मनुष्यों के लिए तो शहर-शहर, गांव-गांव मे चिकित्सालय खुले होते हैं। बड़े शहरों में जानवरों की सेहत के लिए भी इंतजाम होता है। पर क्या आपने पक्षियों के अस्पताल के बारे में सुना है ?
जी हां! इन मासूम परिंदो के लिए देश का पहला चिकित्सालय दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में स्थित जैन मंदिर में खोला गया था। यहां पर लोग अपने बीमार तथा घायल पक्षियों को ला कर उनका उपचार करवाते हैं। यहां अधिकतर पंख कटे पक्षी लाए जाते हैं। बिल्ली-कुत्ते या बड़े शिकारी पक्षियों के शिकार होने से बचे या पतंग की डोर से घायल परिंदों की यहां बच्चों के समान देख-भाल की जाती है। यहां उनकी मरहम-पट्टी कर उन्हें एंटीबायटिक दवाएं दे कर उनकी जान बचाने की कोशिश की जाती है। यहां की सफाई तथा पक्षियों के आहार का विशेष ध्यान रखा जाता है। घायल पक्षी को अलग पिंजरे में रखा जाता है, जिससे अन्य पक्षी उसे नुकसान ना पहुंचा सकें। कुछ ठीक होने पर उसे एक जाली लगे कमरे में छोड़ दिया जाता है। पूर्ण रूप से ठीक होने पर उसे आजाद कर दिया जाता है।
इसी तरह का एक और अस्पताल जयपुर के सांगानेरी गेट के पास भी है। यहां आर्थिक लाभ की अपेक्षा त्याग की भावना से पूरी निष्ठा के साथ इन मूक, मासूम जीवों की निस्वार्थ सेवा कर उन्हें रोग मुक्त करने की चेष्टा की जाती है। यहां कोई भी अपने पालतु पक्षी का इलाज मुफ्त में करा सकता है।
महान थे वे लोग जिन्होंने इस बारे में सोचा और अपनी सोच को अमली जामा पहनाया। साथ ही धन्य हैं वे लोग जो निस्वार्थ रूप से जुड़े हुए हैं इस परोपकारी काम से।
*********************************************
ब्लादिमीर इलिस उलयानोव ने अपने करीब ड़ेढ सौ उपनाम रखे। इन्हीं मे से एक उपनाम से वे विश्व्विख्यात भी हुए।
वह उपनाम था "लेनिन"।
*********************************************
एक समय मैडम क्यूरी को फ्रेंच एकादमी ने अपना सदस्य बनाने से इंकार कर दिया था। कारण था उनका महिला होना।
उसी महिला ने दो-दो बार नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया और ऐसा करने वाली विश्व की पहली महिला बनीं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
सोमवार, 13 अप्रैल 2009
रविवार, 12 अप्रैल 2009
हिड़िंबा, जो राक्षसी से देवी बन पूजी गयी।
जूए में हार जाने के बाद पांड़व अज्ञातवास भुगत रहे थे। जंगलों में भटकते हुए किसी तरह समय कट रहा था। ऐसे ही एक दिन जब मां कुंती समेत सब थके हारे एक वृक्ष के नीचे आराम कर रहे थे, एक राक्षस, जिसका नाम हिड़िंब था, की नज़र इन पर पड़ी। मानव मांस भक्षण का अवसर देख उसने अपनी बहन हिड़िंबा को इन्हें मार कर लाने का आदेश दिया। हिड़िंबा पांडवों तक आ तो गयी पर भीम का अप्रतिम सौंदर्य और पुरुषोचित रूप देख उस पर मुग्ध हो कर रह गयी। एक अपरचित नारी को सामने देख भीम ने उसका परिचय पूछा तो उसने अपनी कामना के साथ-साथ सब सच-सच बता दिया।
इतने में बहन को गये काफी वक्त हुआ देख वहां हिड़िंब भी आ धमका। बहन को मानवों से बात करता देख वह आग-बबूला हो उठा और उसने इन लोगों पर हमला कर दिया। भीषण युद्ध के बाद हिड़िंब मारा गया।
कुंती हिड़िंबा के व्यवहार से प्रभावित हुई थी। उसने हिड़िंबा का विवाह सशर्त करना स्वीकार कर लिया। शर्तें तीन थीं। पहली हिड़िंबा राक्षसी आचरण का पूरी तरह त्याग कर देगी। दूसरी, भीम दिन भर उसके पास रहेगा पर रात को हर हालत में अपने भाईयों के पास लौट आयेगा। तीसरी और सबसे अहम कि पुत्र प्राप्ति के बाद हिड़िंबा को पति से सदा के लिए अलग होना पड़ेगा। हिडिंबा ने खुशी-खुशी सारी बातें मान लीं। समयानुसार उसको पुत्र की प्राप्ति हुई। जिसका नाम रखा गया घटोत्कच। जिसने बाद में महाभारत युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुत्र प्राप्ति के बाद हिड़िंबा ने तपस्विनी की तरह रहते हुए अपना सारा समय अपने पुत्र के भविष्य को संवारने में लगा दिया। अपने सात्विक जीवन और तपोबल से वह जन आस्था का केन्द्र बन एक देवी के रूप में अधिष्ठित हो गयी।
इसी हिड़िंबा देवी का मंदिर हिमाचल के कुल्लू जिले के मनाली नामक स्थान पर स्थित है। कुल्लू शहर से मनाली की दूरी 40की.मी. है। वहां से सड़क मार्ग से 2की.मी. चलने पर आसानी से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। वैसे सीढियों द्वारा भी जाया जा सकता है पर वह काफी श्रमसाध्य सिद्ध होता है। घने देवदार के वृक्षों से घिरे इस स्थान पर पहुंचते ही मन को एक अलौकिक शांति का एहसास होता है। पहले यहां कफी घना जंगल था पर अब इसे सुंदर उपवन का रूप दे दिया गया है। जिसका सारा श्रेय पुरातत्व विभाग को जाता है। यह मंदिर लकड़ी की बनी एक अद्वितीय रचना है। कलाकार ने इस पर अद्भुत कारीगरी कर विलक्षण आकृतियां उकेरी हैं। यहां के निवासियों का अटूट विश्वास है कि मां हिड़िंबा उनकी हर तरह की आपदा, विपदा, अला-बला से रक्षा करती हैं। इनकी पूजा पारंपरिक ढंग से धूमधाम से की जाती है।
यह एक उदाहरण है, कि यदि कोई दृढ प्रतिज्ञ हो तो वह क्या नहीं कर सकता। हिड़िंबा ने राक्षसकुल में जन्म लिया, भीम के संसर्ग से मानवी बनी और फिर अपने तपोबल के कारण देवी होने का गौरव प्राप्त किया।
इतने में बहन को गये काफी वक्त हुआ देख वहां हिड़िंब भी आ धमका। बहन को मानवों से बात करता देख वह आग-बबूला हो उठा और उसने इन लोगों पर हमला कर दिया। भीषण युद्ध के बाद हिड़िंब मारा गया।
कुंती हिड़िंबा के व्यवहार से प्रभावित हुई थी। उसने हिड़िंबा का विवाह सशर्त करना स्वीकार कर लिया। शर्तें तीन थीं। पहली हिड़िंबा राक्षसी आचरण का पूरी तरह त्याग कर देगी। दूसरी, भीम दिन भर उसके पास रहेगा पर रात को हर हालत में अपने भाईयों के पास लौट आयेगा। तीसरी और सबसे अहम कि पुत्र प्राप्ति के बाद हिड़िंबा को पति से सदा के लिए अलग होना पड़ेगा। हिडिंबा ने खुशी-खुशी सारी बातें मान लीं। समयानुसार उसको पुत्र की प्राप्ति हुई। जिसका नाम रखा गया घटोत्कच। जिसने बाद में महाभारत युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुत्र प्राप्ति के बाद हिड़िंबा ने तपस्विनी की तरह रहते हुए अपना सारा समय अपने पुत्र के भविष्य को संवारने में लगा दिया। अपने सात्विक जीवन और तपोबल से वह जन आस्था का केन्द्र बन एक देवी के रूप में अधिष्ठित हो गयी।
इसी हिड़िंबा देवी का मंदिर हिमाचल के कुल्लू जिले के मनाली नामक स्थान पर स्थित है। कुल्लू शहर से मनाली की दूरी 40की.मी. है। वहां से सड़क मार्ग से 2की.मी. चलने पर आसानी से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। वैसे सीढियों द्वारा भी जाया जा सकता है पर वह काफी श्रमसाध्य सिद्ध होता है। घने देवदार के वृक्षों से घिरे इस स्थान पर पहुंचते ही मन को एक अलौकिक शांति का एहसास होता है। पहले यहां कफी घना जंगल था पर अब इसे सुंदर उपवन का रूप दे दिया गया है। जिसका सारा श्रेय पुरातत्व विभाग को जाता है। यह मंदिर लकड़ी की बनी एक अद्वितीय रचना है। कलाकार ने इस पर अद्भुत कारीगरी कर विलक्षण आकृतियां उकेरी हैं। यहां के निवासियों का अटूट विश्वास है कि मां हिड़िंबा उनकी हर तरह की आपदा, विपदा, अला-बला से रक्षा करती हैं। इनकी पूजा पारंपरिक ढंग से धूमधाम से की जाती है।
यह एक उदाहरण है, कि यदि कोई दृढ प्रतिज्ञ हो तो वह क्या नहीं कर सकता। हिड़िंबा ने राक्षसकुल में जन्म लिया, भीम के संसर्ग से मानवी बनी और फिर अपने तपोबल के कारण देवी होने का गौरव प्राप्त किया।
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009
कुछ इधर की कुछ बहुत उधर की
* मरने के बाद भी वह शासन करता रहा -
* पोपाई द सेलर का जीता जागता रूप -
* शव यात्रा, जो साल भर तक चली -
* खानदानी असर -
* अस्थिर दिमाग का अनोखा उदाहरण -
फ्रेंच कोंगो के कोंडे प्रदेश के शासक, 'कोकोडो, के मरने के बाद उसका शव एक चौकोर कौफीन में तीन साल तक रख छोडा गया था। उसे भोजन और पैसा उपलब्ध कराया जाता रहा था। ऐसा इसलिए की वह आराम से सोच सके की उसे मृत रहना है की नहीं।
नोट :- उसने मृत रहने का ही निर्णय लिया।* पोपाई द सेलर का जीता जागता रूप -
जापान के डाक्टर काकुजी योशीदा ने बच्चों को स्वस्थ रखने का गुर सिखाने के लिए एक अनोखा कारनामा किया। उन्होंने ६ साल में करीब ८२८० पाउंड पालक खाई। तकरीबन तीन पाउंड रोज। उनका कहना था इससे वे खुद को भी स्वस्थ और तरोताजा रख सके थे।
* शव यात्रा, जो साल भर तक चली -
चीन के एक जनरल की शवयात्रा, पेकिंग से चल कर काश्गार, सिंकियांग तक गयी थी। जिनके बीच की दूरी २३०० मील थी। यह यात्रा एक जून १९१२ से शुरू हो कर एक जून १९१३ तक चलती रही थी।
* खानदानी असर -
बीमारी इत्यादि का असर तो सुना है, पीढियों तक चलता है। पर इसको क्या कहेंगे जब वाशिंगटन के रोजलिन इलाके के विलियम लुमस्देंन ने अपना बायाँ हाथ एक एक्सीडेंट में खोया तो वह अपने खानदान की चौथी पीढी का ऐसा सदस्य बन गया। इसके पहले उसके परदादा, दादा और पिता उसी की उम्र में अपना बायाँ हाथ किसी न किसी हादसे में गंवा चुके थे।
* अस्थिर दिमाग का अनोखा उदाहरण -
बेल्जियम की एड्रियेंन कुयोत की २३ सालों में ६५२ बार मंगनी था ५३ बार शादी हुई। पर वह कभी भी स्थिर दिमाग नहीं रह पायी और ओसत हर १२ वें दिन उसने अपना मन बदल कर सम्बन्ध तोड़ लिए।
******इधर खुदा है, उधर खुदा है, सामने खुदा है, पीछे खुदा है, अगल खुदा है, बगल खुदा है। ******
******जहाँ नहीं खुदा है, वहाँ कल खुदेगा। हाय रे मेरा शहर!!!!!!!!!सोमवार, 6 अप्रैल 2009
प्रह्लाद जैसा भाग्य एलेक्सिस का नहीं था
यह कहानी सदियों पहले हमारे देश में घटी, प्रह्लाद की कहानी से मिलती-जुलती है। पर अंत में जहां प्रह्लाद को भगवान का सहारा मिल गया था। वैसा खुशनसीब एलेक्सिस नहीं रहा-------- रूस, जहां हुआ एक तानाशाह, नाम पीटर। आतंक का जीता-जागता रूप। जिसने खुद को ईश्वर घोषित कर रखा था। जिसके शासन काल में हजारों लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ी थीं। जो अपना जरा सा भी विरोध सहन नहीं कर पाता था। उसी पीटर का एकमात्र बेटा था, एलेक्सिस। बाप से बिल्कुल विपरीत, शांत, दयालू, विनम्र था जनता का लाड़ला। देशवासी उसे अपनी जान से भी ज्यादा चाहते थे। और यही कारण था कि पीटर के शंकालू मन में अपने ही बेटे के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न होती चली गयी। यहां तक कि वह अपनी पत्नि, यूडेसिआ, से भी घृणा करने लगा जिसने ऐसे पुत्र को जन्म दिया। बात इतनी बिगड़ गयी कि एक दिन एलेक्सिस की अनुपस्थिति में उसने यूड़ेसिया को बंदीगृह में डाल दिया। लौटने पर जब एलेक्सिस को यह पता चला तो वह शोकग्रस्त हो गया। वैसे भी उसे अपने पिता की कार्यप्रणाली से नफरत थी, पर वह अपने पिता को चाहता भी था। इसीलिए वह जनता की भलाई में लगा रहता था, जिससे लोगों में उसके पिता के प्रति नफरत कम हो जाए। पर होता इसका उल्टा ही रहा। वह जनता में लोकप्रिय होता चला गया और पीटर बदनाम। इससे पीटर की क्रोधाग्नि और भड़कती चली गयी। उसे यह सब अपने विरुद्ध षड़यंत्र लगता था। उसके शक को उसके चापलूस दरबारी और हवा देते रहते थे। अंत में पीटर ने एलेक्सिस का महल से बाहर निकलना बंद करवा दिया और धीरे-धीरे उसे मदिरा की लत लगवा दी। यह सब देख पीटर के एक मंत्री ने भविष्य भांप कर अपनी बेटी, कैथरिन, की शादी पीटर से करवा दी जिससे उसके पुत्र को राज मिल सके। कैथरिन बहुत चालाक और महत्वाकांक्षी थी। उसने पीटर को अपने मोह पाश में जल्दि ही फंसा लिया। उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम भी पीटर ही रखा गया। अब एलेक्सिस को अपनी राह से हटाने की कोशिशें तेज हो गयीं। एक बार उसे मदिरा में जहर मिला कर दिया गया पर दैवयोग से वह विषयुक्त मदिरा उसके एक सेवक ने पी ली, जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। फिर एक बार एलेक्सिस के कमरे में विस्फोटक पदार्थ रख दिए गये पर इस बार भी बाहर रहने की वजह से वह बच गया। धीरे-धीरे एलेक्सिस को अपने पिता और सौतेली मां के षड़यंत्रों की जानकारी मिलने लगी तो उसने रूस छोड़ने का ही मन बना लिया। उसने अपने इस फैसले की जानकारी अपने पिता को दे कर कहा कि मुझे सिंहासन से कोई लगाव नहीं है, मैं कोई अधिकार भी नहीं चाहता, मुझे सिर्फ यहां से चले जाने की आज्ञा दे दी जाए। परंतु शक्की पीटर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। अत: एक रात एलेक्सिस अपनी पत्नि के साथ महल छोड़ निकल पड़ा और रोम में शरण ली। परंतु वहां भी पीटर ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और अपने जासूसों से उसका अपहरण करवा फिर रूस ले आया और बंदीखाने में ड़ाल दिया। इतने से भी उसका मन नहीं भरा और उसने एलेक्सिस को कठोर यातनाएं देनी शुरु कर दीं। पर उसके जिंदा रहने से कैथरिन को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा था सो उसने पीटर को उकसा कर एलेक्सिस पर राजद्रोह का इल्जाम लगवा उसे मृत्युदंड़ दिलवा दिया। फांसी पर चढते समय एलेक्सिस ने रोते हुए कहा कि मुझे मरने का ना दुख है ना खौफ। मुझे एक ही बात का गम है कि मैं अपने ही पिता को यह विश्वास नहीं दिला पाया कि मैं उनका दुश्मन नहीं हूं।
रविवार, 5 अप्रैल 2009
थका-हारा, लस्त-पस्त कौवा कितने कंकड़ ला सकता था ?
छुटपन से पढ़ते आ रहे हैं की चतुर कौवे ने कंकड़ ला-ला कर घडा भरा और अपनी प्यास बुझाई। पर सोचने की बात है की क्या सचमुच थके-बेहाल कौवे ने इतनी मेहनत की होगी, या कुछ और बात थी। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ था ------------
बात कुछ पुरानी है। कौआ सभी पशु-पक्षियों में चतुर सुजान समझा जाता था। उसकी बुद्धिमत्ता की धाक चारों ओर फैली हुई थी। ऐसे ही वक्त बीतता रहा। समयानुसार गर्मी का मौसम भी आ खड़ा हुआ, अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले -पोखर-तालाब सूख गए। पानी के लिए त्राहि- त्राहि मच गई। ऐसे ही एक दिन हमारा कौवा पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। उसकी जान निकली जा रही थी। पंख जवाब दे रहे थे। कलेजा मुहँ को आ रहा था। तभी अचानक उसकी नजर एक झोंपडी के बाहर पड़े एक घडे पर पड़ी। वह तुरंत वहां गया, उसने घड़े में झांक कर देखा, उसमे पानी तो था पर एक दम तले में। उसकी पहुँच के बाहर। कौवे ने अपनी अक्ल दौडाई और पास पड़े कंकडों को ला-ला कर घडे में डालना शुरू कर दिया। परन्तु एक तो गरमी दुसरे पहले से थक कर बेहाल ऊपर से प्यास। कौवा जल्द ही पस्त पड़ गया । अचानक उसकी नजर झाडी के पीछे खड़ी एक बकरी पर पड़ी जो न जाने कब से इसका क्रिया-कलाप देख रही थी। यदि बकरी ने उसकी नाकामयाबी का ढोल पीट दिया तो ? कौवा यह सोच कर ही काँप उठा। तभी उसके दिमाग का बल्ब जला और उसने अपनी दरियादिली का परिचय देते हुए बकरी से कहा कि कंकड़ डालने से पानी काफी ऊपर आ गया है तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो सो पहले तुम पानी पी लो। बकरी कौवे की शुक्रगुजार हो आगे बढ़ी पर घडे से पानी ना पी सकी। कौवे ने फिर राह सुझाई कि तुम अपने सर से टक्कर मार कर घडा उलट दो इससे पानी बाहर आ जायेगा तो फिर तुम पी लेना। बकरी ने कौवे के कहेनुसार घडे को गिरा दिया। घडे का सारा पानी बाहर आ गया, दोनों ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई।
बकरी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का जम कर प्रचार किया। सो आज तक कौवे का गुणगान होता आ रहा है। नहीं तो क्या कभी कंकडों से भी पानी ऊपर आता है ?
बात कुछ पुरानी है। कौआ सभी पशु-पक्षियों में चतुर सुजान समझा जाता था। उसकी बुद्धिमत्ता की धाक चारों ओर फैली हुई थी। ऐसे ही वक्त बीतता रहा। समयानुसार गर्मी का मौसम भी आ खड़ा हुआ, अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले -पोखर-तालाब सूख गए। पानी के लिए त्राहि- त्राहि मच गई। ऐसे ही एक दिन हमारा कौवा पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। उसकी जान निकली जा रही थी। पंख जवाब दे रहे थे। कलेजा मुहँ को आ रहा था। तभी अचानक उसकी नजर एक झोंपडी के बाहर पड़े एक घडे पर पड़ी। वह तुरंत वहां गया, उसने घड़े में झांक कर देखा, उसमे पानी तो था पर एक दम तले में। उसकी पहुँच के बाहर। कौवे ने अपनी अक्ल दौडाई और पास पड़े कंकडों को ला-ला कर घडे में डालना शुरू कर दिया। परन्तु एक तो गरमी दुसरे पहले से थक कर बेहाल ऊपर से प्यास। कौवा जल्द ही पस्त पड़ गया । अचानक उसकी नजर झाडी के पीछे खड़ी एक बकरी पर पड़ी जो न जाने कब से इसका क्रिया-कलाप देख रही थी। यदि बकरी ने उसकी नाकामयाबी का ढोल पीट दिया तो ? कौवा यह सोच कर ही काँप उठा। तभी उसके दिमाग का बल्ब जला और उसने अपनी दरियादिली का परिचय देते हुए बकरी से कहा कि कंकड़ डालने से पानी काफी ऊपर आ गया है तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो सो पहले तुम पानी पी लो। बकरी कौवे की शुक्रगुजार हो आगे बढ़ी पर घडे से पानी ना पी सकी। कौवे ने फिर राह सुझाई कि तुम अपने सर से टक्कर मार कर घडा उलट दो इससे पानी बाहर आ जायेगा तो फिर तुम पी लेना। बकरी ने कौवे के कहेनुसार घडे को गिरा दिया। घडे का सारा पानी बाहर आ गया, दोनों ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई।
बकरी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का जम कर प्रचार किया। सो आज तक कौवे का गुणगान होता आ रहा है। नहीं तो क्या कभी कंकडों से भी पानी ऊपर आता है ?
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
ऊँट, प्रकृति की एक अजूबी करामात
ऊंट के बारे में हम बचपन से ही पढते-सुनते आए हैं। फिर भी प्रकृति के इस अजीबोगरीब जानवर के बारे में लगता है कि इसे हम पूर्णतया नहीं जान पाए हैं। आईए देखें इसको सूक्ष्मदर्शी से :-
ऊंट के होंठ खरगोश की तरह के होते हैं।
इसके दांत और पेट चूहे से मेल खाते हैं।
इसके पैर हाथी से मिलते-जुलते होते हैं।
इसकी गर्दन हंस जैसी होती है।
इसका खून पक्षियों जैसा होता है और इसका पित्ताशय (gall bladder) नहीं होता।
यह पलकें बंद कर भी देख सकता है।
यह अपने नथुने बालू के बवंडर में बंद कर रह सकता है।
यह अपने पेट और कूबड़ में पानी जमा कर, बिना पानी बहुत दिनों तक रह सकता है। यह तो बहुत से लोगों को मालुम है। पर स्वच्छ जल इसके लिए हानिकारक हो सकता है। इसे खारा पानी ज्यादा पसंद है, यह कम ही लोगों को मालुम होगा।
इसकी पलकों पर मुलायम रेशमी बाल होते हैं जो इसकी आंखों को सूर्य की चकाचौंध से बचाते हैं।
किसी मरे हुए ऊंट को देख कर इसकी हालत बिगड़ जाती है।
कहते हैं कि एक बार पूराने जमाने में कोई व्यापारी इस पर दूध लाद कर ले जा रहा था। इसकी अजीबोगरीब चाल से धचके लग-लग कर दूध, मक्खन में बदल गया। इस तरह मनुष्य के लिए अमृत समान एक पौष्टिक खुराक की ईजाद हुई।
जानवरों के विशेषज्ञ, जिन्होंने अपनी जिंदगी ऊंटों के अध्ययन में गुजार दी, उनका भी मानना है कि वे इस जानवर के बारे में अधिक नहीं जानते। तो फिर हम कहां टिकते हैं।
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009
अजब-गजब दुनिया ( - :
हमारी दुनिया अजूबों से भरी पड़ी है। कभी-कभी तो विश्वास ही नहीं होता कि क्या ऐसा भी हो सकता है ? आज बाप-बेटों के कुछ नमूने देखें -
मोरोक्को के शाह, मुलाइ ईस्माइल (1646-1727) के 888 बच्चे थे। उसकी सेना की एक रेजिमेंट थी जिसमें 540 सैनिक थे और वे सारे के सारे उसके बेटे थे।
टर्की के सुल्तान, मुस्तफा IV (1717-1774) के 582 बच्चे थे। सारे के सारे लड़के। सत्रह सालों तक कन्या पाने की उसकी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं।
सुल्तान अब्दुल हमीद II, (1876-1909) के सिर्फ 500 के करीब बच्चे थे। आश्चर्य इस बात का नहीं है, आश्चर्य इस बात का है कि उसकी 30,000 पत्नियां थीं।
पोलैंड के अगस्ट II और सैक्सोनी (1670-1733) के 355 बच्चे थे, जिनमें 354 नाजायज औलादें थीं। एकमात्र जायज बेटा अगस्ट III था, जो बाद में राजा बना।
फ्रांस में बोरडिक्स के जीन गाई साहब की किस्मत देखिए। उन्होंने 16 बार शादी की। हर बार वधू अपने साथ अपने बच्चों को लाई। अंत में इन्होंने जब सारे बच्चों का हिसाब लगाया तो पाया कि वे 121 बच्चों के सौतेले पिता हैं।
अंत में फ्रांस के ही पुयी-दि-डोम के जैक्स दि थियर्स (1630-1747) की खुशकिस्मति देखिए। इनके 25 लड़के और एक लड़की थी। इनका प्रत्येक बेटा फ्रांस की सेना में कर्नल बना। हरेक ने युद्ध में अपनी-अपनी रेजिमेंट के साथ लड़ते हुए नाम कमाया। युद्ध के बाद लुइस XIV ने उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया जिसमें उल्लेख था कि इन 25 थियर्स भाईयों, जो कि श्रीमान जैक्स थियर्स के बेटे हैं के कारण ही युद्ध जीता जा सका। गर्वोनत जैक्स थियर्स ने 117 साल की उम्र प्राप्त की।
मोरोक्को के शाह, मुलाइ ईस्माइल (1646-1727) के 888 बच्चे थे। उसकी सेना की एक रेजिमेंट थी जिसमें 540 सैनिक थे और वे सारे के सारे उसके बेटे थे।
टर्की के सुल्तान, मुस्तफा IV (1717-1774) के 582 बच्चे थे। सारे के सारे लड़के। सत्रह सालों तक कन्या पाने की उसकी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं।
सुल्तान अब्दुल हमीद II, (1876-1909) के सिर्फ 500 के करीब बच्चे थे। आश्चर्य इस बात का नहीं है, आश्चर्य इस बात का है कि उसकी 30,000 पत्नियां थीं।
पोलैंड के अगस्ट II और सैक्सोनी (1670-1733) के 355 बच्चे थे, जिनमें 354 नाजायज औलादें थीं। एकमात्र जायज बेटा अगस्ट III था, जो बाद में राजा बना।
फ्रांस में बोरडिक्स के जीन गाई साहब की किस्मत देखिए। उन्होंने 16 बार शादी की। हर बार वधू अपने साथ अपने बच्चों को लाई। अंत में इन्होंने जब सारे बच्चों का हिसाब लगाया तो पाया कि वे 121 बच्चों के सौतेले पिता हैं।
अंत में फ्रांस के ही पुयी-दि-डोम के जैक्स दि थियर्स (1630-1747) की खुशकिस्मति देखिए। इनके 25 लड़के और एक लड़की थी। इनका प्रत्येक बेटा फ्रांस की सेना में कर्नल बना। हरेक ने युद्ध में अपनी-अपनी रेजिमेंट के साथ लड़ते हुए नाम कमाया। युद्ध के बाद लुइस XIV ने उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया जिसमें उल्लेख था कि इन 25 थियर्स भाईयों, जो कि श्रीमान जैक्स थियर्स के बेटे हैं के कारण ही युद्ध जीता जा सका। गर्वोनत जैक्स थियर्स ने 117 साल की उम्र प्राप्त की।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
महाबलीपुरम का शोर मंदिर, यह कैसा नाम
आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए आने-जाने वाले समुद्री व्यापारियों और नाविकों की सहूलियत व सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की व...
-
कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
-
शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
-
आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
-
चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
-
युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
-
कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
-
हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
-
"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
-
अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...



