pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

एक महान संगीतकार की उपेक्षित समाधि

बैजू, जिसके संगीत में पत्थर को भी पिघला देने की क्षमता थी, जिसका गायन सुन लोग जड़वत खड़े रह जाते थे, जिसने अपने समय के महान संगीतकार तानसेन को भी पराजय का मुख देखने को विवश कर दिया था। (कुछ इतिहासकारों के अनुसार दोनों का समय अलग-अलग था) आज उसकी समाधि की खोज-खबर लेने वाला भी कोई नहीं है। उसी ग्वालियर शहर में जहां हर साल तानसेन समारोह बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है वहीं के घोरपोड़े बाड़े में स्थित एक हद तक गुमनाम सी बैजू की समाधि अपनी उपेक्षा का दर्द झेल रही है। यहां तक की बहुतेरे ग्वालियर वासियों को भी इस जगह का पता नहीं है। इस बाड़े में दो समाधियां हैं। आजकल यहां की देख-रेख करने वाले एक धोबी परिवार के अनुसार दूसरी समाधि बैजू की पत्नी की है। समाधि पर होने वाली चूने की पोताई के कारण उस पर लिखे आलेख को अपठनीय बना दिया है।

कहते हैं वर्षों पहले यहां काफी रौनक हुआ करती थी। हर नया गाना सीखने वाला यहां आकर अपनी सफलता की मन्नौति मांगता था। इन्हीं समाधियों के पास एक नीम का पेड़ हुआ करता था, जिसकी दो-तीन पत्तियां खाने से गाने के कारण बैठा हुआ गला बिल्कुल ठीक हो जाता था। पर रोज-रोज की बढती भीड़-भाड़ से तंग आ कर यहां के तत्कालीन मालिक घोरपोड़े ने उस पेड़ को जड़ से ही उखड़वा दिया था।

आज जो धोबी परिवार इन समाधियों की सार-संभार कर रहा है, उसका गीत-संगीत से दूर-दूर का रिश्ता नहीं है पर पूरा परिवार बैजू को अपना कुलदेवता मानता है और जितना बन पड़ता है उतना रख-रखाव कर रहा है।

शनिवार, 22 अगस्त 2009

विवेकजी, बीडी पीना शायद उतना बुरा न भी हो (-:

विवेक जी ने बीडी पीने के लिये ब्रेक भी लिया और उसकी बुराईयां भी गिना दीं। पर उन दद्दाजी के दुखडे को भी जान लें जिन्होंने वर्षों पहले धूंआ पीना छोड़ दिया था। अपनी धर्म पत्नि के कहने पर।
एक दिन अचानक एक वृद्ध दंपति के जीवन का फुलस्टाप एक ही दिन एक ही समय आ गया। दोनो जने धर्मपरायण, सीधे-सच्चे, ईश्वर भक्त थे सो उन्हें सीधे स्वर्ग मे स्थान मिल गया। अब वहां मौजां ही मौजां। ना खाने-पीने की चिंता, ना हारी बिमारी का डर। चारों ओर शांति ही शांति, एक सा मनभावन मौसम। सकून भरी आराम दायक दिनचर्या।
पर दूसरे ही दिन वह भला आदमी, जिसने जीते-जी कभी अपनी पत्नि से एक शब्द भी जोर से नहीं कहा था, लड़ने लग गया। तुम्हारे कारण मेरी खुशियां छिन गयीं। तुम्हारी बेवकूफी से मैं आनंद से महरूम रहा, इत्यादि-इत्यादि।
बेचारी उसकी धर्मपत्नि भी हैरान-परेशान कि मैंने ऐसा क्या कर दिया। आसपास घूमते और लोग भी इकठ्ठा हो गये। तभी एक देवदूत ने उस भले आदमी से पूछा कि क्या हो गया? क्यों खफा हो रहे हो? तो वह भला आदमी बोला, अजी इस औरत ने बीस साल पहले मेरी बीड़ी-सिगरेट छुड़वा दी थी, नहीं तो मैं यहां पहले ना आ जाता।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

संसार की सबसे छोटी कहानियों में से एक

संसार की सबसे छोटी कहानी, 'ओ हेनरी' की इस कहानी में वह सब कुछ है जो एक उम्दा कहानी में होना चाहिये :-
ट्रेन के प्रथम दर्जे के डिब्बे में दो यात्री सफर कर रहे थे। एक अखबार पढ रहा था दूसरा खिड़की के बाहर के पीछे भागते दृष्यों को देख रहा था। तभी दूसरे ने अखबार वाले से पूछा, क्या आप भूतों में विश्वास करते हैं? नहीं। पहले ने जवाब दिया। अगले क्षण पहले ने अखबार हटा सामने देखा तो वहां कोई नहीं था।

'ओ हेनरी'

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

शम्मी कपूर, भारत के पहले इंटरनेट गुरु

शम्मी कपूर! जी हां, शम्मी कपूर। बहुत से लोगों को यह जान कर हैरत होगी कि शम्मीजी 1988 से कम्प्यूटर और इंटरनेट का लगातार इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इस तरह भारत में इस टेक्नोलोजी का सबसे पहले उपयोग करने वाले इने-गिने लोगों में उनका स्थान है। आज यह 80 वर्षीय इंसान फ़िल्म जगत का सबसे अधिक पारंगत कम्प्यूटर यूजर है।
जब पहली बार वे कम्प्यूटर और प्रिंटर घर लाए थे तो दिन भर उस पर अपने प्रयोग करते रहते थे। एक बार उनके दामाद केतन देसाई के साथ अनिल अंबानी उनके घर आए तो सारा ताम-झाम देख कुछ समझ ना पाये और पूछ बैठे कि क्या शम्मी अंकल ने घर पर ही डेस्क-टाप पब्लिशिंग शुरू कर दी है। इतने बडे ओद्योगिक समूह रिलायंस के अनिल अंबानी द्वारा ऐसा सवाल यह दर्शाता है कि उस जमाने में पर्सनल कम्प्यूटर नाम की किसी चीज से लोग कितने अनभिज्ञ थे।
इसीसे यह तथ्य भी पुख्ता होता है कि शम्मीजी भारत में कम्प्यूटर और इंटरनेट के घरेलू उपयोग को बढ़ावा देने वाले रहे हैं। इसीलिए उन्हें भारत का पहला इंटरनेट गुरू या साइबरमैन कह कर पुकारा जाता है। इसी शौक से उन्हें अपने पचास साल पुराने दोस्त, जो विभाजन के पश्चात पाकिस्तान चले गये थे, से संपर्क साधने का मौका मिला और आज दोनो दोस्तों की फिर खूब छनती है इंटरनेट पर।
इस तकनीक को धन्यवाद जिसने इस दोस्ती को फिर जिंदा कर दिया। यही तकनीक आज बहुत से ऐसे लोगों को दुबारा मिलाने की जिम्मेदार है जो किन्हीं कारणों से एक दुसरे से बिछुड गये हैं।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

पहले स्वतन्त्रता दिवस पर गांधीजी कहाँ थे ?

15 अगस्त 1947, सारी धरती, सारा आकाश, स्त्री-पुरुष, अबाल-वृद्ध सब जने ड़ूबे हुए थे आनन्दसागर मे, हर देशवासी सैंकडों सालों से प्रतिक्षित आजादी को अपने सामने पा खुशी के मारे बावरा बन गया था। देश का बच्चा-बच्चा जिस दिन खुशी से पागल हो उठा था, उस दिन इस जश्न का पैरोकार, इस उत्सव का सुत्रधार, इस स्वप्न को मूर्तरूप देने वाला शिल्पी, देश के एक कोने मे स्थित कलकत्ता मे, अमन चैन की रक्षा हेतु उपवास और प्रार्थना कर रहा था।

महात्मा गांधी ने आजादी की खुशी मे मनाए जा रहे किसी भी समारोह मे भाग नहीं लिया। उनके लिये यह 15 अगस्त भी आम दिनों की तरह ही रहा। रमजान का महीना था। लोग बापू के प्रति आदर व्यक्त कर अपना रोजा खोलना चाहते थे। सो बापू अन्य दिनों की अपेक्षा और जल्दी सो कर उठ गये थे। सुबह आने वालों मे हिंदू भी थे। गांधीजी सबसे मिले। फिर गीता का पाठ करने लगे। इसके बाद सदा की तरह प्रात: भ्रमण के लिए निकल पडे। सडकों पर उनके दर्शन के लिए भीड एकत्रित थी। करीब आठ बजे बापू लौटे और एकत्रित जनों से कहा कि आज हमें आजादी मिली है परन्तु इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारी भी बढ गयी है। जिस चरखे ने हमें आजादी दिलाई है उसे हमे नहीं भूलना है। उपवास से हमारा शरीर शुद्ध होता है। इस प्रकार हमें शुद्ध होकर प्रभू से प्रार्थना करनी है कि वे हमें आजादी के काबिल बनाएं। यह हमारी परीक्षा की घड़ी है।

गांधीजी का एक अलग ही सपना था, आजादी को लेकर, वे चाहते थे कि सारे भारतवासी अपने आप को आजादी के काबिल बनाएं। उनका कहना था कि हमें प्रभू को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हम गरीब भारतवासियों के बलिदान का फ़ल दिया है। आजादी का दिन हमारी परीक्षा का दिन है। इस दिन सब उपवास रखें। चरखा चलाएं। किसी तरह की गडबडी ना हो। आजादी के लिए रोशनी के द्वारा समारोह करना उचित नहीं है। जबकि देश की जनता के पास प्रयाप्त अनाज, तेल और कपडा नहीं है। बापू नहीं चाहते थे कि 1946 की पुनरावृती हो। फिर भी कलकत्ता अशांत हो गया था और उन्हें आजादी का पहला दिन वहीं बिताना पडा था। अमन-चैन की बहाली के वास्ते। बापू प्रार्थना मे मुश्किल से ध्यान लगा पा रहे थे क्योंकि हजारों लोग उनसे मिलने और यह कहने आ रहे थे कि उन्हीं के कारण देश यह दिन देख सका है। इस कारण वे कुछ नाराज से हो गये और उन्होंने भवन का मुख्य द्वार बंद करवा दिया। बाद मे बंगाल सरकार के मंत्रीगण उनसे मिलने आए तो बापू ने स्पष्ट शब्दों मे उनसे कहा कि आज आपने अपने सर पर कांटों का ताज पहना है। सत्ता बेहद बुरी चीज है। आपको गद्दी पर बैठ कर सदा चौकस रहना होगा। आपको सत्यवादी, अहिंसक, विनम्र तथा सहनशील होना होगा। धन-दौलत-सत्ता के लालच मे नहीं फंसना है। आप गरीबों की सेवा के लिए हैं। अंग्रेजों के शासन की परीक्षा तो खत्म हो गयी है अब हमारी परीक्षा का कोई अंत नही ईश्वर आपकी मदद करे। लाख बुलाने पर भी गांधीजी किसी समारोह मे नहीं गये।

शाम को प्रार्थना सभा मे जबरदस्त भीड़ थी। प्रार्थना के बाद उन्होंने फिर जनता को संबोधित कर कहा कि आज आजादी का पहला दिन है। राजाजी गवर्नर हो गए हैं। लोगों ने सोचा कि अब आजादी मिल गयी है, सो उन्होंने राजाजी के घर पर कब्जा जमा लिया। यह अच्छी बात है कि लोग जान गये हैं कि सबको समानता का अधिकार है, पर यह दुख की बात है कि वे सोचने लगे हैं कि उन्हें मनचाहा काम करने, चीजों को तोडने-फ़ोडने और नष्ट करने की भी आजादी मिल गयी है। जनता ऐसा काम ना कर, खिलाफ़त आंदोलन के समय जैसी एकता दर्शाई थी वैसी ही भावनाएं बनाए रखे। उस शाम गांधीजी के साथ सुहरावर्दी भी थे, उन्होने भी बापू के बाद सभा को संबोधित करते हुए हिन्दु-मुसलिम एकता की दुहाई दी, सबने मिल कर जय-हिंद का नारा बुलंद किया। गांधीजी के चेहरे पर उस दिन पहली बार मुस्कान की आभा दिप्त हुई। फिर बहुत अनुरोध करने पर बापू शहर मे की गयी रोशनी देखने निकले। लोगों का सैलाब उनकी ओर उमड पडा। छोटे-छोटे बच्चे बेहद आतुरता से उनके हाथ थामने को लपकते रहे। भीड उन पर गुलाब की पंखुडियों की बौछार करती रही। करीब दस बजे बेहद थक कर गांधीजी लौटे और बिना किसी से बात किए सोने चले गये।

स्वतंत्र भारत की नियती से स्वतंत्रता संग्राम के महानायक की यह पहली मुठभेड थी।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

दीपिका पादुकोण को देख मन कुढ़ता है

कभी-कभी आपने देखा होगा कि क्रिकेट में बुरी तरह हार जाने के बावजूद एक ऐसा विज्ञापन आता रहता था, जिसमें इरफान की बाल आग उगल रही होती है, विरेन्द्र सहवाग के बैट से छू कर बाल मैदान के बाहर जा रही होती है और धोनी असंभव सा कैच लेने में सफल होता है और आप भारत की हार, जिसने टीम को प्रतियोगिता से बाहर करवा दिया था, को याद कर कुढते रहते हैं।
ऐसा ही कुछ पिछले एक पखवाड़े से मेरे साथ हो रहा था, #दीपिका_पादुकोंण_को_खम-खा-कर #BSNL का प्रचार करते देख। उसके अनुसार #BSNL पूरे "इंडिया" को लाइटिनिंग युग में ले जायेगा। हर चीज विद्युत की तेजी से सम्पन्न हो जाया करेगी। अब बताईये जिसका फोन पिछले 14 दिनों से कोमा में पड़ा हो, जिसका चोंगा घर का हर सदस्य दिन में दर्जनों बार धड़कन वापस आने की उम्मीद से उठाता हो, जिसकी मधुर ध्वनी सुनने के लिये सब के कान चौबीसों घंटे उसकी ओर लगे हों उनके दिल पर क्या बीतती होगी यह सब देख-सुन कर। जी हां पूरे चौदह दिनों से मेरा फोन कोमा में है। इसके डाक्टरों को पूछ-पूछ कर हार गया कि ऐसा कौन सा फ्लू इसे हो गया है जो इसकी बोलती बंद है। पर आज तक किसी डाक्टर ने सही जवाब दिया है जो यह बताते। रोज कल-कल करते कितने कल निकल गये यह सच साबित करते हुए कि क्या कभी कल भी आया है।
इधर यह हालत है कि मैं आप लोगों से ना मिल पाने की वजह से गम खाये जा रहा हूं। यह जानते हुए भी कि मेरे वहां ना जाने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, पर वहां ना होने की वजह से मुझे जो फर्क पड़ा उसे कैसे बताऊं। सोचता हूं कि क्यूं एक छोटे से इलाके के कुछ सौ फोनों को सुधारने में सैकड़ों घंटे लग जाते हैं सरकारी मशीनरी को। जब की ना इस बार इतना पानी ही बरसा कि जल-थल हो जाये। दूसरी ओर निजी कंपनियों के कर्मचारी दिन-रात एक कर देते हैं एक-एक फोन को काम करवाते रखने के लिये। उत्तर भी मिल जाता है इस कहानी से -
एक बार एक शेर एक खरगोश को अपना शिकार बनाने के लिये उस पर झपटा। काफी दौड़ने के बाद भी वह शेर के हाथ नहीं आया। उसके लौटने पर शेरनी ने पूछा कि तुम एक अदने से खरगोश को क्यों नहीं पकड़ पाये? शेर ने जवाब दिया , मैडम वह अपनी जिंदगी बचाने के लिये दौड़ रहा था, जबकि मैं उसे खाने के लिये।

रविवार, 9 अगस्त 2009

"उज्जैन" के ब्लॉगर बंधु

अगले हफ्ते मेरा उज्जैन जाना हो सकता है। मेरी हार्दिक इच्छा है की मैं वहाँ के ब्लॉगर बंधुओं से मिलूँ। सो वहाँ रहने वाले सारे ब्लॉगर भाई-बहन अपना पता मुझे भेजने की कृपा करें।
मेरी आप सब भाई बहनों से भी प्रार्थना है कि आप वहाँ रहने वाले, जिनका भी नाम और पता जानते हों उनका परिचय मुझसे करवाने का कष्ट करें। अच्छा लगेगा इस तरह सबसे परिचय करके, अपने दोस्त-मित्रों का दायरा बढ़ा कर, अनदेखे अपनों को सामने पाकर।
आशा है आपका सहयोग मिल पायेगा।

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