। उसी समय पूना के एक संस्थान से छोटे पुत्र को कोर्स के लिये बुलावा आ गया। दौड़-धूप शुरु हो गयी। जिन बैंकों के लुभावने वादों पर विश्वास कर पैसों के लिये निश्चिंत थे, वे सारे खोखले साबित हुए। इस बात को वे लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं जिन्होंने कभी मजबूरी में इन बैंकों का रुख किया होगा।
दिन पर दिन निकलते जा रहे थे। कुछ इंतजाम नहीं हो पा रहा था। ठीक ही कहा गया है कि जब समय विपरीत होता है तो अपना खुद का साया भी साथ नहीं देता। किसी तरह सिर्फ आधी रकम का इंतजाम हो पाया था।
कदमजी अपने स्टाफ रूम में सर झुकाये बैठीं थीं। आंखें आसुंओं से भरी हुई थीं। कल फीस जमा करने का अंतिम दिन था। एक लायक बेटे का भविष्य जोखिम में पड़ता जा रहा था। कुछ भी सूझ नहीं रहा था। सदा हंसता मुस्कुराता हुआ चेहरा कुम्हलाया हुआ था। तभी एक सहकर्मी ने कक्ष में प्रवेश किया। इनकी हालत देख जैसे ही कारण पूछा वैसे ही इनके सब्र का बांध टूट गया। आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी। आनन-फानन में सारे साथियों में बात फैल गयी। बात का पता सबको था पर समस्या इतनी विकट होगी किसी को अंदाजा नहीं था।
फिर पता नहीं क्या हुआ। एक घंटे के अंदर कमरे की मेज पर ढाई लाख रुपये पड़े थे। नगद और चेक के रूप में। उस छोटे से स्कूल में काम करने वाले कोई धन्ना सेठ तो थे नहीं, पर दिलों में इंसानियत थी, सहयोग की भावना थी, आपसी प्यार का जज्बा था। सबने अपनी क्षमता के अनुसार जितना भी बन पड़ा सहयोग किया था। कदमजी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे।
फिर किसी तरह तटस्थ हो सारे जने हरकत में आए। दौड़-धूप कर ड्राफ्ट वगैरह बनवाया गया और दूसरे दिन पैसे भेज दिये गये। साथ ही कालेज के प्रिंसीपल साहब को फोन पर इसकी जानकारी दे दी गयी जिससे देर होने पर कोई और अड़चन ना खड़ी हो जाये। सब ठीक हो गया। दाखिला मिल गया।
समय चक्र चलता रहा, वर्षों बीत गये। आज बेटा अपने कर्म क्षेत्र में कार्यरत है। कदमजी के बड़े पुत्र का विवाह भी हो चुका है। सुख-शांति स्थापित है। पर उस समय की याद आते ही उनकी आंखें नम हो जाती हैं, विवशता से नहीं कृतज्ञता से।
मन तो मेरा भी भीग जाता है यह सब सुनाते लिखते, क्योंकि कदमजी मेरी पत्नि हैं।
शर्मा परिवार पर प्रभू की कृपा थी। दोनों बच्चे बड़े हो गये थे। घर की जिम्मेदारियां कुछ कम हुईं तो श्रीमति कदम शर्मा ने बचे समय के सदुपयोग के लिये घर के पास के ही एक स्कूल में शिक्षिका का पद ग्रहण कर लिया। छोटा सा स्कूल था। छोटी-छोटी तनख्वाह थी। पर घर के नजदीक था और कोई मजबूरी नहीं थी। अच्छा था लोगों से मिलना जुलना हो जाता था और प्रकृति प्रदत्त लियाकत का उपयोग भी हो जाता था। तब कहां किसी को पता था कि आने वाले समय के लिये भगवान ने एक द्वार खोल दिया है।
समय अपनी रफ्तार से चलता जा रहा था। बड़ा बेटा कर्मक्षेत्र में उतर चुका था। छोटे ने एम।बी.ए. की तैयारी कर ली थी। तभी परिवार को जबरदस्त आर्थिक नुक्सान ने आ घेरा। सारी जमा-पूंजी पूरक के रूप में निकल गयी। उसी समय पूना के एक संस्थान से छोटे पुत्र को कोर्स के लिये बुलावा आ गया। दौड़-धूप शुरु हो गयी। जिन बैंकों के लुभावने वादों पर विश्वास कर पैसों के लिये निश्चिंत थे, वे सारे खोखले साबित हुए। इस बात को वे लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं जिन्होंने कभी मजबूरी में इन बैंकों का रुख किया होगा।
दिन पर दिन निकलते जा रहे थे। कुछ इंतजाम नहीं हो पा रहा था। ठीक ही कहा गया है कि जब समय विपरीत होता है तो अपना खुद का साया भी साथ नहीं देता। किसी तरह सिर्फ आधी रकम का इंतजाम हो पाया था।
कदमजी अपने स्टाफ रूम में सर झुकाये बैठीं थीं। आंखें आसुंओं से भरी हुई थीं। कल फीस जमा करने का अंतिम दिन था। एक लायक बेटे का भविष्य जोखिम में पड़ता जा रहा था। कुछ भी सूझ नहीं रहा था। सदा हंसता मुस्कुराता हुआ चेहरा कुम्हलाया हुआ था। तभी एक सहकर्मी ने कक्ष में प्रवेश किया। इनकी हालत देख जैसे ही कारण पूछा वैसे ही इनके सब्र का बांध टूट गया। आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी। आनन-फानन में सारे साथियों में बात फैल गयी। बात का पता सबको था पर समस्या इतनी विकट होगी किसी को अंदाजा नहीं था।
फिर पता नहीं क्या हुआ। एक घंटे के अंदर कमरे की मेज पर ढाई लाख रुपये पड़े थे। नगद और चेक के रूप में। उस छोटे से स्कूल में काम करने वाले कोई धन्ना सेठ तो थे नहीं, पर दिलों में इंसानियत थी, सहयोग की भावना थी, आपसी प्यार का जज्बा था। सबने अपनी क्षमता के अनुसार जितना भी बन पड़ा सहयोग किया था। कदमजी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे।
फिर किसी तरह तटस्थ हो सारे जने हरकत में आए। दौड़-धूप कर ड्राफ्ट वगैरह बनवाया गया और दूसरे दिन पैसे भेज दिये गये। साथ ही कालेज के प्रिंसीपल साहब को फोन पर इसकी जानकारी दे दी गयी जिससे देर होने पर कोई और अड़चन ना खड़ी हो जाये। सब ठीक हो गया। दाखिला मिल गया।
समय चक्र चलता रहा, वर्षों बीत गये। आज बेटा अपने कर्म क्षेत्र में कार्यरत है। कदमजी के बड़े पुत्र का विवाह भी हो चुका है। सुख-शांति स्थापित है। पर उस समय की याद आते ही उनकी आंखें नम हो जाती हैं, विवशता से नहीं कृतज्ञता से।
मन तो मेरा भी भीग जाता है यह सब सुनाते लिखते, क्योंकि कदमजी मेरी पत्नि हैं।
शनिवार, 30 जनवरी 2010
हँसी के मोती :) :) :) :)
बार में बंते के साथ बैठा संता उचाट सा था। बंता के बहुत पूछने पर बोला कि यार तेरी भाभी से तंग आ गया हूं, रोज-रोज के क्लेश से जीना मुश्किल हो गया है। जी तो करता है कि उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दूं।
तो फेंक दो ना, एक बार में झंझट खत्म होगा। दो पेग चढा चुके बंता ने सलाह दी।
अरे यार, फेंक तो दूं, पर मेरा फ्लैट ग्राउण्ड़ फ्लोर पर है, जब वह फेंकने के बाद अंदर आयेगी तो तुझे तो क्या मुझे भी नहीं पता मेरा क्या होगा।
संता ने सिहरते हुए खुलासा किया।
बाऊजी बार से पूरी तरह टुन्न हो कर बाहर निकले तो गेटकीपर ने सलाम ठोका। बाऊजी ने खुश हो पूछा, आज तक तुम्हें सबसे ज्यादा कितनी टिप मिली है?
हुजुर, सौ रुपये।
अच्छा, यह लो दो सौ रुपये, खुश?
जी साहब। एक जोरदार सलाम के साथ गेटकीपर ने जवाब दिया।
तभी बाऊ जी को कुछ याद आया। उन्होंने पलट कर फिर पूछा, ये सौ रुपये तुम्हें किस कंजूस ने दिये थे?
आपने ही कल दिये थे हुजूर।
प्रवचन करने के बाद पंड़ितजी शराब की बुराईयां बताते हुए बोले कि यह ऐसी चीज है कि यदि पैर से भी छू जाए तो आदमी नरक में जाता है। इतना कह कर उन्होंने संता को इंगित कर पूछा कि हां भाई क्या समझे?
संता ने खड़े हो कर जवाब दिया, पंड़ितजी ऐसी चीज को कोई लात मारेगा तो वह नरक में ही तो जाएगा।
सबेरे-सबेरे पत्नि ने अखबार ला कर पति को दिखाया, लो देखो शराब की कितनी बुराईयां छपी हैं।
अच्छा! कल से बंद। पति ने कहा।
सचमुच शराब बंद? पत्नि ने खुश हो पूछा।
अरे शराब नहीं यह अखबार।
पति ने बुरा सा मुंह बना कर जवाब दिया।
तो फेंक दो ना, एक बार में झंझट खत्म होगा। दो पेग चढा चुके बंता ने सलाह दी।
अरे यार, फेंक तो दूं, पर मेरा फ्लैट ग्राउण्ड़ फ्लोर पर है, जब वह फेंकने के बाद अंदर आयेगी तो तुझे तो क्या मुझे भी नहीं पता मेरा क्या होगा।
संता ने सिहरते हुए खुलासा किया।
बाऊजी बार से पूरी तरह टुन्न हो कर बाहर निकले तो गेटकीपर ने सलाम ठोका। बाऊजी ने खुश हो पूछा, आज तक तुम्हें सबसे ज्यादा कितनी टिप मिली है?
हुजुर, सौ रुपये।
अच्छा, यह लो दो सौ रुपये, खुश?
जी साहब। एक जोरदार सलाम के साथ गेटकीपर ने जवाब दिया।
तभी बाऊ जी को कुछ याद आया। उन्होंने पलट कर फिर पूछा, ये सौ रुपये तुम्हें किस कंजूस ने दिये थे?
आपने ही कल दिये थे हुजूर।
प्रवचन करने के बाद पंड़ितजी शराब की बुराईयां बताते हुए बोले कि यह ऐसी चीज है कि यदि पैर से भी छू जाए तो आदमी नरक में जाता है। इतना कह कर उन्होंने संता को इंगित कर पूछा कि हां भाई क्या समझे?
संता ने खड़े हो कर जवाब दिया, पंड़ितजी ऐसी चीज को कोई लात मारेगा तो वह नरक में ही तो जाएगा।
सबेरे-सबेरे पत्नि ने अखबार ला कर पति को दिखाया, लो देखो शराब की कितनी बुराईयां छपी हैं।
अच्छा! कल से बंद। पति ने कहा।
सचमुच शराब बंद? पत्नि ने खुश हो पूछा।
अरे शराब नहीं यह अखबार।
पति ने बुरा सा मुंह बना कर जवाब दिया।
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