pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 9 अगस्त 2009

"उज्जैन" के ब्लॉगर बंधु

अगले हफ्ते मेरा उज्जैन जाना हो सकता है। मेरी हार्दिक इच्छा है की मैं वहाँ के ब्लॉगर बंधुओं से मिलूँ। सो वहाँ रहने वाले सारे ब्लॉगर भाई-बहन अपना पता मुझे भेजने की कृपा करें।
मेरी आप सब भाई बहनों से भी प्रार्थना है कि आप वहाँ रहने वाले, जिनका भी नाम और पता जानते हों उनका परिचय मुझसे करवाने का कष्ट करें। अच्छा लगेगा इस तरह सबसे परिचय करके, अपने दोस्त-मित्रों का दायरा बढ़ा कर, अनदेखे अपनों को सामने पाकर।
आशा है आपका सहयोग मिल पायेगा।

हंसी न भी आयी तो मुस्कराहट तो जरूर आयेगी.

संता, बंता तथा कंता पुलिस में भर्ती होने गये। उनको अपराधियों की शिनाख्त करने के लिये एक फोटो दिखाई गयी जिसमें एक आदमी का बगल से खिंचा गया चित्र था। पहले कंता से पूछा गया कि इस आदमी की क्या खासियत है? इसे कैसे पहचानोगे? कंता बोला, अरे यह तो बहुत आसान है। इस आदमी का एक ही कान है। इसे तुरंत पहचान लूंगा। सामने वाले ने अपना सिर पीट लिया। इसके बाद बंता को बुला कर उससे भी वही सवाल पूछा गया, उसने भी झट से जवाब दिया कि एक आंख वाले को पकड़ने और पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है। साक्षात्कार लेने वाला झल्ला कर बोला, कैसे बेवकूफ हो तुम्हें इतना भी नहीं पता कि यह साइड पोज है। चलो भागो यहां से। चले आते हैं पुलिस में काम पाने। अब संता की बारी थी। उसको बुला कर भी वही सवाल पूछा गया, कि इस आदमी को कैसे पहचानोगे? संता ने गौर से फोटो देखी और बोला, मैं इसे पहचान लूंगा, क्योंकि इसने कान्टेक्ट लेंस लगाया हुआ है। साक्षात्कार लेने वाला हैरान। यह बात तो उसे भी मालुम नहीं थी। तुरंत फाइलें खंगाली गयीं तो पाया गया कि संता का कहना सही है। सबने उसकी सूझ-बूझ की बड़ी प्रशंसा की। फिर ऐसे ही उससे पूछ लिया गया कि उसे यह बात कैसे पता चली। संता बोला, जी यह तो कामन सेंस की बात है। एक आंख वालों की नज़र कमजोर होती है और इस बेचारे का कान भी एक ही है तो यह चश्मा तो पहन नहीं सकता। जाहिर है यह कांटेक्ट लेंस ही लगाता होगा।
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एक बार संता पर भगवान की कृपा हो गयी। भगवान ने कहा कि तुम्हें दो चीजों में से कोई एक चीज मिल सकती है, या तो तुम सारे जमाने की अक्ल ले लो या फिर दस करोड़ रुपये। संता ने अक्ल मांग ली। प्रभू ने उसकी इच्छा पूरी कर दी। दूसरे दिन वह उदास बैठा था। उसकी बीवी ने जब उसकी उदासी का कारण पूछा तो वह बोला, 'भागवान मुझे रुपये लेने चाहिये थे'।
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एक बार पागलखाने के डाक्टरों को लगा कि उनके तीन मरीज ठीक हो गये हैं। फिर भी उन्हें घर भेजने के पहले एक टेस्ट कर लेना उचित समझा गया। तीनों को एक खाली स्विंमींग पूल पर ले जाकर डाक्टर ने कहा, पूल में छलांग लगाओ। यह सुनते ही दो पागल कूद पड़े और चोट खा बैठे। डाक्टर ने तीसरे की तरफ देख कहा कि तुम बिल्कुल ठीक हो गये हो लगता है पर यह बताओ कि तुम क्यूं नहीं कूदे?
मुझे तैरना कहां आता है। तीसरे ने मासूमियत के साथ जवाब दिया।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

भेडिए की दादागिरी

एक बहुत पुरानी कहानी है, पर यह पूरी तरह आज अमेरिका के चरित्र को उजागर करती है :-
एक मेमना एक झरने से पानी पी रहा था। तभी उससे काफी उंचाई पर एक भेडिया कहीं से घूमता-घामता आ पहुंचा। मेमने को देखते ही उसके मुंह में पानी आ गया और वह उसे मारने का बहाना बनाते हुए मेमने को डांटते हुए बोला, अरे बेवकूफ तू मेरे पीनेवाले पानी को जूठा क्यों कर रहा है? बेचारे मेमने की हालत तो भेड़िये को देख ऐसे ही खराब हो गयी थी, फिर भी उसने साहस कर कहा, कि पानी तो ऊपर से नीचे की ओर आ रहा है, मैं उसे जूठा कैसे कर सकता हूं। यह सुन भेड़िया एकबार तो सकपका गया पर उसे तो मेमने को अपना शिकार बनाना था। झुंझला कर भेड़िये ने कहा, चलो ठीक है पर यह तो बता कि पिछले साल तूने मुझे गाली क्यूं दी थी। मेमना कुछ संभल गया था। उसने जवाब दिया, मैं पिछले साल आपको गाली कैसे दे सकता था, मैं तो अभी आठ महीने का ही हूं। अपना वार खाली जाते देख भेड़िया बुरी तरह गुस्से में आ गया और बोला, साले तूने नहीं तो तेरे बाप ने मुझे गाली दी होगी। इतना कह भेड़िये ने झपट कर मेमने को दबोच लिया और उसका काम तमाम कर दिया।
आज दुनिया में अमेरिका का रवैया भी उस भेड़िये से मिलता-जुलता है। जो भी उसके खिलाफ खड़ा होने या उसकी बात ना मानने की जुर्रत करता है, उसका हश्र कुछ-कुछ उस गरीब मेमने सा ही हो जाता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

एक "बोगस" शब्द का जन्म

आजकल हमारे यहां नकली नोटों ने अफरातफरी मचा रखी है। पर इन्हीं नकली नोटों ने वर्षों पहले अंग्रेजी डिक्शनरी को एक नया शब्द दिया था। "BOGUS"
बात 1827 की है। अमेरिकी सरकार भी नकली नोटों के चलन से परेशान थी। रोज कहीं ना कहीं छापे पड़ते थे, लोग पकड़े जाते थे। ऐसे ही पुलिस ने एक जगह छापा मार कर नकली नोट छापने वालों को तो पकड़ा ही उनका सारा सामान भी तहस-नहस कर दिया। उनकी नोट छापने वाली मशीन को भी सड़क पर फेंक दिया। जिसे देखने के लिये भीड़ एकत्रित हो गयी। मशीन की बनावट कुछ अजीब सी थी जिसे देख कर भीड़ में से किसी ने कह दिया कि क्या 'ओगस-बोगस' सी मशीन है। दूसरे दिन जब अखबार में खबर छपी तो उसने मशीन का नाम ही बोगस प्रेस लिख दिया। तब ही से यह शब्द अस्तित्व में आया और आज इसका व्यापक रूप मे इस्तेमाल हो रहा है।

पोस्ट बोगस तो नहीं है ? (-:

रविवार, 2 अगस्त 2009

माँ की खिल्ली उडाता एक विज्ञापन

सीन, एक :- एक लड़की घर से निकल रही है। पीछे से आवाज आती है, बाहर बाल खुले मत छोड़ना। तभी वह बाला अपने सारे बालों को लहरवा देती है।
सीन, दो :- वही कन्या आफिस में प्रवेश करती है। पीछे से हिदायत भरी आवाज सुनाई देती है, आफिस में बाल खुले मत रखना। सुनते ही सर को झटका दे वह अपने सारे बालों को आजाद कर देती है।
सीन, तीन :- मां अपने सामने बैठी अपनी लाड़ली के बालों को निहारते हुए फूली नहीं समाती, अपनी सलाहों पर। उधर लड़की मुस्कुराती है, माँ के भोलेपन और अपनी चतुराई पर।
यह एक शैंपू का विज्ञापन है। पता नहीं आज अपना सामान बेचने के लिये, अपना उत्पाद घर-घर पहुंचाने के लिये ज्यादातर कंपनियां मां-बाप को अज्ञानी, समय से पिछड़ा हुआ दिखाने पर क्यों तुली रहती हैं। ये कैसी सोच है? ऐसा भी तो हो सकता था कि मां कहती, बेटा हम फलाना शैंपू प्रयोग में लाते आ रहे हैं, इससे ना कभी मुझे बालोँ की चिंता करनी पड़ी ना तुम्हें पड़ेगी। पर विज्ञापन बनाने वाले अधकचरे दिमागों में यह बात गहराई तक पैठ गयी है कि अवहेलना, उद्दंड़ता, लापरवाही ही आज सफलता का मापदंड़ हो गयी है।
पर कौन और कैसे कोई समझाये किसी को कि यदि क्रीमों से ही इंसान सुंदर और गोरा-चिट्टा होने लग जाता तो आज अफ़्रीका में कोई काले रंग का ना बचा होता। (-:

शनिवार, 1 अगस्त 2009

बरसात में सजीव हो उठता है मांडू

मुगल सेनापति बाज बहादुर और रूपमति की प्रेम गाथाओं को अपने दामन में समेटे, मध्यप्रदेश के धार जिले में विंध्य पर्वत की गोद में स्थित 22किमी के क्षेत्र में बसा मांडव या मांडवगढ या मांडू आज भी ऐसी-ऐसी इमारतों और प्राकृतिक दृष्यों को सहेजे खड़ा है, जो वास्तुकला और प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम मिसाल हैं। 1405-1434 में होशंग शाह के राज्य में यह अपने चर्मोत्कर्ष पर था। उसने ही स्वतंत्र मांडव राज्य की स्थापना की थी। परंतु मुगलों के आगमन से ही इसका पराभव शुरु हो गया था। परंतु आज भी इसका वैभव देख इसकी सुंदरता का अंदाज आसानी से लग जाता है। बरसात के दिनों में तो यहां स्वर्ग उतर आता है। यहां की वादियां, घाटियां, चारों ओर फैली हरियाली मानो जिवंत हो पर्यटकों को एक जादुई दुनियां में ले जाती है।
यहां का सबसे बड़ा आकर्षण, झीलों के बीच बना जहाज महल, सुंदरता का बेजोड़ नमूना है। इस पर बने रानी रूपमती के झरोखे से, जहां पर्वत श्रृंखला खत्म हो जाती है और सामने खुला मैदान नजर आता है। दूर नर्मदा नदी एक लकीर की तरह नजर आती है। कहते हैं कि बिना नर्मदा के दर्शन किये रूपमती जल ग्रहण नहीं करती थी। इसीलिये बाज बहादुर ने यहां नर्मदा के दर्शन हेतु यह झरोखा बनवाया था।
मांडू अपने महलों के लिये विख्यात है यहां देखने लायक बहुत सी इमारतें हैं। जिनमें बाज बहादुर महल, हिंडोला महल, मुंज महल, हाथी महल , जामा मस्जिद, अशर्फी महल, चम्पा बावड़ी, रेवा कुंड इत्यादि किसी को भी अपने मोहपाश में बांधने में सक्षम हैं। इनके अलावा यहां का सनसेट पांइट और ईको पांइट भी महसूस करने लायक स्थान हैं। यहां के नीलकंठ महादेव और जैन मंदिर का अपना अलग ही आकर्षण है।
मांडू घूमने में समय की समस्या भी आड़े नहीं आती। दो दिनों में यहां आराम से घूम, बिना जेब पर ज्यादा बोझ डाले भी पूरी जगहें देखी जा सकती हैं। इंदौर से सड़क के रास्ते इसकी दूरी 100किमी है। यहां से हर तरह के वाहन उपलब्ध हैं। अभी मौसम है, हो सके तो मौका मत चूकीये।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

? इनका जवाब किसी के पास भी नही है

? सन 1814, सितंबर के महिने में, फ्रांस के एजिन शहर के आसमान पर एक बादल का टुकड़ा उमड़ता है। अचानक एक जोर की आवाज के साथ उसमें से कंकड़- पत्थरों के साथ बारिश होने लगती है।ऐसा ही कुछ सन 2000 में इथोपिया मे भी हुआ था जब आसमान से मछलियों की बरसात हुई थी।

? वर्ष 1821, प्रख्यात भूगर्भशास्त्री डेविड वर्च्यु ने अपने काम के सिलसिले में एक चट्टान की खुदाई की। उसी दौरान करीब 20-25 फुट की गहराई पर उन्होंने एक भूरे रंग के छिपकली नुमा जानवर को दबे पाया। वह मरा हुआ दिख रहा था। पर रोशनी और हवा के मिलते ही वह हिला और भाग गया।

? सन
1908, 30 जून, साईबेरिया के एक प्रांत तुंगुस्का के हाड़ी टापू पर आसमान से आग का एक गोला गिरता है जो तकरीबन आधे टापू पर बिखर जाता है। इसका विस्फोट इतना जोरदार होता है कि टापू के सारे पेड़-पौधों का नमोनिशान मिट जाता है।

? सन 1977, अमेरिका और ब्रिटेन में एक साथ हजारों लोगों ने एक अजीब सी भिनभिनाहट जैसी आवाजें सुनी। इससे हजारों लोग रात को सो नहीं पाये थे।

? जनवरी 1984, रूस का एक विमान अपने गंतव्य की ओर बढ रहा था कि अचानक उसमें एक चमकीली गोल सी वस्तु घुस आयी। अचंभित यात्रियों के सर पर कुछ देर मंडराने के पश्चात यह गायब हो गयी।

? पश्चिमी टेक्सास में हाईवे-90 से कुछ ही दूरी पर आकाश में दिखने वाली रोशनी एक रहस्यमय अजूबा है।

? 80 के दशक में दिल्ली के विश्व्विद्यालय क्षेत्र में एक सीमित जगह को तहस-नहस करने वाला बवंडर अभी तक रहस्य के आवरण में लिपटा हुआ है।

विशिष्ट पोस्ट

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...