pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 17 अगस्त 2009

दीपिका पादुकोण को देख मन कुढ़ता है

कभी-कभी आपने देखा होगा कि क्रिकेट में बुरी तरह हार जाने के बावजूद एक ऐसा विज्ञापन आता रहता था, जिसमें इरफान की बाल आग उगल रही होती है, विरेन्द्र सहवाग के बैट से छू कर बाल मैदान के बाहर जा रही होती है और धोनी असंभव सा कैच लेने में सफल होता है और आप भारत की हार, जिसने टीम को प्रतियोगिता से बाहर करवा दिया था, को याद कर कुढते रहते हैं।
ऐसा ही कुछ पिछले एक पखवाड़े से मेरे साथ हो रहा था, #दीपिका_पादुकोंण_को_खम-खा-कर #BSNL का प्रचार करते देख। उसके अनुसार #BSNL पूरे "इंडिया" को लाइटिनिंग युग में ले जायेगा। हर चीज विद्युत की तेजी से सम्पन्न हो जाया करेगी। अब बताईये जिसका फोन पिछले 14 दिनों से कोमा में पड़ा हो, जिसका चोंगा घर का हर सदस्य दिन में दर्जनों बार धड़कन वापस आने की उम्मीद से उठाता हो, जिसकी मधुर ध्वनी सुनने के लिये सब के कान चौबीसों घंटे उसकी ओर लगे हों उनके दिल पर क्या बीतती होगी यह सब देख-सुन कर। जी हां पूरे चौदह दिनों से मेरा फोन कोमा में है। इसके डाक्टरों को पूछ-पूछ कर हार गया कि ऐसा कौन सा फ्लू इसे हो गया है जो इसकी बोलती बंद है। पर आज तक किसी डाक्टर ने सही जवाब दिया है जो यह बताते। रोज कल-कल करते कितने कल निकल गये यह सच साबित करते हुए कि क्या कभी कल भी आया है।
इधर यह हालत है कि मैं आप लोगों से ना मिल पाने की वजह से गम खाये जा रहा हूं। यह जानते हुए भी कि मेरे वहां ना जाने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, पर वहां ना होने की वजह से मुझे जो फर्क पड़ा उसे कैसे बताऊं। सोचता हूं कि क्यूं एक छोटे से इलाके के कुछ सौ फोनों को सुधारने में सैकड़ों घंटे लग जाते हैं सरकारी मशीनरी को। जब की ना इस बार इतना पानी ही बरसा कि जल-थल हो जाये। दूसरी ओर निजी कंपनियों के कर्मचारी दिन-रात एक कर देते हैं एक-एक फोन को काम करवाते रखने के लिये। उत्तर भी मिल जाता है इस कहानी से -
एक बार एक शेर एक खरगोश को अपना शिकार बनाने के लिये उस पर झपटा। काफी दौड़ने के बाद भी वह शेर के हाथ नहीं आया। उसके लौटने पर शेरनी ने पूछा कि तुम एक अदने से खरगोश को क्यों नहीं पकड़ पाये? शेर ने जवाब दिया , मैडम वह अपनी जिंदगी बचाने के लिये दौड़ रहा था, जबकि मैं उसे खाने के लिये।

रविवार, 9 अगस्त 2009

"उज्जैन" के ब्लॉगर बंधु

अगले हफ्ते मेरा उज्जैन जाना हो सकता है। मेरी हार्दिक इच्छा है की मैं वहाँ के ब्लॉगर बंधुओं से मिलूँ। सो वहाँ रहने वाले सारे ब्लॉगर भाई-बहन अपना पता मुझे भेजने की कृपा करें।
मेरी आप सब भाई बहनों से भी प्रार्थना है कि आप वहाँ रहने वाले, जिनका भी नाम और पता जानते हों उनका परिचय मुझसे करवाने का कष्ट करें। अच्छा लगेगा इस तरह सबसे परिचय करके, अपने दोस्त-मित्रों का दायरा बढ़ा कर, अनदेखे अपनों को सामने पाकर।
आशा है आपका सहयोग मिल पायेगा।

हंसी न भी आयी तो मुस्कराहट तो जरूर आयेगी.

संता, बंता तथा कंता पुलिस में भर्ती होने गये। उनको अपराधियों की शिनाख्त करने के लिये एक फोटो दिखाई गयी जिसमें एक आदमी का बगल से खिंचा गया चित्र था। पहले कंता से पूछा गया कि इस आदमी की क्या खासियत है? इसे कैसे पहचानोगे? कंता बोला, अरे यह तो बहुत आसान है। इस आदमी का एक ही कान है। इसे तुरंत पहचान लूंगा। सामने वाले ने अपना सिर पीट लिया। इसके बाद बंता को बुला कर उससे भी वही सवाल पूछा गया, उसने भी झट से जवाब दिया कि एक आंख वाले को पकड़ने और पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है। साक्षात्कार लेने वाला झल्ला कर बोला, कैसे बेवकूफ हो तुम्हें इतना भी नहीं पता कि यह साइड पोज है। चलो भागो यहां से। चले आते हैं पुलिस में काम पाने। अब संता की बारी थी। उसको बुला कर भी वही सवाल पूछा गया, कि इस आदमी को कैसे पहचानोगे? संता ने गौर से फोटो देखी और बोला, मैं इसे पहचान लूंगा, क्योंकि इसने कान्टेक्ट लेंस लगाया हुआ है। साक्षात्कार लेने वाला हैरान। यह बात तो उसे भी मालुम नहीं थी। तुरंत फाइलें खंगाली गयीं तो पाया गया कि संता का कहना सही है। सबने उसकी सूझ-बूझ की बड़ी प्रशंसा की। फिर ऐसे ही उससे पूछ लिया गया कि उसे यह बात कैसे पता चली। संता बोला, जी यह तो कामन सेंस की बात है। एक आंख वालों की नज़र कमजोर होती है और इस बेचारे का कान भी एक ही है तो यह चश्मा तो पहन नहीं सकता। जाहिर है यह कांटेक्ट लेंस ही लगाता होगा।
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एक बार संता पर भगवान की कृपा हो गयी। भगवान ने कहा कि तुम्हें दो चीजों में से कोई एक चीज मिल सकती है, या तो तुम सारे जमाने की अक्ल ले लो या फिर दस करोड़ रुपये। संता ने अक्ल मांग ली। प्रभू ने उसकी इच्छा पूरी कर दी। दूसरे दिन वह उदास बैठा था। उसकी बीवी ने जब उसकी उदासी का कारण पूछा तो वह बोला, 'भागवान मुझे रुपये लेने चाहिये थे'।
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एक बार पागलखाने के डाक्टरों को लगा कि उनके तीन मरीज ठीक हो गये हैं। फिर भी उन्हें घर भेजने के पहले एक टेस्ट कर लेना उचित समझा गया। तीनों को एक खाली स्विंमींग पूल पर ले जाकर डाक्टर ने कहा, पूल में छलांग लगाओ। यह सुनते ही दो पागल कूद पड़े और चोट खा बैठे। डाक्टर ने तीसरे की तरफ देख कहा कि तुम बिल्कुल ठीक हो गये हो लगता है पर यह बताओ कि तुम क्यूं नहीं कूदे?
मुझे तैरना कहां आता है। तीसरे ने मासूमियत के साथ जवाब दिया।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

भेडिए की दादागिरी

एक बहुत पुरानी कहानी है, पर यह पूरी तरह आज अमेरिका के चरित्र को उजागर करती है :-
एक मेमना एक झरने से पानी पी रहा था। तभी उससे काफी उंचाई पर एक भेडिया कहीं से घूमता-घामता आ पहुंचा। मेमने को देखते ही उसके मुंह में पानी आ गया और वह उसे मारने का बहाना बनाते हुए मेमने को डांटते हुए बोला, अरे बेवकूफ तू मेरे पीनेवाले पानी को जूठा क्यों कर रहा है? बेचारे मेमने की हालत तो भेड़िये को देख ऐसे ही खराब हो गयी थी, फिर भी उसने साहस कर कहा, कि पानी तो ऊपर से नीचे की ओर आ रहा है, मैं उसे जूठा कैसे कर सकता हूं। यह सुन भेड़िया एकबार तो सकपका गया पर उसे तो मेमने को अपना शिकार बनाना था। झुंझला कर भेड़िये ने कहा, चलो ठीक है पर यह तो बता कि पिछले साल तूने मुझे गाली क्यूं दी थी। मेमना कुछ संभल गया था। उसने जवाब दिया, मैं पिछले साल आपको गाली कैसे दे सकता था, मैं तो अभी आठ महीने का ही हूं। अपना वार खाली जाते देख भेड़िया बुरी तरह गुस्से में आ गया और बोला, साले तूने नहीं तो तेरे बाप ने मुझे गाली दी होगी। इतना कह भेड़िये ने झपट कर मेमने को दबोच लिया और उसका काम तमाम कर दिया।
आज दुनिया में अमेरिका का रवैया भी उस भेड़िये से मिलता-जुलता है। जो भी उसके खिलाफ खड़ा होने या उसकी बात ना मानने की जुर्रत करता है, उसका हश्र कुछ-कुछ उस गरीब मेमने सा ही हो जाता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

एक "बोगस" शब्द का जन्म

आजकल हमारे यहां नकली नोटों ने अफरातफरी मचा रखी है। पर इन्हीं नकली नोटों ने वर्षों पहले अंग्रेजी डिक्शनरी को एक नया शब्द दिया था। "BOGUS"
बात 1827 की है। अमेरिकी सरकार भी नकली नोटों के चलन से परेशान थी। रोज कहीं ना कहीं छापे पड़ते थे, लोग पकड़े जाते थे। ऐसे ही पुलिस ने एक जगह छापा मार कर नकली नोट छापने वालों को तो पकड़ा ही उनका सारा सामान भी तहस-नहस कर दिया। उनकी नोट छापने वाली मशीन को भी सड़क पर फेंक दिया। जिसे देखने के लिये भीड़ एकत्रित हो गयी। मशीन की बनावट कुछ अजीब सी थी जिसे देख कर भीड़ में से किसी ने कह दिया कि क्या 'ओगस-बोगस' सी मशीन है। दूसरे दिन जब अखबार में खबर छपी तो उसने मशीन का नाम ही बोगस प्रेस लिख दिया। तब ही से यह शब्द अस्तित्व में आया और आज इसका व्यापक रूप मे इस्तेमाल हो रहा है।

पोस्ट बोगस तो नहीं है ? (-:

रविवार, 2 अगस्त 2009

माँ की खिल्ली उडाता एक विज्ञापन

सीन, एक :- एक लड़की घर से निकल रही है। पीछे से आवाज आती है, बाहर बाल खुले मत छोड़ना। तभी वह बाला अपने सारे बालों को लहरवा देती है।
सीन, दो :- वही कन्या आफिस में प्रवेश करती है। पीछे से हिदायत भरी आवाज सुनाई देती है, आफिस में बाल खुले मत रखना। सुनते ही सर को झटका दे वह अपने सारे बालों को आजाद कर देती है।
सीन, तीन :- मां अपने सामने बैठी अपनी लाड़ली के बालों को निहारते हुए फूली नहीं समाती, अपनी सलाहों पर। उधर लड़की मुस्कुराती है, माँ के भोलेपन और अपनी चतुराई पर।
यह एक शैंपू का विज्ञापन है। पता नहीं आज अपना सामान बेचने के लिये, अपना उत्पाद घर-घर पहुंचाने के लिये ज्यादातर कंपनियां मां-बाप को अज्ञानी, समय से पिछड़ा हुआ दिखाने पर क्यों तुली रहती हैं। ये कैसी सोच है? ऐसा भी तो हो सकता था कि मां कहती, बेटा हम फलाना शैंपू प्रयोग में लाते आ रहे हैं, इससे ना कभी मुझे बालोँ की चिंता करनी पड़ी ना तुम्हें पड़ेगी। पर विज्ञापन बनाने वाले अधकचरे दिमागों में यह बात गहराई तक पैठ गयी है कि अवहेलना, उद्दंड़ता, लापरवाही ही आज सफलता का मापदंड़ हो गयी है।
पर कौन और कैसे कोई समझाये किसी को कि यदि क्रीमों से ही इंसान सुंदर और गोरा-चिट्टा होने लग जाता तो आज अफ़्रीका में कोई काले रंग का ना बचा होता। (-:

शनिवार, 1 अगस्त 2009

बरसात में सजीव हो उठता है मांडू

मुगल सेनापति बाज बहादुर और रूपमति की प्रेम गाथाओं को अपने दामन में समेटे, मध्यप्रदेश के धार जिले में विंध्य पर्वत की गोद में स्थित 22किमी के क्षेत्र में बसा मांडव या मांडवगढ या मांडू आज भी ऐसी-ऐसी इमारतों और प्राकृतिक दृष्यों को सहेजे खड़ा है, जो वास्तुकला और प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम मिसाल हैं। 1405-1434 में होशंग शाह के राज्य में यह अपने चर्मोत्कर्ष पर था। उसने ही स्वतंत्र मांडव राज्य की स्थापना की थी। परंतु मुगलों के आगमन से ही इसका पराभव शुरु हो गया था। परंतु आज भी इसका वैभव देख इसकी सुंदरता का अंदाज आसानी से लग जाता है। बरसात के दिनों में तो यहां स्वर्ग उतर आता है। यहां की वादियां, घाटियां, चारों ओर फैली हरियाली मानो जिवंत हो पर्यटकों को एक जादुई दुनियां में ले जाती है।
यहां का सबसे बड़ा आकर्षण, झीलों के बीच बना जहाज महल, सुंदरता का बेजोड़ नमूना है। इस पर बने रानी रूपमती के झरोखे से, जहां पर्वत श्रृंखला खत्म हो जाती है और सामने खुला मैदान नजर आता है। दूर नर्मदा नदी एक लकीर की तरह नजर आती है। कहते हैं कि बिना नर्मदा के दर्शन किये रूपमती जल ग्रहण नहीं करती थी। इसीलिये बाज बहादुर ने यहां नर्मदा के दर्शन हेतु यह झरोखा बनवाया था।
मांडू अपने महलों के लिये विख्यात है यहां देखने लायक बहुत सी इमारतें हैं। जिनमें बाज बहादुर महल, हिंडोला महल, मुंज महल, हाथी महल , जामा मस्जिद, अशर्फी महल, चम्पा बावड़ी, रेवा कुंड इत्यादि किसी को भी अपने मोहपाश में बांधने में सक्षम हैं। इनके अलावा यहां का सनसेट पांइट और ईको पांइट भी महसूस करने लायक स्थान हैं। यहां के नीलकंठ महादेव और जैन मंदिर का अपना अलग ही आकर्षण है।
मांडू घूमने में समय की समस्या भी आड़े नहीं आती। दो दिनों में यहां आराम से घूम, बिना जेब पर ज्यादा बोझ डाले भी पूरी जगहें देखी जा सकती हैं। इंदौर से सड़क के रास्ते इसकी दूरी 100किमी है। यहां से हर तरह के वाहन उपलब्ध हैं। अभी मौसम है, हो सके तो मौका मत चूकीये।

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...